Thursday, August 10, 2017

आनन्‍द
स्‍मृतियां !
दीवार पर चस्‍पा,
काई की परतें।
कल्‍पनाएं !
बंद किवाड़ों की बिवाइयों
से झांकता आंगन ।
स्‍मृतियां/ कल्‍पनाएं
अतीत/ भविष्‍य
और, वर्तमान ?
मुरझा गया है,
बंद किवाड़ों के आंगन में
खड़े शजर की तरह।
अतीत मृत्‍यु  है,
स्‍मृतियां मृत्‍यु का आलिंगन।
भविष्‍य अज्ञात है,
कल्‍पनाएं मृत्‍यु का आह्वान
अतीत और भविष्‍य से परे
स्‍मृति और कल्‍पनाओं से विलग
वर्तमान ही जीवन है।
वहीं आनन्‍द है।
वही आनन्‍द है।


Wednesday, November 4, 2015

मूंग की दाल


 
बॉस की झाड़ और राह की धूल, दोनों झाड़ने के बाद मुन्नालाल खाना खाने बैठ गया। रोटी का टुकड़ा तोड़ा और सब्जी की कटोरी में भिगोया। टुकड़ा कटोरी में ऐसे डूब गया जैसे बिना पतवार की नाव नदी में। मुन्नालाल का जायका बे-जायका हो गया। उसने चिल्लाकर पत्नी से पूछा, ''भागवान! आज यह क्या बना लाई?''
पत्नी ने रसोई से ही सहज भाव से जवाब दिया, ''दाल!''
पत्नी का जवाब सुन मुन्नालाल आसन से खड़े हो कर बदन के कपड़े उतारने लगा। तभी दूसरी रोटी लेकर पत्नी रसोई से बाहर आई और पति की हरकत देख अवाक रह गई। आश्चर्य व्यक्त करते हुए उसने पूछा, ''क्यों जी! खाना खाते-खाते यह क्या?''
मुन्नालाल ने जवाब दिया, ''कुछ नहीं! बस कपड़े उतार कर कटोरी में डुबकी लगाने की सोच रहा हूँ।''
पत्नी ने पूछा, ''क्यूं जी?''
मुन्नालाल ने जवाब दिया, ''कुछ नहीं! तुम्हारी बनाई दाल में दाल के दाने खोजने के लिए।'' 
पत्नी पहले तो खिल-खिला कर हँस दी और फिर खिन्न भाव से बोली, ''दस हजार रुपल्ली की तनख्वाह में दाल मक्खनी के ख्वाब देखते हो!'' 
निरीह भाव से मुन्नालाल बोला, ''मक्खनी दाल मैने कब माँगी है। मूंग-मसूर जिसकी भी दाल बनानी थी, दो-चार दाल के दाने तो गरम पानी में डाल देती।''
महंगाई की तरह पत्नी ने नाक-भौं सिकोड़ी और फिर कटाक्ष किया, ''यह मुंह और मसूर की दाल। महंगाई के आइने में थोपड़ा देखे कितने दिन हो गए हैं? कभी-कभी घर के पिछवाड़े जाकर दुकानदार का आइना भी झाँक आया करो। पता है, मूंग की दाल भी अंतरिक्ष की सैर पर निकली है। दाल के दो-चार दाने ही डिब्बे में बचे हैं, उन्हें हारी-बिमारी में खिचड़ी बनाने के लिए बचा कर रखा हैं।'' 
झड़-बेरी के बेर की तरह मुन्नालाल का चेहरा महंगाई पुराण की कथा सुन सिकुड़ कर रह गया। बदन के कपड़ों पर से पकड़ ढीली पड़ गई। वह अनमने मन से रोटी का टुकड़ा सटकने बैठ गया। तभी पत्नी ने फिर कटाक्ष किया, ''जल्दी करो, कहीं म्यूनिसपैल्टी ने भी पानी के दाम बढ़ा दिए तो सूखी कटोरी से ही टुकड़ा रगड़ना पड़ जाएगा।''
टुकड़े सटकते-सटकते वह सोचने लगा, 'कैसा जमाना आ गया है, टमाटर गरीब के पथरी करने लगा है। गरीब की रोटी छोड़ प्याज राजनीति में चला गया है। उसकी रुचि सरकार गिराने बनाने में है। नेताओं की तरह गरीब की थाली में कभी-कभी दिखलाई पड़ती है। एक बचा था आलू, उसे भी अब सब्जियों का राजा होने का अहसास हो गया है। उसने भी आम आदमी से मुंह फेर लिया है। शुक्र है! जैसी भी है, हथेली पर रोटी बरकरार है। पता नहीं कितने दिन।'' उसने फटाफट वजन पेट में डाला और चारपाई पकड़ ली। आँख लगी ही थी कि सपने में एक सुंदरी ने प्रवेश किया। मंद-मंद मुसकराते हुए उसने अपने मुख पर हाथ फेरा और उसकी तुलना मसूर की दाल से करते हुए पूछा, ''भद्रे! आप कौन हैं? कौन सी दाल का प्रतिनिधित्व करती हैं?'' 
सुंदरी मुसकरा कर बोली, ''प्रिय मुन्नालाल, ठीक पहचाना! मैं दाल ही हूँ, मगर मूंग की दाल..।'' मुन्नालाल बीच ही में बोला, '' ..किंतु, भद्रे! तुम्हें तो पत्नी ने हारी-बीमारी में खिचड़ी के लिए डिब्बे में बंद कर रखा है!'' 
''चिंता मत करो, प्रिय! भोग के लिए मैं यहाँ उपस्थित नहीं हुई हूँ। जब तुम बीमार पड़ोगे तो खिचड़ी में अवश्य दर्शन दूंगी!''
''.. फिर अब यहाँ क्यों?'' ''तुम्हारी चिंता, तुम्हारी शंका निवारण करने के लिए उपस्थित हुई हूँ, प्रिय!'' 
''कहो, शीघ्र कहो, जो भी कहना है! देश के कर्णधारों को यदि पता चल गया कि तुम मुन्नालाल के सपनों में आती हो तो उस पर भी पाबंदी लगा देंगे।'' 
''चिंता न करो, प्रिय! दिवास्वप्न पर पाबंदी लग सकती है। रात्रि-स्वप्न देखने से तुम्हें कोई वंचित नहीं कर पाएगा।''
स्‍वप्‍न-सुंदरी का चेहरा ठण्डे पानी में भीगी दाल की तरह यकायक सिकुड़ गया और ठिठुरे मुंह से वह आगे बोली, ''प्रिय! सरकार ने तुम्हें गरीबी रेखा से ऊपर खींचने का भरसक प्रयास किया, किंतु तुम फैवीकोल के जोड़ की तरह वहीं चिपके रहे। जब अहसास हुआ कि लक्ष्मण रेखा पार न करने के लिए तुम प्रतिज्ञाबद्ध हो, तो सरकार ने लक्ष्मण रेखा का दायरा सीमित करने का प्रयास किया, किंतु खेद कि तुम फिर भी सीमा रेखा से बाहर नहीं आए। सरकार दिन-रात तुम्हारी ही बेहतरी की चिंता में दुबली हो रही है। जब भी अवसर प्राप्त होता है, अच्‍छे दिन आएं या न आएं किंतु तुम्हें अच्‍छे दिन' का अहसास करने के प्रयास में लगी रहती है, किंतु खेद कि तुम्हारे भाग्य का सूर्य हमेशा बादलों में ही छिपा रहता है,चमक ही नहीं पाता।''
सुंदरी ने ठिठुरे अपने चेहरे पर हाथ फेर कर झुर्रीयां मिटाने का प्रयास किया और फिर आगे बोली, ''बताओ, प्रिय तुम्ही बताओ! मैं या प्याज, आलू या टमाटर, कब तक तुम्हारे साथ चिपके रहते। अपना-अपना मुकद्दर प्रिय! तुम गरीबी की लक्ष्मण रेखा लांघ न सके, इंतजार के बाद हम रेखा लांघ ऊपर वालों की जमात में शामिल हो गए। प्रिय! मैं भी कब तक घर की मुर्गी के भाव तुलती रहती, आखिर मेरे भी तो अपने अरमान है, सपने हैं।''
इतना कह कर मूंग की दाल मुन्नालाल के सपने से भी गायब हो गई। उसने करवट बदली और गहरी नींद लेने का महंगा प्रयास किया। तभी दूसरा सपने ने उसे आ घेरा, ''घास की रोटी का एक टुकड़ा उसके हाथ में था, जिसे वह डिब्बे में छिपाने जा रहा था, तभी एक ऊदबिलाऊ उसकी ओर झपटा और उसके हाथ से टुकड़ा छीन कर भाग गया!''
भयभीत मुन्नालाल के मुंह से चीख निकली। चीख सुनकर उसकी पत्नी भी जाग गई। सपने की बात उसने पत्नी को बताई। पत्नी ने उसे सांत्वना दी, ''डरो मत, सो जाओ। ऊदबिलाऊ नहीं था, महंगाई थी।''

††††

Wednesday, September 2, 2015

चरण कमल बंदौ..!



उन्हें आज शर्मा जी के विद्यालय का उद्ंघाटन करने आना है। समारोह का उदघोषक बार-बार घोषणा कर रहा है- मंत्रीजी के चरण कमल शीघ्र ही पड़ने वाले हैं।
उदघोषक मंत्रीजी के आने में विलंब का कारण बता रहा है, मंत्रीजी किसी आवश्यक मीटिंग में व्यस्त हैं। वह शाश्वत सत्य का उच्चारण कर रहा है। नेता मीटिंग, चीटिंग, डेटिंग में ही व्यस्त रहा करते हैं!
मंत्रीजी अपने जीवन में पहली बार ही किसी विद्यालय में प्रवेश करेंगे। इससे पूर्व उन्होंने कभी निगम की प्राइमरी पाठशाला में भी प्रवेश प्राप्त करने की जहमत नहीं उठाई। अब विद्यालयों में आना-जाना उनकी मजबूरी है, क्योंकि वे शिक्षामंत्री हैं। शिक्षामंत्री न भी होते तो भी शर्मा जी के उद्घाटन समारोह में तो उन्हें आना ही था, क्योंकि शर्मा जी इलाके के बड़े इंडस्ट्रियलिस्ट हैं। यह भी एक शाश्वत सत्य है कि नेता के इंडस्ट्रियलिस्ट, जर्नलिस्ट, पामिस्ट्रों से ही प्रगाढ़ संबंध होते हैं। 
मंत्रीजी पधार चुके हैं। उदघोषक बता रहा है, मंत्रीजी अब अपने करकमलों से फीता काट कर विद्यालय का उदघाटन करेंगे। मंत्रीजी ने चांदी की थाली में रखी चांदी की कैंची उठाई, चांदी का रिबन काटा और विद्यालय छात्रों को समर्पित कर दिया। वे जब से राजनीति में आए हैं, तब से उनकी चांदी ही चांदी है। थाली भी चांदी की, कैंची भी चांदी की ही, रिबन भी चांदी का ! मंत्रीजी चांदी से चांदी काट रहे हैं!
उदघोषक बता रहा है, मंत्रीजी अब अपने कमल मुख से शिक्षा के महत्व पर प्रकाश डालेंगे! इसके साथ ही उदघोषक महोदय आज के इस शुभ दिन का महत्व का बखान करते हुए एक रहस्योदघाटन भी करता है। वह बता रहा है कि मंत्रीजी की कृपा से आज ही के दिन शर्माजी को पुत्र-रत्‍‌न की प्राप्ति हुई थी।
मंत्रीजी कमल नयनों से छात्रों को निहारते हैं और फिर कमल मुख से शिक्षा के महत्व पर बोलना शुरू करते हैं। मंत्रीजी बोलना शुरू करते हैं और हम विचार करना, 'निरक्षर रहकर शिक्षामंत्री बनना लाभप्रद है अथवा साक्षर हो कर शिक्षामंत्री का दरबारी बनना?' शर्माजी को पुत्ररत्‍‌न प्राप्ति में मंत्रीजी की कृपा का योगदान हमारे विचार-मंथन का दूसरा विषय था। हमारे लिए विचारणीय तीसरा प्रश्न था, 'मंत्रीजी का यकायक कमल-कमल हो जाना।'
वास्तव में जब से वे राजनीति में आए हैं, उनके शरीर में कुछ जैविक परिवर्तन होने लगे हैं। इंसान तो वे पहले भी नहीं थे। इंसान के रूप में कुछ और ही थे, मगर अब तो उनका संपूर्ण शरीर ही कमल हो गया है। वे कमल स्वरूप हो गए हैं। हां, उनके चरण कमल हो गए हैं। कर कमल हो गए हैं। नयन भी कमल हो गए हैं और मुख भी कमल!
चरण कमल, कर कमल, नयन कमल, मुख कमल। कुल जमा वे 'चरण कमल बंदौ रघुराई' हो गए हैं। हमारा मन भगवान राम का स्तुति-गान करने लगता है, 'श्रीरामचंद्र कृपालु भज मन हरण भवभय दारुणं। नवकंज-लोचन, कंज-मुख, कर-कंज पद कंजारूणं॥'
हम आश्चर्यचकित हैं कि कल तक जिनका स्वरूप कैक्टस के माफिक था, यकायक वे कोमलांग कैसे हो गए, कमल कैसे हो गए? कल तक जो हाथ बबूल की लकड़ी से कर्कश थे, वे यकायक कमल-ककड़ी हो गए, जिन पैरों की आहट से बस्ती कांपती थी, वे अब कमल-शाख हो गए हैं, भय का प्रतीक मुख मंडल, भवभय दारुणं हो गया है और ज्वाला उगलते नयन कमल से निर्मल किस प्रकार हो गए!
आश्चर्य-घोर आश्चर्य, कैक्टस से गुलाब हो जाते तो भी गनीमत थी, फूल के साथ कम से कम कांटे तो होते। बस समानता इतनी शेष बची है कि कल तक वे हाथ में खंजर लिए समारोह का समापन करते थे। आज हाथ में कैंची लिए घूमते हैं, लाल-लाल फीते काटते हैं, उदघाटन करते हैं।
हम सोच रहे हैं कि क्या राजनीति क्षीर सागर हो गई है? उसमें जो भी गोता लगाता है, विष्णु भगवान का अवतार हो जाता है! नीर- क्षीर विवेक का लेक्टोमीटर हो जाता है!
हमने जीव विज्ञानी अपने एक मित्र से जैविक इस परिवर्तन का कारण पूछा। वे बोले, दोष उस चित्रकार का है जिसने श्रद्धावश भगवान विष्णु को कमल पर बिठा दिया। भगवान को कमल सदृश्य बना दिया। पता नहीं उसे कीचड़ में उगने वाले कमल से क्या प्रेम था कि अपने इष्ट को उसी पर बिठा दिया? वह दूरदर्शी नहीं था!
उसने नहीं सोचा कलियुग में उसी का अनुसरण किया जाएगा। जब लोकतंत्र आएगा तो नेता आदमी न होकर जलचर हो जाएगा। कीचड़ में पैदा होगा, उसमें ही वृद्धि को प्राप्त होगा, उसी में फले-फूलेगा, कमल हो जाएगा!
चित्रकार ने विष्णु को कमल पर केवल बैठाया ही था। शायद उसे मालूम नहीं था, नेता स्वयं ही कमल बन जाएगा, संपूर्ण कीचड़ में धंस जाएगा!
हमारे मित्र बोले, लोकतंत्र में नेताओं ने विष्णु और गणेश दो ही देवताओं को तो स्वीकारा है। विष्णु को स्वीकार कर कमल हो गए और गणेश को स्वीकार कर लंबोदर हो गए हैं। कलियुग अंतिम चरण में है, सतयुग का स्वागत करना है। अत: शंकर के अवतार की आवश्यकता है!


Tuesday, March 31, 2015

'आप' से 'खाप' बनने की क़वायद


लोकतांत्रिक राजनीति में प्राय: दो प्रकार के जीव पाए जाते हैं, बुद्धूजीवी और बुद्धिजीवी। बुद्धूजीवी जीवों की प्रकृत्ति दीमक मार रसायन के समान होती है। अर्थात जिस प्रकार दीमक मार रसायन लकड़ी की रक्षा करता रहता है। उसी प्रकार बुद्धूजीवी जीव लोकतंत्र की रक्षा में सर्वस्व त्याग की भावना से उसके साथ चिपके रहते हैं। इसके विपरीत बुद्धिजीवी जीव बुद्धूजीवियों द्वारा रक्षित लोकतंत्र को चटकारे ले लेकर खाते हैं। अर्थात धीरे-धीरे लकड़ी में घुन वाली आस्था के समान खाते हैं। दरअसल वे लोकतंत्र को जीवकोपर्जन के रूप में देखते हैं। वे न खाते हुए भी खाते हैं। अपने लिए नहीं, देश के लिए खाते हैं! लोकतंत्र के लिए खाते हैं! 'भूखे भजन न होई गोपाला' यह उनका आदर्श वाक्य है! इसलिए ही वे बुद्धिजीवी कहलाते हैं। 
बुद्धूजीवी उपवासी प्ऱकति के नहीं हैं। वे भी चाटते हैं, किन्तु लोकतंत्र को नहीं, लोकतंत्र से चिपकी नैतिकता व आदर्श को चाटते हैं। अर्थात लोकतंत्र का आवरण चाटते हैं। उनका आदर्श लोकतंत्र को दीर्घजीवी बनाए रखना है। महत्वपूर्ण एक तथ्य यह भी है कि बुद्धिजीवी अपेक्षाकृत प्रगतिशील किस्म के जीव होते हैं। तानाशाही व्यवस्था में बुद्धूजीवियों के लिए कोई स्थान नहीं है। उस व्यवस्था में केवल बुद्धिजीवी ही होते हैं। तानाशाही प्रवृत्ति में बुद्धूजीवी मानसिकता दकियानूसी मानी जाती है! 
जिस किसी भी व्यवस्था में बुद्धूजीवी पाए जाते हैं। मजबूरन पाए जाते हैं, क्योंकि दिल भले ही किसी भी रंग का हो, चेहरा सभी साफ-सुथरा रखना चाहते हैं। ऐसा नहीं है कि बुद्धिजीवी ही उग्र स्वभाव के होते हैं। दरअसल उग्रता उनका जन्मजात स्वभाव है। कभी-कभी बुद्धूजीवी भी उग्र हो जाते हैं और जब वे उग्र होते हैं, तब वे आदर्श व नैतिकता की चादर को ठिठुरते इनसान की तरह चारों ओर से लपेटकर पूरी ताकत के साथ लोकतंत्र से चिपक जाते हैं। ऐसी स्थिति तब आती है, जब उन्हें बुद्धिजीवियों की चटाई से लोकतंत्र ख़्ातरे में नजर आने लगता है। और, तब वे 'धर्मो रक्षति रक्षित:' -धर्म रक्षकों की रक्षा धर्म करता है!' के सिद्धांत का पालन करते हुए लोकतंत्र की रक्षा के लिए संघर्ष पर उतारू हो जाते हैं।  यही सिद्धांत उन्हें बुद्धूजीवी बनाता है। वास्तत्व में वे नहीं जानते हैं कि आदर्श व नैतिकता जैसे जुमले केवल चेहरा चमकाने के लिए होते हैं। जीवन में उतारने के लिए नहीं! बुद्धिजीवियों के लाख समझाने पर भी बुद्धूजीवी जब यथार्थ से अनभिज्ञ रहते हैं, तब बुद्धिजीवी बनाम बुद्धूजीवी संघर्ष प्रारंभ हो जाता है। ऐसी स्थिति में बुद्धिजीवियों के पास केवल 'लातमार' रास्ता ही शेष रह जाता है! और, वे बुद्धूजीवियों को लतियाने की जुगत में लग जाते हैं। यद्यपि राजनैतिक विचारक लतियाने की इस प्रवृत्ति को तानाशाही प्रवृत्ति बताते हैं, किन्तु इसे विशुद्ध  तानाशाही कहना उचित नहीं होगा। दरअसल इसे लोकतांत्रिक-तानाशाही प्रवृत्ति कहना अधिक उचित होगा। क्योंकि, इसमें लोकतंत्र को ढाल बनाकर तानाशाही सिद्धांतों का अनुगमन किया जाता है। लोकतंत्र की रक्षा के लिए तानाशाही का सदुपयोग करने का हवाला दिया जाता है।
आम आदमी पार्टी (आाप) का संघर्ष ऐसे ही दो विरोधी मानसिकता व विरोधी सिद्धांतों का परिणाम हैं। समझाया बहुत समझाया, 'अरे भाई रास्ते पर आ जाओ!' बुद्धूजीवी थे कि समझने का नाम ही नहीं ले रहे थे। बुद्धिजीवी आखिर कब तक धैर्य रखते। आखिर एक दिन लतिया दिया बुद्धूजीवियों को! अच्छा किया! आम से खास बनने की इच्छा किसको नहीं होती! वैसे भी 'आप' कब तक आम आदमी पार्टी बनी रहती।  एक न एक दिन तो उसे भी खास आदमी पार्टी (खाप) बनना ही था। अत: आप से खाप बनने के लिए बुद्धूजीवियों को लतियाना आवश्यक था। ऐसा किया और 'आप' से 'खाप' बन गए। जहाँ तक बुद्धूजीवियों का प्रश्न है, एक खोजो हजार मिलते हैं! चिन्ता किस बात की है। कल और बहुतेरे मिल जाएंगे।
संपर्क- 8860423256

Wednesday, March 4, 2015

दो पाटन के बीच में 'होली'



रंग न रंगोली इस बार अपनी होली बैरंग ही होले-होले आगे-आगे होली। अट्ठाइस को अच्छे दिन का बजट था, पाँच की होली,  आठ को महिला दिवस! हमारा पाँच न आठ हो पाया न अट्ठाइस, बस तीन-तेरह हो कर रह गया। दो पाटों के बीच फंसी हमारी स्थिति संत कबीर समान थी। गनीमत बस इतनी थी कि हम साबुत बच गए। दरअसल हमारे फागुन का नास तो बजट आते-आते ही हो गया था। थोड़ी बहुत जो कसर बाकी थी, वह महिल दिवस ने पूरी कर दी। हमारे सूर्यमुख पर ग्रहण-सी उदासी थी और चंद्रमुखी पत्नी के चंद्रमुख पर महिला दिवस की खुमारी। होली को आना था वह आई, उसने न राहू ग्रसित हमारे मुख की परवाह की और न ही पत्नी दिवस की खुमारी की।
बावजूद तमाम विषम परिस्थितियों के फगुन की बयार ने हमारे अंतर्मन को झकझोरा, उसने करवट बदली, अंगड़ाई ली और हमें समझाया, ‘उदासी छोड़ मनुआ, होली है। बजट की उदासी कब तक ओढ़े रहोगे, उतार फेंको, होली है। अच्छे दिन आए या न आए, इससे फर्क क्या पड़ता है! फील गुड के समान अच्छे दिन फील तो कर ही सकते हो! कुछ न होते हुए भी सम्राट होने का अहसास तो किया ही जा सकता है! बचुआ, अहसास मन का भाव है, अहसास करो! अंतर्मन की बात हमारे बाह्य उदास मन को नहीं भायी।  बजट ने अपना बजट बिगाड़ दिया है, होली का रंग फीक पड़ गया है  उसने अपनी बात बताई। अंतरमन हँस दिया, अरे इसमें नया क्या है? बजट अच्‍छे दिन का हो या बुरे दिन का आता ही बिगाड़ने के लिए है। बजट का अर्थ ही बिगाड़ना है। तू उदासी छोड़ होली खेल। अंतर्मन की बात सुन कमबख्त बाह्य मन बहकने लगा, होली के रंग में रंगने लगा।
उदासी त्याग, हमने पत्नी संग चिरोरी करने का मन बनाया। होली 'गुलाल और गाल' का त्यौहार है, अत: हाथों में गुलाल लिए हम पत्नी के गालों की तरफ अग्रसर हुए और बोले, ''प्रिय होली है!'' पत्नी ने आँखें तरेरी, आँखों ही आँखों में अखियन ते क्रोध की पिचकारी छोड़ी। हम सहम गए, सहसा ही अतीत के रंग में डूब गए। अरे, यह क्या! पिछली होली पर तो पत्नी ने  'मोरी रंग दे अंगिया, कर दे धानी चुनरिया' फाग का राग सुनाया था। इस बार क्यों ऊंगली छुआते ही चारसो चालीस का करंट मारने लगी। होली पर भी क्यों आँखें दिखने लगी। हमने फिर साहस किया, हाथ आगे बढ़ाया, विरह और मिलन के मिश्रित रस में पगी पक्तियां गुनगुनाई, ''गुल हैं, चिराग रोशन कर दो। उदास फि़ज़ाओं में फागुन भर दो। कट न जाए यह रात यूं ही तन्हा, तन्हा रातों में यौवन भर दो।''
पत्नी ने फिर धमकाया, '' देखो जी! महिला दिवस है अब शोषण नहीं चलेगा। महिलाएं जागृत हो गई हैं, अब हमारा हुकुम चलेगा। तुम्‍हारा नहीं।''
भूखे श्वान-समान हमने पत्नी के मुख की ओर निहारा। पिछली होली तक पलास के खिले फूलों के समान लगने वाले पत्नी के गाल हमे दहकते अँगारों के समान प्रतीत हुए। हमारा सिर चकराया। सावधान की मुद्रा में स्तब्ध-से खड़े-खड़े हम सोचने लगे, 'अरे, महिला दिवस आता तो प्रत्येक वर्ष था, किन्तु, हमारा आशियाना उसके वॉयरस से प्राय: अछूता ही रहता था। किन्तु, इस बार स्वाइन फ्ल्यू वॉयरस के समान उसके वॉयरस हमारे घर में भी प्रवेश कर गए।'
सोचते-सोचते माथे पर उतर आई चिन्ता और विषाद की लकीरें पौंछी और अल्पमत की सरकार की तरह हम समझौते पर उतर आऐ और मिम्याते सुर में बोले, ''झगड़ा किस बात का, प्रिय! हम न सही, तुम ही हमारा शोषण कर लो, किन्तु जैसे भी हो होली के इस पावन पर्व पर हमारा जीवन धन्य कर दो!'' पत्नी जवाब में हमें खरबूजे और छुरी की कहावत सुनाने लगी। फिर घरेलू हिंसा विरोधी कानून के पहाड़े पढ़ाने लगी। हमें अचानक ही महिला दिवस त्रिया दिवस-सा नज़र आने लगा। धीरे-धीरे होली का बुखार भी उतरने लगा।
बुझे मन से हम पत्नी से कहने लगे, प्रिये! महिला दिवस आज ही क्यों, जब से तुमने हमारी कुण्डली में प्रवेश किया है, हमारे जीवन में तो उसी पुण्‍य दिवस से महिला दिवस छाया है। कभी दहेज विरोधी कानून तो कभी घरेलू हिंसा कानून। प्रत्‍येक कानून हमारे वैवाहिक जीवन में राहू की मानिन्‍द छाया है। तुम समान अधिकार की मांग करती हो, कंधे से कंधा मिलाकर चलने का दंभ भरती हो। भूले से भी कंधे से कंधा छू जाए तो ईव टीजिंग का आरोप लगाती हो। अरे, पुरुष-पुरुष का दुशमन हो गया है। पुरुष प्रधान समाज में पुरुष हो कर स्त्री प्रधान कानून बनाता है! अरे, विश्व के पुरुषों एक हो जाओ, भ्रुण हत्या रोको, महिलाओं की संख्या बढ़ाओ। खुद अल्पमत हो जाओ और फिर अल्पमत होने का लाभ उठाओ, प्रतिदिन होली मनाओ।


फोन- 8860423256