Wednesday, November 4, 2015

मूंग की दाल


 
बॉस की झाड़ और राह की धूल, दोनों झाड़ने के बाद मुन्नालाल खाना खाने बैठ गया। रोटी का टुकड़ा तोड़ा और सब्जी की कटोरी में भिगोया। टुकड़ा कटोरी में ऐसे डूब गया जैसे बिना पतवार की नाव नदी में। मुन्नालाल का जायका बे-जायका हो गया। उसने चिल्लाकर पत्नी से पूछा, ''भागवान! आज यह क्या बना लाई?''
पत्नी ने रसोई से ही सहज भाव से जवाब दिया, ''दाल!''
पत्नी का जवाब सुन मुन्नालाल आसन से खड़े हो कर बदन के कपड़े उतारने लगा। तभी दूसरी रोटी लेकर पत्नी रसोई से बाहर आई और पति की हरकत देख अवाक रह गई। आश्चर्य व्यक्त करते हुए उसने पूछा, ''क्यों जी! खाना खाते-खाते यह क्या?''
मुन्नालाल ने जवाब दिया, ''कुछ नहीं! बस कपड़े उतार कर कटोरी में डुबकी लगाने की सोच रहा हूँ।''
पत्नी ने पूछा, ''क्यूं जी?''
मुन्नालाल ने जवाब दिया, ''कुछ नहीं! तुम्हारी बनाई दाल में दाल के दाने खोजने के लिए।'' 
पत्नी पहले तो खिल-खिला कर हँस दी और फिर खिन्न भाव से बोली, ''दस हजार रुपल्ली की तनख्वाह में दाल मक्खनी के ख्वाब देखते हो!'' 
निरीह भाव से मुन्नालाल बोला, ''मक्खनी दाल मैने कब माँगी है। मूंग-मसूर जिसकी भी दाल बनानी थी, दो-चार दाल के दाने तो गरम पानी में डाल देती।''
महंगाई की तरह पत्नी ने नाक-भौं सिकोड़ी और फिर कटाक्ष किया, ''यह मुंह और मसूर की दाल। महंगाई के आइने में थोपड़ा देखे कितने दिन हो गए हैं? कभी-कभी घर के पिछवाड़े जाकर दुकानदार का आइना भी झाँक आया करो। पता है, मूंग की दाल भी अंतरिक्ष की सैर पर निकली है। दाल के दो-चार दाने ही डिब्बे में बचे हैं, उन्हें हारी-बिमारी में खिचड़ी बनाने के लिए बचा कर रखा हैं।'' 
झड़-बेरी के बेर की तरह मुन्नालाल का चेहरा महंगाई पुराण की कथा सुन सिकुड़ कर रह गया। बदन के कपड़ों पर से पकड़ ढीली पड़ गई। वह अनमने मन से रोटी का टुकड़ा सटकने बैठ गया। तभी पत्नी ने फिर कटाक्ष किया, ''जल्दी करो, कहीं म्यूनिसपैल्टी ने भी पानी के दाम बढ़ा दिए तो सूखी कटोरी से ही टुकड़ा रगड़ना पड़ जाएगा।''
टुकड़े सटकते-सटकते वह सोचने लगा, 'कैसा जमाना आ गया है, टमाटर गरीब के पथरी करने लगा है। गरीब की रोटी छोड़ प्याज राजनीति में चला गया है। उसकी रुचि सरकार गिराने बनाने में है। नेताओं की तरह गरीब की थाली में कभी-कभी दिखलाई पड़ती है। एक बचा था आलू, उसे भी अब सब्जियों का राजा होने का अहसास हो गया है। उसने भी आम आदमी से मुंह फेर लिया है। शुक्र है! जैसी भी है, हथेली पर रोटी बरकरार है। पता नहीं कितने दिन।'' उसने फटाफट वजन पेट में डाला और चारपाई पकड़ ली। आँख लगी ही थी कि सपने में एक सुंदरी ने प्रवेश किया। मंद-मंद मुसकराते हुए उसने अपने मुख पर हाथ फेरा और उसकी तुलना मसूर की दाल से करते हुए पूछा, ''भद्रे! आप कौन हैं? कौन सी दाल का प्रतिनिधित्व करती हैं?'' 
सुंदरी मुसकरा कर बोली, ''प्रिय मुन्नालाल, ठीक पहचाना! मैं दाल ही हूँ, मगर मूंग की दाल..।'' मुन्नालाल बीच ही में बोला, '' ..किंतु, भद्रे! तुम्हें तो पत्नी ने हारी-बीमारी में खिचड़ी के लिए डिब्बे में बंद कर रखा है!'' 
''चिंता मत करो, प्रिय! भोग के लिए मैं यहाँ उपस्थित नहीं हुई हूँ। जब तुम बीमार पड़ोगे तो खिचड़ी में अवश्य दर्शन दूंगी!''
''.. फिर अब यहाँ क्यों?'' ''तुम्हारी चिंता, तुम्हारी शंका निवारण करने के लिए उपस्थित हुई हूँ, प्रिय!'' 
''कहो, शीघ्र कहो, जो भी कहना है! देश के कर्णधारों को यदि पता चल गया कि तुम मुन्नालाल के सपनों में आती हो तो उस पर भी पाबंदी लगा देंगे।'' 
''चिंता न करो, प्रिय! दिवास्वप्न पर पाबंदी लग सकती है। रात्रि-स्वप्न देखने से तुम्हें कोई वंचित नहीं कर पाएगा।''
स्‍वप्‍न-सुंदरी का चेहरा ठण्डे पानी में भीगी दाल की तरह यकायक सिकुड़ गया और ठिठुरे मुंह से वह आगे बोली, ''प्रिय! सरकार ने तुम्हें गरीबी रेखा से ऊपर खींचने का भरसक प्रयास किया, किंतु तुम फैवीकोल के जोड़ की तरह वहीं चिपके रहे। जब अहसास हुआ कि लक्ष्मण रेखा पार न करने के लिए तुम प्रतिज्ञाबद्ध हो, तो सरकार ने लक्ष्मण रेखा का दायरा सीमित करने का प्रयास किया, किंतु खेद कि तुम फिर भी सीमा रेखा से बाहर नहीं आए। सरकार दिन-रात तुम्हारी ही बेहतरी की चिंता में दुबली हो रही है। जब भी अवसर प्राप्त होता है, अच्‍छे दिन आएं या न आएं किंतु तुम्हें अच्‍छे दिन' का अहसास करने के प्रयास में लगी रहती है, किंतु खेद कि तुम्हारे भाग्य का सूर्य हमेशा बादलों में ही छिपा रहता है,चमक ही नहीं पाता।''
सुंदरी ने ठिठुरे अपने चेहरे पर हाथ फेर कर झुर्रीयां मिटाने का प्रयास किया और फिर आगे बोली, ''बताओ, प्रिय तुम्ही बताओ! मैं या प्याज, आलू या टमाटर, कब तक तुम्हारे साथ चिपके रहते। अपना-अपना मुकद्दर प्रिय! तुम गरीबी की लक्ष्मण रेखा लांघ न सके, इंतजार के बाद हम रेखा लांघ ऊपर वालों की जमात में शामिल हो गए। प्रिय! मैं भी कब तक घर की मुर्गी के भाव तुलती रहती, आखिर मेरे भी तो अपने अरमान है, सपने हैं।''
इतना कह कर मूंग की दाल मुन्नालाल के सपने से भी गायब हो गई। उसने करवट बदली और गहरी नींद लेने का महंगा प्रयास किया। तभी दूसरा सपने ने उसे आ घेरा, ''घास की रोटी का एक टुकड़ा उसके हाथ में था, जिसे वह डिब्बे में छिपाने जा रहा था, तभी एक ऊदबिलाऊ उसकी ओर झपटा और उसके हाथ से टुकड़ा छीन कर भाग गया!''
भयभीत मुन्नालाल के मुंह से चीख निकली। चीख सुनकर उसकी पत्नी भी जाग गई। सपने की बात उसने पत्नी को बताई। पत्नी ने उसे सांत्वना दी, ''डरो मत, सो जाओ। ऊदबिलाऊ नहीं था, महंगाई थी।''

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Wednesday, September 2, 2015

चरण कमल बंदौ..!



उन्हें आज शर्मा जी के विद्यालय का उद्ंघाटन करने आना है। समारोह का उदघोषक बार-बार घोषणा कर रहा है- मंत्रीजी के चरण कमल शीघ्र ही पड़ने वाले हैं।
उदघोषक मंत्रीजी के आने में विलंब का कारण बता रहा है, मंत्रीजी किसी आवश्यक मीटिंग में व्यस्त हैं। वह शाश्वत सत्य का उच्चारण कर रहा है। नेता मीटिंग, चीटिंग, डेटिंग में ही व्यस्त रहा करते हैं!
मंत्रीजी अपने जीवन में पहली बार ही किसी विद्यालय में प्रवेश करेंगे। इससे पूर्व उन्होंने कभी निगम की प्राइमरी पाठशाला में भी प्रवेश प्राप्त करने की जहमत नहीं उठाई। अब विद्यालयों में आना-जाना उनकी मजबूरी है, क्योंकि वे शिक्षामंत्री हैं। शिक्षामंत्री न भी होते तो भी शर्मा जी के उद्घाटन समारोह में तो उन्हें आना ही था, क्योंकि शर्मा जी इलाके के बड़े इंडस्ट्रियलिस्ट हैं। यह भी एक शाश्वत सत्य है कि नेता के इंडस्ट्रियलिस्ट, जर्नलिस्ट, पामिस्ट्रों से ही प्रगाढ़ संबंध होते हैं। 
मंत्रीजी पधार चुके हैं। उदघोषक बता रहा है, मंत्रीजी अब अपने करकमलों से फीता काट कर विद्यालय का उदघाटन करेंगे। मंत्रीजी ने चांदी की थाली में रखी चांदी की कैंची उठाई, चांदी का रिबन काटा और विद्यालय छात्रों को समर्पित कर दिया। वे जब से राजनीति में आए हैं, तब से उनकी चांदी ही चांदी है। थाली भी चांदी की, कैंची भी चांदी की ही, रिबन भी चांदी का ! मंत्रीजी चांदी से चांदी काट रहे हैं!
उदघोषक बता रहा है, मंत्रीजी अब अपने कमल मुख से शिक्षा के महत्व पर प्रकाश डालेंगे! इसके साथ ही उदघोषक महोदय आज के इस शुभ दिन का महत्व का बखान करते हुए एक रहस्योदघाटन भी करता है। वह बता रहा है कि मंत्रीजी की कृपा से आज ही के दिन शर्माजी को पुत्र-रत्‍‌न की प्राप्ति हुई थी।
मंत्रीजी कमल नयनों से छात्रों को निहारते हैं और फिर कमल मुख से शिक्षा के महत्व पर बोलना शुरू करते हैं। मंत्रीजी बोलना शुरू करते हैं और हम विचार करना, 'निरक्षर रहकर शिक्षामंत्री बनना लाभप्रद है अथवा साक्षर हो कर शिक्षामंत्री का दरबारी बनना?' शर्माजी को पुत्ररत्‍‌न प्राप्ति में मंत्रीजी की कृपा का योगदान हमारे विचार-मंथन का दूसरा विषय था। हमारे लिए विचारणीय तीसरा प्रश्न था, 'मंत्रीजी का यकायक कमल-कमल हो जाना।'
वास्तव में जब से वे राजनीति में आए हैं, उनके शरीर में कुछ जैविक परिवर्तन होने लगे हैं। इंसान तो वे पहले भी नहीं थे। इंसान के रूप में कुछ और ही थे, मगर अब तो उनका संपूर्ण शरीर ही कमल हो गया है। वे कमल स्वरूप हो गए हैं। हां, उनके चरण कमल हो गए हैं। कर कमल हो गए हैं। नयन भी कमल हो गए हैं और मुख भी कमल!
चरण कमल, कर कमल, नयन कमल, मुख कमल। कुल जमा वे 'चरण कमल बंदौ रघुराई' हो गए हैं। हमारा मन भगवान राम का स्तुति-गान करने लगता है, 'श्रीरामचंद्र कृपालु भज मन हरण भवभय दारुणं। नवकंज-लोचन, कंज-मुख, कर-कंज पद कंजारूणं॥'
हम आश्चर्यचकित हैं कि कल तक जिनका स्वरूप कैक्टस के माफिक था, यकायक वे कोमलांग कैसे हो गए, कमल कैसे हो गए? कल तक जो हाथ बबूल की लकड़ी से कर्कश थे, वे यकायक कमल-ककड़ी हो गए, जिन पैरों की आहट से बस्ती कांपती थी, वे अब कमल-शाख हो गए हैं, भय का प्रतीक मुख मंडल, भवभय दारुणं हो गया है और ज्वाला उगलते नयन कमल से निर्मल किस प्रकार हो गए!
आश्चर्य-घोर आश्चर्य, कैक्टस से गुलाब हो जाते तो भी गनीमत थी, फूल के साथ कम से कम कांटे तो होते। बस समानता इतनी शेष बची है कि कल तक वे हाथ में खंजर लिए समारोह का समापन करते थे। आज हाथ में कैंची लिए घूमते हैं, लाल-लाल फीते काटते हैं, उदघाटन करते हैं।
हम सोच रहे हैं कि क्या राजनीति क्षीर सागर हो गई है? उसमें जो भी गोता लगाता है, विष्णु भगवान का अवतार हो जाता है! नीर- क्षीर विवेक का लेक्टोमीटर हो जाता है!
हमने जीव विज्ञानी अपने एक मित्र से जैविक इस परिवर्तन का कारण पूछा। वे बोले, दोष उस चित्रकार का है जिसने श्रद्धावश भगवान विष्णु को कमल पर बिठा दिया। भगवान को कमल सदृश्य बना दिया। पता नहीं उसे कीचड़ में उगने वाले कमल से क्या प्रेम था कि अपने इष्ट को उसी पर बिठा दिया? वह दूरदर्शी नहीं था!
उसने नहीं सोचा कलियुग में उसी का अनुसरण किया जाएगा। जब लोकतंत्र आएगा तो नेता आदमी न होकर जलचर हो जाएगा। कीचड़ में पैदा होगा, उसमें ही वृद्धि को प्राप्त होगा, उसी में फले-फूलेगा, कमल हो जाएगा!
चित्रकार ने विष्णु को कमल पर केवल बैठाया ही था। शायद उसे मालूम नहीं था, नेता स्वयं ही कमल बन जाएगा, संपूर्ण कीचड़ में धंस जाएगा!
हमारे मित्र बोले, लोकतंत्र में नेताओं ने विष्णु और गणेश दो ही देवताओं को तो स्वीकारा है। विष्णु को स्वीकार कर कमल हो गए और गणेश को स्वीकार कर लंबोदर हो गए हैं। कलियुग अंतिम चरण में है, सतयुग का स्वागत करना है। अत: शंकर के अवतार की आवश्यकता है!


Tuesday, March 31, 2015

'आप' से 'खाप' बनने की क़वायद


लोकतांत्रिक राजनीति में प्राय: दो प्रकार के जीव पाए जाते हैं, बुद्धूजीवी और बुद्धिजीवी। बुद्धूजीवी जीवों की प्रकृत्ति दीमक मार रसायन के समान होती है। अर्थात जिस प्रकार दीमक मार रसायन लकड़ी की रक्षा करता रहता है। उसी प्रकार बुद्धूजीवी जीव लोकतंत्र की रक्षा में सर्वस्व त्याग की भावना से उसके साथ चिपके रहते हैं। इसके विपरीत बुद्धिजीवी जीव बुद्धूजीवियों द्वारा रक्षित लोकतंत्र को चटकारे ले लेकर खाते हैं। अर्थात धीरे-धीरे लकड़ी में घुन वाली आस्था के समान खाते हैं। दरअसल वे लोकतंत्र को जीवकोपर्जन के रूप में देखते हैं। वे न खाते हुए भी खाते हैं। अपने लिए नहीं, देश के लिए खाते हैं! लोकतंत्र के लिए खाते हैं! 'भूखे भजन न होई गोपाला' यह उनका आदर्श वाक्य है! इसलिए ही वे बुद्धिजीवी कहलाते हैं। 
बुद्धूजीवी उपवासी प्ऱकति के नहीं हैं। वे भी चाटते हैं, किन्तु लोकतंत्र को नहीं, लोकतंत्र से चिपकी नैतिकता व आदर्श को चाटते हैं। अर्थात लोकतंत्र का आवरण चाटते हैं। उनका आदर्श लोकतंत्र को दीर्घजीवी बनाए रखना है। महत्वपूर्ण एक तथ्य यह भी है कि बुद्धिजीवी अपेक्षाकृत प्रगतिशील किस्म के जीव होते हैं। तानाशाही व्यवस्था में बुद्धूजीवियों के लिए कोई स्थान नहीं है। उस व्यवस्था में केवल बुद्धिजीवी ही होते हैं। तानाशाही प्रवृत्ति में बुद्धूजीवी मानसिकता दकियानूसी मानी जाती है! 
जिस किसी भी व्यवस्था में बुद्धूजीवी पाए जाते हैं। मजबूरन पाए जाते हैं, क्योंकि दिल भले ही किसी भी रंग का हो, चेहरा सभी साफ-सुथरा रखना चाहते हैं। ऐसा नहीं है कि बुद्धिजीवी ही उग्र स्वभाव के होते हैं। दरअसल उग्रता उनका जन्मजात स्वभाव है। कभी-कभी बुद्धूजीवी भी उग्र हो जाते हैं और जब वे उग्र होते हैं, तब वे आदर्श व नैतिकता की चादर को ठिठुरते इनसान की तरह चारों ओर से लपेटकर पूरी ताकत के साथ लोकतंत्र से चिपक जाते हैं। ऐसी स्थिति तब आती है, जब उन्हें बुद्धिजीवियों की चटाई से लोकतंत्र ख़्ातरे में नजर आने लगता है। और, तब वे 'धर्मो रक्षति रक्षित:' -धर्म रक्षकों की रक्षा धर्म करता है!' के सिद्धांत का पालन करते हुए लोकतंत्र की रक्षा के लिए संघर्ष पर उतारू हो जाते हैं।  यही सिद्धांत उन्हें बुद्धूजीवी बनाता है। वास्तत्व में वे नहीं जानते हैं कि आदर्श व नैतिकता जैसे जुमले केवल चेहरा चमकाने के लिए होते हैं। जीवन में उतारने के लिए नहीं! बुद्धिजीवियों के लाख समझाने पर भी बुद्धूजीवी जब यथार्थ से अनभिज्ञ रहते हैं, तब बुद्धिजीवी बनाम बुद्धूजीवी संघर्ष प्रारंभ हो जाता है। ऐसी स्थिति में बुद्धिजीवियों के पास केवल 'लातमार' रास्ता ही शेष रह जाता है! और, वे बुद्धूजीवियों को लतियाने की जुगत में लग जाते हैं। यद्यपि राजनैतिक विचारक लतियाने की इस प्रवृत्ति को तानाशाही प्रवृत्ति बताते हैं, किन्तु इसे विशुद्ध  तानाशाही कहना उचित नहीं होगा। दरअसल इसे लोकतांत्रिक-तानाशाही प्रवृत्ति कहना अधिक उचित होगा। क्योंकि, इसमें लोकतंत्र को ढाल बनाकर तानाशाही सिद्धांतों का अनुगमन किया जाता है। लोकतंत्र की रक्षा के लिए तानाशाही का सदुपयोग करने का हवाला दिया जाता है।
आम आदमी पार्टी (आाप) का संघर्ष ऐसे ही दो विरोधी मानसिकता व विरोधी सिद्धांतों का परिणाम हैं। समझाया बहुत समझाया, 'अरे भाई रास्ते पर आ जाओ!' बुद्धूजीवी थे कि समझने का नाम ही नहीं ले रहे थे। बुद्धिजीवी आखिर कब तक धैर्य रखते। आखिर एक दिन लतिया दिया बुद्धूजीवियों को! अच्छा किया! आम से खास बनने की इच्छा किसको नहीं होती! वैसे भी 'आप' कब तक आम आदमी पार्टी बनी रहती।  एक न एक दिन तो उसे भी खास आदमी पार्टी (खाप) बनना ही था। अत: आप से खाप बनने के लिए बुद्धूजीवियों को लतियाना आवश्यक था। ऐसा किया और 'आप' से 'खाप' बन गए। जहाँ तक बुद्धूजीवियों का प्रश्न है, एक खोजो हजार मिलते हैं! चिन्ता किस बात की है। कल और बहुतेरे मिल जाएंगे।
संपर्क- 8860423256

Wednesday, March 4, 2015

दो पाटन के बीच में 'होली'



रंग न रंगोली इस बार अपनी होली बैरंग ही होले-होले आगे-आगे होली। अट्ठाइस को अच्छे दिन का बजट था, पाँच की होली,  आठ को महिला दिवस! हमारा पाँच न आठ हो पाया न अट्ठाइस, बस तीन-तेरह हो कर रह गया। दो पाटों के बीच फंसी हमारी स्थिति संत कबीर समान थी। गनीमत बस इतनी थी कि हम साबुत बच गए। दरअसल हमारे फागुन का नास तो बजट आते-आते ही हो गया था। थोड़ी बहुत जो कसर बाकी थी, वह महिल दिवस ने पूरी कर दी। हमारे सूर्यमुख पर ग्रहण-सी उदासी थी और चंद्रमुखी पत्नी के चंद्रमुख पर महिला दिवस की खुमारी। होली को आना था वह आई, उसने न राहू ग्रसित हमारे मुख की परवाह की और न ही पत्नी दिवस की खुमारी की।
बावजूद तमाम विषम परिस्थितियों के फगुन की बयार ने हमारे अंतर्मन को झकझोरा, उसने करवट बदली, अंगड़ाई ली और हमें समझाया, ‘उदासी छोड़ मनुआ, होली है। बजट की उदासी कब तक ओढ़े रहोगे, उतार फेंको, होली है। अच्छे दिन आए या न आए, इससे फर्क क्या पड़ता है! फील गुड के समान अच्छे दिन फील तो कर ही सकते हो! कुछ न होते हुए भी सम्राट होने का अहसास तो किया ही जा सकता है! बचुआ, अहसास मन का भाव है, अहसास करो! अंतर्मन की बात हमारे बाह्य उदास मन को नहीं भायी।  बजट ने अपना बजट बिगाड़ दिया है, होली का रंग फीक पड़ गया है  उसने अपनी बात बताई। अंतरमन हँस दिया, अरे इसमें नया क्या है? बजट अच्‍छे दिन का हो या बुरे दिन का आता ही बिगाड़ने के लिए है। बजट का अर्थ ही बिगाड़ना है। तू उदासी छोड़ होली खेल। अंतर्मन की बात सुन कमबख्त बाह्य मन बहकने लगा, होली के रंग में रंगने लगा।
उदासी त्याग, हमने पत्नी संग चिरोरी करने का मन बनाया। होली 'गुलाल और गाल' का त्यौहार है, अत: हाथों में गुलाल लिए हम पत्नी के गालों की तरफ अग्रसर हुए और बोले, ''प्रिय होली है!'' पत्नी ने आँखें तरेरी, आँखों ही आँखों में अखियन ते क्रोध की पिचकारी छोड़ी। हम सहम गए, सहसा ही अतीत के रंग में डूब गए। अरे, यह क्या! पिछली होली पर तो पत्नी ने  'मोरी रंग दे अंगिया, कर दे धानी चुनरिया' फाग का राग सुनाया था। इस बार क्यों ऊंगली छुआते ही चारसो चालीस का करंट मारने लगी। होली पर भी क्यों आँखें दिखने लगी। हमने फिर साहस किया, हाथ आगे बढ़ाया, विरह और मिलन के मिश्रित रस में पगी पक्तियां गुनगुनाई, ''गुल हैं, चिराग रोशन कर दो। उदास फि़ज़ाओं में फागुन भर दो। कट न जाए यह रात यूं ही तन्हा, तन्हा रातों में यौवन भर दो।''
पत्नी ने फिर धमकाया, '' देखो जी! महिला दिवस है अब शोषण नहीं चलेगा। महिलाएं जागृत हो गई हैं, अब हमारा हुकुम चलेगा। तुम्‍हारा नहीं।''
भूखे श्वान-समान हमने पत्नी के मुख की ओर निहारा। पिछली होली तक पलास के खिले फूलों के समान लगने वाले पत्नी के गाल हमे दहकते अँगारों के समान प्रतीत हुए। हमारा सिर चकराया। सावधान की मुद्रा में स्तब्ध-से खड़े-खड़े हम सोचने लगे, 'अरे, महिला दिवस आता तो प्रत्येक वर्ष था, किन्तु, हमारा आशियाना उसके वॉयरस से प्राय: अछूता ही रहता था। किन्तु, इस बार स्वाइन फ्ल्यू वॉयरस के समान उसके वॉयरस हमारे घर में भी प्रवेश कर गए।'
सोचते-सोचते माथे पर उतर आई चिन्ता और विषाद की लकीरें पौंछी और अल्पमत की सरकार की तरह हम समझौते पर उतर आऐ और मिम्याते सुर में बोले, ''झगड़ा किस बात का, प्रिय! हम न सही, तुम ही हमारा शोषण कर लो, किन्तु जैसे भी हो होली के इस पावन पर्व पर हमारा जीवन धन्य कर दो!'' पत्नी जवाब में हमें खरबूजे और छुरी की कहावत सुनाने लगी। फिर घरेलू हिंसा विरोधी कानून के पहाड़े पढ़ाने लगी। हमें अचानक ही महिला दिवस त्रिया दिवस-सा नज़र आने लगा। धीरे-धीरे होली का बुखार भी उतरने लगा।
बुझे मन से हम पत्नी से कहने लगे, प्रिये! महिला दिवस आज ही क्यों, जब से तुमने हमारी कुण्डली में प्रवेश किया है, हमारे जीवन में तो उसी पुण्‍य दिवस से महिला दिवस छाया है। कभी दहेज विरोधी कानून तो कभी घरेलू हिंसा कानून। प्रत्‍येक कानून हमारे वैवाहिक जीवन में राहू की मानिन्‍द छाया है। तुम समान अधिकार की मांग करती हो, कंधे से कंधा मिलाकर चलने का दंभ भरती हो। भूले से भी कंधे से कंधा छू जाए तो ईव टीजिंग का आरोप लगाती हो। अरे, पुरुष-पुरुष का दुशमन हो गया है। पुरुष प्रधान समाज में पुरुष हो कर स्त्री प्रधान कानून बनाता है! अरे, विश्व के पुरुषों एक हो जाओ, भ्रुण हत्या रोको, महिलाओं की संख्या बढ़ाओ। खुद अल्पमत हो जाओ और फिर अल्पमत होने का लाभ उठाओ, प्रतिदिन होली मनाओ।


फोन- 8860423256

Friday, May 23, 2014

नैकिता के मायने



                    डॉक्टर वात्स्यायन से महर्षि अरविन्द-दर्शन पर टिप्स लेने के लिए मेरठ आया था। 'अरविन्द-दर्शन में मानववाद' मेरे शोध-प्रबन्ध का विषय था। विचार कुछ बदला, सोचा पहले कुछ समय कॉलेज की लाइब्रेरी में ही बैठकर अरविन्द दर्शन पर नोट ले लिए जाएं और मैं लाइब्रेरी की ओर मुड़ गया। कॉलेज लाइब्रेरी वृत्ताकार एक हॉल में थी और उसके एक हिस्से में अ‌र्द्धवृत्ताकार बैल्कनि स्थित थी। जिसमें शोधछात्रों के लिए अध्ययन की विशेष व्यवस्था थी। मैं बैल्कनि में जाकर बैठा ही था कि मेरी नजर सुनीता पर पड़ी। सुनीता वहाँ पहले ही से बैठी थी। उसका चेहरा मुझे कुछ-कुछ उदास-सा लगा। वह शंकर-भाष्य-ब्रह्मंसूत्र के पन्ने कुछ इस प्रकार उलट-पलट रही थी, मानो कहीं कुछ खो गया है और उसे ब्रह्मंसूत्र के पन्नों में खोज रही है। मन उदास होने के कारण उसका ध्यान ब्रह्मंसूत्र-अध्ययन में नहीं था। शंकराचार्य का दर्शन उसके शोध प्रबन्ध का विषय था। मैं उसके पास गया और उसका मन उदासी के आवरण से मुक्त करने के उद्देश्य से हलकी-सी चुटकी ली, ''ओ ऐऽऽऽ! ..ये दीपावली के बुझे दिए का सा चेहरा क्यों बना रखा है?''
  सुनीता मेरी तरफ कुछ इस अन्दाज में घूरी, मानो भगवान शिव कामदेव को भस्म करने के लिए उस पर दृष्टिंपात कर रहे हों। उसी तेवर में वह बोली, ''कुछ पता है..!'' आधे-अधूरे इस वाक्य के साथ ही उसकी आँखें नम हो गई।
  ''अरे, कुछ हुआ भी..! बताओ तो सही..!'' नम आँखें और 'कुछ पता है' का अनुभव कर मेरा मन विभिन्न शंका-आशंकाओं से घिर गया था।
  उसने अपने आप को थोड़ा संयत किया और साहस-सा बटोर कर बोली, ''शोभा! ..लौट आई है..!''
  ''शोभा लौट आई है..!''  मैने आश्चर्य व्यक्त करते हुए आगे कहा, '' एक महीने की छुट्टी बिताकर चार-पाँच दिन पहले ही तो बनारस गई थी!''
  ''हाँ!'' उसने कहा।
  ''क्यों?'' मैने पूछा।
  ''बता न पाऊंगी! ..उसी से पूछ लेना! उसके घर हो आना..! उसे कुछ..!''
  ''तुम भी चलो।''
  ''नहीं, मैं वहीं से आ रही हूँ!'' फिर उसने हिदायत देते हुए कहा, ''देखो! वह बेचारी बहुत परेशान है। ..उसके चेहरे को बुझा..!'' आँखों से नमी बाहर आ गई थी।
  ''ठीक है..!'' स्थिति की भयावहता का अनुमान कर मैं तुरन्त ही शोभा के घर की ओर रवाना हो गया था।
              शोभा, सुनीता और मैने एक साथ ही दर्शनशास्त्र में एमए किया था। शोभा यूनिवर्सिटी की गोल्ड मेडलिस्ट थी। एमए करने के बाद मै विभागाध्यक्ष डॉ. वात्स्यायन के निर्देशन में शोध कार्य करने लगा था। डॉ. वात्स्यायन ने ही डॉ. दिनेश के निर्देशन में शोभा का रजिस्ट्रशन बनारस करा दिया था। और, सुनीता कॉलेज के ही प्रोफेसर डॉ. गर्ग के निर्देशन में शोध कार्य करने लगी थी। जिस समय मैं शोभा के घर पहुँचा वह उदास मन लिए वीणा के तार सहला रही थी। मुझे देखकर उसने निगाह वीणा से हटाकर मेरी ओर की और इस के साथ ही पलकों में छिपी ओस की सी दो बूँदें उसके गाल गीले कर गई। तभी उसकी माँ चाय के बहाने मुझे अलग कमरे में ले गई। वीणा के तार पुन: झनझना ने लगे थे। 
  चाय का कप मेरे हाथ में थमाने के बाद शोभा की माँ कहने लगीं, ''बेटा! तुम्हीं इसे समझाओ! ..जो कुछ हुआ उसे भूल जाए! ..रास्ते तो और भी बहुत हैं..!'' वह इतना कहकर कमरे से बाहर चली गई। सम्भवतया नेत्रों के रास्ते बहती भावनाओं पर नियंत्रण करने के उद्देश्य से।
  एक क्षण के बाद ही वे फिर लौट आई और मैने पूछ लिया, ''आखिर हुआ क्या? मम्मी..!'' हम सभी शोभा की माँ को मम्मी कह कर सम्बोधित करते थे। उन्होंने जो दु:खद वृतान्त बताया उसके अनुसार डॉ. दिनेश ने धीरे-धीरे शोभा के साथ आत्मीय सम्बन्ध स्थापित करने शुरू कर दिए थे। यूनिवर्सिटी के स्थान पर उसे वे अपने निवास पर बुलाने लगे और फिर एक दिन डॉ. दिनेश ने शोभा के सामने पुत्र के साथ शादी का प्रस्ताव रख दिया। शोभ ने प्रस्ताव ठुकरा दिया तो डॉ. दिनेश तरह-तरह से परेशान कर उस पर दबाव बनाने लगे।
  वृतान्त सुनने के बाद मैने पूछा, ''मगर इसमें परेशान होने की क्या बात थी! ..डॉ. दिनेश प्रतिष्ठित व्यक्ति हैं। घर-बाहर भी अच्छा ही होगा, फिर शोभा की शादी तो करनी ही है!''
  आँखों में छलकते आँसू पोंछ कर वे केवल इतना ही बोली, ''लड़का हॉफ मैड था..!''
  लड़के की मानसिक स्थिति सुनकर मेरा तन सिहर उठा और अनैच्छिक क्रिया के समान मेरे मुँह से निकला, ''अफ़्सोस! ..निहित स्वार्थ के लिए होनहार एक लड़की के भविष्य पर प्रश्न चिह्नं!'' इसके बाद शोभा के पास जाने के लिए मेरे पास हिम्मत शेष नहीं थी। हालाँकि उसकी माँ ने कह था कि बेटा तुम भी शोभा को समझाने का प्रयास करो।
  ''अभी उसका मन ठीक नहीं है! कल आऊंगा!'' बहाना बनाकर मैं उसके घर से निकल कर सड़क पर आ गया था।
  डॉ. दिनेश नीतिशास्त्र व तर्कशास्त्र के ख्याति प्राप्त व्याख्याता थे। नैतिकता विषय पर उनके व्याख्यान मैं सुन चुका था। डॉ. दिनेश के नैतिक प्रवचन और शोभा के प्रति स्वार्थपूर्ण व्यवहार की तुलनात्मक समीक्षा करते हुए मैं डॉ. वात्स्यायन के बंगले की और जा रहा था। अब डॉ. वत्स्यायन से अरविन्द-दर्शन टिप्स लेना मेरा उद्देश्य नहीं था। विचार-विमर्श का विषय अब शोभा के साथ डॉ. दिनेश का अमानवीय व्यवहार था। डॉ. वात्स्यायन ही ने शोभा का परिचय डॉ. दिनेश से कराया था।
                 दोपहर के लगभग 12 बजे होंगे। धूप धीरे-धीरे तेज होने लगी थी। मैं 'वात्स्यायन निवास' की लॉबी  में बैठा उनका इन्तजार कर रहा था। पहली मीटिंग के दौरान उन्होंने अवश्य ही ड्राइंग रूम में बैठा कर मुझे कृतार्थ किया था और जिसे मैने अपना सौभाग्य मान था। हैड आफॅ दा डिपार्टमेंट के बंगले के एसी ड्राइंगरूम में बैठनामेरे जैसे व्यक्ति के लिए सौभाग्य का विषय होना स्वाभाविक ही था। थोड़ी देर के इन्तजार के बाद उनका घरेलू नौकर डॉ. वात्स्यायन के बाहर आने का संदेश लेकर आया और संदेश देने के साथ ही लॉबी के पंखें का स्विच भी ऑन कर गया। एक क्षण के उपरान्त सिल्क का कुर्ता सफेद पायजामा और पाँव में सफेद रंग के ही स्लीपर पहने डॉ. वात्स्यायन  बाहर आए। अभिवादन के आदान-प्रदान के साथ ही भूजल स्रोत के समान मन की पीड़ा उनके समक्ष फूटने लगी, ''सर! पता है, शोभा के साथ क्या हुआ!''
  ''क्या हुआ?'' डॉ. वात्स्यायन ने आश्चर्य के साथ पूछा।
  ''सर! डॉ. दिनेश ने अपने लड़के के साथ शादी करने के लिए उस पर दबाव डाला था!''
  ''तो क्या हुआ! शादी कर लेनी चाहिए थी!''
  ''सर! वह पागल है!''
  ''तो क्या हुआ! ..इलाज तो चल रहा था। कल ठीक भी हो जाता। शादी के बाद तो वैसे भी ठीक हो जाना था!'' इतना कहकर डॉ. वात्स्यायन के मुखमंडल पर एक कुटिल मुस्कान व्याप्त हो गई थी। और उसके बाद मुस्कराते हुए पुन: बोले, ''..और, इतनी-सी बात पर वह डॉक्टर साहब का अपमान कर चली आई!'' अब मुझे पता चला कि डॉ. वात्स्यायन इस घटना से अनभिज्ञ नहीं थे। शायद मेरे मन की बात लेने के लिए ही वे अनजान बने हुए थे।
   ''सर! डॉ. दिनेश जैसे विद्वान व्यक्ति से ऐसे अनैतिक व्यवहार की आशा नहीं थी!''
  ''क्या होता है, नैतिक-अनैतिक?'' डॉ. वात्स्यायन ने बडे़ ही सहज अन्दाज से प्रश्न मेरे सामने फैंक-सा दिया था। 
  संवेदनहीन उनके व्यवहार का अनुभव कर मेरे चेहरे पर जुगुप्सा-भाव उतर आए थे। और, मेरे मुख से अचानक ही टीस भरी 'ओह!' निकल गई थी। उसके बाद आश्चर्य से मैं उनका मुँह ताकने लगा था।
  डॉ. वात्स्यायन ने सम्भवतया मेरे चेहरे पर उतर आए जुगुप्सा के भावों को नजर-अन्दाज कर दिया था और पूर्व भाव से ही उन्होंने कहना जारी रखा, ''..तुम्हारे लिए जो अनैतिक है, वही कृत्य नैतिकता की मेरी कसौटी पर खरा उतर सकता है! नैतिक और अनैतिक के बीच बस झीनी-सी अर्थहीन एक रेखा ही तो है!''
   नैतिक और अनैतिक के बीच की रेखा को अर्थहीन बता कर डॉ. वात्स्यायन मुस्करा दिए और होठों पर उसी कुटिलता को कायम रखते हुए बोले,  ''..नैतिक-ता! नीतिशास्त्र के पन्नों में ही खूबसूरत लगती है। पढ़ने-पढ़ाने तक तो ठीक है, जीवन में उतारने के लिए नहीं होती।'' ..नीति वाक्य सुना कर डा. शर्मा पुन: मुस्करा दिये थे। ..एक कुटिल मुस्कान!
  ..शोभा की पीड़ा विचारों के घने जंगल में कहीं गुम-सी हो गई थी और मैं नैतिकता के नए मायनो के साथ अब भविष्य की अंधेरी गलियों में विचरण करने लगा था। ..उनके नीति वाक्य और विषाक्त मुस्कान ने मेरा अन्तरमन घायल कर दिया था। मैं घायल किसी परिंदे की तरह बस तड़प  कर रह गया। ..बहेलिये के जाल में फँसे पँछी की गति और हो भी क्या सकती थी!
  डॉ. वात्स्यायन के निर्देशन में शोध कार्य करते हुए दूसरा वर्ष शुरू हो गया था। मगर इस तरह का व्यवहार पहले कभी नहीं दिखालाई दिया था। जब कभी दोस्तों के बीच डॉ. वात्स्यायन का जिक्र चलता तो दोस्त इतना जरूर कहते, ''यार, तेरा गाइड लालची-सा लगता है।'' मगर श्रद्धा व भक्ति के पाग में पगा मैं डॉ. वात्स्यायन को कभी खुली आँख से देखने का विचार भी मन में न ला सका। लेकिन उस दिन डॉ. वात्स्यायन ने ही आंखों पर बंधी श्रद्धा-भक्ति की पट्टंी तार-तार करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। लगा कि जैसे भाषण पिलाने के लिए वे पहले ही से तैयार बैठे थे। ''..सुनो, मेरे साथ काम करते-करते तुम्हें दो साल तो हो गए हैं, है ना।''
 स्वीकारोक्ति में मैंने आज्ञाकारी किसी शिष्य की तरह बस गरदन हिला दी थी।
  ''..इन दो साल के अन्दर तुम्हारे आचरण में एक बार भी व्यवहारिकता नजर नहीं आई।'' चिकनी चांद से पसीने पौंछते-पौंछते डॉ. वात्स्यायन बोले।
 ''..जानते हो तुम्हारे डॉ. गर्ग ने भी मेरे अंडर में ही डाक्ट्रेट की है।''
 ''जी, सर!''
 ''..गर्ग मेरे बच्चों को पढ़ाया करता था। जब कभी जरूरत पड़ती थी तो दूध-सब्जी भी ला दिया करता था। तुम्हारे साथ विनायक भी मेरे ही अंडर रिसर्च कर रहा है, ना!'' विनायक का जिक्र करते हुए उनके चेहरे पर कृतज्ञता के कृत्रिम भाव उतर आए थे। स्वार्थ से प्रेरित व्यक्ति क्या कभी किसी के प्रति यथार्थ में कृतज्ञ होता होगा, मुझे असम्भव-सा लगा।
 पूर्व भाव चेहरे पर चिपकाए हुए उन्होंने आगे कहा, ''..जानते हो! कितनी सेवा करता है, विनायक। बहुत व्यवहारिक लड़का है। ..और तुम..?''
  मैंने अपने आप को संभाला और बोलने की हिम्मत जुटाई।  ''सर, मेरी निष्ठ में कहीं कुछ कमी रह गई क्या? सेवा के लिए मैं हमेशा तैयार रहता हूँ। ..मैं समझ नहीं पा रहा हूँ , सर! ..श्रद्धा, सम्मान में मुझ से कहाँ चूक हुई?'' मैं लगभग गिड़गिड़ाने के स्थिति में सफाई दे रहा था।
  इसी बीच नौकर एक गिलास शीतल पेय लाया। डॉ.वात्स्यायन ने ट्रे से गिलास उठाया और घूँट-घूँट अपनी प्यास बुझाने लगे। मारे गरमी के प्यास मुझे भी सता रही थी और उनके प्रत्येक घूँट के साथ मैं अपने सूखे होंठों पर जीभ फेर कर प्यास बुझाने की चेष्टा कर रहा था। घँूट भरते-भरते डॉ. वात्स्यायन ने आगे कहा, ''..एमरजेंसी के चक्कर में मैं एक हफ्ता जेल में रहा, तुम एक दिन भी मुझ से मिलने आए? ..नहीं ना! ..विनायक रोज आता था।''
 ''जी, सर! गलती हो गई।'' बोलने की हिम्मत तो जुटाई, मगर हिम्मत में आत्मविश्वास नहीं था। मैं बता नहीं पाया कि उस दौरान मैं जब-जब आपके बंगले पर आया मुझे बाहर से बाहर ही लौटा दिया गया। मुझ से यह भी नहीं पूछा गया कि मैं क्यों और किस लिए आया हूँ।
  ''गलती नहीं..!'' इतना कहकर उन्होंने अपनी दृष्टिं मेरे चेहरे पर केन्द्रित की। सम्भवतया चेहरे पर उतरते-चढ़ते भाव पढ़ने की मंशा से। अगले ही क्षण बोले, ''..थोड़ा व्यावहारिक बनो। व्यावहारिक नहीं हो इसलिए ही बार-बार गलती करते हो।''
 क्षणिक विचार करने के उपरान्त डॉ. वात्स्यायन आगे बोले, ''..अच्छा सुनो, जिला कांग्रेस अध्यक्ष तुम्हारे रिश्तेदार हैं, ना। उनसे कह कर मेरे मामले खत्म कराओ।''
 ''जी, सर।'' गरदन झुकाए-झुकाए मैंने कहा।
 डॉ. वात्स्यायन फिर बोले, ''तुम्हारे यहाँ तो खेती होती है? गेंहू भी होते होंगे! मेरे यहां साल भर में पाँच बोरी गेंहू लगता है। ..देखो, चमचागीरी का जमाना है। कामयाब होना है, तो कुछ सीखो जमाने से।''
  डॉ. वात्स्यायन के ताने और तानों के सहारे मंशा व्यक्त करने का तरीका देख-सुन अब मेरा धैर्य और श्रद्धा दोनों ही चूर-चूर होने लगी थे। शीशे की तरह चूर-चूर होते विश्वास के बीच से मेरे अन्तरमन से अनायास ही आवाज निकली,  ''सर, चमचागीरी करना मेरे बस की बात नहीं है। श्रद्धा-भक्ति में कमी नहीं आएगी।''
  ''श्रद्धा-भक्ति और चमचागीरी में अन्तर क्या है? बस शब्द ही तो अलग-अलग हैं।'' डॉ. वात्स्यायन ने अपना पक्ष रखते हुए कहा।
साहस और आत्मविश्वास दोनों ही अब मेरे डरपोक मन पर काबिज हो गए थे और अब डर नहीं वे ही दोनों मेरी जिह्वा पर बैठे थे।
मेरे मुँह से निकला, ''चमचागीरी में नैतिकता नहीं होती, इसलिए चमचागीरी करने वाले कभी भी निष्ठवान नहीं हो सकते।''
 डॉ. वात्स्यायन आश्चर्य भाव से बोले, ''नैतिक-ता..! चमचागीरी नहीं करोगे तो जिंदगी में कभी कामयाब नहीं हो पाओगे।'' कहते-कहते डॉ. वात्स्यायन घर के अन्दर चले गए।
मैं, बंगले की लॉबी में खड़ा पसीना पोंछता रह गया। पैर लड़खड़ाने लगे। मुझे अहसास हुआ कि मन पर काबिज साहस और आत्मविश्वास एक अस्थाई भाव था, मियादी बुखार की तरह जो धीरे-धीरे अब स्वयं ही उतरने लगा था। किंकर्तव्य विमूढ़-सा, लड़खड़ाते पैरों से मैं बंगले के बाहर आया। ..दिशा विहीन-सा हो गया था। तैय नहीं कर पा रहा था, किधर जाना है। तभी पास से एक रिक्शा गुजरी। रोकने का इशारा करने के लिए जैसे हाथ स्वयं ही उठ गया और मैं रिक्शा पर सवार हो गया। रिक्शा वाले ने भी मंजिल का पता पूछे बिना ही पैडल घुमाने शुरू कर दिए। आगे तिराहा था, जहां उसने पूछा, ''किधर जाना है, बाउजी?''
अनायास ही मुँह से निकल, ''मेरठ कॉलेज'' और रिक्शा वाले ने रिक्शा का रुख कॉलेज की तरफ मोड़ दिया।
 जब-जब मन उदास होता था, तब-तब मुझे कॉलेज लाइब्रेरी का शान्त वातावरण अच्छा लगता था। शैल्फ से निकाल कर एक-दो पुस्तके पलटने का प्रयास किया मगर मन नहीं लगा। मन तो अतीत के वे काले पन्ने पलट रहा था। डॉ. वात्स्यायन ने जिन पर अपने बंगले पर आकर भेंट करने का आमंत्रण छाप दिया था।
        एम. ए. फाइनल परीक्षा का परिणाम आया था, उस दिन। डॉ. वात्स्यायन सहित तीनों प्रोफेसरों ने उज्ज्वल भविष्य के लिए छात्रों को अपने-अपने तरीके से शुभकामनाएं दी थी। डॉ. वात्स्यायन ने शुभकामना देते हुए मुझ से कहा था, ''आगे क्या करने का इरादा है?''
 झिझकते हुए मैंने कहा था, ''अभी सोचा नहीं सर।''
  ''अभी सोचा नहीं..!'' आश्चर्य व्यक्त करते हुए डॉ. वात्स्यायन मुस्करा दिए थे और फिर बोले, ''अरे, कैसे लड़के हो! एमए कर लिया और भविष्य के बारे में सोचा नहीं! ठीक है, कल सुबह मुझ से घर पर मिलना।''
  मैंने फिर उसी लहजे में कहा था, ''जी सर! ..सर आपका घर..?''
  डॉ. शर्मा ने पुन: आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा, ''अपने हैड आफ दा डिपार्टमेंट का घर नहीं जानते!'' और, इसके साथ उन्होंने जेब से विजीटिंग कार्ड निकाल कर मेरी तरफ बढ़ा दिया था।
  मेरे लिए वह रंग-बिरंगे चंद अक्षरों से सुसज्जिात केवल विजीटिंग कार्ड ही नहीं था, गुरु का पर्ंम आशीर्वाद था। कल की सुबह के इन्तजार में उस दिन रात भर सोया नहीं था, मैं। रात के बाद उस दिन भी सुबह अपने वक्त पर ही आई थी, मगर मुझे लगा था आज की रात कुछ लंबी हो गई है या सुबह ने ही आने में देर कर दी है।
  बहरहाल सुबह हुई और फटाफट तैयार हो कर डॉ. वात्स्यायन के चरणों में मिष्ठान अर्पित करने के उद्देश्य से मैं उनके बंगले पर था। उन्होंने मुस्करा कर मेरा स्वागत किया था। श्रद्धा को चमचागीरी का पर्यायवाची बताने के समय भी वह मुस्कराए थे। मगर दोनों में जमीन-आसमान का अन्तर था। पहले दिन की मुस्कराहट में स्वागत भाव था, सौम्यता थी और अपनत्व था। दूसरी मुस्कराहट में कुटिलता थी।
  मेरे शुभचिंतक कहते थे, ''तू पहचान नहीं पाया, कुटिलता पहले दिन की मुस्कराहट में भी रही होगी। सौम्यता की चादर तो उठा कर देखता, असलियत नजर आ जाती। मोटे-मोटे होठों के बीच से प्रत्येक अवसर पर निकली उसकी मुस्कराहट कुटिलता लिए ही होती है।''
  डॉ. वात्स्यायन ने उस दिन चाय भी पेश की थी, शायद पहली और अंतिम बार। चाय की चुस्कियों के बीच ही उन्होंने फिर वही सवाल दोहराया था, ''भविष्य के बारे में क्या सोचा है।''
 ''सर अभी तो कुछ सोचा नहीं।''
  ''खैर, कोई बात नहीं! ..अच्छा यह बताओ पीएचडी करोगे?'' मेरे चेहरे पर उतरते-चढ़ते भावों का आकलन करने के उपरान्त डॉ. वात्स्यायन बोले, ''तुम में काबलियत है, करलोगे।''
हैड आफ दॉ डिपार्टमेंट के मुंह से पीएचडी का आफर, किसी भी विद्यार्थी के लिए इससे बड़ा सौभाग्य और क्या हो सकता है।
जिस तरह नवजात परिंदा कोमल पंख उगते ही नीड़ त्याग आसमान की गहराई नापने की चेष्ठा करने लगता है। कुछ वैसी ही स्थिति मेरे भी थी। कार्ड पाते ही मुझे लगा कि मेरे शरीर में पँख उग आए हैं और आसमान की ऊँचाई छूने का ख़्वाब बस अब हकीकत में तब्दील होने जा रहा है। 
           पहली मुलाकात के पन्द्रह दिन बाद पुन: भेंट करना निश्चित हुआ था। उस मीटिंग में पाश्चात्य दर्शन से सम्बद्ध हिन्द-अंग्रेजी की कुछ पुस्तकें पकड़ा दी गई और साथ में दो पन्नों की एक रूपरेखा। मुझ से कहा गया कि 'समकालीन पाश्चात्य दर्शन' नाम की पुस्तक के कुछ अध्याय लिखने हैं। इससे तुम्हें शोध प्रबन्ध लिखने में मदद मिलेगी। पुस्तक के लेखक के रूप में अपने साथ तुम्हारा नाम भी दूँगा।
            मैं खुश था, डॉ. वात्स्यायन जैसी शख़्िसयत ने मुझे सेवा का अवसर प्रदान किया। गुरु का प्रसाद पाकर मैं खुशी-खुशी घर लौट आया। और, पुस्तक लिखने में जुट गया। पुस्तक का अध्याय लिख कर पूरा करता। डॉ. वात्स्यायन को दिखलाता कुछ संशोधन और प्रशंसा के साथ घर लौट आता। इस प्रकार धीरे-धीरे एक वर्ष गुजर गया।
 पुस्तक के सभी अध्याय पूरे होने के बाद एक दिन डॉ. वात्स्यायन ने मुझे मेरे शोध प्रबन्ध के विषय से सम्बन्धित चार पन्नों की एक सिनॉपसिस मेरे हाथ में पकड़ा दी और उसके आधार पर शोध प्रबन्ध लिखने के लिए कहा। मैं पहले से ज़्यादा प्रसन्न था। लेकिन प्रसन्नता का यह भाव ज़्यादा दिन न टिक सका। क्योंकि डॉ. वात्स्यायन शनै: शनै: अपने मूल कुटिल स्वरूप में आने लगे थे। आज भी जब कभी वह दिन याद करता हूँ तो सिहर उठता हूँ, जिस दिन डॉ. वात्स्यायन को मैं अपने शोध प्रबन्ध का पहला चैप्टर दिखलाने गया था। डॉ. वात्स्यायन ने मेरे चैप्टर पर सरसरी नजर डालकर मुझे इस प्रकार घूरना शुरू किया था, मानो कोई बड़ा अपराध कर बैठा हूँ। वे बोले थे, ''तुम अंग्रेजी तो जानते ही नहीं, हिन्दी भी ठीक तरह नहीं जानते! ..यह भी कोई लिखने का तरीका है!'' इतना कहकर उन्होंने सभी पन्ने घायल कबूतर के पँख की तरह उड़ा दिए थे। संतप्त मन से मैं सोच रहा था- डॉ. वात्स्यायन की पुस्तक पूरी करते ही मेरी योग्यता कहीं खो गई अथवा उनका व्यवहार परिवर्तित हो गया।
   एक ओर श्रद्धा, निष्ठा और सेवा और दूसरी ओर मनोबल ह्रंास की प्रक्रिया से गुजरते-गुजरते तीन वर्ष पूरे होने जा रहे थे। एक दिन डॉ. वात्स्यायन ने खुलकर कह ही दिया, ''देखो! आप कोई टयूशन फीस तो मुझे देते नहीं हो और न ही शोध कराने के लिए हमें यूनिवर्सिटी कुछ पे करती है! ..फिर फिजूल तुम्हारे साथ मेहनत क्यों की जाए!'' क्षणिक अन्तराल के बाद डॉ. वात्स्यायन ने बहुत ही आत्मविश्वास के साथ कहा था, ''देखा! तुम्हारे लिए थीसिस लगभग तैयार पड़ी है। तुम्हें उसके लिए ज़्यादा मेहनत नहीं करनी पड़गी। आरडीसी की आगामी मीटिंग के लिए थीसिस सॅबमिट करा दूँगा। ..उसके लिए तुम्हें केवल बीस हजार रुपए देने होंगे!'' उस समय हमारे जैसे मध्यवर्गीय परिवार के लिए बीस हजार रुपए बहुत बड़ी रकम होती थी।
  मुझे प्रतीत हुआ कि निष्ठा, श्रद्धा और सेवा पर स्वार्थ भारी पड़ता जा रहा है। मगर, मांगी गई रकम का प्रबन्ध करना मेरी मजबूरी थी, क्योंकि जीवन के बहुमूल्य तीन वर्ष व्यर्थ ही मुझे मेरे हाथों से फिसलते नजर आ रहे थे। यही सोचकर मैं रुपयों का प्रबन्ध करने का ताना-बाना बुनता घर की ओर लौट रहा था। घर पहुँचा तो माँ ने मेरे हाथ में एक पत्र थमा दिया था। पत्र यूनिवर्सिटी से आया था। जिसमें लिखा था, ''आपके गाइड डॉ. वात्स्यायन की सलाह पर आपका रजिस्ट्रेशन रद्द किया जाता है।'' कभी मैं पत्र को देखता था, तो कभी आसमान की गहराइयों को। मुझे लगा कि जैसे आकाश की गहराई नापते हुए पंछी के पर कतर दिए गए हैं और फड़फड़ाता हुआ वह जमीन पर आ गिर है।
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