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Thursday, August 10, 2017

आनन्‍द
स्‍मृतियां !
दीवार पर चस्‍पा,
काई की परतें।
कल्‍पनाएं !
बंद किवाड़ों की बिवाइयों
से झांकता आंगन ।
स्‍मृतियां/ कल्‍पनाएं
अतीत/ भविष्‍य
और, वर्तमान ?
मुरझा गया है,
बंद किवाड़ों के आंगन में
खड़े शजर की तरह।
अतीत मृत्‍यु  है,
स्‍मृतियां मृत्‍यु का आलिंगन।
भविष्‍य अज्ञात है,
कल्‍पनाएं अरण्‍य में भटकना
अतीत और भविष्‍य से परे
स्‍मृति और कल्‍पनाओं से विलग
वर्तमान ही जीवन है।
वहीं आनन्‍द है।
वही आनन्‍द है।


Tuesday, April 2, 2013

अहसास


अपरिचित एक
अनजाना- सा!
मौन मिलन के भाव-सा!
मन में उठती टीस-सा
वह आया,  किन्‍तु...!
जाने कब चला गया!
भाव शून्‍य-सा,
 नि:शब्‍द खड़ा,
मैं उस पथ पर !
फिर आएगा, भाव वेग-सा
प्रेम पथ,आलोकित करता!
वह...!
अपरिचित, एक
अनजाना-सा...!
***

Monday, April 2, 2012

डकारने का दर्शन



स्कूल के वार्षिक समारोह में
मंत्री जी को बुलाया
मुख्य अतिथि बनाया
मंत्रीजी ने बच्चों की सेहत निहारी
खुल्ला खाने की नसीहत बघारी
मंत्रीजी बोले-
''देश धर्म का नाता है, खाना हमको भाता है।''
डाइटिंग हटाओ, देश बचाओ।
डाइटिंग सेहत के लिए घातक है,
देश की प्रगति में बाधक है।
इसलिए खाने में कभी नखारा नहीं दिखाया,
जो भी मिला उसे खुशी-खुशी  पचाया।
तुम भी खाने में नखरा न दिखाना,
जो भी मिल जाए उसी को पचाना।
छुप कर खाना, खुल कर खाना,
जैसा मौका मिले वैसे ही खाना।
छुप कर खाओगे, छुपे रुस्तम कहलाओगे,
पोल खुल गई तो रुस्तम-ए-हिंद बन जाओगे
देर-सबेर मंत्री भी  बन जाओगे।
मंत्रीजी बोले-
''गिरते हैं स-सवार ही मैदाने में जंग में,
वो क्या खाक गिरेंगे, जो घुटनो के बल चलते हैं।''
खाना तुम्हारा जन्मसिद्ध अधिकार है,
अत: खाते रहना, बस खाते रहना।
अधिकार समझ कर खाते रहना,
कर्तव्य समझ कर खाते रहना।
बस खाते रहना, खाते रहना,
जैसे भी हो बस खाते रहना।
मंत्रीजी बोले-
''जिसने की सरम, उसके फूटे करम,
जिसने की बेसरमाई, उसने खाई दूध मलाई।
तुम  लोहा खाना, सीमेंट खाना,
कुछ न मिले तो चारा ही खाना।
खाना तुम्हारा अधिकार है,
दूध-मलाई समझ कर खाना।
 मंत्रीजी बोले ,
तुम देस का भविष्य हो,
डकारना सीखो
डकारना तुम्हारा नैतिक दायित्व है,
इस देश के प्रति उत्तरदायित्व है। 
अत: जो भी मिले उसे ही डकारो ,
तोप डाकारो, तमंचे डकारो।
कुछ न मिले तो ताबूत ही डकारो,
देश के प्रति उत्तरदायित्व मान कर डकारो।
मगर शर्त यह है,
डकारना, मगर डकार न लेना,
बिना डकार के ही डकार लेना।
डकार कर, डकार लेना दु:चरित्र है,
डकार कर भी डकार न लेना राष्ट्रीय चरित्र है,
अत: डकार लेना- डकार लेना, पर डकार न लेना। 
डकारो, चाहे कुछ भी डकारो, मगर
इस देश को डाइटिंगवादियों से बचालो।
मंत्रीजी भावुक होकर गाने लगे-
मेरे देश को बचालो, चाहे चारा खालो रे,
चारा खालो रे चाहे, ताबूत चबालो रे,
मेरे देश को बचालो, चाहे कफन खालो रे
मेरे देश को बचालो---।

Wednesday, February 29, 2012

उदास मन






                                                 लम्‍हा-लम्‍हा जीवन बीता,
                                                 कतरा-कतरा मौत मिली।
                                                 जब-जब हमने साया मांगा,
                                                 तब-तब उनसे धूप मिली।
                                                              ***

Sunday, April 13, 2008

विकास का सफर

परिंदों की सांसे थम गई,
पुष्प सभी मुरझा गये
पात सभी झर गये
शाखाएं सभी नग्न हो गई
बरगद ने दम तोड़ दिया
प्रकृति रो पड़ी!!!
और इनसान,
विकास की गाथा लिखता रहा!
विकास के इस पथरीले सफर की
मंजिल क्या है?
परिणति क्या है?
परिणाम क्या है?
क्या..!
पंछियों के गीतों पर विराम!
खिल-खिलाते पुष्पों का मौन!
लहलाते वृक्षों की हत्या!
प्रकृति का विनाश!
ओह!
कितना आत्मघाती है,
पथरीले विकास का यह सफर!

संपर्क ः 9868113044

Friday, March 14, 2008

युग-धर्म


सुना है,
सुनता आ रहा हूं।
आत्मा अमर है,
शरीर नश्वर है।
होते होंगे,
राम के त्रेता में,
कृष्ण के द्वापर में।
अब तो यह फ़लसफ़ा बेमानी सा लगता है।
दादी-नानी के मुंह से,
परियों की कहानी सा लगता है!
मैंने तो,
हर दिन, हर पल,
आत्मा को मरते देखा है।
---पढ़ा है,
पढ़ता आ रहा हूं।
आत्मा बदलती है, शरीर
पुराने कपड़ों की तरह।
बदलती होगी,
मैंने नहीं देखा!
हाँ, देखा है, बस!
आत्मा का आवरण
बदलते शरीरों को देखा है!
--यह त्रेता नहीं,
द्वापर नहीं,
कलियुग है!
आत्मघात ही,
इसका युग-धर्म है।
आत्मघात ही,
इसका युग-आदर्श है!
--- इसलिए ही,
मैं अंतरात्मा की आवाज पर
नित् आत्म-हत्या करता हूं।
तन-मन में
नित नई आत्मा भरता हूं।
फिर-फिर,
भ्रूण हत्या करता हूं।
क्योंकि इस युग में,
आत्मा नहीं,
शरीर अमर है।

संपर्क – 9717095225

Sunday, January 20, 2008

महंगाई का अर्थशास्‍त्र- दो

उम्मीदवार ने दरवाजा खटखटाया,
मतदाता ने दरवाजा खोला।
फिर अरहर की दाल से पीले दांत
निपोर कर बोला।
अरे! यह क्या?
तुम तो प्याज की तरह बाजार से गायब थे।
नई फसल की तरह इस आवक के पीछे राज क्या है?
कुछ तो बतलाओ वत्स, बात क्या है?
उम्मीदवार ने पहाड़ी आलू सा मुंह खोला।
फिर यूं बोला-
तेरे द्वार पर आया हूं,
बस वही एक अदद वोट मंगने आया हूं।
मतदाता भाव बढ़ाते हुए बोला-
वोट देना मजबूरी है।
इसलिए वोट तो जरूर मिलेगा।
मगर आलू-प्याज का हिसाब देना पड़ेगा।
अभी तक इमली के पत्ते पर दंड लगाई है।
मतदाता को खूब राह दिखाई है।
बच्चू! अब मतदाता की बारी है।
अब हम तुम्हें तेल दिखाएंगे,
तेल की धार दिखाएंगे।
दाल आटे का भाव बताएंगे।
महंगाई की मार क्या होती है,
इसका अहसास कराएंगे।
उम्मीदवार ने आदतन पाला बदला।
बातों-बातों में बातों का रस घोला।
फिर कुछ इस तरह बोला।
माई-बाप, मेरे आका, मेरे मालिक।
महंगाई तो प्रकृति का प्रकोप है,
उस पर नहीं किसी का जोर है।
चाहता तो मैं भी हूँ,
हर चीज टके सेर बिक जाए।
ईमान की तरह हर चीज सस्ती हो जाए।
मगर फिर 'अंधेर नगरी चौपट राजा'
की कहावत तुम्हीं दोहरा ओगे।
फिर मुझे ही मूर्ख ठहराओगे।
प्याज के दाम बढ़ा कर हमने ज्यादती नहीं की है।
बस गरीब के 'खाजे' को अहमियत दी है।
तुम्ही तो कहते थे,
किसी भी राज ने गरीब को सम्मान नहीं दिया है।
हमने प्याज के भाव बढ़ा कर,
उसे मेवों का सा सम्मान दिया है।
गरीब पर कम से कम एक तो उपकार किया है।
इस पर भी आंख दिखाते हो,
वोट न देने का डर जताते हो।
वोट न दोगे, वोट फिर भी तेरी ही पाऊंगा
सुन! असली न सही,
बोगस वोट से जीत कर दिख लाऊंगा।
ऊपर वाले की दुआ रही,
तो तेरे ही नाम के वोट से
संसद पहुंच जाऊंगा !
संपर्क – 9868113044

Saturday, January 19, 2008

महंगाई का अर्थशास्‍त्र

मस्टराइन ने मास्टर के हाथ में रोटी पकड़ाई।
मास्टर ने त्यौरी चढ़ाई।
कमबख्त! हाथ में सूखी रोटी पकड़ा दी।
शर्म नहीं आई।
कम से कम दाल का पानी ही बना लाती।
मास्टर के तेवर देख मस्टराइन मुस्‍कराई,
अरे, बैठे-ठाले नखरे दिखाते हो।
जमीन पर बैठे-बैठे
आसमान की उड़ान भरते हो।
अरे, ईमान से भी ज्यादा महंगे हैं,
दाल के भाव।
भाव अपने 'लेवल' में लाओ।
मास्टर फिर झल्लाया।
दाल नहीं थी, तो आलू ही भून लाती।
कम से कम रोटी तो निगली जाती।
मस्टराइन को मास्टर पर तरस आया,
गुस्से का भाव बे-भाव पचाया।
फिर मास्‍टर को इस तरह समझाया।
अरे, आजकल आलू के नखरे भी,
तेरे नखरों से कम नहीं हैं।
दिवाली पर तो बनाया ही, था आलू का चौखा।
होली पर फिर मिल जाए, यह भी कुछ कम नहीं है।
मास्टर की अकल में बात धंसी नहीं।
वह फिर बड़बड़ाया।
चल छोड़ दाल-आलू की भाजी,
कुछ नहीं था, तो नमक के साथ प्याज ही रख लाती।
प्याज का नाम सुन मस्टराइन भर्राई,
आंख में कड़वे तेल से आंसू लिए चिल्लाई।
दिमाग फिर गया है तेरा,
दाल-आटे के भाव का नहीं तुझे बेरा।
सुराज में रोटी मिल रही है, खैर मना।
आलू-प्याज को अपना व्यसन न बना।
संपर्क : 9868113044

Tuesday, January 8, 2008

अबोध!!!

रेत जिस सहजता से इकट्ठा होता है,
उसी सहजता से बिखर जाता है।
कल नहीं जानता था, अबोध था।
पांव पर रेत चढ़ाता, घर बनाता।
खुश होता,
स्रजनात्मक अभिव्यक्ति पर।
वह मेरा सहज विजय-भाव था,
अहम् नहीं।
रेत का घर रेत की तरह बिखर जाता।
रोता..!
वह मेरा पराजय भाव था।
अहम् का बिखरना नहीं।
तब नहीं जानता था।
रेत का घर, रेत होता है।
घर नहीं!
तब मैं अबोध था!
आज जानता हूं,
अबोध नहीं हूं!
फिर भी सपने बुनता हूं,
महल बनाता हूं।
किंतु यह स्रजनात्मक अभिव्यक्ति नहीं,
अहम् भाव है।
क्योंकि मैं अब अबोध नहीं, जानता हूं।
फिर भी खुश होता हूं, अहम् भाव पर।
महल ढह जाते हैं,
सपने बिखर जाते हैं।
फिर भी रेत के महल खड़े करता हूं,
सपने बुनता हूं।
सच में आदमी कल भी अबोध था,
आज भी अबोध है!
रेत के महल खड़े करता है।
रेत की तरह बिखर जाते हैं।
सपने बुनता है,
सपनों की तरह बिखर जाते हैं।
अतीत के सहारे, वर्तमान का निर्माण।
और रेत के गलियारों में,
कहीं खो जाता है, वर्तमान का यथार्थ!
संपर्क – 9868113044