भारतीय हॉकी टीम बीजिंग ओलंपिक में खेलने से वंचित रह गई। हॉकी टीम यदि 'टीम' होती तो बीजिंग में सैर-सपाटा करने से वंचित न रहती। पराजय को राष्ट्रीय शर्म का विषय बताया जा रहा है। समूचा राष्ट्र शरमसार है। केवल गिल साहब के अतिरिक्त! दरअसल गिल साहब प्रोफेशनल व्यक्ति हैं। प्रैक्टिकल अप्रोच वाले इनसान हैं। मेरा मानना है कि हॉकी को मोक्ष प्रदान करने के लिए वे कतई दोषी नहीं हैं। जो व्यक्ति गिल साहब की आलोचना कर रहे हैं, उनसे पूछना चाहूंगा कि संहारकर्ता को पुनर्जीवन का कार्य क्या सोच कर सौंप गया? मेरे दूसरा सवाल है- गिल साहब को हॉकी की बागडोर थमाते हुए क्या उन्हें बताया गया था कि आतंकवाद की तरह हॉकी को गडडी नहीं, चढ़ाना है, उसे पुनर्जीवित करना है?
राष्ट्रीय-चरित्र में 'शर्म' नाम का यह तत्व अचानक कहां से घुसपैंठ कर गया? मैं आश्चर्यचकित हूं! हकीकत में हॉकी टीम का ओलंपिक से वंचित रहना नहीं, राष्ट्रीय-चरित्र में 'शर्म' तत्व की घुसपैंठ शर्म का विषय है! गिल साहब की अध्यक्षता में चुनिंदा प्रोफेश्नल नेताओं की एक कमैटी गठित कर इस घुसपैंठ की जांच होनी चाहिए।
हॉकी को राष्ट्रीय खेल का दर्जा प्रदान करना, मेरे लिए आश्चर्य का पहला कारण है। पता नहीं किसने और क्यों अंग्रेजों के इस खेल को राष्ट्रीय-सम्मान से विभूषित करने की जुर्रत कर दी? भारत का राष्ट्रीय खेल कबड्डी होना चाहिए था। गूल्ली-डंडा हो सकता है। इनके अतिरिक्त कंचे-गोली को राष्ट्रीय खेल घोषित किया जा सकता था। ये सभी ऐसे खेल हैं, जो क्षेत्रवाद से ऊपर उठ कर गली-गली खेले जाते हैं। कंचे-गोली का तो जवाब नहीं! हमारी समूची राजनीति ही गोली बाजी पर आधारित है। ऐसा कौन सा दल और कौन से नेता है जो 'गोली' देने में माहिर नहीं है! यदि अंग्रेजों के खेल को ही राष्ट्रीय खेल का दर्जा देना है, तो क्रिकेट को दिया जा सकता है। ऊपर वाले की दुआ से आजकल क्रिकेट का झण्डा भी बुलंद है और खिलाडि़यों की बिकावली का बाजार भी गर्म है।
शरमसार होने का वैसे भी कोई औचित्य नहीं है, क्योंकि नाक ऊंची रखने के लिए हमारे पास एक नहीं अनेक विकल्प मौजूद हैं। हुड़दंगी-राजनैतिक संस्कृति क्या गर्व करने के लिए नाकाफी है? संसद से लेकर सड़क तक क्या हुड़दंग के खेल में हम किसी से पीछे हैं? भ्रष्टाचार में नित-निरंतर प्रगति क्या हमारे लिए राष्ट्रीय-गौरव का विषय नहीं हो सकता? राजनीति में भ्रष्टाचार की तरह वृद्धि को प्राप्त महंगाई पर क्या सिर ऊंचा नहीं कर सकते? ऐसी अनेकों उपलब्धि्यां राष्ट्रीय-कोष में जमा हैं, जिनपर गर्व किया जा सकता है। अत: राष्ट्रवासियों शर्म का त्याग करो। गिल साहब को भारतरत्न से सम्मानित करने की मांग करो!
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Tuesday, March 18, 2008
Wednesday, March 12, 2008
अन्तरात्मा की आवाज
मुन्नालाल चांदी का नहीं, हाथ में सोने का झुंझुना लेकर पैदा हुआ था। काम के नाम पर बाप-दादा द्वारा छोड़ा गया झुंझुना बजाने के अलावा और कोई कार्य उसके पास नहीं था। खाली बैठे उसके मन में अध्यात्म-भाव जागृत हो गया। राजनीति और अध्यात्म दो ही अवस्था में सूझता है, एक जब गंवाने के लिए बहुत कुछ हो, दूसरे जब कुछ भी न हो अर्थात इल्ला-रुक्के की स्थिति हो। ऐसी दोनों ही स्थिति में व्यक्ति खाली पाया जाता है! दोनों ही प्रकार के ऐसे महानुभाव राजनीति और अध्यात्म में रोटी खोजते हैं! शेष रोटी में ही राजनीति और अध्यात्म के दर्शन कर लेते हैं!
दरअसल मुन्नालाल की जन्म कुंडली में शनि की महादशा का प्रकोप था। राहु और केतु भी कुछ तिरछे-तिरछे ही गमन कर रहे थे। अत: साधु-सन्तों की कुसंगति में पड़ गया। उसकी निगाह साधु-सन्तों के ज्ञान भण्डार पर थी और साधु-सन्तों की निगाह उसके धन-भंडार पर।
साधु-सन्तों ने उसे आत्मज्ञान प्रदान करना शुरू किया। उसे आत्मा की आवाज सुनने और यथार्थ स्वरूप की ओर गमन करने का अभ्यास कराया!'
अभ्यास करते-करते मुन्नालाल को आत्मा की आवाज सुनाई देने लगी और उसी के अनुरूप वह गमन करने लगा। आत्मा कहती, 'हे, मुन्नालाल! भगवद्ं भजन में ध्यान लगाओ, दान-पुण्य कर इस जीवन को सार्थक बनाओ और अपना परलोक भी सुधारो। साधुओं के लिए आश्रम बनवाओ।'
आत्मा के आदेश का पालन करते हुए उसने साधुओं के लिए एक भव्य आश्रम का निर्माण कराया। एक दिन आत्मा ने मुन्नालाल को पुन: आवाज दी, 'सन्त मुन्नालाल! माया-मोह का त्याग करो, माया बंधन है। यथार्थ ज्ञान प्राप्ति में बाधक है। काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह ये सभी विकार इस माया की ही उत्पत्ति हैं। अत: विकारों का त्याग कर माया के बंधन से मुक्त होने के प्रयास करो। मनुष्य जब तक बंधन से मुक्त नहीं होगा, अपने यथार्थ स्वरूप को नहीं पहचान पाएगा।'
मुन्नालाल के आश्वासन के उपरान्त आत्मा ने आदेश दिया, 'ट्रस्ट का निर्माण कर अपनी समस्त संपत्ति आश्रम के नाम दान कर दो। इस तरह तुम बंधन मुक्त हो जाओगे और यथार्थ को प्राप्त हो जाओगे। यही मुक्ति का मार्ग है, यही मोक्ष मार्ग है।'
मुन्नालाल आत्मा द्वारा दिखलाए मार्ग का अनुसरण करता रहा और धीरे-धीरे यथार्थ स्वरूप की तरफ बढ़ता चला गया, अर्थात उसका जहाज डूबने लगा।
यथार्थ स्वरूप को देख वह दुखी था। पत्नी दयावती से उसका दुख देखा न गया और एक दिन वह बोली, 'हे, स्वामी! आप सत्यनारायण का व्रत करो। सत्यनारायण भगवान की कथा सुनने और व्रत करने मात्र से ही साधुराम नामक वैश्य का डूबता जहाज पुन: तैरने लगा था। लीलावती-कलावती भी सन्तान और धन्य-धान्य से परिपूर्ण हों गई थीं।'
पत्नी के सुझाव पर मुन्नालाल ने सत्यनारायण व्रत-कथा प्रारंभ कर दी। मगर वह भी उसके लिए कोढ़ में खाज के समान ही साबित हुई। वास्तव में पत्नी ने उसे केवल व्रत करने और कथा पाठ करने के लिए कहा था, सत्यनारायण को जीवन में उतारने के लिए नहीं।
उसकी बुद्धि भ्रष्ट हो गई थी अत: 'सत्य' को जीवन में उतार बैठा। वह नहीं जानता था कि सत्य दूसरों को भयभीत करने के लिए होता है, अपनाने के लिए नहीं! नैतिकता जीवन में उतारने के लिए नहीं उपदेश देने के लिए होती है!
मुन्नालाल अब पूरी तरह अपने यथार्थ स्वरूप में आ चुका था। अर्थात वह पूरी तरह लुट-पिट चुका था। एक दिन उसकी भेंट बचपन के एक मित्र से हुई। पूरा हाल जानने के बाद मित्र ने उसे आचार्यश्री स्वामी अभेदानन्द की शरण में जाने की सलाह दी।
आचार्यश्री राजनीति में धर्म के समान राजनेताओं के धर्म गुरु थे। आचार्यश्री ने मुन्नालाल के रोग से संबद्ध सभी लक्षण ध्यान पूर्वक सुने और फिर बोले- तुम मूर्ख हो, वत्स! आत्मा की आवाज सुनोगे तो ऐसी ही गति प्राप्त होगी, क्योंकि आत्मा की आवाज मनुष्य को उसके यथार्थ स्वरूप से परिचित कराती है और जिसमें तुम विचरण कर रहे हो यही मनुष्य का यथार्थ स्वरूप है।
तुम्हें यदि पुन: अपनी पूर्व स्थिति प्राप्त करनी है तो आत्मा का हनन कर अन्तरात्मा की आवाज सुननी होगी। जिसके श्रवण मात्र से ही नेता रातों-रात सत्ता तक पहुंच जाता है। लाख विरोध के उपरान्त भी सर्वशक्तिमान बन जाता है। सत्ता का केंद्र बन जाता है। साधारण मनुष्य भी धन-धान्य से परिपूर्ण होकर मृत्युलोक में सर्वसुख उपभोग करता है।
मुन्नालाल के कल्याणार्थ आचार्यश्री आगे बोले- हे वत्स, अन्तरात्म-तत्व सभी प्राणियों में समान रूप से विद्यमान है, किन्तु विंद्वान उसे विकसित कर सफलता का मार्ग प्रशस्त कर लेते हैं। संबद्ध व्रत कर तुमने अन्तरात्मा को विकसित नहीं किया, केवल आत्मा की ही आवाज सुनते रहे। हे, वत्स! यदि अन्तरात्मा की आवाज सुनना चाहते हो तो आत्मा का हनन कर डालो! मान-अपमान से परे हो जाओ, धन-धान्य स्वत: ही तुम्हारे नजदीक आजाएंगे।'
आत्महनन-व्रत-विधि पर प्रकाश डालते हुए आचार्य श्री आगे बोले, 'वत्स! प्रत्येक मनुष्य में काम, क्रोध, लोभ, मोह व अहंकार नामक पांच विकार विद्यमान हैं। जब किसी एक भी विकार की प्रधानता हो जाती है तब 'आत्म-तत्व' की स्थिति मेघाच्छादित सूर्य के समान हो जाती है। तब आत्म-तत्व गौण व अन्तरात्म-तत्व प्रधान हो जाता है। ऐसी स्थिति में मनुष्य को आत्म-तत्व की नहीं अंतरात्मा की आवाज सुनाई देने लगती है। अत: जाओ और आत्महनन-व्रत का पालन कर अंतरात्मा की आवाज सुनो, ईश्वर तुम्हारा कल्याण करेगा।'
आचार्यश्री द्वारा बताए व्रत का पालन कर मुन्नालाल आज पुन: पूर्व स्थिति को प्राप्त हो चुका है। डूबता उसका जहाज पुन: किनारे लग गया है। वह नेता भी हो गया है और सर्व-सुख संपन्न भी।
संपर्क – 9868113044
दरअसल मुन्नालाल की जन्म कुंडली में शनि की महादशा का प्रकोप था। राहु और केतु भी कुछ तिरछे-तिरछे ही गमन कर रहे थे। अत: साधु-सन्तों की कुसंगति में पड़ गया। उसकी निगाह साधु-सन्तों के ज्ञान भण्डार पर थी और साधु-सन्तों की निगाह उसके धन-भंडार पर।
साधु-सन्तों ने उसे आत्मज्ञान प्रदान करना शुरू किया। उसे आत्मा की आवाज सुनने और यथार्थ स्वरूप की ओर गमन करने का अभ्यास कराया!'
अभ्यास करते-करते मुन्नालाल को आत्मा की आवाज सुनाई देने लगी और उसी के अनुरूप वह गमन करने लगा। आत्मा कहती, 'हे, मुन्नालाल! भगवद्ं भजन में ध्यान लगाओ, दान-पुण्य कर इस जीवन को सार्थक बनाओ और अपना परलोक भी सुधारो। साधुओं के लिए आश्रम बनवाओ।'
आत्मा के आदेश का पालन करते हुए उसने साधुओं के लिए एक भव्य आश्रम का निर्माण कराया। एक दिन आत्मा ने मुन्नालाल को पुन: आवाज दी, 'सन्त मुन्नालाल! माया-मोह का त्याग करो, माया बंधन है। यथार्थ ज्ञान प्राप्ति में बाधक है। काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह ये सभी विकार इस माया की ही उत्पत्ति हैं। अत: विकारों का त्याग कर माया के बंधन से मुक्त होने के प्रयास करो। मनुष्य जब तक बंधन से मुक्त नहीं होगा, अपने यथार्थ स्वरूप को नहीं पहचान पाएगा।'
मुन्नालाल के आश्वासन के उपरान्त आत्मा ने आदेश दिया, 'ट्रस्ट का निर्माण कर अपनी समस्त संपत्ति आश्रम के नाम दान कर दो। इस तरह तुम बंधन मुक्त हो जाओगे और यथार्थ को प्राप्त हो जाओगे। यही मुक्ति का मार्ग है, यही मोक्ष मार्ग है।'
मुन्नालाल आत्मा द्वारा दिखलाए मार्ग का अनुसरण करता रहा और धीरे-धीरे यथार्थ स्वरूप की तरफ बढ़ता चला गया, अर्थात उसका जहाज डूबने लगा।
यथार्थ स्वरूप को देख वह दुखी था। पत्नी दयावती से उसका दुख देखा न गया और एक दिन वह बोली, 'हे, स्वामी! आप सत्यनारायण का व्रत करो। सत्यनारायण भगवान की कथा सुनने और व्रत करने मात्र से ही साधुराम नामक वैश्य का डूबता जहाज पुन: तैरने लगा था। लीलावती-कलावती भी सन्तान और धन्य-धान्य से परिपूर्ण हों गई थीं।'
पत्नी के सुझाव पर मुन्नालाल ने सत्यनारायण व्रत-कथा प्रारंभ कर दी। मगर वह भी उसके लिए कोढ़ में खाज के समान ही साबित हुई। वास्तव में पत्नी ने उसे केवल व्रत करने और कथा पाठ करने के लिए कहा था, सत्यनारायण को जीवन में उतारने के लिए नहीं।
उसकी बुद्धि भ्रष्ट हो गई थी अत: 'सत्य' को जीवन में उतार बैठा। वह नहीं जानता था कि सत्य दूसरों को भयभीत करने के लिए होता है, अपनाने के लिए नहीं! नैतिकता जीवन में उतारने के लिए नहीं उपदेश देने के लिए होती है!
मुन्नालाल अब पूरी तरह अपने यथार्थ स्वरूप में आ चुका था। अर्थात वह पूरी तरह लुट-पिट चुका था। एक दिन उसकी भेंट बचपन के एक मित्र से हुई। पूरा हाल जानने के बाद मित्र ने उसे आचार्यश्री स्वामी अभेदानन्द की शरण में जाने की सलाह दी।
आचार्यश्री राजनीति में धर्म के समान राजनेताओं के धर्म गुरु थे। आचार्यश्री ने मुन्नालाल के रोग से संबद्ध सभी लक्षण ध्यान पूर्वक सुने और फिर बोले- तुम मूर्ख हो, वत्स! आत्मा की आवाज सुनोगे तो ऐसी ही गति प्राप्त होगी, क्योंकि आत्मा की आवाज मनुष्य को उसके यथार्थ स्वरूप से परिचित कराती है और जिसमें तुम विचरण कर रहे हो यही मनुष्य का यथार्थ स्वरूप है।
तुम्हें यदि पुन: अपनी पूर्व स्थिति प्राप्त करनी है तो आत्मा का हनन कर अन्तरात्मा की आवाज सुननी होगी। जिसके श्रवण मात्र से ही नेता रातों-रात सत्ता तक पहुंच जाता है। लाख विरोध के उपरान्त भी सर्वशक्तिमान बन जाता है। सत्ता का केंद्र बन जाता है। साधारण मनुष्य भी धन-धान्य से परिपूर्ण होकर मृत्युलोक में सर्वसुख उपभोग करता है।
मुन्नालाल के कल्याणार्थ आचार्यश्री आगे बोले- हे वत्स, अन्तरात्म-तत्व सभी प्राणियों में समान रूप से विद्यमान है, किन्तु विंद्वान उसे विकसित कर सफलता का मार्ग प्रशस्त कर लेते हैं। संबद्ध व्रत कर तुमने अन्तरात्मा को विकसित नहीं किया, केवल आत्मा की ही आवाज सुनते रहे। हे, वत्स! यदि अन्तरात्मा की आवाज सुनना चाहते हो तो आत्मा का हनन कर डालो! मान-अपमान से परे हो जाओ, धन-धान्य स्वत: ही तुम्हारे नजदीक आजाएंगे।'
आत्महनन-व्रत-विधि पर प्रकाश डालते हुए आचार्य श्री आगे बोले, 'वत्स! प्रत्येक मनुष्य में काम, क्रोध, लोभ, मोह व अहंकार नामक पांच विकार विद्यमान हैं। जब किसी एक भी विकार की प्रधानता हो जाती है तब 'आत्म-तत्व' की स्थिति मेघाच्छादित सूर्य के समान हो जाती है। तब आत्म-तत्व गौण व अन्तरात्म-तत्व प्रधान हो जाता है। ऐसी स्थिति में मनुष्य को आत्म-तत्व की नहीं अंतरात्मा की आवाज सुनाई देने लगती है। अत: जाओ और आत्महनन-व्रत का पालन कर अंतरात्मा की आवाज सुनो, ईश्वर तुम्हारा कल्याण करेगा।'
आचार्यश्री द्वारा बताए व्रत का पालन कर मुन्नालाल आज पुन: पूर्व स्थिति को प्राप्त हो चुका है। डूबता उसका जहाज पुन: किनारे लग गया है। वह नेता भी हो गया है और सर्व-सुख संपन्न भी।
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Sunday, March 9, 2008
आरक्षण की भीड़ में
बासी चेहरा उनका, आज कुछ ज्यादा ही चमक रहा था। बिलकुल घी चुपड़ी बासी रोटी जैसा। निगाह पड़ी और निगोड़ी भूखे स्वान की तरह अटक कर रह गई। लोक-लाज त्याग हम पर ऋतुसंहार हाबी हो गया। हम अपने को रोक नहीं पाए और श्रृंगार रस से ओतप्रोत ताऊ चिरंजीत की पैरोडी गुनगुने बैठ गए-
'प्रिय जला कर घास, घास के पास
बैठ कर कुछ गप-शप हो जाए।'
मगर ऋतुसंहार की अति संवेदनशील परिस्थितियों में श्रृंगार रस से ओतप्रोत इन पंक्तियों का श्रीमती जी पर तनिक भी असर दिखलाई नहीं दिया।
जवाब में उन्होंने गुनगुनाया, 'जरा ये मुन्ना सो जाए, जरा ये मुन्ना सो जाए'।
श्रीमती जी का अमानवीय यह रुख देख हम घबराए। पैंतरा बदला और लार टपकाते भूखे श्वान की तरह पूंछ हवा में लहराई, फिर बोले, ''क्या बात है, आज तो चेहरे से गजब का नूर टपक रहा है। सच मानो गौरवान्वित ऐसे दिव्य स्वरूप के दर्शन पहले कभी नहीं हुए। क्या किस फेयर एण्ड लवली का कमाल है?''
श्रीमती जी हमारी नीयत भांप गई और तपाक से बोली आज भूखे ही रहोगे।
हमने पालतू श्वान की पूंछ की तरह अपनी मूछें भी नीची की मगर फिर भी उनमें वामपंथी अकड़ बरकरार थी, समझौते की मेज तक आने के लिए तैयार न थी।
उनके हाव-भाव देख सूखे पत्ते की तरह खर-खराते हमने पूछा, भागवान! आम्रपाली से बोध भिक्षुणी बनने का कारण?
श्रीमती जी बोली- 'आज महिला दिवस है।'
काली बिल्ली की तरह आंखें चमकाती श्रीमती जी बोली- 'सुनो जी करवा चौथ पतियों का दिन होता है और उपवास बेचारी पत्नियां रखती हैं। महिला दिवस पर आज तुम उपवास रखोगे।'
श्रीमती जी हमारे हर दाव पर धोबी पाट मारे जा रही थी। हमें भी समझ आने लगा था कि श्रीमती जी आज हाथ आने वाली नहीं है। फिर भी इज्जात की खातिर हम पिटे पहलवान की तरह जमीन पर पड़े-पड़े ही हाथ पैर मारते रहे।
पिटा दांव फिर अजमाते हुए हम बोले- क्या महिला दिवस! आज क्या, पिछले तीस वर्ष से हमें तो हर दिवस महिला दिवस ही नजर आ रहा है। इस घर में आपके पांव पड़े नहीं थे कि कैलेंडर बदल गया था।
श्रीमती जी ने तोते की तरह निगाह बदली और कंधे से कंधा रगड़ते बोली-'महिलाएं अब हर क्षेत्र में पुरुष के कंधे से कंधा मिला कर समाज का छकड़ा प्रगति की राह पर खींच रही हैं। महिलाओं में अब जागृति आ गई है। अब शोषण नहीं चलेगा।'
अपना कंधा सहलाते हमें वह दिन याद आया जब अग्नि को हाजिर-नाजिर जान सात वचनों का कड़वा घूंट पीया था। सात गाली वचन दिलाने वाले पंडित को दी और दस अपने बाप को।
अपनी औकात के मुताबिक विनय भाव से हम बोले- हे, देवी! आज क्या, हमारे घर के लिए आपकी डोली ही जागृत अवस्था में ही उठी थी। डोली उठने के समय आपका विलाप और आपके करुण क्रंदन से उस दिन पड़ोसियों की नींद हराम होना इसकी स्पष्ट पुष्टि करता है।
तब सुषुप्त अवस्था में तो हम थे, आप नहीं। अत: हे, प्रिय! तुम्हारे आगमन से नींद तो हमारी हराम हुई है, तुम्हारी नहीं।
जागे हम है, तुम तो पहले ही से जागृत थी।
तुमने तब विलाप किया था, बस! हम तब से आज तक विलाप करते आ रहे है।
हमारा विलाप सुन श्रीमती जी का मुखमंडल तेज आंच में सिकी रोटी की तरह और भी लाल हो गया। लाल-लाल आंखें तरेर वे बोली, 'अब यह सब कुछ नहीं चलेगा। वे दिन गए जब खलील ़फाख्ता उड़ाया करता था। अब इस घर में मुझे भी तैंतीस प्रतिशत आरक्षण चाहिए।'
श्रीमती जी के आरक्षणवादी ऐसे विचार सुन हमारा ऋतुसंहार ऐसे गायब हुआ जैसे नये फार्मूला युक्त डिटरजेंट को देख कपड़ों से मैल।
धुले-धुले से हम सोचने लगे, अरे! ऋतुसंहार के चलते-चलते यह नरसंहार का एपीसोड! लेकिन श्रीमतीजी आज पूरे राजनैतिक जोश में थी। दार्शनिक लहजे का सफल प्रदर्शन करती श्रीमती जी ने फरमाया-'क्रांतिया नरसंहार से ही आती है, तुम्हारे ऋतुसंहार से नहीं।'
श्रीमती जी के शास्त्रीय ऐसे वचन सुन ऋतुसंहार का भूत भागा, दिमाग चकराया, जुबान सूखी और दिल घबराया। श्वान की जगह उसके अबोध शिशु की तरह मिमयाते हुए हम बोले- 'हे वंदनीय, हे स्मरणीय हे पठनीय! बाहर की दूषित राजनीति का अच्छे-भले घर में प्रवेश क्यों कराती हो। तुम तैंतीस परसेंट की बात करती हो, यह घर तो सेंट-पर-सेंट ही तुम्हारा है।
अपनी दशा तो बात-बात पर पूंछ हिलाने वाले किसी टोमी, रोमी से ज्यादा कभी नहीं रही। तुम्हारा ही तो एकाधिकार है इस घर- परिवार पर। अमर बेल की तरह बल खाती श्रीमती जी ने फिर दोहराया- 'चिकनी चुपड़ी इन बातों में अब हम नहीं आएंगे। तैंतीस परसेंट से कम पर बाज नहीं आएंगे।'
श्रीमती जी की जिद्द के कारण हम आंधी में घिरे गधे की तरह किंकर्तव्यविमूढ़ है।
बड़ा पुत्र मतभिन्नता के आधार पर आरक्षण मांग रहा है। छोटा पुत्र कहता है, मैं छोटा हूं, मेरा शोषण होता आया है। अत: मुझे भी आरक्षण चाहिए। पौत्र कहता है मैं अकेला हूं, अल्पसंख्यक हूं आरक्षण मुझे भी चाहिए।
आरक्षणवादियों की इस भीड़ में मैं अकेला पड़ गया हूं। मैं सोच रहा हूं-हरे-भरे इस घर को न जाने किस की नजर लग गई। घर का आंगन क्यों गृह युद्ध के मैदान में तब्दील होता जा रहा है? एक- एक कर अब और कितने पाले खिंचेंगे इस घर में?
संपर्क – 9868113044
'प्रिय जला कर घास, घास के पास
बैठ कर कुछ गप-शप हो जाए।'
मगर ऋतुसंहार की अति संवेदनशील परिस्थितियों में श्रृंगार रस से ओतप्रोत इन पंक्तियों का श्रीमती जी पर तनिक भी असर दिखलाई नहीं दिया।
जवाब में उन्होंने गुनगुनाया, 'जरा ये मुन्ना सो जाए, जरा ये मुन्ना सो जाए'।
श्रीमती जी का अमानवीय यह रुख देख हम घबराए। पैंतरा बदला और लार टपकाते भूखे श्वान की तरह पूंछ हवा में लहराई, फिर बोले, ''क्या बात है, आज तो चेहरे से गजब का नूर टपक रहा है। सच मानो गौरवान्वित ऐसे दिव्य स्वरूप के दर्शन पहले कभी नहीं हुए। क्या किस फेयर एण्ड लवली का कमाल है?''
श्रीमती जी हमारी नीयत भांप गई और तपाक से बोली आज भूखे ही रहोगे।
हमने पालतू श्वान की पूंछ की तरह अपनी मूछें भी नीची की मगर फिर भी उनमें वामपंथी अकड़ बरकरार थी, समझौते की मेज तक आने के लिए तैयार न थी।
उनके हाव-भाव देख सूखे पत्ते की तरह खर-खराते हमने पूछा, भागवान! आम्रपाली से बोध भिक्षुणी बनने का कारण?
श्रीमती जी बोली- 'आज महिला दिवस है।'
काली बिल्ली की तरह आंखें चमकाती श्रीमती जी बोली- 'सुनो जी करवा चौथ पतियों का दिन होता है और उपवास बेचारी पत्नियां रखती हैं। महिला दिवस पर आज तुम उपवास रखोगे।'
श्रीमती जी हमारे हर दाव पर धोबी पाट मारे जा रही थी। हमें भी समझ आने लगा था कि श्रीमती जी आज हाथ आने वाली नहीं है। फिर भी इज्जात की खातिर हम पिटे पहलवान की तरह जमीन पर पड़े-पड़े ही हाथ पैर मारते रहे।
पिटा दांव फिर अजमाते हुए हम बोले- क्या महिला दिवस! आज क्या, पिछले तीस वर्ष से हमें तो हर दिवस महिला दिवस ही नजर आ रहा है। इस घर में आपके पांव पड़े नहीं थे कि कैलेंडर बदल गया था।
श्रीमती जी ने तोते की तरह निगाह बदली और कंधे से कंधा रगड़ते बोली-'महिलाएं अब हर क्षेत्र में पुरुष के कंधे से कंधा मिला कर समाज का छकड़ा प्रगति की राह पर खींच रही हैं। महिलाओं में अब जागृति आ गई है। अब शोषण नहीं चलेगा।'
अपना कंधा सहलाते हमें वह दिन याद आया जब अग्नि को हाजिर-नाजिर जान सात वचनों का कड़वा घूंट पीया था। सात गाली वचन दिलाने वाले पंडित को दी और दस अपने बाप को।
अपनी औकात के मुताबिक विनय भाव से हम बोले- हे, देवी! आज क्या, हमारे घर के लिए आपकी डोली ही जागृत अवस्था में ही उठी थी। डोली उठने के समय आपका विलाप और आपके करुण क्रंदन से उस दिन पड़ोसियों की नींद हराम होना इसकी स्पष्ट पुष्टि करता है।
तब सुषुप्त अवस्था में तो हम थे, आप नहीं। अत: हे, प्रिय! तुम्हारे आगमन से नींद तो हमारी हराम हुई है, तुम्हारी नहीं।
जागे हम है, तुम तो पहले ही से जागृत थी।
तुमने तब विलाप किया था, बस! हम तब से आज तक विलाप करते आ रहे है।
हमारा विलाप सुन श्रीमती जी का मुखमंडल तेज आंच में सिकी रोटी की तरह और भी लाल हो गया। लाल-लाल आंखें तरेर वे बोली, 'अब यह सब कुछ नहीं चलेगा। वे दिन गए जब खलील ़फाख्ता उड़ाया करता था। अब इस घर में मुझे भी तैंतीस प्रतिशत आरक्षण चाहिए।'
श्रीमती जी के आरक्षणवादी ऐसे विचार सुन हमारा ऋतुसंहार ऐसे गायब हुआ जैसे नये फार्मूला युक्त डिटरजेंट को देख कपड़ों से मैल।
धुले-धुले से हम सोचने लगे, अरे! ऋतुसंहार के चलते-चलते यह नरसंहार का एपीसोड! लेकिन श्रीमतीजी आज पूरे राजनैतिक जोश में थी। दार्शनिक लहजे का सफल प्रदर्शन करती श्रीमती जी ने फरमाया-'क्रांतिया नरसंहार से ही आती है, तुम्हारे ऋतुसंहार से नहीं।'
श्रीमती जी के शास्त्रीय ऐसे वचन सुन ऋतुसंहार का भूत भागा, दिमाग चकराया, जुबान सूखी और दिल घबराया। श्वान की जगह उसके अबोध शिशु की तरह मिमयाते हुए हम बोले- 'हे वंदनीय, हे स्मरणीय हे पठनीय! बाहर की दूषित राजनीति का अच्छे-भले घर में प्रवेश क्यों कराती हो। तुम तैंतीस परसेंट की बात करती हो, यह घर तो सेंट-पर-सेंट ही तुम्हारा है।
अपनी दशा तो बात-बात पर पूंछ हिलाने वाले किसी टोमी, रोमी से ज्यादा कभी नहीं रही। तुम्हारा ही तो एकाधिकार है इस घर- परिवार पर। अमर बेल की तरह बल खाती श्रीमती जी ने फिर दोहराया- 'चिकनी चुपड़ी इन बातों में अब हम नहीं आएंगे। तैंतीस परसेंट से कम पर बाज नहीं आएंगे।'
श्रीमती जी की जिद्द के कारण हम आंधी में घिरे गधे की तरह किंकर्तव्यविमूढ़ है।
बड़ा पुत्र मतभिन्नता के आधार पर आरक्षण मांग रहा है। छोटा पुत्र कहता है, मैं छोटा हूं, मेरा शोषण होता आया है। अत: मुझे भी आरक्षण चाहिए। पौत्र कहता है मैं अकेला हूं, अल्पसंख्यक हूं आरक्षण मुझे भी चाहिए।
आरक्षणवादियों की इस भीड़ में मैं अकेला पड़ गया हूं। मैं सोच रहा हूं-हरे-भरे इस घर को न जाने किस की नजर लग गई। घर का आंगन क्यों गृह युद्ध के मैदान में तब्दील होता जा रहा है? एक- एक कर अब और कितने पाले खिंचेंगे इस घर में?
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Sunday, February 24, 2008
मृत्यु का अर्थशास्त्र
चचा मुसद्दीलाल एक अर्से से असाध्य रोग से पीड़ित हैं। गली-मुहल्ले के डाक्टर जवाब दे चुके हैं, क्योंकि चचा स्वयं भी इस नश्वर संसार को जवाब देने की स्थिति में पहुंच गए हैं। पुत्र मुन्नालाल ने हैसियत के मुताबिक पिता की दवा-दारू में कोई कसर बाकी नहीं रखी, मगर क्या किया जाए जब ईश्वर को कुछ और ही मंजूर है। पीड़ित मुसद्दीलाल एक दिन मुन्नालाल से बोले, 'मुन्ना एक काम कर, मुझे किसी सरकारी अस्पताल में भर्ती करा दे।'
पिता की बात सुन अपनी हैसियत और भीड़ भरे सरकारी अस्पतालों के दृश्य उसके सामने एक साथ उभर आए और वह कसमसा कर रह गया। उसने पिता की बात का कोई जवाब नहीं दिया। बस मन ही मन अपने को धिक्कारा, काश! कोई मंत्री-संतरी उसकी भी जान-पहचान का होता और वह भी अपने पिता की अंतिम इच्छा पूरी कर पाता।
दो-तीन दिन बीत जाने के बाद चचा मुसद्दीलाल ने अपनी इच्छा पुन: व्यक्त की। अपनी एलआईजी हैसियत और पिता के दुराग्रह के कारण शालीनता के सभी बंधन तोड़ मुन्नालाल बोला, 'सरकारी अस्पताल में भर्ती होना चाहते हो, अभी भी अपने को तहसीलदार समझ रहे हो। जिंदगी के अंतिम चरण में भी विलासिता के ख्वाब देख रहे हो।'
पुत्र के मधुर वचन सुन मुसद्दीलाल की आंखें भर आई और मन ही मन अपने आप को धिक्कारा, 'सरकारी अस्पताल में इलाज भी विलासिता! क्या जमाना आगया है?'
मृत्यु शैया पर पड़े पिता के साथ दुर्व्यवहार का किस्सा पूरी कालोनी में चर्चा का विषय बन गया। लोक-लाज वश वृद्ध माता-पिता की सेवा करने वाले सुपुत्रों ने भी मुन्नालाल को धिक्कारा, तो ऐसे सुपुत्र भी आलोचना करने में पीछे नहीं रहे, जो पुण्य प्राप्त करने के आध्यात्मिक स्वार्थ के वशीभूत सेवा करना अपना परम-धर्म मानते हैं। और तो और ऐसे लोगों ने भी मुन्नालाल को खूब लानत-मनानत देकर अपनी गिनती सुपुत्रों में करा ली, जिन्होंने अपने माता-पिता को जीते-जी एक गिलास पानी भी कभी अपने हाथ से नहीं पिलाया। हां, मृत माता-पिता की आत्मा उन्हें परेशान न करें, इस भय से मुक्त रहने के लिए वे उनका श्राद्ध करना कभी नहीं भूले।
खैर बात उड़ते-उड़ते मुसद्दीलाल के मित्र चिंतादास के पास पहुंची और लानत-मनानत देने के लिए उसने मुन्नालाल को तलब किया। चिंतादास ने मुन्नालाल को पुत्रधर्म समझाया, पित्र भक्ति से ओतप्रोत पौराणिक कहानी सुनाई और लानत-मनानत दी और अंत में पिता को अस्पताल में भर्ती कराने की आदेशात्मक सलाह दी।
चिंतादास के वचन सुन मुन्नालाल बोला, 'चचा! तुम्ही बताओ, कोई कोर-कसर छोड़ी है उनके इलाज में, मगर वे तो सोचते हैं, आज भी वैसा ही जमाना है, जैसा उनकी तहसीलदारी के समय था।'
भीगी पलकों के साथ मुन्नालाल आगे बोला, 'चचा सरकारी अस्पताल में भरती कराना अब कोई खाला का घर नहीं है कि जब चाहो मेहमानदारी में चले जाओ। भरती कराने के लिए कम से कम स्वास्थ्य मंत्री की सिफारिश तो चाहिए ही, कहां से लाऊं?'
मुन्नालाल की चिंता चिंतादास को भी उचित लगी और हमें भी। सरकारी अस्पतालों में अब या तो सरकार आराम फरमाने जाते है अथवा ऐसे भाई लोग जेल की हवा में जिनका दम घुटता है। आम आदमी तो हाथ में दवा की पर्ची थामे बस तारीख पर तारीख ही भुगतता रहता है और तब तक भुगतता रहता है, जब तक कि ऊपर वाले की अदालत में उसके मुकदमे का अंतिम फैसला न सुना दिया जाता।
मुन्नालाल करता भी तो क्या करता, वह जानता है कि शहर में अमन-चैन कायम रखने के लिए पुलिस वाले वारदात दर्ज नहीं करते और मृत्यु दर में गिरावट लाने के परम्ं उद्देश्य की प्राप्ति हेतु सरकारी अस्पताल वाले ला-इला़ज मरीज को भर्ती नहीं करते। फिर इस हालात में उसके पिता को कोई क्यों भर्ती करेगा।
दरअसल सरकारी अस्पताल वाले बड़े ही दयालु किस्म के जीव होते हैं। वे नहीं चाहते हैं कि कोई भी व्यक्ति सड़-सड़ कर अस्पताल में मरे, अच्छा यही है कि वह अपने परिजनों के बीच चैन से मृत्यु को प्राप्त हो। यही वजह है कि मरीज को जीवन के अंतिम पायदान तक पहुंचाने का अनुष्ठंान पूर्ण कर उसे अस्पताल से घर भेज दिया जाता है, ताकि वह शास्त्रानुसार मृत्यु को प्राप्त हो सके।
हां, मृत्यु का भी अपना शास्त्र होता है, अर्थशास्त्र! जो व्यक्ति निजी पंचतारा अस्पतालों की सुंदर नर्सो की बांहों में मृत्यु का वरण करते हैं, वे एचआईजी मृत्यु को प्राप्त होते हैं। सरकारी अस्पतालों के नकचढ़े वार्ड बॉय व नर्सो के प्रवचन सुनते-सुनते इस नश्वर शरीर का त्याग करने वाले मनुष्य एमआईजी मृत्यु को प्राप्त होते हैं और आंखों में अस्पताल सुख का सपना संजोए-संजोए घर के एक कोने में बिछी खटिया पर प्राण त्यागने वाले प्राणी एलआईजी मृत्यु को प्राप्त होते हैं। ईडब्ल्यूएस मृत्यु को प्राप्त होने वाले मनुष्य महानगरों की सड़क के किनारे पटरियों पर दम तोड़ने का सुख प्राप्त करते हैं।
संपर्क : 9868113044
पिता की बात सुन अपनी हैसियत और भीड़ भरे सरकारी अस्पतालों के दृश्य उसके सामने एक साथ उभर आए और वह कसमसा कर रह गया। उसने पिता की बात का कोई जवाब नहीं दिया। बस मन ही मन अपने को धिक्कारा, काश! कोई मंत्री-संतरी उसकी भी जान-पहचान का होता और वह भी अपने पिता की अंतिम इच्छा पूरी कर पाता।
दो-तीन दिन बीत जाने के बाद चचा मुसद्दीलाल ने अपनी इच्छा पुन: व्यक्त की। अपनी एलआईजी हैसियत और पिता के दुराग्रह के कारण शालीनता के सभी बंधन तोड़ मुन्नालाल बोला, 'सरकारी अस्पताल में भर्ती होना चाहते हो, अभी भी अपने को तहसीलदार समझ रहे हो। जिंदगी के अंतिम चरण में भी विलासिता के ख्वाब देख रहे हो।'
पुत्र के मधुर वचन सुन मुसद्दीलाल की आंखें भर आई और मन ही मन अपने आप को धिक्कारा, 'सरकारी अस्पताल में इलाज भी विलासिता! क्या जमाना आगया है?'
मृत्यु शैया पर पड़े पिता के साथ दुर्व्यवहार का किस्सा पूरी कालोनी में चर्चा का विषय बन गया। लोक-लाज वश वृद्ध माता-पिता की सेवा करने वाले सुपुत्रों ने भी मुन्नालाल को धिक्कारा, तो ऐसे सुपुत्र भी आलोचना करने में पीछे नहीं रहे, जो पुण्य प्राप्त करने के आध्यात्मिक स्वार्थ के वशीभूत सेवा करना अपना परम-धर्म मानते हैं। और तो और ऐसे लोगों ने भी मुन्नालाल को खूब लानत-मनानत देकर अपनी गिनती सुपुत्रों में करा ली, जिन्होंने अपने माता-पिता को जीते-जी एक गिलास पानी भी कभी अपने हाथ से नहीं पिलाया। हां, मृत माता-पिता की आत्मा उन्हें परेशान न करें, इस भय से मुक्त रहने के लिए वे उनका श्राद्ध करना कभी नहीं भूले।
खैर बात उड़ते-उड़ते मुसद्दीलाल के मित्र चिंतादास के पास पहुंची और लानत-मनानत देने के लिए उसने मुन्नालाल को तलब किया। चिंतादास ने मुन्नालाल को पुत्रधर्म समझाया, पित्र भक्ति से ओतप्रोत पौराणिक कहानी सुनाई और लानत-मनानत दी और अंत में पिता को अस्पताल में भर्ती कराने की आदेशात्मक सलाह दी।
चिंतादास के वचन सुन मुन्नालाल बोला, 'चचा! तुम्ही बताओ, कोई कोर-कसर छोड़ी है उनके इलाज में, मगर वे तो सोचते हैं, आज भी वैसा ही जमाना है, जैसा उनकी तहसीलदारी के समय था।'
भीगी पलकों के साथ मुन्नालाल आगे बोला, 'चचा सरकारी अस्पताल में भरती कराना अब कोई खाला का घर नहीं है कि जब चाहो मेहमानदारी में चले जाओ। भरती कराने के लिए कम से कम स्वास्थ्य मंत्री की सिफारिश तो चाहिए ही, कहां से लाऊं?'
मुन्नालाल की चिंता चिंतादास को भी उचित लगी और हमें भी। सरकारी अस्पतालों में अब या तो सरकार आराम फरमाने जाते है अथवा ऐसे भाई लोग जेल की हवा में जिनका दम घुटता है। आम आदमी तो हाथ में दवा की पर्ची थामे बस तारीख पर तारीख ही भुगतता रहता है और तब तक भुगतता रहता है, जब तक कि ऊपर वाले की अदालत में उसके मुकदमे का अंतिम फैसला न सुना दिया जाता।
मुन्नालाल करता भी तो क्या करता, वह जानता है कि शहर में अमन-चैन कायम रखने के लिए पुलिस वाले वारदात दर्ज नहीं करते और मृत्यु दर में गिरावट लाने के परम्ं उद्देश्य की प्राप्ति हेतु सरकारी अस्पताल वाले ला-इला़ज मरीज को भर्ती नहीं करते। फिर इस हालात में उसके पिता को कोई क्यों भर्ती करेगा।
दरअसल सरकारी अस्पताल वाले बड़े ही दयालु किस्म के जीव होते हैं। वे नहीं चाहते हैं कि कोई भी व्यक्ति सड़-सड़ कर अस्पताल में मरे, अच्छा यही है कि वह अपने परिजनों के बीच चैन से मृत्यु को प्राप्त हो। यही वजह है कि मरीज को जीवन के अंतिम पायदान तक पहुंचाने का अनुष्ठंान पूर्ण कर उसे अस्पताल से घर भेज दिया जाता है, ताकि वह शास्त्रानुसार मृत्यु को प्राप्त हो सके।
हां, मृत्यु का भी अपना शास्त्र होता है, अर्थशास्त्र! जो व्यक्ति निजी पंचतारा अस्पतालों की सुंदर नर्सो की बांहों में मृत्यु का वरण करते हैं, वे एचआईजी मृत्यु को प्राप्त होते हैं। सरकारी अस्पतालों के नकचढ़े वार्ड बॉय व नर्सो के प्रवचन सुनते-सुनते इस नश्वर शरीर का त्याग करने वाले मनुष्य एमआईजी मृत्यु को प्राप्त होते हैं और आंखों में अस्पताल सुख का सपना संजोए-संजोए घर के एक कोने में बिछी खटिया पर प्राण त्यागने वाले प्राणी एलआईजी मृत्यु को प्राप्त होते हैं। ईडब्ल्यूएस मृत्यु को प्राप्त होने वाले मनुष्य महानगरों की सड़क के किनारे पटरियों पर दम तोड़ने का सुख प्राप्त करते हैं।
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Thursday, February 21, 2008
कटी नाक का सवा हाथ बढ़ना
मुझे ऐसे लोगों पर तरस आता है, जो छोटी-छोटी बात को भी नाक का सवाल बना लेते हैं। बात कैसी भी हो, छोटी हो या बड़ी, नाक का सवाल नहीं बनाया जाना चाहिए। हकीकत में 'नाक' नाक का सवाल है ही नहीं! मेरी नजर में नाक को तरजीह देने वाले लोग अव्यवहारिक होते हैं। नाक बचाने में व्यर्थ ही अपना पूरा जीवन गंवा देते हैं!
वास्तव में नाक बचाने की वस्तु नहीं है, क्योंकि नाक बॉस की नाक का बाल बनने में बाधक है! प्रगति में बाधक है! नाक बचाऊ लोगों की जिंदगी 'जहां है, जैसी है' की स्थिति में ही व्यतीत हो जाती है। मौल-भाव से वंचित रह जाती है।
नाक होने का जिन्हें अहसास तक नहीं होता, ऐसे लोग व्यवहारिक होते हैं। अहसास नहीं होता, इसलिए नाक कटना उनके लिए कोई घटना नहीं है। प्रगति मार्ग पर बेखौफ बिना किसी बाधा के स्केटिंग करते चले जाते हैं। नाक कटे लोग ही सम्मानित व्यक्ति कहलाए जाते हैं। ता-उम्र पूजे जाते हैं। बाद मरने के उनके बुत भी पूजनीय हो जाते हैं। ऐसे लोग ही बाद मरने के भी अमर कह लाए जाते हैं।
नाक दरअसल शरीर का ही एक अंग है, मगर भिन्न प्रकृति का। क्योंकि यह जितनी कटती है, उससे कहीं ज्यादा बढ़ती है, अत: नाक कटने से शारीरिक हानि भी नहीं है। 'नाक कटते ही सवा हाथ बढ़ जाती है' यह शोध सदियों पुराना है। नाक वास्तव में गुलाब के झाड़ के समान है, क्योंकि नाक भी कांट-छांट के बाद ही बढ़ती है, उसके बाद ही फलती-फूलती है। बिना कटी नाक छोटी होती है, कटने के बाद ही बड़ी होती है।
नाक कुत्ते की पूंछ के समान है। सुरक्षित रहेगी, तो कुत्ते की पूंछ की तरह टेढ़ी ही रहेगी, अर्थात प्रगति में बाधक बनी रहेगी। टेढ़ी पूंछ क्योंकि आसानी से हिलती नहीं है, इसलिए टेढ़ी पूंछ का कुत्ता किसी को भाता नहीं है। कुत्ता वही वफादार कहलाया जाता है, जो बात-बात पर पूंछ हिलाता है। पूंछ हिलाने वाला कुत्ता ही अपने पालक की नाक का बाल बनता है।
टेढ़ी पूंछ तो वक्त पड़ने पर हिलाई भी जा सकती है, मगर नाक तो स्वभाव से ही स्थिर है, हिलती ही नहीं है। इस मामले में कुत्ते की पूंछ से भी बदतर है। यही कारण है कि नाकदार व्यक्ति भाग्यविधाता की नाक का बाल बनने से वंचित रह जाता है। ऐसी नाक का क्या लाभ, जो नाक का बाल बनने में बाधक हो। अत: उचित यही होगा कि नाक कटा कर प्रगति का मार्ग प्रशस्त किया जाए।
जिन कुत्तों की पूंछ सीधी नहीं हो पाती अर्थात हिल नहीं पाती, ऐसे नस्ल के कुत्तों की पूंछ बचपन में ही काट दी जाती है। पूंछ कटी नस्ल के ऐसे कुत्ते अपेक्षाकृत ज्यादा उपयोगी होते हैं, ज्यादा कीमती होते हैं। इसी प्रकार नाक कटे इंसान अपेक्षाकृत ज्यादा प्रभावशाली होते हैं, ज्यादा प्रगतिशील होते हैं।
दरअसल नाक और पूंछ कटने के बाद शरीर में कुछ जैविक परिवर्तन होने लगते हैं। कुछ अतिरिक्त हारमोंस बनने लगते हैं। जिनके कारण नाक कटे इंसान और पूंछ कटे कुत्ते उम्दा किस्म के कहलाए जाते हैं।
ऐसे अनेक महानुभाव कुकुरमुत्ते की तरह समाज में पनप रहें हैं, जो कभी साधारण जीव की तरह विचरते थे। आज विशिष्ट जनों की पंक्ति में भी आगे खड़े हैं। जाने-अनजाने या कहा जाए दुर्घटनावश कभी उनकी नाक कटी थी। प्रारंभ में तो शर्म के कारण बेचारों ने मुंह दिखाना बंद कर दिया था। कुरूप होने का अनुभव करने लगे थे। परंतु जैसे-जैसे उनके शरीर में जैविक परिवर्तन और हारमोंस विकसित हुए, वे अपने-आप को पूर्व की स्थिति से ज्यादा तरोताजा महसूस करने लगे और मुंह से नकाब हटाने लगे।
नाक कटे वे महानुभाव आज नाकदार ही नहीं अपने-अपने स्थान पर समाज व राष्ट्र की नाक कहलाए जा रहे हैं। उनमें से अनेक सत्ता में अपना अपूर्व योगदान देकर इस राष्ट्र को गौरव प्रदान कर रहें हैं।
अब आप पूछेंगे, तो क्या इस देश का जुगाड़ ऐसे ही महानुभाव धकेल रहें हैं? इस सवाल के जवाब में मैं कुछ नहीं बोलूंगा, चुप रहूंगा। बस इतना ही कहूंगा आप भी अपनी-अपनी नाक कलम करा लीजिए। कलमी वृक्षों पर लगे फल ज्यादा मीठे होते हैं, उम्दा कहलाए जाते हैं, महंगे भाव बिकते हैं। बाकी आप खुद समझदार हैं।
संपर्क- 9868113044
वास्तव में नाक बचाने की वस्तु नहीं है, क्योंकि नाक बॉस की नाक का बाल बनने में बाधक है! प्रगति में बाधक है! नाक बचाऊ लोगों की जिंदगी 'जहां है, जैसी है' की स्थिति में ही व्यतीत हो जाती है। मौल-भाव से वंचित रह जाती है।
नाक होने का जिन्हें अहसास तक नहीं होता, ऐसे लोग व्यवहारिक होते हैं। अहसास नहीं होता, इसलिए नाक कटना उनके लिए कोई घटना नहीं है। प्रगति मार्ग पर बेखौफ बिना किसी बाधा के स्केटिंग करते चले जाते हैं। नाक कटे लोग ही सम्मानित व्यक्ति कहलाए जाते हैं। ता-उम्र पूजे जाते हैं। बाद मरने के उनके बुत भी पूजनीय हो जाते हैं। ऐसे लोग ही बाद मरने के भी अमर कह लाए जाते हैं।
नाक दरअसल शरीर का ही एक अंग है, मगर भिन्न प्रकृति का। क्योंकि यह जितनी कटती है, उससे कहीं ज्यादा बढ़ती है, अत: नाक कटने से शारीरिक हानि भी नहीं है। 'नाक कटते ही सवा हाथ बढ़ जाती है' यह शोध सदियों पुराना है। नाक वास्तव में गुलाब के झाड़ के समान है, क्योंकि नाक भी कांट-छांट के बाद ही बढ़ती है, उसके बाद ही फलती-फूलती है। बिना कटी नाक छोटी होती है, कटने के बाद ही बड़ी होती है।
नाक कुत्ते की पूंछ के समान है। सुरक्षित रहेगी, तो कुत्ते की पूंछ की तरह टेढ़ी ही रहेगी, अर्थात प्रगति में बाधक बनी रहेगी। टेढ़ी पूंछ क्योंकि आसानी से हिलती नहीं है, इसलिए टेढ़ी पूंछ का कुत्ता किसी को भाता नहीं है। कुत्ता वही वफादार कहलाया जाता है, जो बात-बात पर पूंछ हिलाता है। पूंछ हिलाने वाला कुत्ता ही अपने पालक की नाक का बाल बनता है।
टेढ़ी पूंछ तो वक्त पड़ने पर हिलाई भी जा सकती है, मगर नाक तो स्वभाव से ही स्थिर है, हिलती ही नहीं है। इस मामले में कुत्ते की पूंछ से भी बदतर है। यही कारण है कि नाकदार व्यक्ति भाग्यविधाता की नाक का बाल बनने से वंचित रह जाता है। ऐसी नाक का क्या लाभ, जो नाक का बाल बनने में बाधक हो। अत: उचित यही होगा कि नाक कटा कर प्रगति का मार्ग प्रशस्त किया जाए।
जिन कुत्तों की पूंछ सीधी नहीं हो पाती अर्थात हिल नहीं पाती, ऐसे नस्ल के कुत्तों की पूंछ बचपन में ही काट दी जाती है। पूंछ कटी नस्ल के ऐसे कुत्ते अपेक्षाकृत ज्यादा उपयोगी होते हैं, ज्यादा कीमती होते हैं। इसी प्रकार नाक कटे इंसान अपेक्षाकृत ज्यादा प्रभावशाली होते हैं, ज्यादा प्रगतिशील होते हैं।
दरअसल नाक और पूंछ कटने के बाद शरीर में कुछ जैविक परिवर्तन होने लगते हैं। कुछ अतिरिक्त हारमोंस बनने लगते हैं। जिनके कारण नाक कटे इंसान और पूंछ कटे कुत्ते उम्दा किस्म के कहलाए जाते हैं।
ऐसे अनेक महानुभाव कुकुरमुत्ते की तरह समाज में पनप रहें हैं, जो कभी साधारण जीव की तरह विचरते थे। आज विशिष्ट जनों की पंक्ति में भी आगे खड़े हैं। जाने-अनजाने या कहा जाए दुर्घटनावश कभी उनकी नाक कटी थी। प्रारंभ में तो शर्म के कारण बेचारों ने मुंह दिखाना बंद कर दिया था। कुरूप होने का अनुभव करने लगे थे। परंतु जैसे-जैसे उनके शरीर में जैविक परिवर्तन और हारमोंस विकसित हुए, वे अपने-आप को पूर्व की स्थिति से ज्यादा तरोताजा महसूस करने लगे और मुंह से नकाब हटाने लगे।
नाक कटे वे महानुभाव आज नाकदार ही नहीं अपने-अपने स्थान पर समाज व राष्ट्र की नाक कहलाए जा रहे हैं। उनमें से अनेक सत्ता में अपना अपूर्व योगदान देकर इस राष्ट्र को गौरव प्रदान कर रहें हैं।
अब आप पूछेंगे, तो क्या इस देश का जुगाड़ ऐसे ही महानुभाव धकेल रहें हैं? इस सवाल के जवाब में मैं कुछ नहीं बोलूंगा, चुप रहूंगा। बस इतना ही कहूंगा आप भी अपनी-अपनी नाक कलम करा लीजिए। कलमी वृक्षों पर लगे फल ज्यादा मीठे होते हैं, उम्दा कहलाए जाते हैं, महंगे भाव बिकते हैं। बाकी आप खुद समझदार हैं।
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Tuesday, February 19, 2008
अपराधीकरण नहीं, यह हृदय परिवर्तन है
जब कभी कोई अतीक भाई अंधेरी गलियों से निकल कर उजाले में आता है, चाय के कुल्हड़ में तूफान खड़ा हो जाता है! पता नहीं क्यों? राजनीति के अपराधीकरण पर चिंता व्यक्त की जाने लगती है। कल तक जो खुद अतीक थे, वे भी चिंता के स्वर आलापने लगते हैं। राजनीति की गंगा प्रदूषित होने का शोर मचाने लगते हैं। अब कोई उनसे पूछे, बहती गंगा में हाथ धोने को किसका मन नहीं करेगा! जब गंगा का अवतरण ही पाप धोने के लिए हुआ है, तो फिर कोई अतीक पाप धोने के लिए यदि राजनीति की गंगा में पांव पसारता है तो इसमें हर्ज क्या है?
कोई उन से पूछे, भाइयों के आने से राजनीति का अपराधीकरण कैसे हो गया? गंगा में नाले गिरते हैं, गंगा फिर भी गंगा है। गंगा का नालाकरण तो नहीं हो जाता? हाँ, गंगा में गिरने वाले नालों का गंगाकरण अवश्य हो जाता है! इसी प्रकार राजनीति का अपराधिकरण नहीं, अपराध का राजनीतिकरण हो रहा है।
बे-बात कुल्हड़ में तूफान खड़ा करना राष्ट्र-विरोधी गतिविधि है, इससे राष्ट्र की एकता-अखण्डता और विवधता पर आंच आती है! व्यक्तिगत स्तर पर मैं इसके खिलाफ हूं। मेरा मानना है कि यह राजनीति का अपराधिकरण नहीं हृदय परिवर्तन है। हृदय परिवर्तन के उदाहरणों से हमारा इतिहास लबालब है। अतीक ऐसे ही हृदय परिवर्तन का प्रतीक है। अपराधी प्रवृत्ति का कोई अतीक जब धर्मात्मा बन सकता है, तो राजात्मा क्यों नहीं बन सकता?
कलिंग युद्ध रक्त-पात करने के उपरांत सम्राट अशोक का हृदय परिवर्तन हुआ और बोध-धर्म अपना कर महान कह लाया। मानव-अंगुलियों की माला पहनने वाले अंगुलिमाल का हृदय परिवर्तन हुआ और भगवान बुद्ध ने उसे अपने संघ की सदस्यता प्रदान कर दी थी।
फिर हमारे अतीकों के साथ यह भेदभाव क्यों? सम्राट अशोक जितने रक्त तो आजकल के अतीकों के खाते में नहीं होंगे और न ही उनके गले में अंगुलिमाल जितनी अंगुलियां पड़ी होंगी। फिर यदि किसी अतीक का हृदय परिवर्तन होता है, तो किसी को एतराज क्यों? अरे, भाई! यह गांधी का देश है। गांधी जी ने कहा था, 'पाप से घृणा करो पापी से नहीं'। फिर अतीक भाइयों से घृणा क्यों?
हमारा मत है कि अतीक भाइयों के जरिए देश में समाजवाद आ रहा है! समाजवाद ऐसे ही आएगा! समाजवाद आने दो! भाई लोग यदि राष्ट्र की मुख्यधारा में प्रवेश कर रहे हैं, करने दो! राष्ट्र की मुख्य धारा को सुदृढ़ होने दो! बे-बात की बात में कुल्हड़ में तूफान मत खड़ा करो! कुल्हड़ की पोल खुल जाएगी!
तूफान खड़ा करने वाले ये वो लोग हैं, जिन्हें अतीक भाइयों के राजनीति में आने से आपनी रोटी खतरे में नजर आने लगती है। अरे भाई! यह लोकतंत्र है और लोकतंत्र में नागरिकों को रोटी सेंकने का मौलिक अधिकार प्राप्त है। अत: अतीकों को भी राजनैतिक रोटियां सेंकने का प्रतीक बनने दो!
संपर्क : 9868113044
कोई उन से पूछे, भाइयों के आने से राजनीति का अपराधीकरण कैसे हो गया? गंगा में नाले गिरते हैं, गंगा फिर भी गंगा है। गंगा का नालाकरण तो नहीं हो जाता? हाँ, गंगा में गिरने वाले नालों का गंगाकरण अवश्य हो जाता है! इसी प्रकार राजनीति का अपराधिकरण नहीं, अपराध का राजनीतिकरण हो रहा है।
बे-बात कुल्हड़ में तूफान खड़ा करना राष्ट्र-विरोधी गतिविधि है, इससे राष्ट्र की एकता-अखण्डता और विवधता पर आंच आती है! व्यक्तिगत स्तर पर मैं इसके खिलाफ हूं। मेरा मानना है कि यह राजनीति का अपराधिकरण नहीं हृदय परिवर्तन है। हृदय परिवर्तन के उदाहरणों से हमारा इतिहास लबालब है। अतीक ऐसे ही हृदय परिवर्तन का प्रतीक है। अपराधी प्रवृत्ति का कोई अतीक जब धर्मात्मा बन सकता है, तो राजात्मा क्यों नहीं बन सकता?
कलिंग युद्ध रक्त-पात करने के उपरांत सम्राट अशोक का हृदय परिवर्तन हुआ और बोध-धर्म अपना कर महान कह लाया। मानव-अंगुलियों की माला पहनने वाले अंगुलिमाल का हृदय परिवर्तन हुआ और भगवान बुद्ध ने उसे अपने संघ की सदस्यता प्रदान कर दी थी।
फिर हमारे अतीकों के साथ यह भेदभाव क्यों? सम्राट अशोक जितने रक्त तो आजकल के अतीकों के खाते में नहीं होंगे और न ही उनके गले में अंगुलिमाल जितनी अंगुलियां पड़ी होंगी। फिर यदि किसी अतीक का हृदय परिवर्तन होता है, तो किसी को एतराज क्यों? अरे, भाई! यह गांधी का देश है। गांधी जी ने कहा था, 'पाप से घृणा करो पापी से नहीं'। फिर अतीक भाइयों से घृणा क्यों?
हमारा मत है कि अतीक भाइयों के जरिए देश में समाजवाद आ रहा है! समाजवाद ऐसे ही आएगा! समाजवाद आने दो! भाई लोग यदि राष्ट्र की मुख्यधारा में प्रवेश कर रहे हैं, करने दो! राष्ट्र की मुख्य धारा को सुदृढ़ होने दो! बे-बात की बात में कुल्हड़ में तूफान मत खड़ा करो! कुल्हड़ की पोल खुल जाएगी!
तूफान खड़ा करने वाले ये वो लोग हैं, जिन्हें अतीक भाइयों के राजनीति में आने से आपनी रोटी खतरे में नजर आने लगती है। अरे भाई! यह लोकतंत्र है और लोकतंत्र में नागरिकों को रोटी सेंकने का मौलिक अधिकार प्राप्त है। अत: अतीकों को भी राजनैतिक रोटियां सेंकने का प्रतीक बनने दो!
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Monday, February 4, 2008
अन्तिम इच्छा
''हे, ईश्वर इतनी कृपा करना, अगले जन्म में मुझे किसी श्वान सुंदरी की कोख से जन्म दे देना! यह जन्म तो अकारत ही चला गया। तूने मुझ पर एक आंख से भी कृपा नहीं की! बिना भेदभाव के सभी को एक आंख से देखने का तेरा दावा नेताई निकला। मुझ पर यदि तेरी कृपा होती, तो कम से कम एक श्वानीय-गुण का तो मेरे चरित्र में समावेश करता! जन्म-कुण्डली बनाते वक्त भूल गया था, तो बाद में ही प्रत्यारोपित कर देता। किंतु नहीं, तू ने ऐसा भी नहीं किया! ..मेरे साथ पक्षपात किया! मेरे मित्रों को श्वान-सर्वगुण संपन्न कर दिया और मुझे बैरंग ही मृत्युलोक पोस्ट कर दिया! कोई बात नहीं भूल सुधार कर ले। अगले जन्म के लिए तो मुझे श्वान-कोटे में आरक्षित कर दे!''
शनै:-शनै: उम्र के अंतिम पड़ाव की ओर सरक रहा हूं। कल उस मंजिल को पालूंगा, जहां से नई मंजिल के लिए द्वार खुलते हैं। 'आज मरे कल दूजा दिन' सोच रहा हूं, दूजा-तीजा होने से पूर्व ही ईश्वर के सामने अपनी अन्तिम इच्छा प्रस्तुत कर दूं। इस जन्म के लिए नहीं पूर्व जन्म के लिए। इस जन्म में तो ऐसा कुछ मेरे पास है ही नहीं, जिसे लेकर मेरी औलाद झगड़ा करे और मुझे वसीयत लिखने की आवश्यकता महसूस हो! इसलिए वसीयत नहीं अन्तिम इच्छा पंजीकृत करा रहा हूं! औलाद के लिए कुछ छोड़कर जाओ और वह नश्वर शरीर ठिकाने लगाने से पूर्व ही बटवारे के लिए महाभारत का आयोजन करने लगे। इसके खिलाफ मैं हमेशा से ही रहा हूं!
मैं यह भी सोचता हूं, यह जन्म तो जैसे-तैसे पूर्ण आहुति के समीप है, फिर क्यों ने अगले जन्म के लिए ईश्वर से प्रार्थना की जाए। शायद उसे तरस आजाए, प्रार्थना स्वीकार कर ले। कम से कम अगले जन्म में ही सही सफल व्यक्तियों की सूची में अपना नाम भी दर्ज हो जाए!
मैं जानता हूं, इस जन्म से छुटकारा मिलने के बाद, जब तक अगला जन्म प्राप्त करूंगा, तब तक श्वान-संस्कृति अपने चर्म पर होगी। श्वान-गुण-संपन्न व्यक्ति ही तब शासन में होंगे, प्रशासन में होंगे, प्रत्येक क्षेत्र में अग्रणी होंगे। वैसे कमी आज भी कुछ नहीं है, लेकिन इसे प्रारंभिक अवस्था ही कहना ठीक होगा। उस समय मनुष्य गौण श्वान प्रधान होगा। अनुमान तो यह है कि जो थोडे़-बहुत मनुष्य आज शोष हैं भी, तब तक उनका भी राम नाम सत्य हो जाएगा। तब श्वान-संस्कृति ही राष्ट्र-संस्कृति होगी! उसी पर आधारित सांस्कृतिक राष्ट्रवाद होगा!
कृष्ण-भक्त रसखान ने भी मेरी ही तरह पुनर्जन्म के लिए मौजूदा जन्म में आराध्य कृष्ण भगवान के सामने अन्तिम इच्छा व्यक्त की थी। किंतु मेरी और उनकी अन्तिम इच्छा के मसौदे में अंतर है। पता नहीं क्यों, उन्होंने अगले जन्म में भी मनुष्य-योनि को ही प्राथमिकता दी है। इसके अतिरिक्त उन्होंने गाय, पक्षी और पाषाण के रूप में जन्म लेने की संभावना से भी इनकार नहीं किया, लेकिन श्वान को उन्होंने उपेक्षित ही रखा।
मुझे लगता है, उन्होंने वसीयत अतिभावुक अवस्था में की होगी। भावुक मन से लिए गए निर्णय बौद्धिक नहीं हुआ करते हैं। अत: वे भविष्य का सटीक अनुमान नहीं कर पाए होंगे। भावुकता के स्थान पर यदि वे बुद्धि का इस्तेमाल करते हुए दूरदृष्टिं का उपयोग करते, तो एक विकल्प श्वान-रूप में उत्पन्न होने का अवश्य रखते! उनके जमाने में मानुष का महत्व श्वानों की अपेक्षा अधिक रहा होगा, इसलिए वे मानुष-जन्म को प्राथमिकता प्रदान कर गए। अब अवश्य पछता रहें होंगे!
किसी न किसी रूप में श्वान के महत्व को कवि श्रेष्ठ रामधारी सिंह दिनकर ने समझा था। 'श्वानों को मिलते दूध-दही, भूखे बच्चे अकुलाते हैं। माँ की गोदी से लिपट-लिपट जाड़े की रात बिताते हैं।' दिनकर जी की ये पंक्तियां श्वान महत्व का सबूत हैं। यह बात अलग है कि इन लाइनों में श्वानों के प्रति ईष्र्या-भाव झलकता है। लेकिन यह भी सत्य है कि समाज में श्रेष्ठ व्यक्तित्व ही ईष्र्या का पात्र होता है।
दिनकर जी की कविता के आधार पर हम यह तो दावा कर ही सकते हैं कि उनके समय से ही श्वान-संस्कृति फलने-फूलने लगी थी। आज तो वह विराट स्वरूप ग्रहण करती जा रही है और जब तक मैं पुनर्जन्म में प्रवेश करूंगा, तब तक तो वल्ले-वल्ले हो जाएगी। तब मैं भी सरकारी-बजट का लाभ प्राप्त करने के योग्य हो जाऊंगा। हालांकि चोरी-छिपे बिस्कुट अभी भी वे ही इस्तेमाल कर रहा हूं, किंन्तु तब साधिकार कर पाऊंगा।
किसी ऐश के सुंदर-कोमल स्पर्श के लिए अब तरसता हूं। जब किसी श्वान-शिशु को सुंदरी के गोल-गोल कपोलों का रसास्वादन करते देखता हूं, तो मन मसोस कर रह जाता हूं! मन में एक हूक सी उठती है, 'हाय! ..श्वान के भाग कहा कहिए, गोल-कपोल पै कर रहा चुम्मा-चाटी!'
ईश्वर मुझ पर कृपा कर दे, मेरी वसीयत पर मुहर लगा दे, तो किसी सुंदरी की गोद में शोभायमान होने का शुभ अवसर मुझे भी प्राप्त हो जाएगा। तब मुझे भी ऐश के साथ जीवन व्यतीत करने का सौभाग्य प्राप्त होगा। अपनी भी ऐश होगी!
अत: बहुत सोच-विचार कर मैंने श्वान-सुंदरी की कोख से जन्म लेने की इच्छा व्यक्त की है। मगर मैं ईश्वर को किसी मुसीबत में भी नहीं डालना चाहता हूं, क्योंकि मैं जानता हूं कि मेरे जैसी इच्छा करने वाले लोग की तादाद कहीं अधिकहोगी और श्वान-कोख सीमित। अत: मैने एक विकल्प भी रखा है। मेरे भाग्य में यदि अगली बार भी मनुष्य-योनि में ही जन्म लेना लिखा है, तो हे, परमपिता परमात्मा! इतनी कृपा अवश्य कर देना मुझे श्वान सद्गुणों से संपन्न तो कर ही देना!
संपर्क : 9868113044
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शनै:-शनै: उम्र के अंतिम पड़ाव की ओर सरक रहा हूं। कल उस मंजिल को पालूंगा, जहां से नई मंजिल के लिए द्वार खुलते हैं। 'आज मरे कल दूजा दिन' सोच रहा हूं, दूजा-तीजा होने से पूर्व ही ईश्वर के सामने अपनी अन्तिम इच्छा प्रस्तुत कर दूं। इस जन्म के लिए नहीं पूर्व जन्म के लिए। इस जन्म में तो ऐसा कुछ मेरे पास है ही नहीं, जिसे लेकर मेरी औलाद झगड़ा करे और मुझे वसीयत लिखने की आवश्यकता महसूस हो! इसलिए वसीयत नहीं अन्तिम इच्छा पंजीकृत करा रहा हूं! औलाद के लिए कुछ छोड़कर जाओ और वह नश्वर शरीर ठिकाने लगाने से पूर्व ही बटवारे के लिए महाभारत का आयोजन करने लगे। इसके खिलाफ मैं हमेशा से ही रहा हूं!
मैं यह भी सोचता हूं, यह जन्म तो जैसे-तैसे पूर्ण आहुति के समीप है, फिर क्यों ने अगले जन्म के लिए ईश्वर से प्रार्थना की जाए। शायद उसे तरस आजाए, प्रार्थना स्वीकार कर ले। कम से कम अगले जन्म में ही सही सफल व्यक्तियों की सूची में अपना नाम भी दर्ज हो जाए!
मैं जानता हूं, इस जन्म से छुटकारा मिलने के बाद, जब तक अगला जन्म प्राप्त करूंगा, तब तक श्वान-संस्कृति अपने चर्म पर होगी। श्वान-गुण-संपन्न व्यक्ति ही तब शासन में होंगे, प्रशासन में होंगे, प्रत्येक क्षेत्र में अग्रणी होंगे। वैसे कमी आज भी कुछ नहीं है, लेकिन इसे प्रारंभिक अवस्था ही कहना ठीक होगा। उस समय मनुष्य गौण श्वान प्रधान होगा। अनुमान तो यह है कि जो थोडे़-बहुत मनुष्य आज शोष हैं भी, तब तक उनका भी राम नाम सत्य हो जाएगा। तब श्वान-संस्कृति ही राष्ट्र-संस्कृति होगी! उसी पर आधारित सांस्कृतिक राष्ट्रवाद होगा!
कृष्ण-भक्त रसखान ने भी मेरी ही तरह पुनर्जन्म के लिए मौजूदा जन्म में आराध्य कृष्ण भगवान के सामने अन्तिम इच्छा व्यक्त की थी। किंतु मेरी और उनकी अन्तिम इच्छा के मसौदे में अंतर है। पता नहीं क्यों, उन्होंने अगले जन्म में भी मनुष्य-योनि को ही प्राथमिकता दी है। इसके अतिरिक्त उन्होंने गाय, पक्षी और पाषाण के रूप में जन्म लेने की संभावना से भी इनकार नहीं किया, लेकिन श्वान को उन्होंने उपेक्षित ही रखा।
मुझे लगता है, उन्होंने वसीयत अतिभावुक अवस्था में की होगी। भावुक मन से लिए गए निर्णय बौद्धिक नहीं हुआ करते हैं। अत: वे भविष्य का सटीक अनुमान नहीं कर पाए होंगे। भावुकता के स्थान पर यदि वे बुद्धि का इस्तेमाल करते हुए दूरदृष्टिं का उपयोग करते, तो एक विकल्प श्वान-रूप में उत्पन्न होने का अवश्य रखते! उनके जमाने में मानुष का महत्व श्वानों की अपेक्षा अधिक रहा होगा, इसलिए वे मानुष-जन्म को प्राथमिकता प्रदान कर गए। अब अवश्य पछता रहें होंगे!
किसी न किसी रूप में श्वान के महत्व को कवि श्रेष्ठ रामधारी सिंह दिनकर ने समझा था। 'श्वानों को मिलते दूध-दही, भूखे बच्चे अकुलाते हैं। माँ की गोदी से लिपट-लिपट जाड़े की रात बिताते हैं।' दिनकर जी की ये पंक्तियां श्वान महत्व का सबूत हैं। यह बात अलग है कि इन लाइनों में श्वानों के प्रति ईष्र्या-भाव झलकता है। लेकिन यह भी सत्य है कि समाज में श्रेष्ठ व्यक्तित्व ही ईष्र्या का पात्र होता है।
दिनकर जी की कविता के आधार पर हम यह तो दावा कर ही सकते हैं कि उनके समय से ही श्वान-संस्कृति फलने-फूलने लगी थी। आज तो वह विराट स्वरूप ग्रहण करती जा रही है और जब तक मैं पुनर्जन्म में प्रवेश करूंगा, तब तक तो वल्ले-वल्ले हो जाएगी। तब मैं भी सरकारी-बजट का लाभ प्राप्त करने के योग्य हो जाऊंगा। हालांकि चोरी-छिपे बिस्कुट अभी भी वे ही इस्तेमाल कर रहा हूं, किंन्तु तब साधिकार कर पाऊंगा।
किसी ऐश के सुंदर-कोमल स्पर्श के लिए अब तरसता हूं। जब किसी श्वान-शिशु को सुंदरी के गोल-गोल कपोलों का रसास्वादन करते देखता हूं, तो मन मसोस कर रह जाता हूं! मन में एक हूक सी उठती है, 'हाय! ..श्वान के भाग कहा कहिए, गोल-कपोल पै कर रहा चुम्मा-चाटी!'
ईश्वर मुझ पर कृपा कर दे, मेरी वसीयत पर मुहर लगा दे, तो किसी सुंदरी की गोद में शोभायमान होने का शुभ अवसर मुझे भी प्राप्त हो जाएगा। तब मुझे भी ऐश के साथ जीवन व्यतीत करने का सौभाग्य प्राप्त होगा। अपनी भी ऐश होगी!
अत: बहुत सोच-विचार कर मैंने श्वान-सुंदरी की कोख से जन्म लेने की इच्छा व्यक्त की है। मगर मैं ईश्वर को किसी मुसीबत में भी नहीं डालना चाहता हूं, क्योंकि मैं जानता हूं कि मेरे जैसी इच्छा करने वाले लोग की तादाद कहीं अधिकहोगी और श्वान-कोख सीमित। अत: मैने एक विकल्प भी रखा है। मेरे भाग्य में यदि अगली बार भी मनुष्य-योनि में ही जन्म लेना लिखा है, तो हे, परमपिता परमात्मा! इतनी कृपा अवश्य कर देना मुझे श्वान सद्गुणों से संपन्न तो कर ही देना!
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Sunday, February 3, 2008
नेता प्रशिक्षण संस्थान
बेरोजगार हूं! कहानी, व्यंग्य, लेख कब तक गढ़ता रहूंगा। इतने दिन से गढ़ रहा हूं, फिर भी बेरोजगार ही कहलाया जा रहा हूं। कभी-कभी लगता है, मैं खुद ही व्यंग्य-कथा का पात्र बनता जा रहा हूं।
कब तक यूं ही हाथ पर हाथ धरे बैठा रहूंगा? बेरोजगार कहलाया जाता रहूंगा? कब तक परिवार के लिए घृणा का पत्र बना रहूंगा? नौकरी की संभावनाएं क्षीण है, क्योंकि नौकरी के लिए आवश्यक योग्यता मुझ में नहीं हैं। कार्य में निपुणता, निष्ठा, ईमानदारी, मेहनत आजकल बेमानी हो गई हैं। नौकरी करनी है, तो चमचई आनी चाहिए, मक्खन लगाना आना चाहिए, हिलाने के लिए एक अदद पूंछ चाहिए, तलवे चाटने के लिए स्वाद-ग्रंथी-विहीन जीभ चाहिए। कुल मिलाकर पांव-पान-पूजा में निपुण होना चाहिए। ऐसी किसी भी योग्यताओं से संपन्न होता, तो बेरोजगार ही क्यों कहलाया जाता?
सोच रहा हूं, अपना ही कोई रोजगार शुरू कर लूं! किस्म-किस्म की दुकानदारियों में संभावनाएं तलाशता हूं। निगाह की सुई शिक्षा के क्षेत्र पर आकर अटकती है। क्योंकि मौजूदा दौर शिक्षा के क्षेत्र में श्वेत-क्रांति का दौर है। शिक्षा से संबंधित दुकान कैसी भी हो चांदी ही चांदी है।
शिक्षा के क्षेत्र में भी वैरायटी बहुत हैं। मसलन आई टी, सीए, एमबीए, पत्रकारिता, चिकित्सा, बीएड आदि-आदि। मगर ऐसी किसी भी दुकान में संभावनाएं कुछ खास नजर नहीं आ रही हैं। हालांकि दुकानदारी इनमें चकाचक है, मगर ऐसी दुकानें खुल भी बहुत गई हैं। एक और ऐसी दुकान खोल कर बेरोजगारी को ही बढ़ावा देना होगा। मैं नहीं चाहता एक अदद अपनी बेरोजगारी समाप्त कर बेरोजगारों की फौज खड़ी करूं!
विचार कर रहा हूं कि शिक्षा के ही क्षेत्र में किसी ऐसी उप-क्षेत्र में भाग्य आजमाया जाए, जिसमें बेरोजगारी की संभावनाएं न के बराबर हों। दिमाग जब इस तरफ दौड़ाता हूं, तो भिखारी, जेबतराशी, चोरी आदि ऐसे क्षेत्र पाता हूं। जिनमें कितने ही प्रशिक्षित विद्वान पैदा हो जाएं, बेरोजगार रहने की संभावनाएं न्यून ही हैं, क्योंकि ये सभी सद्कर्म स्वरोजगार की श्रेणी में आते हैं।
मगर लोचा यहां भी है, क्योंकि इन सभी के प्रशिक्षण दुकानें काफी तादाद में चल रही हैं, इसलिए संबद्ध दुकान खोलने पर प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ेगा। एक बिलकुल अछूता क्षेत्र मेरे जहन में उतरा है, वह है नेतागीरी!
नेता-प्रशिक्षण संस्थान खोलने की तरफ अभी शायद किसी का ध्यान नहीं गया है, इसलिए विश्व में शायद कहीं भी ऐसा प्रशिक्षण संस्थान नहीं है, जो नेतागीरी के लिए युवाओं को प्रशिक्षित करता हो! इसमें बेरोजगारी की गुंजाइश तो बिलकुल है ही नहीं, भविष्य में भी नहीं! अर्थात वर्तमान और भविष्य दोनों चकाचक, मेरा भी और प्रशिक्षित नेताओं का भी।
अंतत: मैं इसी पर अपना ध्यान केंद्रित कर ऊर्जा का भरपूर इस्तेमाल कर रहा हूं। इसके लिए प्रशिक्षण पाठ्यक्रम भी तैयार कर लिया है।
पाठ्यक्रम का पहला पाठ में प्रशिक्षु को 'इंसेल्ट प्रूफ' बनने के तरीके व उसके लाभ से अवगत कराया जाएगा। मेरा मानना है कि 'इंसेल्ट प्रूफ' होना नेता का प्रथम व महत्वपूर्ण गुण है। जो व्यक्ति मान-सम्मान की परवाह करता है, वह कभी भी सफल नेता नहीं बन सकता!
दूसरा पाठ 'समस्या' उत्पादन व उन्हें जीवित रखने से संबंधित है। समस्याएं यदि नहीं होंगी अथवा उनका निराकरण कर दिया जाएगा, तो समूची राजनीति ही भैंस की तरह पानी में चली जाएगी! मुद्दों का अभाव हो जाएगा! चुनाव प्रक्रिया नीरस क्या, समाप्त ही हो जाएगी। यह कहने में भी कोई हर्ज नहीं है कि 'समस्या' नहीं रही तो लोकतंत्र भी खतरे में पड़ सकता है! अत: 'समस्या' का पाठ भी अपने आप में कम महत्वपूर्ण नहीं है!
परोक्ष-अपरोक्ष रूप से समस्या का संबंध 'आश्वासन' से है! समस्या होगी तो उसके निराकरण का भी आश्वासन देना ही होगा। वैसे भी इस देश की अधिसंख्य जनता आश्वासनों के ही सहारे जिंदा है और नेता की नेतागीरी भी! जहां आश्वासन कमजोर पड़ते हैं, वहां आत्महत्याओं का दौर शुरू हो जाता है। इस प्रकार नेताओं पर हिंसक होने का आरोप लगने लगता है। अत: तीसरा पाठ 'आश्वासन' विधि से संबद्ध ही निर्धारित किया गया है! आश्वासन किस प्रकार गढ़े जाएं और किस तरह उन्हें भुला दिया जाए, चुनाव आने पर पुन: उन्हें स्मरण करने व कराने की विधि क्या है? इस पाठ में आदि-आदि पढ़ाए जाने की योजना है।
समस्या और आश्वासन के गणित के लिए 'झूठ' बोलना अति आवश्यक है, इसलिए पाठ्यक्रम में चौथा और महत्वपूर्ण पाठ 'झूठ' से संबंधित है। झूठ बोलने की विधि और झूठ को सच में कैसे तब्दील किया जाए इस पाठ का महत्वपूर्ण हिस्सा होगा!
'भ्रष्टाचार की 101 विधियां' हमारे पाठ्यक्रम का महत्वपूर्ण भाग है। विधियों के साथ-साथ इस पाठ्यक्रम में भ्रष्टाचार को शिष्टाचार में तब्दील करने की विधियों में भी प्रशिक्षुओं को निपुण किया जाएगा।
मैं चाहता हूं कि मेरे 'नेता प्रशिक्षण संस्थान' से निष्णात हो कर जब प्रशिक्षु सार्वजनिक क्षेत्र में कद रखे, तो सफलता उसके कदम चूमें! जनता उसमें अपना सुनहरी भविष्य देखे।
पाठ्यक्रम अभी फाइनल नहीं किया है, यदि कोई विषय मेरी बुद्धि की पकड़ से छूट गया हो और आपके जहन में उतर रहा हो, तो कृपया मुझे अवगत कराने का कष्ट करें। आपके प्रत्येक नेताई सुझाव का स्वागत है!
संपर्क 9868113044
कब तक यूं ही हाथ पर हाथ धरे बैठा रहूंगा? बेरोजगार कहलाया जाता रहूंगा? कब तक परिवार के लिए घृणा का पत्र बना रहूंगा? नौकरी की संभावनाएं क्षीण है, क्योंकि नौकरी के लिए आवश्यक योग्यता मुझ में नहीं हैं। कार्य में निपुणता, निष्ठा, ईमानदारी, मेहनत आजकल बेमानी हो गई हैं। नौकरी करनी है, तो चमचई आनी चाहिए, मक्खन लगाना आना चाहिए, हिलाने के लिए एक अदद पूंछ चाहिए, तलवे चाटने के लिए स्वाद-ग्रंथी-विहीन जीभ चाहिए। कुल मिलाकर पांव-पान-पूजा में निपुण होना चाहिए। ऐसी किसी भी योग्यताओं से संपन्न होता, तो बेरोजगार ही क्यों कहलाया जाता?
सोच रहा हूं, अपना ही कोई रोजगार शुरू कर लूं! किस्म-किस्म की दुकानदारियों में संभावनाएं तलाशता हूं। निगाह की सुई शिक्षा के क्षेत्र पर आकर अटकती है। क्योंकि मौजूदा दौर शिक्षा के क्षेत्र में श्वेत-क्रांति का दौर है। शिक्षा से संबंधित दुकान कैसी भी हो चांदी ही चांदी है।
शिक्षा के क्षेत्र में भी वैरायटी बहुत हैं। मसलन आई टी, सीए, एमबीए, पत्रकारिता, चिकित्सा, बीएड आदि-आदि। मगर ऐसी किसी भी दुकान में संभावनाएं कुछ खास नजर नहीं आ रही हैं। हालांकि दुकानदारी इनमें चकाचक है, मगर ऐसी दुकानें खुल भी बहुत गई हैं। एक और ऐसी दुकान खोल कर बेरोजगारी को ही बढ़ावा देना होगा। मैं नहीं चाहता एक अदद अपनी बेरोजगारी समाप्त कर बेरोजगारों की फौज खड़ी करूं!
विचार कर रहा हूं कि शिक्षा के ही क्षेत्र में किसी ऐसी उप-क्षेत्र में भाग्य आजमाया जाए, जिसमें बेरोजगारी की संभावनाएं न के बराबर हों। दिमाग जब इस तरफ दौड़ाता हूं, तो भिखारी, जेबतराशी, चोरी आदि ऐसे क्षेत्र पाता हूं। जिनमें कितने ही प्रशिक्षित विद्वान पैदा हो जाएं, बेरोजगार रहने की संभावनाएं न्यून ही हैं, क्योंकि ये सभी सद्कर्म स्वरोजगार की श्रेणी में आते हैं।
मगर लोचा यहां भी है, क्योंकि इन सभी के प्रशिक्षण दुकानें काफी तादाद में चल रही हैं, इसलिए संबद्ध दुकान खोलने पर प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ेगा। एक बिलकुल अछूता क्षेत्र मेरे जहन में उतरा है, वह है नेतागीरी!
नेता-प्रशिक्षण संस्थान खोलने की तरफ अभी शायद किसी का ध्यान नहीं गया है, इसलिए विश्व में शायद कहीं भी ऐसा प्रशिक्षण संस्थान नहीं है, जो नेतागीरी के लिए युवाओं को प्रशिक्षित करता हो! इसमें बेरोजगारी की गुंजाइश तो बिलकुल है ही नहीं, भविष्य में भी नहीं! अर्थात वर्तमान और भविष्य दोनों चकाचक, मेरा भी और प्रशिक्षित नेताओं का भी।
अंतत: मैं इसी पर अपना ध्यान केंद्रित कर ऊर्जा का भरपूर इस्तेमाल कर रहा हूं। इसके लिए प्रशिक्षण पाठ्यक्रम भी तैयार कर लिया है।
पाठ्यक्रम का पहला पाठ में प्रशिक्षु को 'इंसेल्ट प्रूफ' बनने के तरीके व उसके लाभ से अवगत कराया जाएगा। मेरा मानना है कि 'इंसेल्ट प्रूफ' होना नेता का प्रथम व महत्वपूर्ण गुण है। जो व्यक्ति मान-सम्मान की परवाह करता है, वह कभी भी सफल नेता नहीं बन सकता!
दूसरा पाठ 'समस्या' उत्पादन व उन्हें जीवित रखने से संबंधित है। समस्याएं यदि नहीं होंगी अथवा उनका निराकरण कर दिया जाएगा, तो समूची राजनीति ही भैंस की तरह पानी में चली जाएगी! मुद्दों का अभाव हो जाएगा! चुनाव प्रक्रिया नीरस क्या, समाप्त ही हो जाएगी। यह कहने में भी कोई हर्ज नहीं है कि 'समस्या' नहीं रही तो लोकतंत्र भी खतरे में पड़ सकता है! अत: 'समस्या' का पाठ भी अपने आप में कम महत्वपूर्ण नहीं है!
परोक्ष-अपरोक्ष रूप से समस्या का संबंध 'आश्वासन' से है! समस्या होगी तो उसके निराकरण का भी आश्वासन देना ही होगा। वैसे भी इस देश की अधिसंख्य जनता आश्वासनों के ही सहारे जिंदा है और नेता की नेतागीरी भी! जहां आश्वासन कमजोर पड़ते हैं, वहां आत्महत्याओं का दौर शुरू हो जाता है। इस प्रकार नेताओं पर हिंसक होने का आरोप लगने लगता है। अत: तीसरा पाठ 'आश्वासन' विधि से संबद्ध ही निर्धारित किया गया है! आश्वासन किस प्रकार गढ़े जाएं और किस तरह उन्हें भुला दिया जाए, चुनाव आने पर पुन: उन्हें स्मरण करने व कराने की विधि क्या है? इस पाठ में आदि-आदि पढ़ाए जाने की योजना है।
समस्या और आश्वासन के गणित के लिए 'झूठ' बोलना अति आवश्यक है, इसलिए पाठ्यक्रम में चौथा और महत्वपूर्ण पाठ 'झूठ' से संबंधित है। झूठ बोलने की विधि और झूठ को सच में कैसे तब्दील किया जाए इस पाठ का महत्वपूर्ण हिस्सा होगा!
'भ्रष्टाचार की 101 विधियां' हमारे पाठ्यक्रम का महत्वपूर्ण भाग है। विधियों के साथ-साथ इस पाठ्यक्रम में भ्रष्टाचार को शिष्टाचार में तब्दील करने की विधियों में भी प्रशिक्षुओं को निपुण किया जाएगा।
मैं चाहता हूं कि मेरे 'नेता प्रशिक्षण संस्थान' से निष्णात हो कर जब प्रशिक्षु सार्वजनिक क्षेत्र में कद रखे, तो सफलता उसके कदम चूमें! जनता उसमें अपना सुनहरी भविष्य देखे।
पाठ्यक्रम अभी फाइनल नहीं किया है, यदि कोई विषय मेरी बुद्धि की पकड़ से छूट गया हो और आपके जहन में उतर रहा हो, तो कृपया मुझे अवगत कराने का कष्ट करें। आपके प्रत्येक नेताई सुझाव का स्वागत है!
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Saturday, February 2, 2008
आदमी बंदर की औलाद!
डार्विन ने कहा आदमी बंदर की औलाद है! न मालूम डार्विन ने इस प्रकार का दावा किस आधार पर कर दिया? न जाने उनके पास ऐसे कौन से सबूत थे, जिनके आधार पर ऐसा मुंह -फट बयान देने की जुर्रत कर दी! उनके विकासवादी सिद्धांत में किसी प्रकार के ऐसे अवशेष प्राप्त होने का जिक्र भी नहीं मिलता है, जिनसे ऐसा अमानवीय दावा किया जा सके!
एक संभावना यह हो सकती है कि उन्हें आस्ट्रेलिया के क्रिकेट खिलाड़ी एंड्रयू साइमंड्स की शक्ल-ओ-सूरत के आदमी कुछ ज्यादा ही तादाद में मिल गये हों और उसी के आधार पर उन्होंने आपने विकासवाद सिद्धांत का प्रतिपादन कर दिया हो। इस तथ्य से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि उन्होंने आस्ट्रेलिया क्रिकेट टीम की लूट-खसोट की प्रवृत्ति को आधार बना कर ही अपने सिद्धांत की नीव रख दी हो!
बहरहाल आधार कुछ भी रहा हो, लेकिन इस सिद्धांत को लेकर कई शंकाएं हमारे मन का बंद द्वार खटखटा रहीं हैं। मसलन आदमी यदि बंदर की औलाद है, तो फिर बंदर से आदमी बनने का सिलसिला जारी क्यों नहीं है? अद्भुत इस विकास पर अचानक पूर्ण विराम कैसे लग गया? शंका-सवाल ़िफजूल ही पैदा नहीं हो गए हैं! उन्हें खाली दिमाग की खलल भी कहना उचित न होगा!
सवाल पैदा होने की वजह है कि कम से कम कलियुग में तो हमने किसी बंदर को आदमी बनते नहीं देखा! अलबत्ता आदमियों की हरकतें बंदराना जरूर दिखलाई दे जाती हैं।
कलियुग ही क्यों द्वापर के इतिहास में भी ऐसा कोई प्रसंग हमारे हाथ नहीं लगा, जिसके आधार पर यह कहा जाए कि कृष्ण भगवान के द्वापर में ़फलां-़फलां आदमी बंदर से विकसित होने के ताजा उदाहरण हैं। इतना ही क्यों द्वापर में ऐसे साइमंड्स की शक्ल-ओ-सूरत के आदमियों का भी तो कहीं जिक्र नहीं है।
साइमंड्सी सूरत के कुछ नायक-महानयक त्रेतायुग में अवश्य अवश्य प्राप्त हैं। भगवान राम की सेना में समूची एक ब्रिगेड ऐसे ही वीरों की थी। किंतु भगवान राम के भक्तों की प्रकृति बंदराना नहीं थी। क्रोध आने पर अथवा रावण जैसे राक्षस को मजा चखाने के लिए बंदराना हरकत कभी करनी पड़ गई हो तो उसे उनकी प्रकृति कहना उचित न होगा। दरअसल यह उनका परिस्थिति-जन्य स्वभाव था! रामभक्त भक्त तो आज भी शालीन ही पाए जाते हैं!
त्रेतायुग के इतिहास से संबद्ध किसी भी ग्रंथ में बंदर से विकसित आदमी का कहीं कोई संदर्भ प्राप्त नहीं है। अत: केवल भगवान राम की ब्रिगेड के आधार पर डार्विनी सिद्धांत के औचित्य को स्वीकारना उचित न होगा।
फिर डार्विन के मन में इस प्रकार का मानव विरोधी फितूर आया क्यों? अतत: इस बारे में हमने सोचा क्यों न किसी जहीन बुजुर्ग बंदर से ही इस बारे में बात की जाए? अत: हमने संसद भवन का रुख किया, क्योंकि वहां प्रत्येक किस्म के बंदर सहज उपलब्ध हैं!
वहां पहुंचते ही हमने सुदामा की पोटली की तरह बंदरों की जमात के बीच केले, चने और गुड़ की पोटली खोल दी। पोटली का खोलना था कि कुछ युवा व बाल बंदर उनकी और झपटे। तभी एक बुजुर्ग बंदर शायद उनकी जमात का मुखिया रहा होगा, ने किसी संगीत निर्देशक की तरह हाथ हवा में उठाए और साजिंदों की तरह बंदर शांत हो गए। हम यह देख कर हतप्रभ थे!
हमने बुजुर्ग को प्रणाम किया। बुजुर्ग ने अभिवादन स्वीकार हम से आने का कारण पूछा। हमने औपचारिकता का निर्वाह करते हुए कहा, 'यों ही दर्शन करने चला आया था!'
बुजुर्ग मुस्करा कर बोला, 'आदमी! ..और केवल दर्शनार्थ! ..कोरे दर्शन की इच्छा से तो वह बजरंगबली के मंदिर भी नहीं जाता! ..असंभव! ..नि:सकोच अपना मंतव्य व्यक्त करो, वत्स!'
बुजुर्ग का कटु सत्य सुनकर हमें अपने शुष्क चेहरे पर चंद जल की बूंदों का अहसास हुआ। इतने भर से ही लगा कि हम पानी-पानी हो रहे हैं!
हमें अपने पानी-पानी होने के अहसास पर भी आश्चर्य था, क्योंकि ऐसा होना जल-संकट के इस दौर में किसी भी लिहाज से व्यवहारिक नहीं कहा जा सकता!
हमने मुंह पर हाथ फेरा और बोले, 'मान्यवर! हमने प्रसाद आपकी सेवा में अर्पित किया था, अपने उसे ग्रहण करना उचित क्यों नहीं जाना?'
हमारा प्रश्न सुन कर बुजुर्ग गंभीर भाव से बोला, 'एक नहीं कई कारण हैं। प्रथम तो वर्तमान राजनीति में बंदरों के बीच भेली डालने का चलन बढ़ गया है।'
'..कैसे?' हमने प्रश्न किया।
'..भारतरत्न के नाम पर आडवाणी जी ने भेली डाली, वैसे! दूसरा कारण- हमारी ही संतान अब हमें बोझा समझने लगी है। चने-गुड़ दिखाकर हमें कैद कर रही है! अत: आदमियों से अब डर लगने लगा है, इसलिए सतर्कता आवश्यक है। सतर्कता हटी नहीं कि दुर्घटना घटी नहीं!' बुजुर्ग ने हमारी शंका का समाधान किया।
बुजुर्ग वास्तव में जहीन निकला और बातों-बातों में ही हमारी मूल शंका का संदर्भ भी छेड़ दिया। उसी संदर्भ की पूंछ पकड़ हमने प्रश्न किया, 'मान्यवर! तो क्या आप भी डार्विन के समान आदमी को अपनी ही औलाद मानते हैं?'
बुजुर्ग तपाक से बोला, '..इसमें न मानने की क्या बात है और डार्विन ने ही कौन नया सिद्धांत बघार दिया? ..यह तो हकीकत है!'
'मगर, अब..?' बुजुर्ग ने हमें प्रश्न पूरा नहीं करने दिया और हमारे प्रश्न का आशय समझ मध्य ही में बोला, 'हम ही ने आदमी बनने से तौबा कर ली है। हमारा प्रतिनिधि मंडल विधाता के पास गया था और अपनी व्यथा बता कर बंदर-आदमी विकास प्रक्रिया पर स्टे करा लाया!'
हमारा अगला प्रश्न था, 'ऐसा क्यों? यह तो प्रकृति के विकास में बाधा है!'
हमारा प्रश्न सुन बुजुर्ग के माथे पर बल पड़ गये, 'प्रकृति के विकास में बाधा और हम! प्रश्न करने से पूर्व अपने कर्मो की समीक्षा नहीं की शायद! करते, तो आरोप हम पर न लगाते, बरखुरदार!'
माहौल में आई गर्मी कम करने के लिहाज से मक्खनी अंदाज में हमने प्रश्न किया, '..किंतु आपकी व्यथा क्या थी?'
'हमारी व्यथा का कारण भी तुम आदमी-जाति ही थी!' बुजुर्ग ने अपने आवेग पर नियंत्रण किया और फिर अपनी व्यथा को विस्तार देते हुए बोला, ' लूट-खसोट करने में आदमी व्यस्त है और बदनाम हमें कर रहा है। गुड़ की भेली अपनों के ही बीच डाल कर तमाशा देखता है और अफवाह बंदरों के बीच भेली डालने की उड़ा दी जाती है!'
बुजुर्ग ने आसमान निहारा और फिर विचार की मुद्रा में बोला, 'आदमी की अति-बंदराना हरकत देख हम खुद ही भय खा गए और डार्विन के विकासवाद से तौबा कर ली! हम तो केवल खाली पेट ही लूट-खसोट करते हैं। हमारी औलाद पेट भरने के बाद भी लूट-खसोट जारी रखती है। अत: हमने सोच सुबह जो गलती हो गई सो हो गई, अब सांय काल तो घर लौट आना ही चाहिए!'
बुजुर्ग के चेहरे पर गंभीर भाव वृद्धि को प्राप्त होते जा रहे थे, 'लगता है, आदमी बंदर होता जा रहा है! विकास की प्रक्रिया उल्टी बहने लगी है! यही कारण है कि अब बंदर आदमी के रूप में विकसित होते नहीं दिखलाई पड़ रहे हैं!'
बात का उपसंहार करते हुए बुजुर्ग अंत में बोला, 'सुनों! दृष्टिं में थोड़ा परिवर्तन लाओ तो महसूस करोगे विकास की प्रक्रिया अभी भी चालू हैं, मगर बंदर से आदमी बनने की नहीं, अपितु आदमी से बंदर बनने की!'
एक संभावना यह हो सकती है कि उन्हें आस्ट्रेलिया के क्रिकेट खिलाड़ी एंड्रयू साइमंड्स की शक्ल-ओ-सूरत के आदमी कुछ ज्यादा ही तादाद में मिल गये हों और उसी के आधार पर उन्होंने आपने विकासवाद सिद्धांत का प्रतिपादन कर दिया हो। इस तथ्य से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि उन्होंने आस्ट्रेलिया क्रिकेट टीम की लूट-खसोट की प्रवृत्ति को आधार बना कर ही अपने सिद्धांत की नीव रख दी हो!
बहरहाल आधार कुछ भी रहा हो, लेकिन इस सिद्धांत को लेकर कई शंकाएं हमारे मन का बंद द्वार खटखटा रहीं हैं। मसलन आदमी यदि बंदर की औलाद है, तो फिर बंदर से आदमी बनने का सिलसिला जारी क्यों नहीं है? अद्भुत इस विकास पर अचानक पूर्ण विराम कैसे लग गया? शंका-सवाल ़िफजूल ही पैदा नहीं हो गए हैं! उन्हें खाली दिमाग की खलल भी कहना उचित न होगा!
सवाल पैदा होने की वजह है कि कम से कम कलियुग में तो हमने किसी बंदर को आदमी बनते नहीं देखा! अलबत्ता आदमियों की हरकतें बंदराना जरूर दिखलाई दे जाती हैं।
कलियुग ही क्यों द्वापर के इतिहास में भी ऐसा कोई प्रसंग हमारे हाथ नहीं लगा, जिसके आधार पर यह कहा जाए कि कृष्ण भगवान के द्वापर में ़फलां-़फलां आदमी बंदर से विकसित होने के ताजा उदाहरण हैं। इतना ही क्यों द्वापर में ऐसे साइमंड्स की शक्ल-ओ-सूरत के आदमियों का भी तो कहीं जिक्र नहीं है।
साइमंड्सी सूरत के कुछ नायक-महानयक त्रेतायुग में अवश्य अवश्य प्राप्त हैं। भगवान राम की सेना में समूची एक ब्रिगेड ऐसे ही वीरों की थी। किंतु भगवान राम के भक्तों की प्रकृति बंदराना नहीं थी। क्रोध आने पर अथवा रावण जैसे राक्षस को मजा चखाने के लिए बंदराना हरकत कभी करनी पड़ गई हो तो उसे उनकी प्रकृति कहना उचित न होगा। दरअसल यह उनका परिस्थिति-जन्य स्वभाव था! रामभक्त भक्त तो आज भी शालीन ही पाए जाते हैं!
त्रेतायुग के इतिहास से संबद्ध किसी भी ग्रंथ में बंदर से विकसित आदमी का कहीं कोई संदर्भ प्राप्त नहीं है। अत: केवल भगवान राम की ब्रिगेड के आधार पर डार्विनी सिद्धांत के औचित्य को स्वीकारना उचित न होगा।
फिर डार्विन के मन में इस प्रकार का मानव विरोधी फितूर आया क्यों? अतत: इस बारे में हमने सोचा क्यों न किसी जहीन बुजुर्ग बंदर से ही इस बारे में बात की जाए? अत: हमने संसद भवन का रुख किया, क्योंकि वहां प्रत्येक किस्म के बंदर सहज उपलब्ध हैं!
वहां पहुंचते ही हमने सुदामा की पोटली की तरह बंदरों की जमात के बीच केले, चने और गुड़ की पोटली खोल दी। पोटली का खोलना था कि कुछ युवा व बाल बंदर उनकी और झपटे। तभी एक बुजुर्ग बंदर शायद उनकी जमात का मुखिया रहा होगा, ने किसी संगीत निर्देशक की तरह हाथ हवा में उठाए और साजिंदों की तरह बंदर शांत हो गए। हम यह देख कर हतप्रभ थे!
हमने बुजुर्ग को प्रणाम किया। बुजुर्ग ने अभिवादन स्वीकार हम से आने का कारण पूछा। हमने औपचारिकता का निर्वाह करते हुए कहा, 'यों ही दर्शन करने चला आया था!'
बुजुर्ग मुस्करा कर बोला, 'आदमी! ..और केवल दर्शनार्थ! ..कोरे दर्शन की इच्छा से तो वह बजरंगबली के मंदिर भी नहीं जाता! ..असंभव! ..नि:सकोच अपना मंतव्य व्यक्त करो, वत्स!'
बुजुर्ग का कटु सत्य सुनकर हमें अपने शुष्क चेहरे पर चंद जल की बूंदों का अहसास हुआ। इतने भर से ही लगा कि हम पानी-पानी हो रहे हैं!
हमें अपने पानी-पानी होने के अहसास पर भी आश्चर्य था, क्योंकि ऐसा होना जल-संकट के इस दौर में किसी भी लिहाज से व्यवहारिक नहीं कहा जा सकता!
हमने मुंह पर हाथ फेरा और बोले, 'मान्यवर! हमने प्रसाद आपकी सेवा में अर्पित किया था, अपने उसे ग्रहण करना उचित क्यों नहीं जाना?'
हमारा प्रश्न सुन कर बुजुर्ग गंभीर भाव से बोला, 'एक नहीं कई कारण हैं। प्रथम तो वर्तमान राजनीति में बंदरों के बीच भेली डालने का चलन बढ़ गया है।'
'..कैसे?' हमने प्रश्न किया।
'..भारतरत्न के नाम पर आडवाणी जी ने भेली डाली, वैसे! दूसरा कारण- हमारी ही संतान अब हमें बोझा समझने लगी है। चने-गुड़ दिखाकर हमें कैद कर रही है! अत: आदमियों से अब डर लगने लगा है, इसलिए सतर्कता आवश्यक है। सतर्कता हटी नहीं कि दुर्घटना घटी नहीं!' बुजुर्ग ने हमारी शंका का समाधान किया।
बुजुर्ग वास्तव में जहीन निकला और बातों-बातों में ही हमारी मूल शंका का संदर्भ भी छेड़ दिया। उसी संदर्भ की पूंछ पकड़ हमने प्रश्न किया, 'मान्यवर! तो क्या आप भी डार्विन के समान आदमी को अपनी ही औलाद मानते हैं?'
बुजुर्ग तपाक से बोला, '..इसमें न मानने की क्या बात है और डार्विन ने ही कौन नया सिद्धांत बघार दिया? ..यह तो हकीकत है!'
'मगर, अब..?' बुजुर्ग ने हमें प्रश्न पूरा नहीं करने दिया और हमारे प्रश्न का आशय समझ मध्य ही में बोला, 'हम ही ने आदमी बनने से तौबा कर ली है। हमारा प्रतिनिधि मंडल विधाता के पास गया था और अपनी व्यथा बता कर बंदर-आदमी विकास प्रक्रिया पर स्टे करा लाया!'
हमारा अगला प्रश्न था, 'ऐसा क्यों? यह तो प्रकृति के विकास में बाधा है!'
हमारा प्रश्न सुन बुजुर्ग के माथे पर बल पड़ गये, 'प्रकृति के विकास में बाधा और हम! प्रश्न करने से पूर्व अपने कर्मो की समीक्षा नहीं की शायद! करते, तो आरोप हम पर न लगाते, बरखुरदार!'
माहौल में आई गर्मी कम करने के लिहाज से मक्खनी अंदाज में हमने प्रश्न किया, '..किंतु आपकी व्यथा क्या थी?'
'हमारी व्यथा का कारण भी तुम आदमी-जाति ही थी!' बुजुर्ग ने अपने आवेग पर नियंत्रण किया और फिर अपनी व्यथा को विस्तार देते हुए बोला, ' लूट-खसोट करने में आदमी व्यस्त है और बदनाम हमें कर रहा है। गुड़ की भेली अपनों के ही बीच डाल कर तमाशा देखता है और अफवाह बंदरों के बीच भेली डालने की उड़ा दी जाती है!'
बुजुर्ग ने आसमान निहारा और फिर विचार की मुद्रा में बोला, 'आदमी की अति-बंदराना हरकत देख हम खुद ही भय खा गए और डार्विन के विकासवाद से तौबा कर ली! हम तो केवल खाली पेट ही लूट-खसोट करते हैं। हमारी औलाद पेट भरने के बाद भी लूट-खसोट जारी रखती है। अत: हमने सोच सुबह जो गलती हो गई सो हो गई, अब सांय काल तो घर लौट आना ही चाहिए!'
बुजुर्ग के चेहरे पर गंभीर भाव वृद्धि को प्राप्त होते जा रहे थे, 'लगता है, आदमी बंदर होता जा रहा है! विकास की प्रक्रिया उल्टी बहने लगी है! यही कारण है कि अब बंदर आदमी के रूप में विकसित होते नहीं दिखलाई पड़ रहे हैं!'
बात का उपसंहार करते हुए बुजुर्ग अंत में बोला, 'सुनों! दृष्टिं में थोड़ा परिवर्तन लाओ तो महसूस करोगे विकास की प्रक्रिया अभी भी चालू हैं, मगर बंदर से आदमी बनने की नहीं, अपितु आदमी से बंदर बनने की!'
Thursday, January 17, 2008
भारतरत्न के बारे में बौद्धिक सुझाव
भारतरत्न न हुआ आलू-प्याज हो गया। जिसे देखो वही सरकारी सस्ते गल्ले की दुकान पर लाइन लगाए खड़ा है। बेचारी यूपीए सरकार को मुसीबत में डाल रहा है। अभी तक तो परमाणु डील मसले पर सरकार गिराने की धमकी से निजात नहीं मिल पाई थी। कल से भारतरत्न के मुद्दे पर भी सरकार गिराने की धमकियां मिलना शुरू हो जाएंगी। सरकार न हुई गरीब की जोरू हो गई। जिसे देखो वही भाभी बनाने पर आमादा है। एक अनार सौ बीमार। भाभी बेचारी क्या करे? भारतरत्न आवंटन के बारे में हमारे कुछ सुझाव हैं। इन सुझावों के सहारे हम किसी भी झोला छाप डाक्टर की तर्ज पर शर्तिया इलाज की गारंटी देते हैं। सरकार एक बार आजमा कर तो देखे। फिर बताए, इलाज से पहले और इलाज के बाद का हाल!
हमारा पहला सुझाव है कि भारतरत्न नेताओं को न देकर किसी बुद्धिजीवी को दिया जाए। बुद्धिजीवियों में फिलहाल नटरवरलाल से बड़ा और निर्विवाद दूसरन नाम नहीं है। नटवरलाल से हमारा आशय माननीय नटवरसिंह से नहीं है। हम ठग सम्राट नटवारलाल के नाम की पैरवी कर रहे हैं। यह वह नाम है, जो पूरी जिंदगी बुद्धि चातुर्य की ही कमाई खाता रहा। बुद्धि के बल पर अच्छे-अच्छे तीसमारखांओं को चूना लगाता रहा। अर्थिक स्थिति सुदृढ़ करने के नए-नए फार्मूले इजाद करता रहा। देश-विदेश में भारत का नाम रौशन करता रहा। हमारा तो यहां तक मानना है कि यदि माननीय नटवरलाल को विदेशमंत्री बना दिया जाता, तो वे पाकिस्तान की तो हैसियत क्या है, नकली दस्तावेजों के सहारे अमेरिका को भी भारत का उपनिवेश बनाने की क्षमता रखते हैं। अब आप ही बताइए कि नटवरलाल जी के नाम का सुझाव देकर मैंने कोई गलत तो नहीं की।
मुझे रेलमंत्री लालू प्रसाद की सूझबूझ पर भी तरस आता है। पता नहीं, क्यों उन्होंने अभी तक भारतरत्न के लिए नटवरलाल जी के नाम का प्रस्तावित नहीं किया। भारतरत्न यदि नटवरलाल जी को मिल जाता है, तो सर्वाधिक लाभ उन्हें ही होगा। संपूर्ण बिहार उनकी जै-जै कार करेगा। राबड़ी देवी जी को पुन: सिंहासन पर विराजमान करने का रास्त सुगम हो जाएगा।
लाभ कांग्रेस को भी कम नहीं होगा। पूर्वाचल से जुड़ी देश भर की तमाम वोट कांग्रेस के खाते में आने के आसार बढ़ जाएंगे, विवाद से मुक्ति मिल जाएगी। यदि दक्षिण भारत को मक्खन लगाना है, तो तेलगी भाई और हर्षद मेहता के नाम पर विचार करने में भी कोई हर्ज नहीं है। वे दोनो भी बुद्धिजीवियों की श्रेणी में अग्रिम पंक्ति दबाए हुए हैं। हर्षद मेहता से बड़ा अर्थशास्त्री मैं न मानमोहन सिंह जी को मानता हूं और न ही वित्त मंत्री चिदंबरम साहब को। जो, शेयर बाजार को मुठ्ठी में कर ले, दुनियां-जहान के बैंकों की रकम अपने नाम से शेयर बाजार मे लगवा दे। आर्थिक क्षेत्र में ऐसा धमाकेदार कार्य हर्षद भाई की खोपड़ी के अलावा और किसके बूते की बात है!
तेलगी भाई को मैं उद्योग जगत का सरताज मानता हूं। पूरे देश में उन्हीं के तो टिकट चलते थे। इन दोनों महानुभावों के लिए किसी सबूत की आवश्यकता नहीं है। इन तीनों महानुभावों में से यदि किसी को भारतरत्न से सम्मानित किया जाता है, तो भारत की अरबी-जनसंख्या यूपीए व कांग्रेस के गुनगान करना न भूलेगी। भारतरत्न के सम्मान में भी वृद्धि होगी!
आलू-प्याज और गाड़ियों के वीआईपी नंबर की तरह भारतरत्न की बढ़ती मांग को देखते हुए, सरकार को चाहिए कि उसकी सार्वजनिक नीलामी का प्रावधान कर दे। मेज के नीचे अन्य पुरष्कारों का तो
कारोबार सा चलता ही है। भारत रत्न का भी शुरू हो जाए तो हर्ज क्या है? विकल्प के रूप में यह मेरा दूसरा सुझाव है। सरकार यदि इस सुझाव को स्वीकारती है, तो सारे टंटे ही समाप्त हो जाएगें। 'लेना एक न देना दो' जिसकी जेब में दम होगा, वही अपने सीने पर भारतरत्न चस्पा करने का हकदार हो जाएगा। देखो न जब से भारत की राजधानी दिल्ली में बीआईपी नंबर की बोली लगने का प्रावधान हुआ है, मारामारी समाप्त हो गई है। वरना मेरे जैसा टटपूंजिया भी अपने स्कूटर पर वाआईपी नंबर का जुगाड़ करने की हसरत रखता था। 'सरकार उरला हलवाई, परला पंसारी' की तर्ज पर बैठे-बैठे बस तमाशा देखे। कोई माई का लाल अपने लाल को भारतरत्न दिलाने के लिए सरकार को गरीब की जोरू समझ कर आंख न दिख लाएगा। सुझाव विपत्तिकारक हैं ना, आपकी क्या राय है?
संपर्क : 9868113044
हमारा पहला सुझाव है कि भारतरत्न नेताओं को न देकर किसी बुद्धिजीवी को दिया जाए। बुद्धिजीवियों में फिलहाल नटरवरलाल से बड़ा और निर्विवाद दूसरन नाम नहीं है। नटवरलाल से हमारा आशय माननीय नटवरसिंह से नहीं है। हम ठग सम्राट नटवारलाल के नाम की पैरवी कर रहे हैं। यह वह नाम है, जो पूरी जिंदगी बुद्धि चातुर्य की ही कमाई खाता रहा। बुद्धि के बल पर अच्छे-अच्छे तीसमारखांओं को चूना लगाता रहा। अर्थिक स्थिति सुदृढ़ करने के नए-नए फार्मूले इजाद करता रहा। देश-विदेश में भारत का नाम रौशन करता रहा। हमारा तो यहां तक मानना है कि यदि माननीय नटवरलाल को विदेशमंत्री बना दिया जाता, तो वे पाकिस्तान की तो हैसियत क्या है, नकली दस्तावेजों के सहारे अमेरिका को भी भारत का उपनिवेश बनाने की क्षमता रखते हैं। अब आप ही बताइए कि नटवरलाल जी के नाम का सुझाव देकर मैंने कोई गलत तो नहीं की।
मुझे रेलमंत्री लालू प्रसाद की सूझबूझ पर भी तरस आता है। पता नहीं, क्यों उन्होंने अभी तक भारतरत्न के लिए नटवरलाल जी के नाम का प्रस्तावित नहीं किया। भारतरत्न यदि नटवरलाल जी को मिल जाता है, तो सर्वाधिक लाभ उन्हें ही होगा। संपूर्ण बिहार उनकी जै-जै कार करेगा। राबड़ी देवी जी को पुन: सिंहासन पर विराजमान करने का रास्त सुगम हो जाएगा।
लाभ कांग्रेस को भी कम नहीं होगा। पूर्वाचल से जुड़ी देश भर की तमाम वोट कांग्रेस के खाते में आने के आसार बढ़ जाएंगे, विवाद से मुक्ति मिल जाएगी। यदि दक्षिण भारत को मक्खन लगाना है, तो तेलगी भाई और हर्षद मेहता के नाम पर विचार करने में भी कोई हर्ज नहीं है। वे दोनो भी बुद्धिजीवियों की श्रेणी में अग्रिम पंक्ति दबाए हुए हैं। हर्षद मेहता से बड़ा अर्थशास्त्री मैं न मानमोहन सिंह जी को मानता हूं और न ही वित्त मंत्री चिदंबरम साहब को। जो, शेयर बाजार को मुठ्ठी में कर ले, दुनियां-जहान के बैंकों की रकम अपने नाम से शेयर बाजार मे लगवा दे। आर्थिक क्षेत्र में ऐसा धमाकेदार कार्य हर्षद भाई की खोपड़ी के अलावा और किसके बूते की बात है!
तेलगी भाई को मैं उद्योग जगत का सरताज मानता हूं। पूरे देश में उन्हीं के तो टिकट चलते थे। इन दोनों महानुभावों के लिए किसी सबूत की आवश्यकता नहीं है। इन तीनों महानुभावों में से यदि किसी को भारतरत्न से सम्मानित किया जाता है, तो भारत की अरबी-जनसंख्या यूपीए व कांग्रेस के गुनगान करना न भूलेगी। भारतरत्न के सम्मान में भी वृद्धि होगी!
आलू-प्याज और गाड़ियों के वीआईपी नंबर की तरह भारतरत्न की बढ़ती मांग को देखते हुए, सरकार को चाहिए कि उसकी सार्वजनिक नीलामी का प्रावधान कर दे। मेज के नीचे अन्य पुरष्कारों का तो
कारोबार सा चलता ही है। भारत रत्न का भी शुरू हो जाए तो हर्ज क्या है? विकल्प के रूप में यह मेरा दूसरा सुझाव है। सरकार यदि इस सुझाव को स्वीकारती है, तो सारे टंटे ही समाप्त हो जाएगें। 'लेना एक न देना दो' जिसकी जेब में दम होगा, वही अपने सीने पर भारतरत्न चस्पा करने का हकदार हो जाएगा। देखो न जब से भारत की राजधानी दिल्ली में बीआईपी नंबर की बोली लगने का प्रावधान हुआ है, मारामारी समाप्त हो गई है। वरना मेरे जैसा टटपूंजिया भी अपने स्कूटर पर वाआईपी नंबर का जुगाड़ करने की हसरत रखता था। 'सरकार उरला हलवाई, परला पंसारी' की तर्ज पर बैठे-बैठे बस तमाशा देखे। कोई माई का लाल अपने लाल को भारतरत्न दिलाने के लिए सरकार को गरीब की जोरू समझ कर आंख न दिख लाएगा। सुझाव विपत्तिकारक हैं ना, आपकी क्या राय है?
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Wednesday, January 16, 2008
चोली-दामन का संबंध!
दो विषय अथवा वस्तुओं के पारस्परिक संबंधों की पुष्टिं तब तक अधूरी-अधूरी सी लगती है, जब तक उनके घनिष्ठ संबंध की व्याख्या 'चोली दामन' के संबंध के साथ संयुक्त न कर दी जाए। मसलन राजनीति-भ्रष्टाचार, राजनीति-अपराध, राजनीति-छलछद्म के मध्य पारस्परिक संबंधों की घनिष्ठता की सटीक व्याख्या करने के संदर्भ में चोली-दामन के संबंधों की घनिष्ठता का जिक्र करना आवश्यक हो जाता है, वरन् संबंध अधूरे-अधूरे से लगते हैं। चोली-दामन के मध्य जितने पुराने संबंध है, उतना पुराना ही यह मुहावरा है। हो भी क्यों ना, यह मुहावरा मानवीय कोमल भावनाओं को सीधे-सीधे जो छूता है।
जब कभी चोली-दामन अथवा अकेली चोली का जिक्र चलता है, तो 'चोली के पीछे क्या है?' का प्रश्न सहज ही उत्पन्न हो जाता है। यह मानव-जिज्ञासा का प्रश्न है। जिस शायर ने 'चोली के पीछे क्या है?' के प्रश्न को सार्वजनिक किया है, उसी ने बताया है, 'चोली के पीछे दिल है।'
दिल है, जो धड़कता है। दिल धड़कता है, तो अंग-अग फड़कता है। उन्नीस वी सदी तक दिल की इस धड़कन को छिपाने का रिवाज था। उम्र के एक नाजुक मोड़ पर युवा दिल जब धड़कना प्रारंभ करते थे, तो दिलदार उसे छिपाने का प्रयास करने लगते थे। जिसे शरम-हया पता नहीं किन-किन दकियानूसी शब्दों से नवाजा जाता था। इतना अवश्य है कि दिल की धड़कन छुपाई जाती थी और उसे शालीनता माना जाता था। हमारा मानना है कि शरम-हया नहीं, वास्तव में यह दमनकारी कृत्य था! इस कृत्य के लिए दामन का सहारा लिया जाता था!
अपवाद स्वरूप दो-चार दिलदार उस समय भी चोरी-छिपे एक-दूसरे को धड़कते दिल की आवाज सुनाने में अवश्य सफल हो जाते होंगे, किंतु सामान्यतया ऐसा नहीं होता था। अधिसंख्य युवा-युवतियां दामन के दमन से प्रभावित थे। दिल की धड़कने छुपाने के लिए बालाएं चोली के ऊपर दामन का प्रयोग करती ही थीं। चोली से दामन सरकने नहीं देती थीं, क्योंकि धड़कते दिल की धड़कने छुपाने में अकेली चोली कामयाब नहीं थी। संभवतया उसी जमाने में इस मुहावरे का जन्म हुआ होगा।
चोली-दामन की यह घनिष्ठता उन्नीस वे दशक तक रही। बीसवीं सदी के आते-आते युवा हृदयों ने दामन के दमन के खिलाफ आवाज उठानी शुरू कर दी और पारदर्शिता के वैश्विक आदर्श की ओर कदम बढ़ाना शुरू कर दिया। अत: चोली पर से दामन की पकड़ ढीली होने लगी और दामन चोली स्थल से खिसकते-खिसकते घाघरे की दिशा में लटकने लगा।
जो संबंध कभी चोली-दामन के मध्य थे, वह घाघरे और दामन के मध्य स्थापित होने लगे। इस प्रकार चोली-दामन के इस मुहावरे की प्रासंगिकता पर सवालिया निशान धीरे-धीरे स्पष्ट होने लगा।
बीसवीं सदी के बहिर्गमन द्वार तक आते-आते ब्रिटेन साम्राज्य की तरह स्वयं घाघरा भी सिकुड़ कर मिनीस्कर्ट के नाम से प्रसिद्ध हो गया। इस प्रकार दामन के दमन से उसने भी मुक्ति प्राप्त कर ली। बालाओं के तन से दामन ऐसे गायब हो गया, जैसे राजनीति से नीति। मगर बदकिस्मती से मुहावरा अभी तक प्रचलन में है। शायद किसी भाषा-विज्ञानी का ध्यान इस और नहीं गया है।
अब हम इक्कीसवीं सदी में जी रहे हैं। आज के जवां दिलों के लिए शालीनता धड़कते दिल की धड़कन छुपाने में नहीं उसे व्यक्त करने में है, क्योंकि यह पारदर्शिता का युग है। मेढ़क की तरह फुदकता दिल युवजन हथेली पर लिए घूमते हैं। बागीचों में पार्को में, प्राचीन एतिहासिक इमारतों के साय में और आधुनिक मॉल्स में जहां कहीं भी मौका मिल जाए, एक-दूजे को दिल की धड़कनों से वाकिफ कराने में मशगूल हो जाते हैं। क्योंकि यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का युग है, इसलिए स्वच्छंद रूप से व्यक्त कर रहे हैं। भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों को नए आयाम दे रहे हैं। पुराने मूल्यों को उनके अंजाम तक पहुंचा रहे हैं।
सौंदर्य-बोध और पारदर्शिता के इस युग में दामन का औचित्य है भी क्या? दामन युवा शब्दकोष से बहिर्गमन कर गया है, चोली का आकर भी निरंतर सिकुड़ने की प्रगति पर है। फिर न जाने क्यों चोली-दामन के संबंध को फिजूल महत्व देकर क्यों प्राचीन मुहावरे की लकीर पीटी जा रही है। हमारा सुझाव है-'गधे के सिर से सींग गायब' थोड़ा अभद्र लगता है, अमानवीय लगता है, अत: इस मुहावरे के स्थान पर 'चोली से दामन गायब' के मुहावरे को प्रचलन में लाया जाए। उदाहरण के रूप में कहा जा सकता है, इक्कीसवीं सदी में शरम-ओ-हया ऐसे गायब हो गई जैसे चोली से दामन।
संपर्क : 9868113044
जब कभी चोली-दामन अथवा अकेली चोली का जिक्र चलता है, तो 'चोली के पीछे क्या है?' का प्रश्न सहज ही उत्पन्न हो जाता है। यह मानव-जिज्ञासा का प्रश्न है। जिस शायर ने 'चोली के पीछे क्या है?' के प्रश्न को सार्वजनिक किया है, उसी ने बताया है, 'चोली के पीछे दिल है।'
दिल है, जो धड़कता है। दिल धड़कता है, तो अंग-अग फड़कता है। उन्नीस वी सदी तक दिल की इस धड़कन को छिपाने का रिवाज था। उम्र के एक नाजुक मोड़ पर युवा दिल जब धड़कना प्रारंभ करते थे, तो दिलदार उसे छिपाने का प्रयास करने लगते थे। जिसे शरम-हया पता नहीं किन-किन दकियानूसी शब्दों से नवाजा जाता था। इतना अवश्य है कि दिल की धड़कन छुपाई जाती थी और उसे शालीनता माना जाता था। हमारा मानना है कि शरम-हया नहीं, वास्तव में यह दमनकारी कृत्य था! इस कृत्य के लिए दामन का सहारा लिया जाता था!
अपवाद स्वरूप दो-चार दिलदार उस समय भी चोरी-छिपे एक-दूसरे को धड़कते दिल की आवाज सुनाने में अवश्य सफल हो जाते होंगे, किंतु सामान्यतया ऐसा नहीं होता था। अधिसंख्य युवा-युवतियां दामन के दमन से प्रभावित थे। दिल की धड़कने छुपाने के लिए बालाएं चोली के ऊपर दामन का प्रयोग करती ही थीं। चोली से दामन सरकने नहीं देती थीं, क्योंकि धड़कते दिल की धड़कने छुपाने में अकेली चोली कामयाब नहीं थी। संभवतया उसी जमाने में इस मुहावरे का जन्म हुआ होगा।
चोली-दामन की यह घनिष्ठता उन्नीस वे दशक तक रही। बीसवीं सदी के आते-आते युवा हृदयों ने दामन के दमन के खिलाफ आवाज उठानी शुरू कर दी और पारदर्शिता के वैश्विक आदर्श की ओर कदम बढ़ाना शुरू कर दिया। अत: चोली पर से दामन की पकड़ ढीली होने लगी और दामन चोली स्थल से खिसकते-खिसकते घाघरे की दिशा में लटकने लगा।
जो संबंध कभी चोली-दामन के मध्य थे, वह घाघरे और दामन के मध्य स्थापित होने लगे। इस प्रकार चोली-दामन के इस मुहावरे की प्रासंगिकता पर सवालिया निशान धीरे-धीरे स्पष्ट होने लगा।
बीसवीं सदी के बहिर्गमन द्वार तक आते-आते ब्रिटेन साम्राज्य की तरह स्वयं घाघरा भी सिकुड़ कर मिनीस्कर्ट के नाम से प्रसिद्ध हो गया। इस प्रकार दामन के दमन से उसने भी मुक्ति प्राप्त कर ली। बालाओं के तन से दामन ऐसे गायब हो गया, जैसे राजनीति से नीति। मगर बदकिस्मती से मुहावरा अभी तक प्रचलन में है। शायद किसी भाषा-विज्ञानी का ध्यान इस और नहीं गया है।
अब हम इक्कीसवीं सदी में जी रहे हैं। आज के जवां दिलों के लिए शालीनता धड़कते दिल की धड़कन छुपाने में नहीं उसे व्यक्त करने में है, क्योंकि यह पारदर्शिता का युग है। मेढ़क की तरह फुदकता दिल युवजन हथेली पर लिए घूमते हैं। बागीचों में पार्को में, प्राचीन एतिहासिक इमारतों के साय में और आधुनिक मॉल्स में जहां कहीं भी मौका मिल जाए, एक-दूजे को दिल की धड़कनों से वाकिफ कराने में मशगूल हो जाते हैं। क्योंकि यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का युग है, इसलिए स्वच्छंद रूप से व्यक्त कर रहे हैं। भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों को नए आयाम दे रहे हैं। पुराने मूल्यों को उनके अंजाम तक पहुंचा रहे हैं।
सौंदर्य-बोध और पारदर्शिता के इस युग में दामन का औचित्य है भी क्या? दामन युवा शब्दकोष से बहिर्गमन कर गया है, चोली का आकर भी निरंतर सिकुड़ने की प्रगति पर है। फिर न जाने क्यों चोली-दामन के संबंध को फिजूल महत्व देकर क्यों प्राचीन मुहावरे की लकीर पीटी जा रही है। हमारा सुझाव है-'गधे के सिर से सींग गायब' थोड़ा अभद्र लगता है, अमानवीय लगता है, अत: इस मुहावरे के स्थान पर 'चोली से दामन गायब' के मुहावरे को प्रचलन में लाया जाए। उदाहरण के रूप में कहा जा सकता है, इक्कीसवीं सदी में शरम-ओ-हया ऐसे गायब हो गई जैसे चोली से दामन।
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Thursday, January 3, 2008
माया महा ठगिनि हम जानी
'वत्स, क्या? ..वर्तमान संदर्भ में मायाऽऽऽ!' कर्णेन्द्रियों में माया शब्द के प्रवेश मात्र से ही आचार्य श्री का तन-मन ऐसे मुरझा गया, जैसे शिशिर ऋतु में सूखाग्रस्त क्षेत्र की लताएं अथवा किसी मनुवादी प्रमाणपत्र प्राप्त आईएएस अधिकारी!
विचलित मन के साथ भय के रथ पर सवार आचार्य श्री बोले, 'हे, पुत्र! माया तो पुरातन काल से ही विवादास्पद रही है। अब, मेरे मुख से टिप्पणी प्रसारित कराकर मुझे क्यों इस विवाद में घसीटता है। जाओ, धर्म-ग्रंथों का अध्ययन करो माया का रहस्य समझ आ जाएगा।'
आचार्य को ढांढस बंधाते हुए मुन्नालाल बोला, 'हे, जगद् गुरु! राजनीति की उर्वरा भूमि में गहराई तक धंसी आपकी जड़ों से मैं पूर्ण परिचित हूं। वोट बैंक पर लटका ताला तोड़ने में आपको महारथ हासिल है। राजनीति के इस हस्तिनापुर में आप भीष्म पितामह के समान है। राजनीतिज्ञों के लिए आप किसी कुशल व्यवसायी की काली पूंजी के समान हैं। फिर भला किसकी हिम्मत है कि कोई आपको विवाद के दलदल में घसीटने की चेष्टा करे। अत: निरर्थक भय का त्याग कर माया के रूप-स्वरुप का विस्तृत विवेचन करने की कृपा करें।'
मुन्नालाल के सत्यं प्रियम् वचन सुन आचार्य बोले, 'पुत्र! राजनीति का चरित्र बहुत विचित्र है। राजनीति वेश्या के समान है, जो नित्य बिस्तर बदलती रहती है। उसके लिए आज मैं उपयोगी हूं, कल अन्य कोई धर्म गुरु उपयोगी हो सकता है।'
रहस्यवाद और मजबूरीवाद का समानुपाती मिश्रण चेहरे पर पोत आचार्य आगे बोले, 'पुत्र! मेरा नाम राजर्षि सम्मान की सूची में प्रथम स्थान पर है, अत: मुझे माया जाल में उलझा कर उस सूची से मेरा नाम साफ कराने का प्रबंध न कर।'
आचार्य श्री की व्यथा-कथा सुन मुन्नालाल ने मक्खन की मात्रा में वृद्धि की और मालिश करते हुए बोला, 'हे, आचार्य! आप भी यदि 'माया' शब्द मात्र से व्यथित हो जाएंगे। आप ही यदि भयवश संयम का त्याग कर देंगे। तब इस देश की राजनीति कि दिशा-दशा क्या होगी, इसकी कल्पना मात्र से ही मेरा मन ऐसे कांपने लगता है, जैसे पवन वेग से पीपल के सूखे पात।'
त्वचा रोम के रास्ते मक्खन की चिकनाई आचार्य के अंतर्मन में प्रवेश हुई और शुष्क मन चिकनाई प्राप्त कर मुलायम हुआ। इस प्रकार मुन्नालाल का मक्खनी प्रयोग सफल हुआ। बगुले की भांति आचार्य श्री ने दाएं-बाएं गर्दन घुमाई और माया की दिशा में उड़ान भरी। 'प्रिय, पुत्र! तेरी बाल हट के सम्मुख मैं पराजित हुआ और निर्धारित विजन-मिशन को एक तरफ रख माया के रहस्य पर मद्धम-मद्धम प्रकाश डालता हूं। लेकिन मेरी नसीहत पर भी तू गंभीरता से विचार करना।'
''देवो न जानति कुतो मुनष्य:''
हे, प्रिय पुत्र! मनुष्य की तो औकात क्या मान्यवर राम जी भी अपनी माया का रहस्य नहीं जान पाए। रामजी की माया है, पुत्र!रामजी की माया। तू फिजूल ही क्यों इस लफड़े में पड़ता है।' 'पुत्र, बड़ी विचित्र है माया की 'माया'! पुत्र! क्षण-प्रतिक्षण रूप परिवर्तन करना उसकी प्रकृति है। पुरातन काल से ही ऋषि-मुनि मायाजाल से दूर रहने की नेक सलाह देते आए हैं। मगर मोह के वशीभूत मनुष्य उसके मायाजाल में उसी प्रकार फंसता चला जाता है, जैसे अन्न के दाने देखकर जाल में कबूतर। '
प्रिय पुत्र! शंकराचार्य ने माया को असत्य कहा, भ्रम कहा, रज्जू में सर्प के समान कहा और दादा कबीर ने उसे मोहिनी कहा। उसका मोहिनी रूप देखकर मनुष्य उसी प्रकार अपना कंट्रोल खो बैठता हैं, जिस प्रकार हल्दीराम की भुजिया का खुला पैकेट देखकर टीवी बाला। माया के मोहिनी रूप से आकर्षित मनुष्य उसके साथ गठजोड़ कर बैठता है और फिर मनु के वंशज का तमगा प्राप्त कर दर-दर भटकता फिरता है।'
'माया विषकन्या है, पुत्र! वह राजा को रंक बनाने की क्षमता रखती है। कल्याण की भावना से जंजाल में फंसे व्यक्ति को भी नहीं बख्शती। अच्छे-अच्छे तीसमारखाओं की तासीर बदल कर माया उन्हें मुलायम बनाने की क्षमता रखती है।'
'परम प्रिय मुन्नालाल! दादा कबीर भी माया के मोह में फंसे होंगे, उनके अनुभव से ऐसा ज्ञात होता है।'
''कबीरा खड़ा बजार में लिए लुकाठी हाथ। जो घर जारै आपना चलै हमारे साथ॥''
स्पष्ट है कि स्वार्थ का त्याग कर केवल कल्याण भावना के साथ ही दादा ने माया शिविर में प्रवेश किया होगा। मगर शिविर में प्रवेश पाते ही वह भी ठगे रह गए होंगे। अपने अनुभव के आधार पर तभी तो उन्होंने कहा, 'माया महा ठगिनि हम जानी। तिरगुन फांस लिए कर डोलै, बोलै मधुर बानी॥''
'अंततोगत्वा दादा की स्थिति क्या हुई, ''कबिरा खड़ा बजार में, मांगे सबकी खैर। ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर॥'' 'प्रिय पुत्र माया की चपत लगने के बाद मनुष्य दादा कबीर की ही तरह निष्काम-प्रवृति का हो जाता है।'
'उस दिन से आज तक बाजार में खड़ा कबीर चिल्ला-चिल्लाकर मनुष्य को माया से दूर रहने की नसीहत दे रहा है। मगर मनुष्य अनसुनी कर केवल यही दोहरा रहा है, ''माया तेरे तीन नाम परसी, परसा, परसुराम'' और उसके जंजाल में फंसता चला जा रहा है। अत: हे, पुत्र! तू माया का मोह त्याग, अन्य कोई शिविर तलाश। दीमक के समान माया तेरा जनाधार चाटती जा रही है। व्यर्थ में ही क्यों अपना जनाधार नष्ट कर रहा है, कबीर की मान, 'माया को महा ठगिनि जान।'
संपर्क : 9868113044
विचलित मन के साथ भय के रथ पर सवार आचार्य श्री बोले, 'हे, पुत्र! माया तो पुरातन काल से ही विवादास्पद रही है। अब, मेरे मुख से टिप्पणी प्रसारित कराकर मुझे क्यों इस विवाद में घसीटता है। जाओ, धर्म-ग्रंथों का अध्ययन करो माया का रहस्य समझ आ जाएगा।'
आचार्य को ढांढस बंधाते हुए मुन्नालाल बोला, 'हे, जगद् गुरु! राजनीति की उर्वरा भूमि में गहराई तक धंसी आपकी जड़ों से मैं पूर्ण परिचित हूं। वोट बैंक पर लटका ताला तोड़ने में आपको महारथ हासिल है। राजनीति के इस हस्तिनापुर में आप भीष्म पितामह के समान है। राजनीतिज्ञों के लिए आप किसी कुशल व्यवसायी की काली पूंजी के समान हैं। फिर भला किसकी हिम्मत है कि कोई आपको विवाद के दलदल में घसीटने की चेष्टा करे। अत: निरर्थक भय का त्याग कर माया के रूप-स्वरुप का विस्तृत विवेचन करने की कृपा करें।'
मुन्नालाल के सत्यं प्रियम् वचन सुन आचार्य बोले, 'पुत्र! राजनीति का चरित्र बहुत विचित्र है। राजनीति वेश्या के समान है, जो नित्य बिस्तर बदलती रहती है। उसके लिए आज मैं उपयोगी हूं, कल अन्य कोई धर्म गुरु उपयोगी हो सकता है।'
रहस्यवाद और मजबूरीवाद का समानुपाती मिश्रण चेहरे पर पोत आचार्य आगे बोले, 'पुत्र! मेरा नाम राजर्षि सम्मान की सूची में प्रथम स्थान पर है, अत: मुझे माया जाल में उलझा कर उस सूची से मेरा नाम साफ कराने का प्रबंध न कर।'
आचार्य श्री की व्यथा-कथा सुन मुन्नालाल ने मक्खन की मात्रा में वृद्धि की और मालिश करते हुए बोला, 'हे, आचार्य! आप भी यदि 'माया' शब्द मात्र से व्यथित हो जाएंगे। आप ही यदि भयवश संयम का त्याग कर देंगे। तब इस देश की राजनीति कि दिशा-दशा क्या होगी, इसकी कल्पना मात्र से ही मेरा मन ऐसे कांपने लगता है, जैसे पवन वेग से पीपल के सूखे पात।'
त्वचा रोम के रास्ते मक्खन की चिकनाई आचार्य के अंतर्मन में प्रवेश हुई और शुष्क मन चिकनाई प्राप्त कर मुलायम हुआ। इस प्रकार मुन्नालाल का मक्खनी प्रयोग सफल हुआ। बगुले की भांति आचार्य श्री ने दाएं-बाएं गर्दन घुमाई और माया की दिशा में उड़ान भरी। 'प्रिय, पुत्र! तेरी बाल हट के सम्मुख मैं पराजित हुआ और निर्धारित विजन-मिशन को एक तरफ रख माया के रहस्य पर मद्धम-मद्धम प्रकाश डालता हूं। लेकिन मेरी नसीहत पर भी तू गंभीरता से विचार करना।'
''देवो न जानति कुतो मुनष्य:''
हे, प्रिय पुत्र! मनुष्य की तो औकात क्या मान्यवर राम जी भी अपनी माया का रहस्य नहीं जान पाए। रामजी की माया है, पुत्र!रामजी की माया। तू फिजूल ही क्यों इस लफड़े में पड़ता है।' 'पुत्र, बड़ी विचित्र है माया की 'माया'! पुत्र! क्षण-प्रतिक्षण रूप परिवर्तन करना उसकी प्रकृति है। पुरातन काल से ही ऋषि-मुनि मायाजाल से दूर रहने की नेक सलाह देते आए हैं। मगर मोह के वशीभूत मनुष्य उसके मायाजाल में उसी प्रकार फंसता चला जाता है, जैसे अन्न के दाने देखकर जाल में कबूतर। '
प्रिय पुत्र! शंकराचार्य ने माया को असत्य कहा, भ्रम कहा, रज्जू में सर्प के समान कहा और दादा कबीर ने उसे मोहिनी कहा। उसका मोहिनी रूप देखकर मनुष्य उसी प्रकार अपना कंट्रोल खो बैठता हैं, जिस प्रकार हल्दीराम की भुजिया का खुला पैकेट देखकर टीवी बाला। माया के मोहिनी रूप से आकर्षित मनुष्य उसके साथ गठजोड़ कर बैठता है और फिर मनु के वंशज का तमगा प्राप्त कर दर-दर भटकता फिरता है।'
'माया विषकन्या है, पुत्र! वह राजा को रंक बनाने की क्षमता रखती है। कल्याण की भावना से जंजाल में फंसे व्यक्ति को भी नहीं बख्शती। अच्छे-अच्छे तीसमारखाओं की तासीर बदल कर माया उन्हें मुलायम बनाने की क्षमता रखती है।'
'परम प्रिय मुन्नालाल! दादा कबीर भी माया के मोह में फंसे होंगे, उनके अनुभव से ऐसा ज्ञात होता है।'
''कबीरा खड़ा बजार में लिए लुकाठी हाथ। जो घर जारै आपना चलै हमारे साथ॥''
स्पष्ट है कि स्वार्थ का त्याग कर केवल कल्याण भावना के साथ ही दादा ने माया शिविर में प्रवेश किया होगा। मगर शिविर में प्रवेश पाते ही वह भी ठगे रह गए होंगे। अपने अनुभव के आधार पर तभी तो उन्होंने कहा, 'माया महा ठगिनि हम जानी। तिरगुन फांस लिए कर डोलै, बोलै मधुर बानी॥''
'अंततोगत्वा दादा की स्थिति क्या हुई, ''कबिरा खड़ा बजार में, मांगे सबकी खैर। ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर॥'' 'प्रिय पुत्र माया की चपत लगने के बाद मनुष्य दादा कबीर की ही तरह निष्काम-प्रवृति का हो जाता है।'
'उस दिन से आज तक बाजार में खड़ा कबीर चिल्ला-चिल्लाकर मनुष्य को माया से दूर रहने की नसीहत दे रहा है। मगर मनुष्य अनसुनी कर केवल यही दोहरा रहा है, ''माया तेरे तीन नाम परसी, परसा, परसुराम'' और उसके जंजाल में फंसता चला जा रहा है। अत: हे, पुत्र! तू माया का मोह त्याग, अन्य कोई शिविर तलाश। दीमक के समान माया तेरा जनाधार चाटती जा रही है। व्यर्थ में ही क्यों अपना जनाधार नष्ट कर रहा है, कबीर की मान, 'माया को महा ठगिनि जान।'
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Monday, December 31, 2007
राजनीति में मूंछों का अल्पसंख्यक होना
ईमानदारी की तरह राजनीति में मूंछों का भी महत्व घटता जा रहा है। बालीवुड से राजनीति की तरफ पलायन करने वाले अभि-नेता भी मूंछ विहीन हैं।
मुझे नहीं मालूम की ईमानदारी व मूंछों के बीच कोई रिश्ता है या नहीं, मगर दोनों का साथ-साथ महत्वहीन होना पारस्परिक रिश्तों की तरफ इशारा अवश्य करता है। हमारी चिंता व चिंतन का विषय यहां ईमानदारी नहीं केवल मूंछें हैं, क्योंकि संवेदनशील दो मसले एक साथ उठाना हमारी कूवत से बाहर की बात है। आप यदि पसंद करे और आपके स्वभाव के अनुकूल हो तो मूंछों पर किए गए हमारे शोध से प्राप्त निष्कर्षो को आप ईमानदारी की दुर्गति पर भी लागू कर सकते हैं। ऐसा करने के लिए हम आपको मौलिक अधिकार प्रदान करते हैं।
ऐसा नहीं है कि राजनीति से मूंछें डॉयनासोर अथवा गिद्ध गति को प्राप्त हो चुकी हैं। थोड़ी-बहुत मूंछें हैं, मगर उनमें से अधिकांश को मूंछें नहीं अपितु मूंछों के अवशेष ही कहना ज्यादा उचित होगा। ऐसी मूंछों की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर नहीं है। अत: उन्हें दलित मूंछें भी कहा जा सकता है।
भेड़ों के झुंड में ऊंट की तरह यदाकदा कुछ उच्च वर्गीय मूंछें भी दलित मूंछों की राजनीति करती दिखलाई पड़ जाती हैं, मगर उनका दायरा भी सीमित ही है और ताव नामक वंशानुगत गुण का असर उन पर कभी-कभार ही दिखलाई पड़ता है। कुल मिलाकर यह कहना अनुचित न होगा कि राजनीति में मूंछें अल्पसंख्यक होती जा रही हैं।
ऐसा क्यों हो रहा है, मूंछें अल्पसंख्यक क्यों होती जा रहीं हैं? ठहरे पानी में जलकुंभी की तरह यह प्रश्न एक अर्से से हमारी बुद्धि की पोखर पर काबिज है। उसे हम जितना हल करने का प्रयास करते हैं, जलकुंभी में गधे की तरह उसमें हम उतना ही फंसते जा रहे हैं। प्रश्न हल होने का नाम नहीं ले रहा है और हम हल करने की जिद्द नहीं छोड़ पा रहे हैं, अत: मूंछों से जुड़ा यह प्रश्न हमारे लिए 'मूंछ का सवाल' बन गया है।
गहन मंथन और विभिन्न किस्म के नेताओं से इस्क्लूसिव बात करने के उपरांत हम कुछ निष्कर्ष हमारे हाथ लगे, जिनका खुलासा आपके समक्ष प्रस्तुत है-
1. राजनीति अब मूंछों की लड़ाई नहीं रह गई है। स्थायित्व शब्द राजनीति में अर्थहीन हो गया है, इसलिए स्थायी दुश्मनी और दोस्ती का राजनीति में कोई अर्थ नहीं है, फिर चेहरे पर क्यों फिजूल ही में खर-पतवार उगाए जाएं?'
2. हालिया जमाने में हाल मूछंदर नेता का प्रगति कर पाना मुश्किल काम है। खुदा-न-खस्ता प्रगति कर भी ले तो बेचारा मलाई कैसे चाटेगा, क्योंकि मलाई चाटने के वक्त मूंछें आड़े आ जाती हैं। मूंछों के बावजूद मलाई चाटने का दु:साहस किया भी तो आधी मलाई मूंछों पर चिपक कर रह जाएगी। मलाई भी पूरी हाथ नहीं लगेगी और जग हंसाई मुफ्त में हो जाएगी। जिसे पता नहीं, उसे भी पता चल जाएगा कि नेता मलाई चाट है।
3. मलाई चाटना नेता की मजबूरी है। मलाई न चाटे तो आकाओं को रोज-रोज मक्खन लगाने के लिए इतना मक्खन कहां से लाएगा? मक्खन लगाने और मलाई चाटे बिना राजनीति नहीं चला करती। अत: राजनीति में अस्तित्व बरकरार रखने के लिए मूंछें नहीं, मलाई आवश्यक है। देवता भी मलाई प्रेमी होते थे अत: मूंछ नहीं रखते थे। आधुनिक देवता भी उसी देवत्व परंपरा का निर्वाह कर रहे हैं।
4. राजनीति में कदम जमाने और जमे कदम उखाड़ने के लिए किसी की नाक का बाल बनना भी परम आवश्यक है और मूंछ इस परम आवश्यकता की पूर्ति में बाधक हैं। फिर मूंछ का भार फिजूल में ही वहन क्यों किया जाए?
5. राजनीति में मूंछों के अल्पसंख्यक होने का एक मात्र कारण पूंछ का विकसित होना है, क्योंकि राजनीति में पूंछ वालों की ही पूछ है। अत: मूंछें साफ होती गई और पूंछ लंबी होती चली गई।
इस प्रकार राजनीति में मूंछ अल्पसंख्यक होती जा रही है। आप चाहें तो राजनीति में ईमानदारी विलुप्त होने के पीछे भी मेरे इन्हीं शोध निष्कर्ष को लागू कर सकते हैं।
संपर्क : 9868113044
मुझे नहीं मालूम की ईमानदारी व मूंछों के बीच कोई रिश्ता है या नहीं, मगर दोनों का साथ-साथ महत्वहीन होना पारस्परिक रिश्तों की तरफ इशारा अवश्य करता है। हमारी चिंता व चिंतन का विषय यहां ईमानदारी नहीं केवल मूंछें हैं, क्योंकि संवेदनशील दो मसले एक साथ उठाना हमारी कूवत से बाहर की बात है। आप यदि पसंद करे और आपके स्वभाव के अनुकूल हो तो मूंछों पर किए गए हमारे शोध से प्राप्त निष्कर्षो को आप ईमानदारी की दुर्गति पर भी लागू कर सकते हैं। ऐसा करने के लिए हम आपको मौलिक अधिकार प्रदान करते हैं।
ऐसा नहीं है कि राजनीति से मूंछें डॉयनासोर अथवा गिद्ध गति को प्राप्त हो चुकी हैं। थोड़ी-बहुत मूंछें हैं, मगर उनमें से अधिकांश को मूंछें नहीं अपितु मूंछों के अवशेष ही कहना ज्यादा उचित होगा। ऐसी मूंछों की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर नहीं है। अत: उन्हें दलित मूंछें भी कहा जा सकता है।
भेड़ों के झुंड में ऊंट की तरह यदाकदा कुछ उच्च वर्गीय मूंछें भी दलित मूंछों की राजनीति करती दिखलाई पड़ जाती हैं, मगर उनका दायरा भी सीमित ही है और ताव नामक वंशानुगत गुण का असर उन पर कभी-कभार ही दिखलाई पड़ता है। कुल मिलाकर यह कहना अनुचित न होगा कि राजनीति में मूंछें अल्पसंख्यक होती जा रही हैं।
ऐसा क्यों हो रहा है, मूंछें अल्पसंख्यक क्यों होती जा रहीं हैं? ठहरे पानी में जलकुंभी की तरह यह प्रश्न एक अर्से से हमारी बुद्धि की पोखर पर काबिज है। उसे हम जितना हल करने का प्रयास करते हैं, जलकुंभी में गधे की तरह उसमें हम उतना ही फंसते जा रहे हैं। प्रश्न हल होने का नाम नहीं ले रहा है और हम हल करने की जिद्द नहीं छोड़ पा रहे हैं, अत: मूंछों से जुड़ा यह प्रश्न हमारे लिए 'मूंछ का सवाल' बन गया है।
गहन मंथन और विभिन्न किस्म के नेताओं से इस्क्लूसिव बात करने के उपरांत हम कुछ निष्कर्ष हमारे हाथ लगे, जिनका खुलासा आपके समक्ष प्रस्तुत है-
1. राजनीति अब मूंछों की लड़ाई नहीं रह गई है। स्थायित्व शब्द राजनीति में अर्थहीन हो गया है, इसलिए स्थायी दुश्मनी और दोस्ती का राजनीति में कोई अर्थ नहीं है, फिर चेहरे पर क्यों फिजूल ही में खर-पतवार उगाए जाएं?'
2. हालिया जमाने में हाल मूछंदर नेता का प्रगति कर पाना मुश्किल काम है। खुदा-न-खस्ता प्रगति कर भी ले तो बेचारा मलाई कैसे चाटेगा, क्योंकि मलाई चाटने के वक्त मूंछें आड़े आ जाती हैं। मूंछों के बावजूद मलाई चाटने का दु:साहस किया भी तो आधी मलाई मूंछों पर चिपक कर रह जाएगी। मलाई भी पूरी हाथ नहीं लगेगी और जग हंसाई मुफ्त में हो जाएगी। जिसे पता नहीं, उसे भी पता चल जाएगा कि नेता मलाई चाट है।
3. मलाई चाटना नेता की मजबूरी है। मलाई न चाटे तो आकाओं को रोज-रोज मक्खन लगाने के लिए इतना मक्खन कहां से लाएगा? मक्खन लगाने और मलाई चाटे बिना राजनीति नहीं चला करती। अत: राजनीति में अस्तित्व बरकरार रखने के लिए मूंछें नहीं, मलाई आवश्यक है। देवता भी मलाई प्रेमी होते थे अत: मूंछ नहीं रखते थे। आधुनिक देवता भी उसी देवत्व परंपरा का निर्वाह कर रहे हैं।
4. राजनीति में कदम जमाने और जमे कदम उखाड़ने के लिए किसी की नाक का बाल बनना भी परम आवश्यक है और मूंछ इस परम आवश्यकता की पूर्ति में बाधक हैं। फिर मूंछ का भार फिजूल में ही वहन क्यों किया जाए?
5. राजनीति में मूंछों के अल्पसंख्यक होने का एक मात्र कारण पूंछ का विकसित होना है, क्योंकि राजनीति में पूंछ वालों की ही पूछ है। अत: मूंछें साफ होती गई और पूंछ लंबी होती चली गई।
इस प्रकार राजनीति में मूंछ अल्पसंख्यक होती जा रही है। आप चाहें तो राजनीति में ईमानदारी विलुप्त होने के पीछे भी मेरे इन्हीं शोध निष्कर्ष को लागू कर सकते हैं।
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Saturday, December 29, 2007
कहानी जंगल की
यह व्यंग्य निठारी काण्ड पर लिखा था। निठारी काण्ड जिसमें एक-एक कर लगभग 32 बच्चे लापता हो गए थे। एक वर्ष पूर्व आज ही के दिन 29 दिसंबर 2006 को इस काण्ड का खुलासा हुआ था। नोएडा-निठारी गांव के सेक्टर 31 स्थित नाले से लगभग 19 मासूम बच्चों के कंकाल मिले थे। पता चला कि मासूमों को हवस का शिकार बना कर नर-पिशाच उनकी हत्या कर देते थे और शव के टुकड़े-टुकड़े कर नाले के हवाले कर दिए। ये सभी अमानवीय कर्म इसी सेक्टर की डी-5 कोठी में हुए। कोठी के मालिक मोनिंदर सिंह पंढेर और उसके नौकर सुरेंद्र सिंह कोहली पर गाजियाबाद की एक अदालत में इस काण्ड से संबद्ध लगभग 19 मुकदमे चल रहे हैं। आरोप है कि सुरेंद्र बच्चों को बहका-फुसला कर कोठी के अंदर लाता था और हत्या करने के बाद शव के साथ दुष्कर्म करता था। इस पूरे मामले में कोठी मालिक पंढेर का भी हाथ बताया जाता है।
जंगल का राजा उदार हृदय था। यह उसके उदारता का ही परिचायक था कि बंदर उसके राजनैतिक सलाहकार व कार्यकत्र्ता थे और लकड़बग्घे व जंगली कुत्ते उसके राज्य में कानून-व्यवस्था कायम रखने का काम संभाले हुए थे। उसके राज में भेड़ियों की गिनती प्रभावशाली जीवों में होती थी, यह भी राज के उदार हृदय होने की जीवंत उदाहरण है। उस जंगल का एक हिस्सा काफी संपन्न व धन-धन्य से परिपूर्ण था। भेड़िये, लकड़बग्घे, कुत्ते और तेजतर्रार बंदर वहाँ अपनी-अपनी नियुक्ति कराने व बसने की जुगत में लगे रहते थे।
रोजी-रोटी की तलाश में जंगल के दूसरे हिस्सों से भेड़-बकरियों के कुछ परिवार भी वहाँ आकर बस गए। वे दिन भर मेहनत-मजदूरी करते और अपने परिवार को पालते। रोजगार के साधन उपलब्ध होने के कारण भेड़-बकरियों के दिन चैन से कटने लगे। मगर दुर्भाग्य की उनका सुख-चैन ज्यादा दिन तक कायम न रह सका।
दरअसल जंगल में भेड़िये तो पहले ही से प्रभावी थे। ऐसे ही प्रभावशाली एक भेड़िये की निगाह निरीह भेड़-बकरियों के मेमनों पर पड़ गई। मेमने की लजीज मांस और वह भी सहज रूप से मिल जाए, भेड़िये के लिए इससे सुखद बात और क्या हो सकती थी। अत: भेड़िये ने मेमनों पर हाथ साफ करना शुरू कर दिया।
एक मेमना गायब हो गया, उसके माता-पिता को चिंता हुई, किंतु सोच कर शांत बैठ गए कि इधर-उधर कहीं चरने चला गया होगा, आ जाएगा। मेमना जीवित होता, तो अवश्य आता, किंतु उसे तो भेड़िया अपना भोजन बना चुका था।
मेमना वापस नहीं लोटा, उसकी माँ रोने लगी, उसकी आवाज जंगल में सुनाई दी। रोने की आवाज कानून के रखवाले लकड़बग्घों के कान तक पहुंची, किंतु कुछ हुआ नहीं, क्योंकि भेड़-बकरियों का रोने से लकड़बग्घों की संवेदना जागृत नहीं होती है। कहते हैं कि यह प्रकृति का नियम है।
पहले दिन एक परिवार के रोने की आवाज जंगल में गूंजी, धीरे-धीरे एक-एक कर रोने की बहुत सारी आवाजें उसमें शामिल होने लगी। दरअसल भेड़िया एक-एक कर 25-30 मेमने खा गया था।
जब भी किसी का बच्चा गायब होता, उसके माता-पिता कानून के रखवाले लकड़बग्घों के पास जाते, लकड़बग्घे उन्हें टला देते। टाल देना उचित भी था, क्योंकि जंगल के विशिष्ट जीवों की सुरक्षा उनकी प्राथमिकता थी, उसी का भार उनके ऊपर काफी था। वैसे भी कानून-व्यवस्था का भेड़-बकरियों से कोई खास सरोकार होता भी नहीं है। एक-दो मेमने यदि कहीं गुम हो भी गए तो जंगल की सुरक्षा को कौन खतरा पैदा हो गया!
रोने की आवाज धीरे-धीरे जोर पकड़ने लगी, आवाज राजा के राजनैतिक कार्यकर्ता बंदरों के कानों तक पहुंची। कुछ कान खड़े हुए, किंतु व्यर्थ। पता किया, अरे यह तो भेड़- बकरियों के रोने की आवाज है! उनका दर्द सुना जाए, मगर क्यों, बंदर-बांट के लिए उनके पास कुछ भी तो नहीं है!
बंदरों का सरदार बोला, छोड़ो अभी चुनाव भी तो आस-पास नहीं हैं, हों भी तो क्या है, बाहर से आए हुए हैं, उनके वोट भी कितने हैं! भेड़-बकरियों का दुख भूल सभी बंदर अपने आकाओं की सेवा-सुश्रुसा में लग गए।
भेड़-बकरियों के परिवार रोते रहे, भेड़िया निर्भय पूर्वक उनके बच्चों का शिकार करता रहा। पीड़ित परिवार के रोने की आवाज से आजिज कानून-व्यवस्था के रखवाले लकड़बग्घों ने भेड़िये को गिरफ्तार किया भी, किंतु भेड़िये के सामने लकड़बग्घे की क्या औकात और उस पर भी भेड़िया रुसूख वाला हो। भेड़िया मुक्त कर दिया गया और मेमने निगलने का उसका क्रम जारी रहा।
रोने वालों की तादाद बढ़ती चली गई और रोने की आवाज चीख में तब्दील होने लगी। उनकी श्रेणी के भयभीत अन्य जीव भी उनकी आवाज में आवाज मिलाने लगे। आस-पास के जंगलों के जीवों का ध्यान आकर्षित हुआ। उसी दौरान जंगल के चुनाव भी नजदीक आ गए। जंगल का समूचा तंत्र सक्रिय हो गया, राजा को चुनाव में फिर विजयी बनाना था।
सुना गया है, हत्यारे भेड़िया पुन: गिरफ्तार कर लिया गया है। पीड़ित परिवारों के सामने हरी घास के कुछ तिनके भी डाल दिए गए हैं। यह कहानी निठारी के जंगल की है।
अब देखना यह है कि आगे क्या होता है। आगे कुछ होगा, तभी कहानी आगे बढ़ेगी, वरन् कहानी यहीं समाप्त समझो।
संपर्क : 9868113044
जंगल का राजा उदार हृदय था। यह उसके उदारता का ही परिचायक था कि बंदर उसके राजनैतिक सलाहकार व कार्यकत्र्ता थे और लकड़बग्घे व जंगली कुत्ते उसके राज्य में कानून-व्यवस्था कायम रखने का काम संभाले हुए थे। उसके राज में भेड़ियों की गिनती प्रभावशाली जीवों में होती थी, यह भी राज के उदार हृदय होने की जीवंत उदाहरण है। उस जंगल का एक हिस्सा काफी संपन्न व धन-धन्य से परिपूर्ण था। भेड़िये, लकड़बग्घे, कुत्ते और तेजतर्रार बंदर वहाँ अपनी-अपनी नियुक्ति कराने व बसने की जुगत में लगे रहते थे।
रोजी-रोटी की तलाश में जंगल के दूसरे हिस्सों से भेड़-बकरियों के कुछ परिवार भी वहाँ आकर बस गए। वे दिन भर मेहनत-मजदूरी करते और अपने परिवार को पालते। रोजगार के साधन उपलब्ध होने के कारण भेड़-बकरियों के दिन चैन से कटने लगे। मगर दुर्भाग्य की उनका सुख-चैन ज्यादा दिन तक कायम न रह सका।
दरअसल जंगल में भेड़िये तो पहले ही से प्रभावी थे। ऐसे ही प्रभावशाली एक भेड़िये की निगाह निरीह भेड़-बकरियों के मेमनों पर पड़ गई। मेमने की लजीज मांस और वह भी सहज रूप से मिल जाए, भेड़िये के लिए इससे सुखद बात और क्या हो सकती थी। अत: भेड़िये ने मेमनों पर हाथ साफ करना शुरू कर दिया।
एक मेमना गायब हो गया, उसके माता-पिता को चिंता हुई, किंतु सोच कर शांत बैठ गए कि इधर-उधर कहीं चरने चला गया होगा, आ जाएगा। मेमना जीवित होता, तो अवश्य आता, किंतु उसे तो भेड़िया अपना भोजन बना चुका था।
मेमना वापस नहीं लोटा, उसकी माँ रोने लगी, उसकी आवाज जंगल में सुनाई दी। रोने की आवाज कानून के रखवाले लकड़बग्घों के कान तक पहुंची, किंतु कुछ हुआ नहीं, क्योंकि भेड़-बकरियों का रोने से लकड़बग्घों की संवेदना जागृत नहीं होती है। कहते हैं कि यह प्रकृति का नियम है।
पहले दिन एक परिवार के रोने की आवाज जंगल में गूंजी, धीरे-धीरे एक-एक कर रोने की बहुत सारी आवाजें उसमें शामिल होने लगी। दरअसल भेड़िया एक-एक कर 25-30 मेमने खा गया था।
जब भी किसी का बच्चा गायब होता, उसके माता-पिता कानून के रखवाले लकड़बग्घों के पास जाते, लकड़बग्घे उन्हें टला देते। टाल देना उचित भी था, क्योंकि जंगल के विशिष्ट जीवों की सुरक्षा उनकी प्राथमिकता थी, उसी का भार उनके ऊपर काफी था। वैसे भी कानून-व्यवस्था का भेड़-बकरियों से कोई खास सरोकार होता भी नहीं है। एक-दो मेमने यदि कहीं गुम हो भी गए तो जंगल की सुरक्षा को कौन खतरा पैदा हो गया!
रोने की आवाज धीरे-धीरे जोर पकड़ने लगी, आवाज राजा के राजनैतिक कार्यकर्ता बंदरों के कानों तक पहुंची। कुछ कान खड़े हुए, किंतु व्यर्थ। पता किया, अरे यह तो भेड़- बकरियों के रोने की आवाज है! उनका दर्द सुना जाए, मगर क्यों, बंदर-बांट के लिए उनके पास कुछ भी तो नहीं है!
बंदरों का सरदार बोला, छोड़ो अभी चुनाव भी तो आस-पास नहीं हैं, हों भी तो क्या है, बाहर से आए हुए हैं, उनके वोट भी कितने हैं! भेड़-बकरियों का दुख भूल सभी बंदर अपने आकाओं की सेवा-सुश्रुसा में लग गए।
भेड़-बकरियों के परिवार रोते रहे, भेड़िया निर्भय पूर्वक उनके बच्चों का शिकार करता रहा। पीड़ित परिवार के रोने की आवाज से आजिज कानून-व्यवस्था के रखवाले लकड़बग्घों ने भेड़िये को गिरफ्तार किया भी, किंतु भेड़िये के सामने लकड़बग्घे की क्या औकात और उस पर भी भेड़िया रुसूख वाला हो। भेड़िया मुक्त कर दिया गया और मेमने निगलने का उसका क्रम जारी रहा।
रोने वालों की तादाद बढ़ती चली गई और रोने की आवाज चीख में तब्दील होने लगी। उनकी श्रेणी के भयभीत अन्य जीव भी उनकी आवाज में आवाज मिलाने लगे। आस-पास के जंगलों के जीवों का ध्यान आकर्षित हुआ। उसी दौरान जंगल के चुनाव भी नजदीक आ गए। जंगल का समूचा तंत्र सक्रिय हो गया, राजा को चुनाव में फिर विजयी बनाना था।
सुना गया है, हत्यारे भेड़िया पुन: गिरफ्तार कर लिया गया है। पीड़ित परिवारों के सामने हरी घास के कुछ तिनके भी डाल दिए गए हैं। यह कहानी निठारी के जंगल की है।
अब देखना यह है कि आगे क्या होता है। आगे कुछ होगा, तभी कहानी आगे बढ़ेगी, वरन् कहानी यहीं समाप्त समझो।
संपर्क : 9868113044
Friday, December 28, 2007
तसलीमा : अतिथि देवो भव!
तसलीमाऽऽऽ! .. अतिथि देवो भव! यह पूरा देश तुम्हारा है, तसलीमा! तुम बंगाल से आंध्र तक श्रीनगर से कन्या कुमारी तक दिल्ली से झूमरीतलैया तक जहां चाहो रह सकती हो। हमें कोई एतराज नहीं। मगर तसलीमा तुम्हारी सुरक्षा भी तो आवश्यक है, ना! तुम्हारे जैसे बहुमूल्य रत्न को हम खोना नहीं चाहते, अत: तिहाड़ सहित किसी भी प्रदेश की जेल चुन सकती हो। वहां कोई कट्टरपंथी तुम्हें टेढ़ी नजर से देखने की भी जुर्रत नहीं कर पाएगा और एकांत में तुम्हारी लिखाई-पढ़ाई भी ठीक तरह से चलती रहेगी। ठीक है, ना तसलीमा !तसलीमाऽऽऽ! ..क्या कहा तुमने? धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र में बिना किसी अपराध के कैद! अरे, नहीं, नहीं! .. मन से नकारात्मक विचारों का त्याग करो! हां! ..हमारा राष्ट्र धर्मनिरपेक्ष है। हम सभी धर्मो को एक निगाह से देखते हैं, अर्थात 'सर्वधर्म समभाव'। अत: खुदा के बंदों की भावनाओं का खयाल तो करना ही पड़ेगा ना, तसलीमा! वरन् लोग कहेंगे कि भारत सर्वधर्म समभाव के सिद्धांत से विचलित हो गया!
वैसे भी तसलीमा तुम जानती ही हो, 'खुदा महरबान तो गधा पहलवान!' तुमने खुदा के बंदों को ख्वाहमख्वाह नाराज कर दिया। अब देखना! खुदा के बंदे नाराज होंगे, तो भला खुद नाराज क्यों नहीं होगा!
तुम्ही बताओ तसलीमा, क्या जरूरत थी खुदा और उसके बंदों को नाराज करनी की! खुदा जब नाराज है, तो भला तुम पहलवान कैसे हो सकती हो। हमारी बात मानो और एकांतवास में चली जाओ, वहां रह कर खुदा की इबादत करना। खुदा को महरबान करना, खुदा के बंदों को खुश करना। फिर जब खुदा की महरबानियों से गधा पहलवान हो सकता है, तुम तो नेक इनसान हो, तुम्हें पहलवान बनने से कौन रोक सकता है।
तसलीमाऽऽऽ! ..नहीं, तुम उदास न हो! चेहरे पर खिंची इन उदास रेखाओं को सूखे रेत में खिंची लकीरों की तरह झाड़ दो।
हाँ! ..अवश्य! हमने कब मना किया? इस देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है! तभी तो..! तुम्हारी स्वतंत्रता तनिक बाधित हो गई! अब देखो! तुम्हारी अभिव्यक्ति पर उन्होंने अपनी अभिव्यक्ति दे मारी! अब उनकी अभिव्यक्ति की अनदेखी कर देते तो जाहिर सी बात है, हम पर अभिव्यक्ति के मौलिक अधिकार के हनन का आरोप लग जाता! सरकार किसी की भी हो, इतना संगीन इलजाम अपने ऊपर कैसे ले सकती है!
हां! अभिव्यक्ति तुम्हारी भी है! हम इससे कब इनकार करते हैं! किंतु, तसलीमा! तुम्हारी अभिव्यक्ति बांग्लादेश से जुड़ी है और उनकी अभिव्यक्ति इसी देश से। उनकी अभिव्यक्ति तुम्हारी अभिव्यक्ति पर तनिकभारी पड़ती है। वैसे भी तुम्हारी अभिव्यक्ति को यदि हम तरजीह देते तो हमारे मित्र बांग्लादेश की सरकार हम पर आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने की तोहमत जड़ देती। कूटनीतिक संबंध भी तो कोई चीज होते हैं, न तसलीमा!
हां, तसलीमाऽऽऽ! ..तुमने सत्य कहा! हम स्वीकारते हैं, हमारी अदालत स्वीकारती है, हाजिर-नाजिर जान कर तुमने जो भी कहा सत्य कहा! परंतु तुमसे किसने कहा था, सत्य उच्चारण के लिए!
सुनो, तसलीमा! सत्य हमेशा ही अप्रिय होता है और भारतीय संस्कृति में अप्रिय सत्य वाचन निषेध है। हम भी तो इसीलिए कभी सत्य-उच्चारण नहीं करते। असत्य बोलना हमारी प्रकृति नहीं है। सांस्कृतिक-मजबूरी है! अब तुम्ही बताओ तुम्हारा सत्य झुठला कर हमने कौन जुर्म किया? अरे, भाई! अपनी संस्कृति का ही तो अनुसरण किया! कौन नहीं चाहेगा अपनी संस्कृति का पोषण करना?
तसलीमाऽऽऽ! ..तुम नहीं जानती कि धर्म कोई भी हो सभी भावनाओं की खोखली जड़ों पर टिकें हैं। जरा सी आहट होती है, तो भावनाएं आहत हो जाती हैं, धर्म खतरे में पड़ जाते हैं। तुम्हारा सत्य आहत नहीं, भावनाओं को हताहत करने वाला है! हिंसा के लिए हमारी संस्कृति में कोई स्थान नहीं है। हम और हमारी संस्कृति अहिंसावादी है, मगर हमारे दिल में तुम्हारे लिए स्थान है। तुम जहां चाहो वहीं रहो, मगर----!
संपर्क : 9868113044
Wednesday, December 26, 2007
कुछ नए मुहावरे गढ़ो
जमाना बदल गया है, चाल बदल गई। बहुत कुछ पुराना पड़ गया है। पुराना औचित्यहीन हो गया है। नया प्रासंगिक है। कुछ नए मुहावरे गढ़ो। पुराने मुहावरों की लकीर कब तक पीटते रहोगे। कब तक लकीर के फकीर बने रहोगे। पुराने मुहावरों से युक्त साहित्य बासी-बासी से लगता है। गरीबी रेखा के नीचे का बाशिंदा सा लगता है। साहित्य राजनीति नहीं है कि गरीब और गरीबी को हटाने का शोर तो मचाया जाए, मगर स्वहित के कारण उन्हें बरकरार रखा जाए।
राजनीति में गरीबी और गरीब की स्थिति वही है, जैसी मु़गले-आजम में बेचारी अनारकली की थी। किंग अकबर ने उसका जीना मुहाल कर दिया था और प्रिंस सलीम ने उसका मरना। बेचारी कनीज अनारकली जीवन और मृत्यु के बीच फुटबाल बनी रही और फिल्म दी एण्ड हो गई।
अकबर की तरह महंगाई गरीब का जीने नहीं दे रही है और राजनीति उसे मरने नहीं दे रही है, क्योंकि नेता प्रिंस सलीम की तरह गरीब से प्यार करते हैं, क्योंकि गरीब के बूते ही उनकी राजनीति चलता है। लेकिन साहित्य राजनीति नहीं है, अत: अप्रासंगिक गरीब मुहावरों से कैसा मोह। अत: नए मुहावरे गढ़ो साहित्य को गरीबी रेखा से ऊपर लाओ।
थोड़ा विचार कीजिए, 'पानी उतरे चेहरे' अथवा 'चेहरे का पानी उतर गया' जैसे घिसे-पिटे मुहावरों का अब औचित्य क्या? जब समूचा ब्रह्मंाण्ड जल संकट से जूझ रहा है। पृथ्वी के चेहरे से पानी उतर कर रसातल की और गमन कर रहा है। पानी को लेकर चौथे विश्व युद्ध की संभावनाएं व्यक्त की जारी हैं। संकट के ऐसे हालात में पानीदार चेहरों का मिलना, क्या रेगिस्तान में कमल खिलना सा नहीं लगता है?
खुदा-न-खास्ता कहीं पानीदार चेहरा मिल जाए तो उसको रोमन अंदाज में ममी बनाकर सुरक्षित रख देना चाहिए ताकि आने वाली शुष्क संतान देख सके कि कभी इनसानी चेहरे भी पानीदार हुआ करते थे। मेरा मानना है कि जल-संकट के इस जमाने में चेहरे पर पानी चढ़ा कर रखना जमाखोरी है, जन-विरोधी है। वैसे भी अब रहीम दास जी का जमाना तो रहा नहीं कि पानी बिना मोती, मानस, चून के उबरने पर सवालिया निशान लगा हो? इस जमाने में तो वे ही मानस तरक्की करते हैं, जिनके चेहरे पानी उतरे होते हैं। आज के जमाने में चेहरे का पानी तरक्की में बाधक है। फिर कोई क्यों चेहरा पानी से तर रखेगा। तब 'चेहरों का पानी उतरना' अथवा नकारात्मक दृष्टिं से 'पानी उतरे चेहरे' जैसे मुहावरों का औचित्य क्या?
जहाँ तक रही चून (आटा)की बात तो गरीबी में कौन कमबख्त आटा गीला करना चाहेगा? मोती भी अब मानस चेहरों की तरह कहां पानीदार मिलते हैं। नकली पानी चढ़े मोती ही अब सच्चे मोती कह लाते हैं!
मुहावरा 'शर्म से पानी-पानी होना' भी अब दकियानूसी लगता है। पानी-संकट के दौर में मामूली सी बात पर पानी-पानी होकर पानी जाया करने का औचित्य क्या? सीधी-सीधी राष्ट्रीय संपत्ति को नुकसान पहुंचाने का मामला सा लगता है। शर्म तरक्की में बाधक है। बिंदास होना प्रगति का सूचक है। बदले ऐसे हालत में पानीदार मुहावरों का त्यागना ही उचित है। मुहावरा 'चुल्लू भर पानी में डूबना' भी अपनी प्रासंगिकता खोता जा रहा है। शर्म-हया से मुक्त बिंदास जमाने में चुल्लू भर पानी की आवश्यकता क्या रह गई है?
वृद्धि के संदर्भ में सुरसा जी का मुंह, हनुमान जी की पूंछ और द्रोपदी के चीर से संबद्ध मुहावरे मुझे प्राणी-अत्याचार से लगते हैं।
सुरसा जी ने अपने मुंह के विस्तार का कमाल हनुमान जी को समुद्र लांघने के दौरान केवल एक बार दिखलाया था। उसके बाद उसका मुंह फिर कभी वृद्धि को प्राप्त हुआ हो इसका संदर्भ कहीं नहीं मिलता। उसी प्रकार बेचारे हनुमान जी ने रावण दरबार में आसन न मिलने पर ही अपनी पूंछ का कमाल दिखलाया था।
द्रौपदी का चीर भी महंगाई की तरह वृद्धि को प्राप्त नहीं होता रहा था! चीरहरण के समय कृष्ण भगवान की कृपा से चीर का कमाल देखने में आया था। पता नहीं एकबार की घटना के आधार पर मुहावरे क्यों गढ़ दिए गए और तब से आज तक क्यों संदर्भ बे संदर्भ बार-बार उन्हें उछाल कर उन पर अत्याचार किया जा रहा है?
द्रौपदी के चीर का अब औचित्य क्या? आजकल की द्रौपदियों ने तो चीर की पीर का मर्म समझ कर चीर का परित्याग ही कर दिया है। चीर होगा तो चीर की पीर भी होगी! न चीर होगा और न ही किसी दुर्योधन-दु:शासन को चीरहरण करने का कष्ट करना पड़ेगा! जब चीर ही अपना अस्तित्व अपनी प्रासंगिकता खो चुका है, तब द्रौपदी के चीर की लकीर पीटने का औचित्य क्या? मुझे तो ऐसा लगता है कि दुर्योधन ने जिस सद्कार्य को एक बार किया था, आज के साहित्यकार इस मुहावरे का प्रयोग कर उस सद्कार्य को बार-बार दोहरा रहे हैं! इस मुहावरे को उछाल कर आधुनिक द्रौपदियों को पीर पहुंचाने का औचित्य क्या है?
सुरसा जी का मुंह, हनुमान जी की पूंछ और द्रौपदी का चीर एक बार वृद्धि को प्राप्त हुए थे। महंगाई निरंतर वृद्धि को प्राप्त हो रही है, तो क्यों न वृद्धि के संदर्भ में महंगाई को खींचा जाए!
'गधे के सिर से सींग का गायब होना!' भला कोई पूछे, जब गधे के सिर पर कभी सींग रही नहीं तो गायब होने का अर्थ क्या? बेमतलब बेचारे गधे को बदनाम किया जा रहा है। एक निरीह जीव पर अत्याचार किया जा रहा है। पता नहीं क्यों और किसने गायब होने के संदर्भ में औचित्यहीन मुहावरा गढ़ दिया? साहित्यकारों को चाहिए कि बेमतलब के ऐसे सभी मुहावरों के प्रयोग पर प्रतिबंध का फतवा जारी कर दें। उसके स्थान पर 'चोली से दामन गायब' मुहावरा प्रचलन में लाया जा सकता है।
दरअसल घनिष्ठ संबंध दर्शाने के लिए 'चोली दामन के संबंध' को मुहावरे के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। जबकि पारदर्शी इस युग में चोली दामन के मध्य संबंध विच्छेद हो गया है! जब संपूर्ण तन-मन से ही दामन गायब है, तो मुहावरे के जरिए चोली के ऊपर दामन का बोझ डाल कर उसके प्रति यह हिंसा क्यों?
यूं तो चोली भी अब निरंतर संकुचन की दिशा में प्रगति पर है। चोली अब चोली नहीं रही और दामन भी बे-दम है, फिर मुहावरे के रूप में चोली-दामन के संबंध को बदनाम क्यों किया जाए?
गधे को मुक्ति प्रदान कर उसके स्थान पर 'चोली से दामन गायब' मुहावरा ही उचित रहेगा। ऐसा करने से साहित्य को एक नया मुहावरा भी मिल जाएगा और साहित्य में सौंदर्य भी बरकरार रहेगा!
मेरा सुझाव है कि घनिष्ठ संबंधों की व्याख्या करने के लिए 'राजनीति में भ्रष्टाचार' जैसे सटीक संबंधों को मुहावरों के रूप में प्रयुक्त किया जा सकता है। दूध-दूध नीं रहा पानी-संकट के कारण जनमानस त्राहिमान-त्राहिमान कर रहा है, फिर चोली-दामन के संबंध की तरह दूध में पानी का एकाकार औचित्यहीन हो गया है! दूध-पानी-मिश्रण के स्थान पर 'राजनीति में अपराध' के सुदृढ़ मिश्रण को मुहावरे के रूप में प्रयुक्त किया जाना चाहिए! उदाहरण के रूप में, ''आओ, प्रिय! हम-तुम राजनीति में भ्रष्टाचार'' अथवा ''राजनीति में अपराध की तरह'' एकाकार हो जाएं!
अब कोई साहित्यकारों से पूछे कि प्रियतमा के मुखड़ा चांद सा क्यों? उस चांद पर, जहां जीवन की संभावना तक नहीं! जब मैं कहता हूं, 'प्रिय तुम्हारा मुखड़ा चांद सा है!' तो लगता कि वह प्राण -प्रिय नहीं प्राण-प्यासी है! अरे, भाई! 'सेक्सी-सेक्सी' कोई जीवंत उपमा तलाश करो! उदाहरण के रूप में, ''प्रिय! तुम्हारा मुख प्रियंका चोपड़ा, मल्लिका सहरावत, बिपासा बसु, आदि-आदि के मुख जैसा सेक्सी सेक्सी है!'' प्रियतमा भी खुश और प्रियतम् भी!
बॉस के सभी इंक्रीमेंटी वायदे 'नेताई आश्वासन' निकले। कितना प्रगतिशील एवं आधुनिक मुहावरा हो सकता है। साहित्य से बासीपन समाप्त करो। कुछ-कुछ आधुनिक, कुछ प्रगतिशील मुहावरे खोजो। साहित्यकारों, भाषाविदों को मेरे सुझाव पर सहानुभूति पूर्वक विचार करना चाहिए और साहित्य को सेक्सी-सेक्सी बनाने में अपना महत्वपूर्ण योगदान देना चाहिए।
संपर्क : 9868113044
राजनीति में गरीबी और गरीब की स्थिति वही है, जैसी मु़गले-आजम में बेचारी अनारकली की थी। किंग अकबर ने उसका जीना मुहाल कर दिया था और प्रिंस सलीम ने उसका मरना। बेचारी कनीज अनारकली जीवन और मृत्यु के बीच फुटबाल बनी रही और फिल्म दी एण्ड हो गई।
अकबर की तरह महंगाई गरीब का जीने नहीं दे रही है और राजनीति उसे मरने नहीं दे रही है, क्योंकि नेता प्रिंस सलीम की तरह गरीब से प्यार करते हैं, क्योंकि गरीब के बूते ही उनकी राजनीति चलता है। लेकिन साहित्य राजनीति नहीं है, अत: अप्रासंगिक गरीब मुहावरों से कैसा मोह। अत: नए मुहावरे गढ़ो साहित्य को गरीबी रेखा से ऊपर लाओ।
थोड़ा विचार कीजिए, 'पानी उतरे चेहरे' अथवा 'चेहरे का पानी उतर गया' जैसे घिसे-पिटे मुहावरों का अब औचित्य क्या? जब समूचा ब्रह्मंाण्ड जल संकट से जूझ रहा है। पृथ्वी के चेहरे से पानी उतर कर रसातल की और गमन कर रहा है। पानी को लेकर चौथे विश्व युद्ध की संभावनाएं व्यक्त की जारी हैं। संकट के ऐसे हालात में पानीदार चेहरों का मिलना, क्या रेगिस्तान में कमल खिलना सा नहीं लगता है?
खुदा-न-खास्ता कहीं पानीदार चेहरा मिल जाए तो उसको रोमन अंदाज में ममी बनाकर सुरक्षित रख देना चाहिए ताकि आने वाली शुष्क संतान देख सके कि कभी इनसानी चेहरे भी पानीदार हुआ करते थे। मेरा मानना है कि जल-संकट के इस जमाने में चेहरे पर पानी चढ़ा कर रखना जमाखोरी है, जन-विरोधी है। वैसे भी अब रहीम दास जी का जमाना तो रहा नहीं कि पानी बिना मोती, मानस, चून के उबरने पर सवालिया निशान लगा हो? इस जमाने में तो वे ही मानस तरक्की करते हैं, जिनके चेहरे पानी उतरे होते हैं। आज के जमाने में चेहरे का पानी तरक्की में बाधक है। फिर कोई क्यों चेहरा पानी से तर रखेगा। तब 'चेहरों का पानी उतरना' अथवा नकारात्मक दृष्टिं से 'पानी उतरे चेहरे' जैसे मुहावरों का औचित्य क्या?
जहाँ तक रही चून (आटा)की बात तो गरीबी में कौन कमबख्त आटा गीला करना चाहेगा? मोती भी अब मानस चेहरों की तरह कहां पानीदार मिलते हैं। नकली पानी चढ़े मोती ही अब सच्चे मोती कह लाते हैं!
मुहावरा 'शर्म से पानी-पानी होना' भी अब दकियानूसी लगता है। पानी-संकट के दौर में मामूली सी बात पर पानी-पानी होकर पानी जाया करने का औचित्य क्या? सीधी-सीधी राष्ट्रीय संपत्ति को नुकसान पहुंचाने का मामला सा लगता है। शर्म तरक्की में बाधक है। बिंदास होना प्रगति का सूचक है। बदले ऐसे हालत में पानीदार मुहावरों का त्यागना ही उचित है। मुहावरा 'चुल्लू भर पानी में डूबना' भी अपनी प्रासंगिकता खोता जा रहा है। शर्म-हया से मुक्त बिंदास जमाने में चुल्लू भर पानी की आवश्यकता क्या रह गई है?
वृद्धि के संदर्भ में सुरसा जी का मुंह, हनुमान जी की पूंछ और द्रोपदी के चीर से संबद्ध मुहावरे मुझे प्राणी-अत्याचार से लगते हैं।
सुरसा जी ने अपने मुंह के विस्तार का कमाल हनुमान जी को समुद्र लांघने के दौरान केवल एक बार दिखलाया था। उसके बाद उसका मुंह फिर कभी वृद्धि को प्राप्त हुआ हो इसका संदर्भ कहीं नहीं मिलता। उसी प्रकार बेचारे हनुमान जी ने रावण दरबार में आसन न मिलने पर ही अपनी पूंछ का कमाल दिखलाया था।
द्रौपदी का चीर भी महंगाई की तरह वृद्धि को प्राप्त नहीं होता रहा था! चीरहरण के समय कृष्ण भगवान की कृपा से चीर का कमाल देखने में आया था। पता नहीं एकबार की घटना के आधार पर मुहावरे क्यों गढ़ दिए गए और तब से आज तक क्यों संदर्भ बे संदर्भ बार-बार उन्हें उछाल कर उन पर अत्याचार किया जा रहा है?
द्रौपदी के चीर का अब औचित्य क्या? आजकल की द्रौपदियों ने तो चीर की पीर का मर्म समझ कर चीर का परित्याग ही कर दिया है। चीर होगा तो चीर की पीर भी होगी! न चीर होगा और न ही किसी दुर्योधन-दु:शासन को चीरहरण करने का कष्ट करना पड़ेगा! जब चीर ही अपना अस्तित्व अपनी प्रासंगिकता खो चुका है, तब द्रौपदी के चीर की लकीर पीटने का औचित्य क्या? मुझे तो ऐसा लगता है कि दुर्योधन ने जिस सद्कार्य को एक बार किया था, आज के साहित्यकार इस मुहावरे का प्रयोग कर उस सद्कार्य को बार-बार दोहरा रहे हैं! इस मुहावरे को उछाल कर आधुनिक द्रौपदियों को पीर पहुंचाने का औचित्य क्या है?
सुरसा जी का मुंह, हनुमान जी की पूंछ और द्रौपदी का चीर एक बार वृद्धि को प्राप्त हुए थे। महंगाई निरंतर वृद्धि को प्राप्त हो रही है, तो क्यों न वृद्धि के संदर्भ में महंगाई को खींचा जाए!
'गधे के सिर से सींग का गायब होना!' भला कोई पूछे, जब गधे के सिर पर कभी सींग रही नहीं तो गायब होने का अर्थ क्या? बेमतलब बेचारे गधे को बदनाम किया जा रहा है। एक निरीह जीव पर अत्याचार किया जा रहा है। पता नहीं क्यों और किसने गायब होने के संदर्भ में औचित्यहीन मुहावरा गढ़ दिया? साहित्यकारों को चाहिए कि बेमतलब के ऐसे सभी मुहावरों के प्रयोग पर प्रतिबंध का फतवा जारी कर दें। उसके स्थान पर 'चोली से दामन गायब' मुहावरा प्रचलन में लाया जा सकता है।
दरअसल घनिष्ठ संबंध दर्शाने के लिए 'चोली दामन के संबंध' को मुहावरे के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। जबकि पारदर्शी इस युग में चोली दामन के मध्य संबंध विच्छेद हो गया है! जब संपूर्ण तन-मन से ही दामन गायब है, तो मुहावरे के जरिए चोली के ऊपर दामन का बोझ डाल कर उसके प्रति यह हिंसा क्यों?
यूं तो चोली भी अब निरंतर संकुचन की दिशा में प्रगति पर है। चोली अब चोली नहीं रही और दामन भी बे-दम है, फिर मुहावरे के रूप में चोली-दामन के संबंध को बदनाम क्यों किया जाए?
गधे को मुक्ति प्रदान कर उसके स्थान पर 'चोली से दामन गायब' मुहावरा ही उचित रहेगा। ऐसा करने से साहित्य को एक नया मुहावरा भी मिल जाएगा और साहित्य में सौंदर्य भी बरकरार रहेगा!
मेरा सुझाव है कि घनिष्ठ संबंधों की व्याख्या करने के लिए 'राजनीति में भ्रष्टाचार' जैसे सटीक संबंधों को मुहावरों के रूप में प्रयुक्त किया जा सकता है। दूध-दूध नीं रहा पानी-संकट के कारण जनमानस त्राहिमान-त्राहिमान कर रहा है, फिर चोली-दामन के संबंध की तरह दूध में पानी का एकाकार औचित्यहीन हो गया है! दूध-पानी-मिश्रण के स्थान पर 'राजनीति में अपराध' के सुदृढ़ मिश्रण को मुहावरे के रूप में प्रयुक्त किया जाना चाहिए! उदाहरण के रूप में, ''आओ, प्रिय! हम-तुम राजनीति में भ्रष्टाचार'' अथवा ''राजनीति में अपराध की तरह'' एकाकार हो जाएं!
अब कोई साहित्यकारों से पूछे कि प्रियतमा के मुखड़ा चांद सा क्यों? उस चांद पर, जहां जीवन की संभावना तक नहीं! जब मैं कहता हूं, 'प्रिय तुम्हारा मुखड़ा चांद सा है!' तो लगता कि वह प्राण -प्रिय नहीं प्राण-प्यासी है! अरे, भाई! 'सेक्सी-सेक्सी' कोई जीवंत उपमा तलाश करो! उदाहरण के रूप में, ''प्रिय! तुम्हारा मुख प्रियंका चोपड़ा, मल्लिका सहरावत, बिपासा बसु, आदि-आदि के मुख जैसा सेक्सी सेक्सी है!'' प्रियतमा भी खुश और प्रियतम् भी!
बॉस के सभी इंक्रीमेंटी वायदे 'नेताई आश्वासन' निकले। कितना प्रगतिशील एवं आधुनिक मुहावरा हो सकता है। साहित्य से बासीपन समाप्त करो। कुछ-कुछ आधुनिक, कुछ प्रगतिशील मुहावरे खोजो। साहित्यकारों, भाषाविदों को मेरे सुझाव पर सहानुभूति पूर्वक विचार करना चाहिए और साहित्य को सेक्सी-सेक्सी बनाने में अपना महत्वपूर्ण योगदान देना चाहिए।
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Monday, December 24, 2007
मौत का सौदागर


गुजरात में मोदी भइया जीत गए! ..बधाई!! मोदी भइया को नहीं, सोनिया मइया और राहुल भइया को! दोनों ने जी तोड़ मेहनत की थी! मेहनत रंग लाई, मोदी भइया ने विजय पाई! सोनिया-परिवार यदि मेहनत न करता तो इस बार मोदी भइया के गले में हार का हार ही पड़ने की संभावना थी। मोदी जी को भी सोनिया -परिवार का शुक्रगुजार होना चाहिए और उन्हें धन्यवाद ज्ञापित करना चाहिए!
केवल मोदी भइया को विजयी बनाने का श्रेय ही सोनिया मइया के खाते में नहीं जाता, संसदीय शब्दकोष को शब्द-संपन्न करने का श्रेय भी इस बार उन्हीं के खाते में जाता है! सोनिया मइया ने सदियों से उपेक्षित शब्दों को संसदीय सम्मान दिया है। मसलन बेईमान, झूठा और मौत का सौदागर आदि आदि। ये ऐसे बदकिस्मत शब्द थे, जिन्हें अभी तक संसदीय शब्दकोष में शामिल होने का सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ था। बस बेचारे गली-मोहल्लों में ही भटकते फिर रहे थे। सोनिया मइया के प्रयास से उपेक्षित इन शब्दों को तो सम्मान प्राप्त हुआ ही है। संसदीय शब्दकोष की भी गरिमा बढ़ी है। इससे पूर्व ऐतिहासिक और सामाजिक मूल्यों का प्रतिनिधित्व करने वाले शिखण्डी, दलाल व मसखरा जैसे शब्दों को संसदीय शब्दकोष में प्रवेश दिलाकर उसकी गरिमा में चार नहीं दर्जनों चांद जड़े गए थे।
प्रचार नकारात्मक और सकारात्मक प्रचार-प्रचार होता है। नकारात्मक प्रचार सकारात्मक कहीं ज्यादा प्रभावी होता है। 'बदनाम हुए तो क्या नाम न होगा!' नकारात्मक प्रचार का यह मूलमंत्र है। जो व्यक्ति नकारात्मक प्रचार के इस मूलमंत्र को मोदी भइया की तरह आत्मसात कर लेता है, मजबूरन ही सही विजय श्री उसी का वरण करती है। मैदान चुनाव का हो या युद्ध का येन केन प्रकारेण विजय प्राप्त होनी चाहिए। गुजरात चुनाव में वही हुआ भी। हो सकता है, जब सोनिया मइया ने 'मौत का सौदागर' जैसे मुहावरों का प्रयोग किया था, तब मोदी भइया को उसका स्वाद नीम चढ़े करेले सा लगा होगा, मगर अब..! और अब मधुमेह की व्याधि से मुक्ति मिल गई ना। मधु-वर्ष संपन्न करने के लिए पूरे पांच वर्ष की अनुमति मिल गई ना! सोनिया मइया मौत के सौदागर का रहस्य सार्वजनिक न करती तो गुजरात की जनता मौत के सौदागर को पूरे पांच वर्ष राज्य करने का लाइसेंस न देती।
इस बार संसदीय शब्दकोष को शब्द-संपन्न करने से मोदी भइया तनिक चूक गए और सोनिया मइया सफल हो गई। सोनिया जी इस देश की सफलतम् नेत्रियों में से एक हैं! मोदी जी इस बार गच्चा क्यों खा गए? यह भी एक विचारणीय प्रश्न है। दरअसल मोदी जी कमल के समान कोमल भावना से संपन्न भाजपा-नेता हैं। भाजपाई भावनाएं छुईमुई के पौधे से भी ज्यादा छुईमुई होती हैं, संवेदनशील होती हैं। छुईमुई के पौधे की भावनाएं तर्जनी देखकर आहत होती हैं, किंतु भाजपा की कोमल भावनाएं तर्जनी के विचार-मात्र से आहत हो जाती हैं। सूरज बादलों के साथ लुकाछिपी का खेल खेलता है और कमल यह सोचकर मुरझा जाता है कि सूरज डूब गया। ऐसा ही हुआ मोदी जी के साथ।
मोदी भइया अब तो उदासी का त्याग करो। मुरझाए कमल को सूरज के दर्शन कराओ। देश तुम्हें याद रखेगा, मान जाओ! हम जानते हैं, 'देश मुझे याद न रखे' मोदी भइया का यह कहना भी कोमल भावना आहत होने की ओर संकेत करता है। मेरे जैसा टटपूंजिया भी जब ऐसी सद्इच्छा रखता है कि यह देश मुझे याद करे, तब यह कैसे संभव है कि मोदी जी इसके इच्छुक न हों। भावनाएं जब आहत हो जाती हैं तो कमजोर मन की इच्छाएं भी निराशा के वशीभूत अनिच्छा में तबदील हो जाती हैं। मोदी जी की आहत भावनाओं पर मरहम लगाने के उद्देश्य से मैं कहना चाहूंगा, निराश न हों, क्योंकि देश कृतघ्न प्रकृति के नहीं हुआ करते हैं। यह देश गांधी को याद करता है तो गौडसे को भी नहीं भूला है। उसे राम याद है तो रावण भी उसकी स्मृति में शेष है। देश कृष्ण का स्मरण करता है तो कंस को भी नहीं भूला है। हिटलर अभी तक विश्व-स्मृति में है। नेपोलियन को कौन भूला है। मुसोलिन को भी उसके देशवासी याद करते हैं। यह बात अलग है कि इन महानुभावों का स्मरण कर देश के तंत्रिकातंत्र में कंपन उत्पन्न हो जाता है, किंतु देश की स्मृति में आज भी वे शेष हैं। व्यक्ति अपने सद्कर्मो के कारण याद किये जाते हैं और सद्कर्मो का खाता आपका भी चकाचक है। अत: मोदी जी चिंता का त्याग करो, देश तुम्हें याद रखेगा। यह देश कृतघ्न नहीं है! तुम भी कृतघ्नता का त्याग करो और सोनिया मइया के नाम बधाई संदेश ई मेल कर दो!
फोन-9868113044
Saturday, December 22, 2007
देश पै घोड़े-गधे राज करैं सै
बाबा की बारात रथ में गई थी। साथ में रौनक बढ़ाने के लिए हाथी, घोड़े और सुंदर-सुंदर बैल और मनोरंजन के लिए नाचने वाली रण्डियां। जमाना बदला बाप की बारात रथ में नहीं बैलगाड़ी में गई। हाथी तो नहीं मगर बैल व घोड़ों ने अवश्य बारात की शोभा चकाचक की। मनोरंजन के लिए नौटंकी कंपनी साथ ले जाई गई थी। जमाने ने फिर करवट ली खुद की बारात में न हाथी थे, न बैल, न घोड़े। मनोरंजन के परंपरागत साधन भी नहीं थे, किंतु इनके स्थान पर नेता व नेतानियों की फौज अवश्य बारात की शोभा में एक दर्जन चांद जड़ रही थी। बैलगाड़ी व रथ के स्थान पर बारात के आवागमन के लिए हैलीकॉपटर का सदुपयोग किया गया था।
लड़के का बाबा तो पूर्व में ही पुत्रों को अंतिम-संस्कार संपन्न करने का सुअवसर प्रदान कर मोक्ष को प्राप्त हो गया था, किंतु लड़की के बाबा परिवार वालों को इस पुण्य कर्म का अवसर प्रदान करने में कोताही बरत रहा था। उसके पुत्र-पौत्र तीक्ष्ण इच्छा के साथ उस दिन के इंतजार में थे, जिस दिन बुढ़ऊ का क्लांत हृदय शांत हो और उन्हें भी अपने पूजनीय के कपाल पर वार करने का पवित्र अवसर प्रदान हो जाए। खैर ऐसा अवसर प्रदान करना न बुढ़ऊ के हाथ में था और न ही उसके शुभचिंतकों के। यह सभी विधि के हाथ में है। हो सकता है कि क्लांत हृदय को शांति प्रदान करने का पुण्य कार्य भी विधाता शुभचिंतकों से ही करा दे। कहा जाता है कि शुभचिंतकों के हाथों मृत्यु का पुण्य कर्म संपन्न होने से स्वर्ग-संसद के लिए मृतक का चुनाव तो निर्विरोध हो ही जाता है। पुण्यकर्म संपन्न करने वाले शुभचिंतकों को भी कई जन्मों के पुण्य अग्रिम रूप में एक मुश्त प्राप्त हो जाते हैं।
बहरहाल लड़की का बाबा अभी तक इसी नश्वर संसार का बाशिंदा है। लड़की के बाबा ने पौत्री की बारात देखी और माथा पकड़ कर बैठ गया। उसने मन ही मन लड़की के ससुर को कोसा और बिरादरी से मुंह छिपाने के लिए कोठे में मुंह देकर बैठ गया। शोक की उस अवस्था में भी बुढ़ऊ आखिर कब तक रहता। उसे पता था कि उसका भाग्य कैकेयी के समान नहीं है कि कोई दशरथ आएगा और कोप भवन में विश्राम करने का कारण उससे पूछेगा। फिर उसके वचन-पूर्ण करेगा और कोप भवन के कोप से उसे निजात दिला देगा।
क्रोध में रंग-बिरंगा बुढ़ऊ कोठे से बाहर आया और लड़की के बाप को टेरने लगा- ओ राम्मे, राम्मे ओ-ओ राम्मे! भुनभुनाता राम्मे बुढ़ऊ के पास आया और बोला- के आफत आग्गी बाप्पू? चों मक्का के खेत के तोत्ते से उड़ा रा सै? दीख ना रहा दरवाज्जे पै छोरी की बरात खड़ी सै!
बुढ़ऊ बापत्वाधिकार के साथ बोला- मैं तोत्ते ना उड़ारा! म्हारे ही तोत्ते तो तेरे समधी नै उड़ दिए। तोते की तरह आंख घुमाकर राम्मो बोला- के बिध बाप्पू? समधी नै के खता कर दी तेरी साण मै? बुढ़ऊ झुंझलाया- तेरी चारो ही फूट री कै, दिक्ख ना?
शतुरमुर्ग की तरह बुढ़ऊ ने गरदन ऊंची की और बारात की ओर देख कर बोला- राम्मो पहलै तै जे बता कि छोरी की सगाई कित कर आया? तै नै वाके खेत-खलिहान भी ना देखा के? बला टालने के लहजे में राम्मो प्यार से बोला- बाप्पू! फिर वा ई बकबक ..अर बता तै समधी ने के तेरी खाट के निच्चे आग रख दी?
बुढ़ऊ की आंखें भर आई। राम्मो भी समझ गया कि बापू का मरम कुछ ज्यादा ही दरदीला हो रहा है। बापू को ढांढस बंधाते हुए वह बोला- तू तो खम्मोखां आंसू टपका रा सै। बतात्ता तो है नी के बात हुई, बता चल बता!
राम्मू तू देखना रिया इस उजड़ी-उजड़ी बरात नै। बरात मै एक भी तो हाथी, घोड़ा, बैल ना! बुढ़ऊ ने नथनों से टपकते पानी को रोकने के लिए नाक हाथ से रगड़ी और फिर बोला- अर हाथ, बैल घोड़े लावे की हैसियत ना थी तो गधा ही ले आता! बुढ़ऊ ने नाक से सुड़क-सुड़क की आवाज की और आगे बोला- गधा भी ना ला सकै था तो गधे की मरी पूंछ ही ले आत्ता! अर दिके कम सै कम बिरादरी में हंसाई तै ना होत्ती। बुढ़ऊ का दर्द केवल इतना ही नहीं था। उसे इस बात का भी रंज था कि मनोरंजन के लिए भी बारात के साथ कोई प्रबंध नहीं है। अत: वह उसने आगे कहा- राम्मो! मैनै अपनी जिंदगानी में ऐसी उजड़ी बरात पहलै कभी ना देक्खी। अरै हम तेरी बरात मै रण्डी ना ले जा सके तो नौटंकी वाले कंपनी तै ले गिए थे। वा तो कुछ भी ना लाया। बैरंग ही बरात ले आया सै! वा कै बिलकुल ही टोट्टा ब्यारा सै तो नाच वे के लाईया अपनी मां नै ई ले आत्ता।
राम्मू बुढ़ऊ के दर्द से वाकिफ हो गया। उसका मन हंसने को किया पर हंसी होठों पर आने से पहले ही रोक ली और बोला- बाप्पू तू चिंता ना कर। समधी अ अभी बुला के तेरे सामने ही जुत्ते मारूं! राम्मो नै समधी को बुलवाया और आंख मार कर उसे बापू के मर्म की कथा सुनाई। कथा सुन कर समधी हंसी नहीं रोक पाया और वह सहज भाव से बोला- चौं रे छोरी के बाब्बा, हमने के बिध तरी जग हंसाई करा दी। देख रिया नी, इबजा हाथी-घोड़न का जमाना ना रिहा! ना अब बरात मै रण्डी-भड़वे चलै सै। बाब्बा इबजा नेता-नेतानियों का जमाना सै। सो तेरी पोत्ती की बरात मै एक दर्जन नेता-नेत्तानी आई सै!
छोरी के ससुर की बात सुन अचंभे से बुढ़ऊ का मुंह फटा रह गया। फिर फटे मुंह और रुंधे गले से वह बोला- के! तेरे कहवे का मतलब जै है तै, इबजा हाथी, बैल घोड़े-गधों की जगह बरात में नेता चलन लगे अर नाचने वालियों की जगह नेतानी! मुस्कराते हुए लड़की का ससुर बोला- हाँ ताऊ! बुढ़ऊ की हंसी छूट गई और हंसते-हंसते बोला- ठीक कहवै है छोरा! या ई लईयां देस का भट्टा बैठ रि या सै! देस पै घोड़े-गधे अर नचनियां जो राज करैं सै।
संपर्क- 9868113044
लड़के का बाबा तो पूर्व में ही पुत्रों को अंतिम-संस्कार संपन्न करने का सुअवसर प्रदान कर मोक्ष को प्राप्त हो गया था, किंतु लड़की के बाबा परिवार वालों को इस पुण्य कर्म का अवसर प्रदान करने में कोताही बरत रहा था। उसके पुत्र-पौत्र तीक्ष्ण इच्छा के साथ उस दिन के इंतजार में थे, जिस दिन बुढ़ऊ का क्लांत हृदय शांत हो और उन्हें भी अपने पूजनीय के कपाल पर वार करने का पवित्र अवसर प्रदान हो जाए। खैर ऐसा अवसर प्रदान करना न बुढ़ऊ के हाथ में था और न ही उसके शुभचिंतकों के। यह सभी विधि के हाथ में है। हो सकता है कि क्लांत हृदय को शांति प्रदान करने का पुण्य कार्य भी विधाता शुभचिंतकों से ही करा दे। कहा जाता है कि शुभचिंतकों के हाथों मृत्यु का पुण्य कर्म संपन्न होने से स्वर्ग-संसद के लिए मृतक का चुनाव तो निर्विरोध हो ही जाता है। पुण्यकर्म संपन्न करने वाले शुभचिंतकों को भी कई जन्मों के पुण्य अग्रिम रूप में एक मुश्त प्राप्त हो जाते हैं।
बहरहाल लड़की का बाबा अभी तक इसी नश्वर संसार का बाशिंदा है। लड़की के बाबा ने पौत्री की बारात देखी और माथा पकड़ कर बैठ गया। उसने मन ही मन लड़की के ससुर को कोसा और बिरादरी से मुंह छिपाने के लिए कोठे में मुंह देकर बैठ गया। शोक की उस अवस्था में भी बुढ़ऊ आखिर कब तक रहता। उसे पता था कि उसका भाग्य कैकेयी के समान नहीं है कि कोई दशरथ आएगा और कोप भवन में विश्राम करने का कारण उससे पूछेगा। फिर उसके वचन-पूर्ण करेगा और कोप भवन के कोप से उसे निजात दिला देगा।
क्रोध में रंग-बिरंगा बुढ़ऊ कोठे से बाहर आया और लड़की के बाप को टेरने लगा- ओ राम्मे, राम्मे ओ-ओ राम्मे! भुनभुनाता राम्मे बुढ़ऊ के पास आया और बोला- के आफत आग्गी बाप्पू? चों मक्का के खेत के तोत्ते से उड़ा रा सै? दीख ना रहा दरवाज्जे पै छोरी की बरात खड़ी सै!
बुढ़ऊ बापत्वाधिकार के साथ बोला- मैं तोत्ते ना उड़ारा! म्हारे ही तोत्ते तो तेरे समधी नै उड़ दिए। तोते की तरह आंख घुमाकर राम्मो बोला- के बिध बाप्पू? समधी नै के खता कर दी तेरी साण मै? बुढ़ऊ झुंझलाया- तेरी चारो ही फूट री कै, दिक्ख ना?
शतुरमुर्ग की तरह बुढ़ऊ ने गरदन ऊंची की और बारात की ओर देख कर बोला- राम्मो पहलै तै जे बता कि छोरी की सगाई कित कर आया? तै नै वाके खेत-खलिहान भी ना देखा के? बला टालने के लहजे में राम्मो प्यार से बोला- बाप्पू! फिर वा ई बकबक ..अर बता तै समधी ने के तेरी खाट के निच्चे आग रख दी?
बुढ़ऊ की आंखें भर आई। राम्मो भी समझ गया कि बापू का मरम कुछ ज्यादा ही दरदीला हो रहा है। बापू को ढांढस बंधाते हुए वह बोला- तू तो खम्मोखां आंसू टपका रा सै। बतात्ता तो है नी के बात हुई, बता चल बता!
राम्मू तू देखना रिया इस उजड़ी-उजड़ी बरात नै। बरात मै एक भी तो हाथी, घोड़ा, बैल ना! बुढ़ऊ ने नथनों से टपकते पानी को रोकने के लिए नाक हाथ से रगड़ी और फिर बोला- अर हाथ, बैल घोड़े लावे की हैसियत ना थी तो गधा ही ले आता! बुढ़ऊ ने नाक से सुड़क-सुड़क की आवाज की और आगे बोला- गधा भी ना ला सकै था तो गधे की मरी पूंछ ही ले आत्ता! अर दिके कम सै कम बिरादरी में हंसाई तै ना होत्ती। बुढ़ऊ का दर्द केवल इतना ही नहीं था। उसे इस बात का भी रंज था कि मनोरंजन के लिए भी बारात के साथ कोई प्रबंध नहीं है। अत: वह उसने आगे कहा- राम्मो! मैनै अपनी जिंदगानी में ऐसी उजड़ी बरात पहलै कभी ना देक्खी। अरै हम तेरी बरात मै रण्डी ना ले जा सके तो नौटंकी वाले कंपनी तै ले गिए थे। वा तो कुछ भी ना लाया। बैरंग ही बरात ले आया सै! वा कै बिलकुल ही टोट्टा ब्यारा सै तो नाच वे के लाईया अपनी मां नै ई ले आत्ता।
राम्मू बुढ़ऊ के दर्द से वाकिफ हो गया। उसका मन हंसने को किया पर हंसी होठों पर आने से पहले ही रोक ली और बोला- बाप्पू तू चिंता ना कर। समधी अ अभी बुला के तेरे सामने ही जुत्ते मारूं! राम्मो नै समधी को बुलवाया और आंख मार कर उसे बापू के मर्म की कथा सुनाई। कथा सुन कर समधी हंसी नहीं रोक पाया और वह सहज भाव से बोला- चौं रे छोरी के बाब्बा, हमने के बिध तरी जग हंसाई करा दी। देख रिया नी, इबजा हाथी-घोड़न का जमाना ना रिहा! ना अब बरात मै रण्डी-भड़वे चलै सै। बाब्बा इबजा नेता-नेतानियों का जमाना सै। सो तेरी पोत्ती की बरात मै एक दर्जन नेता-नेत्तानी आई सै!
छोरी के ससुर की बात सुन अचंभे से बुढ़ऊ का मुंह फटा रह गया। फिर फटे मुंह और रुंधे गले से वह बोला- के! तेरे कहवे का मतलब जै है तै, इबजा हाथी, बैल घोड़े-गधों की जगह बरात में नेता चलन लगे अर नाचने वालियों की जगह नेतानी! मुस्कराते हुए लड़की का ससुर बोला- हाँ ताऊ! बुढ़ऊ की हंसी छूट गई और हंसते-हंसते बोला- ठीक कहवै है छोरा! या ई लईयां देस का भट्टा बैठ रि या सै! देस पै घोड़े-गधे अर नचनियां जो राज करैं सै।
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Thursday, December 20, 2007
धर्म मार्ग ही उत्तम अर्थ मार्ग
प्रभाव :- मेरे यह व्यंग्य पढ़ कर न जान कितने सज्जनों ने अर्थ की खातिर धर्म मार्ग अपनाया होगा। कांग्रेस के एक नेता तो मेरे संज्ञान में हैं। व्यंग्य पढ़ कर उन्होंने मुझे फोन पर बधाई दी थी। उसके बाद पता चला कि कुर्ता-पायजामे का त्याग कर नाम के आगे आचार्यश्री लगाया और साधुओं का बाना धारण कर प्रवचन देना शुरू कर दिया है। आज उनके पास दौलत भी है और शौहरत भी। अब बड़े-बड़े नेता आचार्यश्री के पांव छू कर आशीर्वाद लेते हैं। धर्म भी चकाचक, अर्थ भी चकाचक और नेतागीरी भी।उसने कहां-कहां धक्के नहीं खाए। कौन-कौन से ब्रांड के पापड़ नहीं बेले, मगर अर्थ प्राप्ति का सुगम व सुरक्षित मार्ग प्राप्त करने में वह असफल ही रहा। दरअसल वह कोई सस्ता, सुंदर और टिकाऊ रास्ता चाहता था। ऐसा रास्ता जिसमें अर्थ तो बरसे मगर छप्पर सुरक्षित रहे। काजल की कोठरी से काजल तो समेटे मगर कुर्ता चमकता रहे। इसके लिए उसने सत्यनारायण की कथा भी नियमित रूप से कराई। लक्ष्मी को प्रसन्न करने के उद्देश्य से उल्लुओं को भी खूब चबेना चबाया। अर्थ प्राप्ति हुई भी हुई, मगर दाग ने पीछा नहीं छोड़ा।
अर्थ प्राप्ति के सुगम व सुरक्षित रास्ते के रूप में उसने पत्रकारिता के पेशे में भाग्य अजमाया। नेताओं की परिक्रमा की उनके लिए दलाली की। अर्थ भी खूब बटोरा, मगर संतोष की प्राप्ति नहीं हुई। एक अज्ञात भय से भयभीत रहा। दलाली करते-करते पत्रकारिता का त्याग कर समाज सेवकी का पेशा अख्तियार किया। वहां भी सेवा की मेवा खूब बटोरी, मगर अज्ञात भय ने वहीं भी पीछा नहीं छोड़ा।
समाज सेवकी से उसने राजनीति के बाजार में प्रवेश किया और नेता बन बैठा। अर्थ की धारा उसकी तरफ और भी तीव्र गति से प्रवाहित होने लगी। मगर कभी पक्ष तो कभी विपक्ष और कभी स्टिंग ऑपरेशन तो, कभी सीबीआई उसे पीछा करते दिखलाई देते रहे।
दाग से कैसे पीछा छुड़ाए, यह प्रश्न बराबर उसे विचलित करता रहा। एक के बाद एक असफलता से हताश कभी-कभी वह सोचता, 'पता नहीं अंधे के हाथ बटेर कैसे लग जाती है? लगती भी है या बिना लगे ही मार्केटिंग कर दी जाती है। मार्केटिंग का फण्डा है ही कुछ ऐसा अपने-अपने अंधों के हाथ बटेर थमा कर उपलब्धि रिपोर्ट प्रस्तुत कर दी जाती हैं।'
हैरान-परेशान, परेशान मुन्नालाल ने एक दिन एक ही झटके में कुर्ता-पयजामा उतार खूंटी पर टांग दिया और राजनीति के बाजार से अपना कारोबार समेट सुरक्षित किसी नए व्यवसाय की तलाश में लेफ्ट-राइट शुरू कर दी। दोस्तों के सामने अपनी पीड़ा रखी, जन-परिवारजनों के साथ सलाह-मश्विरा किया और अंतत: स्वामी अभेदानंद की शरण में जाने का निश्चय किया। अध्यात्म में उसकी रुचि बालकाल से ही थी, इसलिए उसने सोचा अर्थ प्राप्ति का न सही धर्म मार्ग ही सही। उसका ऐसा फैसला करना स्वाभाविक भी था, क्योंकि एक सीमा तक चूहों का भक्षण करने के बाद परलोक सुधारने के मंशा से बिल्लियां अक्सर तीर्थ यात्रा के लिए निकल पड़ती हैं।
स्वामी अभेदानंद के समक्ष वह चरणागत् हुआ और उद्देश्य निवेदन किया। राजनीति को धर्ममय बनाए रखने के लिए धर्म गुरु व राजनीतिज्ञों के बीच सांठगांठ आवश्यक है। इसी धर्म का निर्वाह करते हुए स्वामीजी ने मुन्नालाल को शिष्य के रूप में ग्रहण कर पवित्र आशीर्वाद से धन्य किया। मुन्नालाल भी पूर्ण समर्पण भाव से उनकी सेवा में लग गया।
उसकी सेवा से प्रसन्न हो कर एक दिन स्वामीजी बोले, 'पुत्र मुन्नालाल! तुम्हारे प्रश्न, तुम्हारी शंकाएं ऐसे छद्ंम ज्ञानियों के समान हैं, जो ज्ञान विहीन होते हुए भी ज्ञानी कहलाए जाते हैं, परंतु तुम्हारे अंतर्मन में धर्म व अर्थ दोनों के बीज सुषुप्त अवस्था में विद्यमान हैं। मैं तुम्हारे बुद्धि चातुर्य और सेवा दोनों से प्रसन्न हूं, अत: तुम्हें अर्थ प्राप्ति का सुगम व सुरक्षित मार्ग बतलाता हूं। पुत्र! अर्थ प्राप्ति का केवल मात्र एक ही सुगम व सुरक्षित मार्ग है और वह है, धर्म मार्ग। केवल धर्म मार्ग ही बिना किसी अवरोध के सीधा कुबेर के आश्रम की ओर जाता है।
स्वामीजी के ऐसे वचन सुन मुन्नालाल हैरान था, उसे लगा कि वह आसमान से गिरकर खजूर पर लटक गया है और स्वामीजी उसे खजूर के पत्ते पर ही दंड-बैठक करने की सलाह दे रहें हैं। वह आश्चर्य व्यक्त करते हुए बोला, ''स्वामीजी, धर्म मार्ग और अर्थ! धर्म मार्ग तो मनुष्य को मोक्ष प्राप्ति की ओर ले जाता है। अर्थ तो धर्म मार्ग में अवरोध उत्पन्न करता है। पुरुषार्थ चतुष्टय सिद्धांत भी कुछ ऐसा ही कहता है।''
मुन्नालाल के वचन सुन स्वामीजी मुस्करा दिए और बोले, ''वत्स! अभी तक तुम किसी योग्य गुरु के पल्ले नहीं पड़े हो, तभी ऐसे तुच्छ विचार रखते हो। मोक्ष की ओर नहीं पुत्र! धर्म मार्ग अर्थ की ही ओर जाता है। पुरुषार्थ चतुष्टय का सिद्धांत भी यही प्रतिपादित करता है। अपने मस्तिष्क के साफ्टवेयर को तनिक एक्टिवेट करो और सोचो पुरुषार्थ चतुष्टय सिद्धांत (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) में धर्म के बाद क्या अर्थ नहीं आता? अरे, मूर्ख मोक्ष तो उपरांत में आता है। पुरुषार्थ चतुष्टय सिद्धांत भी यही कहता है, धर्म मार्ग अपना कर अर्थ प्राप्त करो और अर्थ तुम्हें काम व मोक्ष प्रदान करेगा।''
मुन्नालाल बोला, ''मगर गुरुजी! धर्म मार्ग अर्थ प्राप्ति का सुगम व सुरक्षित मार्ग कैसे है?''
स्वामीजी बोले, '' आभामंडल! पुत्र आभामंडल, इसी आभामंडल के कारण कुबेर हमारे यहां पानी भरता है और उसी
के प्रभाव से समूचा जनतंत्र हमारे समक्ष नतमस्तक है। बडे़-बडे़ पूर्व, भूतपूर्व व अभूतपूर्व मंत्रियों से लेकर संतरी तक हमारे समक्ष चरणागत्ं हैं। फिर असुरक्षा का प्रश्न कहां? आभामंडल लक्ष्मण रेखा है, कोई भी दाग उसे लांघ नहीं पाएगा। न आयकर, न सेवाकर, न व्यवसाय कर। बस धर्म मार्ग पर चल और दोनों कर से अर्थ एकत्रित कर। जाओ पुत्र धर्म मार्ग का अनुसरण करो, उसे ही अपना व्यवसाय बनाओ और इस व्यवसाय में 'कॉर्परेट कल्चर' का समावेश करते हुए कुबेर के खजाने का निर्भय पूर्वक उपभोग करो।'
संपर्क – 9868113044
Wednesday, December 19, 2007
लाइलाज बीमारी बासिज्म

जर्मन शैपर्ड पिल्लू सिंह मुन्नालाल के परिवार का एक प्रमुख सदस्य है। मुन्नालाल दरअसल जीव प्रेमी है। श्रीमती मेनका गांधी उसकी प्रेरणा स्त्रोत हैं। पिल्लू सिंह को उसने कुत्ते के रूप में पाला था। मगर व्यवहार व सदगुणों के कारण मुन्नालाल के परिवार के आदम सदस्य आज उसे कुत्ता कहना अपनी हिमाकत समझते हैं। क्योंकि उसे कुत्ता कह कर संबोधित करना उसका अपमान मानते हैं।
पिल्लू सिंह वास्तव में एक पारिवारिक जीव है। वह स्वयं भी उसी प्रकार व्यवहार करता है, जिस प्रकार परिवार के अन्य सदस्य। हां, कभी-कभी आदम सदस्य अवश्य परिवार विरोधी हरकतें कर बैठते हैं, यह उनकी आदमीय कमजोरी है। उसे आदम प्रकृति भी कहा जा सकता है, मगर मजाल कि पिल्लू सिंह कभी किसी तरह की ओछी हरकत करते देखा गया हो! इसकी वजह उसका परा-आदम स्वभाव है और यही स्वभाव आदम व जीवों में अंतर करता है।
मनुष्यों के समान उसकी भी अपनी इच्छाएं हैं और उन्हें व्यक्त भी करता है। मगर शालीनता के साथ। जब कभी उसे लघु या दीर्घ किसी शंका के निवारण की आवश्यकता महसूस होती है तो वह अपनी पीठ परिवार के आदम सदस्यों के शरीर से रगड़ने लगता है। भूख-प्यास परेशान करने लगे तो चेहरे पर तरह-तरह की आकर्षक मुद्राएं उतारने लगता हैं, दुम हिलाने लगता है। दुम हिलाने का यह सदगुण मनुष्य ने शायद पिल्लू सिंह की प्रजाति के जीवों से ही ग्रहण किया है।
सदगुण किसी से भी ग्रहण किया जाए, हर्ज की बात नहीं है। मगर उसका दुरुपयोग गलत है और मनुष्य दुम हिलाने के इस सद्ंगुण का खुला दुरुपयोग कर रहा है,यह घातक है। गनीमत है कि दुम हिलाने संबंधी इस सदगुण का पेटेंट करने का फितूर अभी तक मनुष्य के दिमाग में नहीं उठा है। वरन् बेचारे पिल्लू सिंह के भाई-बिरादर बस दुम लटकाए ही घूमते। दुम का भार वे सहन करते और हिलाया करता मनुष्य। मनुष्य यदि पेटेंट करा लेता है तो यह संपूर्ण जीव जगत के अधिकारों पर कुठाराघात होगा। मेनका जी को अभी से इसके प्रति सचेत रहना चाहिए।
पिल्लू सिंह न केवल अपनी इच्छाएं व्यक्त करने में शालीनता का निर्वाह करता है, अपितु आदेश-निर्देश देते समय भी शालीनता का पालन करना उसकी प्रकृति में शामिल है। सुबह जब हॉकर अखबार डालकर चलने लगता है, तब पिल्लू कुंई-कुंई कर मेरे तलवे चाट कर मुझे जगाता है तब मुझ लगता कि जैसे मधुर स्वर में कह रहा है 'बीती विभावरी जाग री अंबर पनघट में डुबो रही तारा घट ऊषा नागरी। तू अब तक सोया है, मतवाले! अखबार फेंक गए अखबार वाले।'
आदम-जात ने तलवे चाटने का गुण भी उसी की पारिवारिक विरासत से चुराया है, मगर वह उसका भी दुरुपयोग कर रहा है।
मेरे साथ ही नहीं, अपनी मम्मी यानी के मेरी पत्नी व पुत्रों के साथ भी उसका व्यवहार सद्ंभावना से परिपूर्ण ही रहता है। पड़ोस में गप्पें करते-करते पत्नी यदि कभी समय सीमाओं का उल्लंघन कर देती है तो वह मेरी तरह नहीं चिल्लाता 'अजी कहां हो, मुन्ना जाग गया है। देखों दूध में उबाल आ गया है, जल्दी आओ नहीं तो पतीली से बाहर आ जाएगा।'
मुन्ना सोया ही कब था, जो जागेगा। दूध तो मदर डेयरी से घर तक आया ही नहीं, फिर उबाल क्या रीते पतीले में आएगा। मगर ऐसा ही होता है। मुन्ना बिना सोए ही जाग जाता है और दिल में उठा उबाल रीते पतीले के दूध में उठने लगता है। यह भी आदम स्वभाव है।
इसके विपरीत पिल्लू भाई, शालीनता के साथ अपनी मम्मी का पल्लू पकड़ घर ले आता है। शायद इस भाव के साथ, 'बहुत देर हो गई है, घर चलो, नहीं तो पापा के रीते पतीले में उबाल व तूफान दोनों एक साथ उठने लगेंगे'
चीखने-चिल्लाने से शायद उसे नफरत है, इसलिए वह कभी नहीं चिल्लाता। घर का कोई आदम सदस्य कभी चिल्लाता भी है, तो उसकी आंखें आंसुओं से भर जाती हैं और चिल्लाने वाले सदस्य के पैरों में लेट जाता है, शायद इस भाव के साथ, 'अरे, भाई! चिल्लाओ मत, मेरा सिर फटता है। आदम जात में यही सबसे बड़ा दोष है कि चिल्लाते बहुत हैं। पता नहीं सहज भाव से अपनी बात कहना हमसे कब सीखेंगे। अरे, बरखुरदार! चीखने-चिल्लाने की अपेक्षा अपनी बात सहज-भाव से ज्यादा अच्छी तरह समझाई जा सकती है।'
पिल्लू सिंह को लेकर मुन्नालाल आज-कल काफी चिंतित है। चिंता का कारण है, उसके व्यवहार में आदम-जात गुणों की घुसपैठ। उसके स्वभाव में यह परिवर्तन अचानक दृश्यमान होने लगा है। शालीनता उसके स्वभाव से इस तरह गायब होती जा रही है, जिस तरह सरकारी दफ्तरों से ईमानदारी। अपनी इच्छा-अनिच्छा अब वह सहज भाव से नहीं, चिल्ला-चिल्ला कर व्यक्त करने लगा है। पड़ोसी कहने लगे हैं, अब तो आपका पिल्लू भी भौंकने लगा है। भौंकने-चिल्लाने में भी पिल्लू सिंह की मंशा वही पुरानी है, बस लहजे में बदलाव आया है।
चिंतित मुन्नालाल ने उसके बारे में जाने माने मनोविश्लेषक से परामर्श ली, तो उसकी चिंता महंगाई की तरह विस्तार को प्राप्त हो गई। परीक्षण के बाद मनोविश्लेषक ने बताया, 'पिल्लू सिंह आदम स्वभाव से संक्रमित है, मगर उसका चिल्लाना और भी ज्यादा घातक बीमारी 'बासि़जम' का लक्षण है। बासि़जम के लक्षण जब जीव की प्रकृति बन जाते हैं, तब किसी भी तरह के प्रशिक्षण से इलाज असंभव हो जाता है। मुन्नालाल जी, आपके परिवार के बीच रहते-रहते चिल्लाना उसका स्वभाव नहीं प्रकृति बन गई है। किसी भी जीव का स्वभाव तो बदला जा सकता है, प्रकृति नहीं।'
मनोविश्लेषक से मिलने के बाद मुन्नालाल किंकर्तव्यविमूढ़ सा हो गया है। आखिर वह करे भी तो क्या करे। पहले आफिस में बॉस और घर में पत्नी की ही कर्कश आवाज झेलनी पड़ती थी अब कमबख्त पिल्लू सिंह के डायलॉग भी उसी तर्ज पर सुनने पड़ रहे हैं। मुन्नालाल आखिर जाए तो कहां जाए? आप कोई सुझाव सुझा सकें तो अति कृपा होगी।
फोन-9868113044
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