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Monday, June 29, 2026

ग़ज़ल

 ग़ज़ल 

चाँदनी में तेरी जिस्म जलने लगे। 

आजकल जुगनुओं से भी डरने लगे।। 

मेहरबानी तेरी इस क़दर कुछ रही।

जैसे बरगद तले धूप लगने लगे।। 

शहर में मुफ़लिसी जब सताने लगी। 

उनके महलों में मुजरे सँवरने लगे।

ख़ुदकुशी की है अब सच ने दरबार में 

फैसले झूठ के हक में आने लगे। 

है धुआँ ही धुआँ आसमाँ पे तिरे। 

अब पखेरू ठिकाना बदलने लगे।। 

ज़िंदगी ख़ौफ़ में कट न जाए  कहीं।

अब उजाले अँधेरों से मिलने लगे।। 

ढूंढ लो बाग़बाँ इस चमन के लिए। 

जिस्म फूलों के अब तो झुलस ने लगे।।