राजेंद्र त्यागी
पिल्लू हमारा पालतू कुत्ता था। कुत्ता कहने में हम उसका अपमान और अपनी हिमाकत समझते थे। इसके विपरीत उसे पिल्लू कहलाना पसंद नहीं था, इसे वह अपना अपमान मानता था और कुत्ता कहलाने में गर्व। आजकल कुछ लोग भी आदमी बने रहने व कहलाने में शर्मिदगी महसूस करते हैं। जब उसका नामकरण पिल्लू किया गया, तो कमजोर देश की कमजोर सरकार की तरह उसने दांत निकाल कर विरोध दर्ज किया था। फिर भी अपने सुपीरियॉरिटी कॉम्पलेक्स के कारण हम उसे पिल्लू ही कहकर पुकारते रहे और अंतत: कमजोर देश की समझौतावादी सरकार की तरह उसने भी हालात से समझौता कर लिया और पिल्लू नाम स्वीकार कर लिया। इसके अलावा, उसके पास और कोई रास्ता भी नहीं था, किंतु जीवन भर वह इस नाम को लेकर त्रस्त रहा। एक बार प्यार में हम उसे झिड़ककर बोले, 'अबे, आदमी हो जा आदमी!' इतना सुनकर वह हम पर गुर्राया, 'मेरी भी अपनी इज्जत है। आदमी कहकर मुझे अपमानित क्यों करते हो?' फिर उसने आदमी केंद्रित दर्शन झाड़ा, 'आदमी अब खुद ही आदमी नहीं रहा है। जब से आदमी के अंदर से आदमियत का लोप हुआ है, वह 'आदिम' से भी ज्यादा हिंसक हो गया है। पता नहीं क्यों आप मेरा आदमीकरण करने पर तुले हैं। हम आदमी से बेहतर हैं, इसलिए मैं जैसा भी हूं, वैसा ही ठीक हूं।' इतना कहकर वह शांत हो गया।
उसका दर्द मुझे जायज लगा। अलबत्ता आदमियों के कुछ गुण उसने अपने अंदर विकसित कर लिए थे। मसलन उसका पीआर व मार्केटिंग बहुत जबरदस्त था। हालांकि वह ऐसे आदमीय सद्गुणों को भी अपनी प्रजाति की ही देन मानता था। उसके पीआर व मार्केटिंग का ही परिणाम था कि हमारे घर जो भी आता, हमें छोड़ उसके प्रति स्नेह भाव प्रदर्शित करने लग जाता। जिस तरह के ऑफर के लिए हम आज तक तरस रहे हैं, ऐसे अनेक ऑफर उसे मिलते रहे। उनमें एक लाख रुपये के पैकेज वाले ऑफर भी थे और इससे ऊपर वाले भी।
यह उसकी मार्केटिंग का ही असर है कि स्वर्गवास के एक वर्ष बाद भी, हमारे घर आने वालों के मुंह से एक ही वाक्य प्राथमिकता के आधार पर निकलता है, 'पिल्लू के बिना घर सूना लगता है जी।' लोग हमारा हाल बाद में पूछते हैं, पहले पिल्लू को श्रद्धांजलि पेश करते हैं। हमारा व्यक्तित्व उसके सामने लोवोल्टेज हो गया है। उसके व्यक्तित्व के कायल लोग आज भी कहना नहीं भूलते, 'जनाब, पिल्लू का व्यक्तित्व बड़ा रोबदार था'। मानो पिल्लू न हुआ, मुगले आजम का शहंशाह हो गया।
पीआर और मार्केटिंग के विवादास्पद सद्गुणों को यदि दरकिनार कर दिया जाए तो बहुत सारे ऐसे आदमीय गुण हैं, जिन्हें उसने नहीं अपनाए। मसलन तलवे चाटना उसका जातीय गुण था, किंतु तलवे चाटते-चाटते काटना नहीं सीख पाया। आदमी ने यह कला विकसित कर ली है। 'भौंकने वाले काटते नहीं हैं', पिल्लू चाहकर भी अपने इस जातीय संस्कार से मुक्त नहीं हो पाया। वह भौंकता बहुत था, किंतु काटता किसी को नहीं था। आदमी के बारे में ऐसा कुछ भी नहीं कहा जा सकता कि भौंकने वाला कटखना होता है अथवा मौन रहने वाला।
पिल्लू के चेहरे पर जो था, उसके दिल में भी वही था। यहां भी वह मार खा गया। जिस थाली में हम उसे भोजन परोसते थे, आज भी सुरक्षित है। कई बार उलट-पलट कर देखा, उसमें एक भी छेद नहीं दिखलाई पड़ा। पिल्लू जिसके टुकड़े तोड़ता रहा, उसके प्रति ही निष्ठावान बना रहा। टुकड़ों के साथ टुकड़ों-टुकड़ों में उसकी निष्ठा तो अवश्य तब्दील होती रही, किंतु टुकड़े किसी के निष्ठा किसी के प्रति, यह आदमीय सद्गुण भी उसने अपने अंदर विकसित नहीं किया। शायद ऐसे सभी सद्गुण उसे पसंद नहीं थे और संभवत: इसीलिए आदमी कहना उसे भद्दी गाली लगती थी।
उसके जीवनकाल में मैं उसे रूढि़वादी मानता रहा। मेरा मानना था कि आदमी की तरह प्रगतिशील रास्ता अपनाकर उसे अन्य आदमीय सद्गुणों के साथ आदमी बनना चाहिए था किंतु उसकी मृत्यु के उपरांत आज मुझे लगा कि पिल्लू ठीक था। हम ही गलत थे, क्योंकि अब मुझे भी आदमी से डर लगता है।
Friday, October 12, 2007
Thursday, October 11, 2007
नेकी तज अनेकी कर
नेकी तज अनेकी कर
राजेंद्र त्यागी
असामाजिक कृत्य नेकी करने वालों के प्रति भले लोगों की हमेशा से ही हमदर्दी रही है। यही कारण है कि नेकी करने के बाद जब-जब भी नेक इंसान पीड़ित हुए, भले मानुषों ने उन्हें दिलासा और सुझाव देने में तनिक भी कोताही नहीं बरती। नेकीकृत पीड़ा के ऐसे ही आड़े वक्त किसी भले मानुष ने सुझाव दिया होगा, 'नेकी कर दरिया में डाल।' नेकी के इतिहास में इसी का क्षेत्रीय संस्करण भी मिलता है, 'नेकी कर कुएं में डाल'। जिन क्षेत्रों में दरिया नहीं बहते होंगे या होते भी होंगे तो जमाने की दुश्वारियों से तंग आकर 'सरस्वती' की गति को प्राप्त हो गए होंगे, ऐसे ही क्षेत्रों के लोग नेकी डालने के लिए कुओं का इस्तेमाल करते होंगे और वहीं से सुझाव का यह क्षेत्री संस्करण उत्पन्न हुआ होगा। आधुनिक युग में परिदृश्य बिलकुल बदल गये हैं। दरिया व कुएं नेकियों के कारण पट गए हैं। दुर्भाग्यवश, अभी तक जो इस सदगति से वंचित हैं, ऐसे दरिया विकास की लाईन में लगे हैं। नेकी से अटे कुओं को समतल कर उन पर जन-सुविधा परिसर निर्मित कर दिये गये हैं। पानी के लिए लोग म्यूनिसपैल्टी के 'मिक्सचर' पर आश्रित हैं। फलस्वरूप नेकी करने वाले बेचारे बड़ी मुसीबत में हैं। जाने-अनजाने किसी से नेकी जैसे पाप कर्म हो जाए तो उसे छुपाने कहां जाए? बदलते इस परिवेश से पीड़ित हमारे मखौलकार मित्र आलोक पुराणिक ने मुसीबत से निजात दिलाने का नायाब हल प्रस्तुत किया है। नेकी करने वालों के लिए उनकी सलाह है,'न सही दरिया और कुएं, नेकी कर ही डाली है तो उसे अखबार में लपेट, यानी, 'नेकी कर अखबार में डाल।' हम प्रैक्टिकल अप्रोची हैं, प्रगतिवादी हैं, परिवर्तनवादी हैं। इसलिए हमारा मत इन से बिलकुल भिन्न है। नेकी करने का मूल सिद्धांत ही हमें फंडामेंटल लगता है, दकियानूसी लगता है। हमारा कहना है कि नेकी करे ही क्यों? पहले नेकी कर और फिर नाजायज औलाद की तरह अखबार में लपेट, दरिया-कुएं में दफनाता फिर। जरा से मजे के लिए जिंदगी भर की तोहमत, पागल कुत्ते ने काटा है? ऐसी नेकी से तो तोबा भली।ेनेकी के विरोध और अनेकी के पक्ष में हमारे पास सोलिड तर्क हैं, जैनविन कारण हैं।े हमारा कहना है, भाई! ऐसा कृत्य करते ही क्यों हो, जो समाज को स्वीकार्य न हो। स्वीकार होता तो दरियर या कुएं का मसला ही न उठता। हमारी मान! नेकी कर अपना नाम असामाजिक लोगों की सूचि में दर्ज न करा।
नेकी करेगा, भईया! फल अगले जन्म में मिलेगा, मरने के बाद स्वर्ग मिलेगा। पूरे एक जन्म का इंतजार!आंख बंद हो गई फिर किसने देखा।आज का भरोसा नहीं, कल किस ने देखा।अनेकी करेगा, हाथ के हाथ फल मिलेगा।जिंदगी भर मजा लूटेगा, इसी जन्म में स्वर्ग मिलेगा।नेकी करेगा! मूर्ख कह लाएगा।अनएफिसिऐंट का लेवल चस्पा हो जाएगा।मरने के बाद भले ही स्वर्ग मिल जाए।जीते जी तो नरक का हीभागी रहेगा।औलाद को भी गर्त में ढकेल जाएगा।अनेकी करेगा! बहुमुखी प्रतिभा के धनी कह लाएगा।देर-सबेर नेता भी बन जाएगा।जीवन भर सत्ता सुख भोगेगा।मरते-मरते, औलाद के लिए मार्ग प्रशस्त कर जाएगा।हमारी सलाह है, व्यवहारिक सलाह है।नेकी मत कर, अनेकी कर अनेक बार कर, बार-बार कर। सुखी रहेगा। नेकी फेयर है, अनेकी अफेयर। जमाना फेयर का नहीं अफेयर का है।फेयर करना गले में हड्डंी डालना है।हड्डंी चूस! कौन मना करता है?फेयर के चक्कर में गले न फंसा।फेयर करेगा जूते खाएगा।एक से भी हाथ धो जाएगा।फेयर नहीं 'अफेयर' कर। ढोल अपने नहीं दूसरे के गले पड़ा रहने दे। जब मन आए बजा लेना, मन न करे तो कान दबा कर खिसक जाना। 'अफेयर' कर खुल्लम-खुाल्ला कर, मन भर कर। 'अफेयर' करेगा तो नाजायज औलाद भी जायज होने का एडवांस प्रमाणपत्र लेकर पैदा होगी।खुद के साथ-साथ तेरा नाम भी रोशन कर जाएगी।
समाज में जिसने भी फेयर तज अफेयर किया वही अमर हो गया। लैला-मंजनू, हीर-रांझा, सोनी-महिवाल, सीरी-फरहाद बन गया। प्रेमियों के इतिहास में नाम अमर कर गया। फेयर जिसने किया घृणा का पात्र बन गया। हमारे एक मित्र हैं, नेकीराम जी! बेचारे नेकी मार्गी है। कहने को एम.ए.पीएचडी हैं, मगर मेरठ के लालकुर्ती चौराहे पर गोलगप्पे बेच कर नेक-नीयत के साथ भरण-पोषण करने की चेष्टा में रत्ं हैं। हमने लाख बार समझाया, बड़े भाई! व्यावहारिक बनो। नेकी-वेकी की राह छोड़ो अनेकी का मार्ग अपनाओ। नेकी करोगे तो दरिया या कुएं में कहीं न कहीं दफनानी पड़ेगी। उसके बाद भी समाज से लताड़ ही मिलेगी। मजाल जो उनके कान पर जूं भी रेंगी हो। उल्टे, आंखों से गंगा-यमुना की प्रदूषित धारा बहाते हुए बोले, 'क्या जमाना आ गया है, नेकी के पीछे लोग ऐसे पड़े हैं जैसे कश्मीर के लिए पाकिस्तान अड़ा है। ठीक है! जब नैतिक मूल्यों का ही पतन हो रहा है तो नेकी ही बेचारी कहां बच पाएगी।' उनके दिमाग का प्रदूषण दूर करने का असफल प्रयास करते हुए हमने कहा, 'भई जान! कौन से मूल्यों की बात करते हो? मंदी का दौर है, मुद्रास्फीति का भटकाव बराबर जारी है। ऐसे में तुम्हारे नैतिक मूल्यों का भव कोई क्या लगाएगा? गोलगप्पों के भाव बिक रहे हैं, तुम्हारे नैतिक मूल्य। इस भाव में भी उनका कोई खरीददार नहीं। ऐसे में नैतिक मूल्य अच्छे भाव दे जाएंगे, यह सोचना भी व्यर्थ की कवायद है। कभी-कभार अखबार का अर्थ पृष्ठं भी पलट कर देख लिया करो। तुम्हारी नेकी, बाजार में कभी भाव नहीं बना पाई। नेकी की राह पर चला तो था तुम्हारा राजा हरीशचंद्र, नेकी करने की हिमाकत की थी। क्या हाल हुआ उसका, जगजाहिर है। पीछा तब तक नहीं छूटा जब तक शमशान घाट जा कर नेकी का अंतिम संस्कार नहीं कर दिया। महात्मा गांधी भी नेकी मार्गी थे, एक लंगोटी, एक लाठी के सहारे तमाम जिंदगी काट दी। अनेकी की राह पर चलने वाले उनके चेले-चपाटे! खीमखाफ पहन सत्ता का सुख भोगते रहे। अनेकी की राह पकड़ एक शिष्य पाकिस्तान ले बैठा, पूरी जिंदगी राज करा। बाकी हिंदुस्तान पर काबिज हो गये। जब तक जिंदा रहे खुद राज करा, अब औलाद गुलछर्रे उड़ा रही है। जाने-अनजाने नेकी हो भी जाए तो हमारे मित्र पुराणिक की सलाह पर अखबार वालों के आसपास भी मत फटकना। अखबार और अखबार वालों से किनारा ही करना। नेकी जैसा कुकृत्य अखबार वालों के लिए कोई खबर नहीं है। खबर बन भी जाए तो उसे प्रकाशित करना जनर्लिस्टिक एथिक्स के विपरीत है। अनेकी करोगे तो 'भाई लोगों' की तरह खुद-ब-खुद हाईलाइट हो जाओगे।मगर, क्या कहा जाए? सभी की अपनी-अपनी समझ है, अपनी-अपनी सोच। दरअसल हर आदमी की बुद्धि किसी न किसी लक्ष्मण रेखा के दायरे में कैद है। उससे बाहर न सोचने के लिए बेचारा मजबूर है। फिर भी मेरी सलाह, व्यावहारिक सलाह! नेकी तज, अनेकी कर, एक नहीं अनेक बार कर, बार-बार कर।
संपर्क :-9868113044
Wednesday, October 10, 2007
राजनीति के ब्लैक होल
राजनीति विज्ञानी मुन्नालाल आजकल दिल्ली में हैं। उनके प्रेमियों ने उन्हें राजनीति विज्ञान के स्टीफन हाकिंग के नाम से नवाजा है। अधिसंख्य जनता उनके सिद्धांत आज भले ही न समझ पाती हो, मगर सभी उनका एक झलक पाने के लिए आतुर रहते हैं। उन्हें सुनना चाहते हैं। उनके सारगर्भित लेख पढ़ना चाहते हैं। वैज्ञानिक सिद्धांतों के आधार पर राजनीति के रहस्य सुलझाना उनकी महान उपलब्धि है। उन्होंने सिद्ध किया है कि छुट-भइया नेता और भ्रष्टाचार की शुरूआत वोट बैंक राजनीति से हुई। राजनीति के वायुमंडल में जिसकी परिणति ब्लैक होल के रूप में हुई। यह उन्होंने आइंस्टीन के सापेक्षवाद के सिद्धांत के आधार पर सिद्ध किया है।
विज्ञानी मुन्नालाल दिल्ली से पूर्व मुंबई में व्याख्यान दे चुके हैं। वहां उनके एक व्याख्यान का विषय था, 'संक्षेप में हमारा राजनैतिक ब्रह्माण्ड' और दूसरा विषय था, 'भविष्य में भ्रष्टाचार।' इन व्याख्यानों में मुन्नालाल ने 'लीडर ट्रैक' से शुरू कर 'सत्ता' के चारो तरफ विभिन्न ग्रहों की परिक्रमा व अन्य ग्रहों के निवासियों का राजनीति की भूमि पर आक्रमण विषयों पर चर्चा की थी। गांधी युग के बाद से राजनैतिक आकाश में कितने परिवर्तन आए, उन्होंने इस विषय पर भी प्रकाश डाला है। दिल्ली में उनके व्याख्यान का विषय होगा, 'राजनैतिक आकाश' में ब्लैक होल।
गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या थी। विज्ञानी मुन्नालाल का व्याख्यान सुनने के लिए जनमानस मनमोहन हॉल में घुसने के लिए इस तरह धक्का-मुक्की कर रहा था, हाल के भीतर सरकार जैसे बाढ़ पीड़ितों के लिए गुड़-चने बांट रहा हो। धीरे-धीरे मनमोहन हॉल खचाखच भर गया। कुछ देर इंतजार के बाद उदघोषक ने मुन्नालाल के पधारने की घोषणा की। लोगों की निगाहें मंच के बैक डोर की तरफ उठी। दरअसल आजकल के महान नेता ऐसे ही बैक डोर के माध्यम से राजनैतिक मंच पर प्रवेश करते हैं।
हाकिंग की मुख मुद्रा का मास्क ओढ़े मुन्नालाल मंच पर पधारे। हॉल में एकत्रित संपूर्ण जनमानस ने घुटनों के बल झुक कर मुन्नालाल के शान में सजदा किया। हाकिंस की तर्ज पर मुन्नालाल ने धीरे से अपनी गर्दन बाई तरफ लुढ़काई और मुस्करा कर जनमानस का अभिवादन स्वीकार किया।
मुन्नालाल ने रडार के एंटीना की तरह हॉल की चारो दिशाओं में निगाह घुमाई और फिर बोले-'वर्तमान राजनीति से शोषित मेरे भाइयों और बहनों! नेताओं के सम्मान में कब तक घुटनों के बल झुके रहोगे। राजनैतिक ब्रह्माण्ड के रहस्य समझने का प्रयास करो, वरना तुम्हें एक दिन घुटने के बल रेंगना पड़ेगा।'
लानत-मनानत देने के बाद विज्ञानी आगे बोला, 'इस ब्रह्माण्ड के जटिल रहस्य समझाने के लिए आज फिर मैं आपके सामने उपस्थित हूं। शोषित भाइयों और बहनों राजनैतिक -ब्रह्माण्ड दरअसल इतना प्रदूषित हो चुका है कि उसे एनेलाइज करने में मुझे भी एड़ी से चोटी तक पसीना बहाना पड़ा।'
वास्तव में राजनैतिक सृष्टिं अनिश्चितता (अनसर्टेटी) के सिद्धांत से बंधी है। इसलिए राजनीति और लोकतंत्र के भविष्य के बारे में जानना फिलहाल मुमकिन नहीं है। निश्चिततावाद (डिटर्मिनिजम) और अनिश्चिततावाद (अनसर्टेटी) विषय पर आजादी के बाद से ही बहस चल रही है। फिर भी अभी तक किसी नतीजे पर नहीं पहुंचा जा सका है। लेकिन आईंस्टीन के सापेक्षवाद और उसके उसके बाद क्वांटम सिद्धांत के आधार पर हम कुछ निष्कर्षो पर पहुंचे हैं।
प्राप्त निष्कर्षो के आधार पर कहा जा सकता है कि ब्रह्माण्ड के किसी कण की तरह नेता के भी दो प्रमुख गुण होते हैं-उसकी स्थिति (पोजीशन)और गति (मूवमेंट)। नेता की गति भ्रष्टाचार से संचालित है। इसलिए गति मापना नामुमकिन है। गति मापने चलेंगे तो उसकी स्थिति नहीं माप पाएंगे, क्योंकि नेता हमेशा गतिशील रहता है। मेरा दावा है कि नेता की गति ईश्वर भी नहीं माप पाया है। इसलिए नेता की गति का अनुमान उसके तरंग गुणों (वेव/मूड) से ही लगाया जा सकता है। जब तक नेता की गति व स्थिति का पता नहीं चलेगा तब तक राजनीति और लोकतंत्र के भविष्य के बारे में विज्ञान तो क्या ईश्वर भी कुछ कहने की स्थिति में नहीं है।
गर्दन इधर उधर ढलकाते हुए मोहक अंदाज में मुन्नालाल आगे बोले- दया के पात्र मेरे भाइयों-बहनों! वर्तमान राजनीति के आधार लोकतंत्र का विखंडन किया जाए तो परमाणु के रूप में सत्ता दृष्टिंगोचर होती है। उसका पुन: विखंडन करने पर नाभिक (न्यूक्लिअर) के रूप में कुर्सी के दर्शन होते हैं।
नाभिक (कुर्सी) के चारों तरफ नेता व अपराधी नाम के दो तत्व लगातार परिक्रमा कर रहे हैं। परमाणु विखंडन में एक तीसरा तत्व भी हाथ लगता है और वह है मतदाता। विज्ञान की भाषा में सूक्ष्म इन तत्वों को क्रमश: प्रोटोन, इलेक्ट्रोन और न्यूट्रोन कहते हैं। प्रोटोन की तरह नेता की प्रकृति धनात्मक, इलेक्ट्रोन की तरह अपराधी की प्रकृति ऋणात्मक होती है और न्यूट्रोन की तरह मतदाता निष्क्रिय होता है। नेता व अपराधी नाम के ये दोनो तत्व अपनी-अपनी प्रकृति के अनुसार एक दूसरे को आकर्षित करते हैं। वास्तव में इस प्रकृति के कारण इन दोनों का गठजोड़ बन जाता है। विज्ञान की भाषा में जिसे नैक्सस कहते हैं। क्योंकि मतदाता नामक तत्व अपनी प्रकृति के अनुरूप निष्क्रिय है, इसलिए राजनीति की न्यूक्लियर (कुर्सी) पर शेष दोनों ही तत्वों का नैक्सस हावी रहता है।
राजनैतिक वायुमंडल में 'ब्लैक होल' उत्पन्न होने के भी यही कारण हैं। नेता व अपराधी नामक दोनों ही तत्व एक कृत्रिम पदार्थ 'भ्रष्टाचार' से ऊर्जा प्राप्त करते हैं। भ्रष्टाचार की तुलना हम प्रकृति के कृत्रिम पदार्थ प्लास्टिक से कर सकते हैं। प्लास्टिक की तरह भ्रष्टाचार नामक यह तत्व भी कभी नष्ट न होने वाला है।
भ्रष्टाचार से नेता-अपराधी नैक्सस जब ऊर्जा प्राप्त करते हैं तो उस समय होने वाली रासायनिक प्रक्रिया से खतरनाक गैसें निकलती हैं। जिस तरह प्लास्टिक से निकलने वाली खतरनाक गैसें वायुमंडल के सुरक्षा कवच ओजोन पर्तो में छिद्र कर ब्लैक होल का निर्माण करती हैं। उसी प्रकार भ्रष्टाचार से निकलने वाली खतरनाक गैस भी राजनैतिक वायुमंडल के सुरक्षा कवच 'शुचिता, नैतिकता और राष्ट्रवाद' में छिद्र कर ब्लैक होल का निर्माण करती हैं। ये ब्लैक होल आकार में इतने विशाल होते हैं कि अनेकों सत्ताएं इनमें समा सकती हैं।
विज्ञानी मुन्नालाल ने अपने भाषण में आगे कहा भाइयों और बहनों ये ब्लैक होल दिखने में इतने श्वेत होते हैं कि राजनीतिक क्षितिज में दैदीप्त सितारों की चमक भी इनके कृत्रिम प्रकाश के सामने धूमिल पड़ जाती है और ये ब्लैक होल सितारों का भ्रम पैदा करने लगते है। इसलिए राजनीति के हे, शोषित भाइयों बहनों! राजनैतिक ब्रह्माण्ड के रहस्य को जानों और कृत्रिम ब्लैक होल के भ्रम से दूर रह कर राजनीति के वास्तविक सितारों को पहचानो।
विज्ञानी मुन्नालाल ने अपना व्याख्यान समाप्त किया और सजल नेत्रों के साथ फिर उसी बैक डोर से वापस लौट गया।
संपर्क - 9717095225
Tuesday, October 9, 2007
हाए! भ्रष्टाचार के खेल में पिट गए!
हाए! भ्रष्टाचार के खेल में पिट गए!
राजेंद्र त्यागी
मन खिन्न है। भविष्य के प्रति चिंतित है। पानी उतरा हमारा चेहरा शर्म से पानी-पानी है। उम्मीद थी कि भ्रष्टाचार के क्षेत्र में एक दिन हम विश्व के सिरमौर हो जाएंगे। अब उसमें भी हम पिछड़ते जा रहे हैं, सत्तर वे पायदान से खिसक कर बहत्तर वे पायदान पर आ गए हैं। इस खेल में हम म्यानमार और सोमालिया जैसे टटपूंजिए देशों के हाथ पिट गए, इसलिए मेरा मन शर्मसार है। इतना भी होता तो गनीमत थी। ट्वेंटी-ट्वेंटी में मात खाए पाकिस्तान और बांग्लादेश से फिफटी- फिफिटी के गेम में पिछड़ गए, इसी वजह से मेरा मन उदास है। रफ्तार यदि यही रही तो सौवें पायदान की गति को भी शीघ्र ही प्राप्त हो जाएंगे, विश्व में फिसड्डी कह लाएंगे!
अफसोस यह नहीं है कि भ्रष्टाचार उतार पर है। जिंदगी में उतार-चढ़ाव तो चलते ही रहते हैं। अफसोस तो यह है कि अब हम गर्व से कैसे कह पाएंगे कि हमारे हुक्मरानों के स्नानागारों में स्वर्ण-जड़ित नल की टोंटियां हैं। भ्रष्टाचार यदि पूर्णरूपेण समाप्त हो गया तो फिर राष्ट्रीय शिष्टाचार का क्या होगा? याद रखो जिस राष्ट्र का अपना का कोई शिष्टाचार नहीं है, जिस राष्ट्र का कई राष्ट्रीय-चरित्र नहीं है, वह राष्ट्र कहलाने के काबिल नहीं है।
जब मुझे कोई उलाहना देता था कि तुम्हारे देश का कोई राष्ट्रीय-चरित्र नहीं है, तब मेरा राष्ट्रवादी मन गर्व से कह उठता था, ''मूर्ख हो तुम! भ्रष्टाचार मेरे भारत-महान का राष्ट्रीय-चरित्र है!'' अब राष्ट्र-संस्कृतिवाद का यह सुनहरा पन्ना फटता नजर आ रहा है। यही कारण है कि मेरा राष्ट्रवादी मन आज खिन्न है। शुष्क चेहरा भी शर्म से पानी-पानी है।
भ्रष्टाचार का शिष्टाचार समाप्ति की और है, कोई बात नहीं। सांसकृतिक-मूल्य समय के अनुरूप बदलते रहते हैं। नए मूल्य पुराने मूल्यों का स्थान ले लेते हैं। वैकल्पिक मूल्य रिक्त-स्थान की पूर्ति कर देगें। मगर अफसोस तो यह है कि मेरा भारत-महान ईमानदारी के सैकड़े की ओर कदमताल कर रहा है। मैं इसे आत्मघाती कदम मानता हूं।
क्योंकि 'ऊपर-वाला' और 'बेईमानी' मनुष्य की जिंदगी में ये ही तो दो दैविक आसरे हैं। मगर ऊपर-वाले की कृपा से केवल परलोक सुधारता होगा, पता नहीं। किंतु सर्वविदित है, इहलोक तो बेईमानी के आशीर्वाद से ही फलता-फूलता है। ऊपर-वाला ऊपर की कमाई में रत्ती भर भी सहायक नहीं है। ऊपर की कमाई बेईमानी-देवी के ही आशीर्वाद से प्राप्त होती है। ऊपर की कमाई ही आर्थिक स्थिति को मजबूती प्रदान करती है। मनुष्य ऊपर-वाले का स्मरण केवल कष्ट में करता है और मनुष्य कष्ट में तब होता है, जब वह ईमानदार हो जाता है। अत: दोनों में से बेईमानी ही मनुष्य के सुखद जीवन के लिए महत्वपूर्ण दैविक आसरा है। बड़े-बुजुर्गो ने भी कहा है, ''बेईमानी तेरा ही आसरा''! मेरा भारत-महान प्रगतिशील मार्ग का त्याग कर ईमानदारी के आत्मघाती मार्ग का अनुसरण कर रहा है, मेरा पवित्र मन इसीलिए उदास है।
हे, भारत-महान के कर्णधारों! भ्रष्टाचार प्रगति मार्ग है, बेईमानी उसका आधार है। इस देश का सांस्कृतिक राष्ट्रवाद है, राष्ट्र की आर्थिक प्रगति का प्रतीक है, सुदृढ़ अर्थव्यवस्था का आधार है। देश में समाजवाद लाना है तो ईमानदारी जैसे घातक मार्ग का त्याग कर, बेईमानी की पूजा-अर्चाना करो। भ्रष्टाचार को सींचों, देश को आगे बढ़ाओ।
संपर्क – 9868113044
Monday, October 8, 2007
शिक्षा के क्षेत्र में हरित क्रांति

शिक्षा के क्षेत्र में हरित क्रांति
राजेंद्र त्यागी
कल एक समारोह में गया था। समारोह में शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान के लिए शिक्षाशास्त्री सम्मान प्रदान किया जाना था। सम्मान के लिए आदर के साथ नाम की घोषणा की गई। माननीय मुन्नालाल मंच पर पधारे। शक्ल-सूरत देख कर हम हतप्रभ रह गए। हमारे अन्त: करण से आवाज आई, ''अरे! ये तो अपना मुन्नाभाई पानवाला है। पानवाले से शिक्षाशास्त्री हो गया!'' मैं उसकी ऊंगलियों में पैन की स्याही के दाग खोजने की चेष्टा करने लगा। प्रत्येक चेष्टा में मुझे उसके हाथों में कत्थे-चूने के दाग पाए। हमने अपने मित्र को पीड़ा से अवगत कराया, ''भइया! मुन्नाभाई और शिक्षाशास्त्री! इसके लिए तो काला अक्षर और भैंस दोनों एक समान हैं।'' मित्र ने व्यंग्य किया है, ''मुन्नाभाई समाजवादी हैं, अत: भेदभाव उनकी प्रकृति में नहीं हैं।''
हम गंभीर थे, हमारे मित्र के मन में व्यंग्य-पुष्प खिल रहे थे। हमने अपनी गंभीरता का अर्थात दोहराया, ''ये जनाब तो पान, बीड़ी-सिगरट का हिसाब भी नहीं लिख पाते। जब पान खाने जाता था, तब मैं ही लिख कर आता था। अनपढ़ व्यक्ति और शिक्षाशास्त्री!'' हमने आश्चर्य भाव से पुन: प्रश्न किया। हमारे प्रश्न का उत्तर मित्र ने प्रश्नवाचक भाव में दिया, ''अक्ल बड़ी या भैंस?'' हम बोले, ''अक्ल!'' मित्र बोला, ''फिर काले अक्षर और भैंस के बीच समानता क्यों खोजते हो? दोनों के मध्य समानता का अख्यान देते समय अक्ल के तथ्य को क्यों भूल जाते हो? काला अक्षर और भैंस के मध्य समानता का आकलन अतीत का आख्यान हो गया है। अब अक्ल और भैंस के मध्य अनुपातिक समीकरण का जमाना है, अत: बिना भाव भावना को नीलाम कर दो और अक्ल से काम लो।''
मुन्नालाल को शिक्षाशास्त्री का तमगा मिलता देख हमारी अक्ल हमारा दामन छोड़ कर कहीं चली गई। भूखी भैंस की तरह शायद कहीं घास चरने गई होगी, यह सोच कर हमने संतोष किया। किंतु मित्र हमारी अक्ल को वापस हांक कर लाने के प्रयास में जुट गया। वह बोले, ''सुनो भाई! यह शिक्षा के क्षेत्र में हरित क्रांति का जमाना है।'' हमने पुन: आश्चर्य उडेला, ''शिक्षा के क्षेत्र में हरित क्रांति! हरित क्रांति का संबंध तो कृषि क्षेत्र से है? रास्ता भटकी भैंस की तरह हरित क्रांति शिक्षा के क्षेत्र में कहां से घुस आई़?''
मित्र ने माथा ठोका और फिर बोला, ''लगता है, तुम्हारी अक्ल अभी तक किसी घूरे पर घास चर रही है, लौट कर नहीं आई है।'' हमें सांत्वना देने के लहजे में वह फिर बोला, ''कोई बात नहीं, ध्यान से सुना, एकाग्रचित्त हो कर सुनों, लौट आएगी। श्कि्षा के क्षेत्र में हरित क्रांति सावन के अंधे की तरह नहीं आई है। वास्तव में आई है। शिक्षा के क्षेत्र में घुस कर तो देखो चारों तरफ हरा ही हरा नजर आएगा।''
हमने पुन: जिज्ञासा व्यक्त की, ''कैसे?'' वह बोला, ''हरा रंग खुशहाली का प्रतीक है, हरित क्रांति माल पैदा करने का प्रतीक है। शिक्षा के क्षेत्र में चारों तरफ माल ही माल है। जो भी इस क्षेत्र में घुस गया मालामाल हो गया। अपने मुन्नालाल का भी यही हाल है।'' हमने अगला प्रश्न किया, '' कैसे?'' वह बोला, ''अपने मुन्नलाल भाई पानवाले के चार इंजीनियरिंग कालेज हैं, दो मेडीकल कालेज हैं और पांच बिजनेस मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट हैं। भाई अब पानवाले नहीं इंस्टीट्यूट वाले हैं। भई अब मालामाल हैं, शिक्षाशास्त्री हैं।'' ''..किंतु यह हुआ कैसे?'' हमने पूछा। मित्र ने बताया, ''हमारी सलाह पर। मुन्नालाल एक दिन बोले, पान के काम में ससुर पैसा तो है, पर इज्जत ना है। कछु ऐसा काम बताओ जिसमें पैसा भी हो और ससुर इज्जत भी। हम बोले, भाई इंस्टीटंयूट खोल लो। मुन्नालाल बोले, मगर हम तो ससुर काला अक्षर भैंस बराबर है। पढ़ाई-लिखाई से तो हमारा जन्म-जन्म का बैर है। हम बोले बैर का त्याग करो, दोस्ती कर लो। अक्ल से काम लो अकबर बन जाओ, बीरबलों की कमी नहीं है। एक ढूंढों के हजार मिल जाएंगे। बस मुन्नालाल की अक्ल में हमारी बात धंस गई और शिक्षाशास्त्री हो गए। अगली सरकार में शिक्षामंत्री भी हो जाएंगे।'' मुन्नलाल पानवाला शिक्षाशास्त्री हो गया। हम बीरबल बने शिक्षा के क्षेत्र में हल चलाने में व्यस्त हैं। मुन्नालाल अकबर बन हरित क्रांति का माल लूटने में व्यस्त है।
कल एक समारोह में गया था। समारोह में शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान के लिए शिक्षाशास्त्री सम्मान प्रदान किया जाना था। सम्मान के लिए आदर के साथ नाम की घोषणा की गई। माननीय मुन्नालाल मंच पर पधारे। शक्ल-सूरत देख कर हम हतप्रभ रह गए। हमारे अन्त: करण से आवाज आई, ''अरे! ये तो अपना मुन्नाभाई पानवाला है। पानवाले से शिक्षाशास्त्री हो गया!'' मैं उसकी ऊंगलियों में पैन की स्याही के दाग खोजने की चेष्टा करने लगा। प्रत्येक चेष्टा में मुझे उसके हाथों में कत्थे-चूने के दाग पाए। हमने अपने मित्र को पीड़ा से अवगत कराया, ''भइया! मुन्नाभाई और शिक्षाशास्त्री! इसके लिए तो काला अक्षर और भैंस दोनों एक समान हैं।'' मित्र ने व्यंग्य किया है, ''मुन्नाभाई समाजवादी हैं, अत: भेदभाव उनकी प्रकृति में नहीं हैं।''
हम गंभीर थे, हमारे मित्र के मन में व्यंग्य-पुष्प खिल रहे थे। हमने अपनी गंभीरता का अर्थात दोहराया, ''ये जनाब तो पान, बीड़ी-सिगरट का हिसाब भी नहीं लिख पाते। जब पान खाने जाता था, तब मैं ही लिख कर आता था। अनपढ़ व्यक्ति और शिक्षाशास्त्री!'' हमने आश्चर्य भाव से पुन: प्रश्न किया। हमारे प्रश्न का उत्तर मित्र ने प्रश्नवाचक भाव में दिया, ''अक्ल बड़ी या भैंस?'' हम बोले, ''अक्ल!'' मित्र बोला, ''फिर काले अक्षर और भैंस के बीच समानता क्यों खोजते हो? दोनों के मध्य समानता का अख्यान देते समय अक्ल के तथ्य को क्यों भूल जाते हो? काला अक्षर और भैंस के मध्य समानता का आकलन अतीत का आख्यान हो गया है। अब अक्ल और भैंस के मध्य अनुपातिक समीकरण का जमाना है, अत: बिना भाव भावना को नीलाम कर दो और अक्ल से काम लो।''
मुन्नालाल को शिक्षाशास्त्री का तमगा मिलता देख हमारी अक्ल हमारा दामन छोड़ कर कहीं चली गई। भूखी भैंस की तरह शायद कहीं घास चरने गई होगी, यह सोच कर हमने संतोष किया। किंतु मित्र हमारी अक्ल को वापस हांक कर लाने के प्रयास में जुट गया। वह बोले, ''सुनो भाई! यह शिक्षा के क्षेत्र में हरित क्रांति का जमाना है।'' हमने पुन: आश्चर्य उडेला, ''शिक्षा के क्षेत्र में हरित क्रांति! हरित क्रांति का संबंध तो कृषि क्षेत्र से है? रास्ता भटकी भैंस की तरह हरित क्रांति शिक्षा के क्षेत्र में कहां से घुस आई़?''
मित्र ने माथा ठोका और फिर बोला, ''लगता है, तुम्हारी अक्ल अभी तक किसी घूरे पर घास चर रही है, लौट कर नहीं आई है।'' हमें सांत्वना देने के लहजे में वह फिर बोला, ''कोई बात नहीं, ध्यान से सुना, एकाग्रचित्त हो कर सुनों, लौट आएगी। श्कि्षा के क्षेत्र में हरित क्रांति सावन के अंधे की तरह नहीं आई है। वास्तव में आई है। शिक्षा के क्षेत्र में घुस कर तो देखो चारों तरफ हरा ही हरा नजर आएगा।''
हमने पुन: जिज्ञासा व्यक्त की, ''कैसे?'' वह बोला, ''हरा रंग खुशहाली का प्रतीक है, हरित क्रांति माल पैदा करने का प्रतीक है। शिक्षा के क्षेत्र में चारों तरफ माल ही माल है। जो भी इस क्षेत्र में घुस गया मालामाल हो गया। अपने मुन्नालाल का भी यही हाल है।'' हमने अगला प्रश्न किया, '' कैसे?'' वह बोला, ''अपने मुन्नलाल भाई पानवाले के चार इंजीनियरिंग कालेज हैं, दो मेडीकल कालेज हैं और पांच बिजनेस मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट हैं। भाई अब पानवाले नहीं इंस्टीट्यूट वाले हैं। भई अब मालामाल हैं, शिक्षाशास्त्री हैं।'' ''..किंतु यह हुआ कैसे?'' हमने पूछा। मित्र ने बताया, ''हमारी सलाह पर। मुन्नालाल एक दिन बोले, पान के काम में ससुर पैसा तो है, पर इज्जत ना है। कछु ऐसा काम बताओ जिसमें पैसा भी हो और ससुर इज्जत भी। हम बोले, भाई इंस्टीटंयूट खोल लो। मुन्नालाल बोले, मगर हम तो ससुर काला अक्षर भैंस बराबर है। पढ़ाई-लिखाई से तो हमारा जन्म-जन्म का बैर है। हम बोले बैर का त्याग करो, दोस्ती कर लो। अक्ल से काम लो अकबर बन जाओ, बीरबलों की कमी नहीं है। एक ढूंढों के हजार मिल जाएंगे। बस मुन्नालाल की अक्ल में हमारी बात धंस गई और शिक्षाशास्त्री हो गए। अगली सरकार में शिक्षामंत्री भी हो जाएंगे।'' मुन्नलाल पानवाला शिक्षाशास्त्री हो गया। हम बीरबल बने शिक्षा के क्षेत्र में हल चलाने में व्यस्त हैं। मुन्नालाल अकबर बन हरित क्रांति का माल लूटने में व्यस्त है।
Saturday, October 6, 2007
एक अदद जटायु की खोज

एक अदद जटायु की खोज
राजेन्द्र त्यागी
जीव विज्ञानी गिद्धों की घटती पैदावार को लेकर चिंतित हैं। अब अपनी ऊर्जा वे गिद्धों की पैदावार बढ़ाने में लगाएंगे। सुना है, सरकार भी इस विषय को लेकर काफी चिंतित है। सरकार की चिंता को लेकर हमें कोई आश्चर्य नहीं है, क्योंकि सजातीय के प्रति चिंतित होना जीवों का स्वभाव है। सरकार नामक गठबंधन में शामिल तत्वों कुछ हों या न हों, किंतु उनके जीव होने से इनकार नहीं किया जा सकता। वैसे भी, सरकारों का सरोकार मुख्य रूप में चिंता और चिंतन से ही है, अत: गिद्धों के प्रति उनका मोह आश्चर्य का विषय नहीं है। आश्चर्य हमें विज्ञानियों की सोच को लेकर हुआ, क्योंकि हम उन्हें न बुद्धूजीवी मानते हैं और न ही गिद्धों का सजातीय। फिर न जाने क्यों, अचानक उन्हें गिद्ध मोह कैसे हो गया? क्यों उनकी पैदावार बढ़ाने के लिए अभियान चला रहे हैं? इसे सोहबत का असर भी कहा जा सकता है और परिस्थितिजन्य अन्य कारण भी। अभियान केवल गिद्धों की पैदावार को लेकर ही चलाया जाता तो भी हमारी चिंता का वजन वजनदार न होता, हमारे लिए भी चिंता सरकारी स्तर की होती। चिंता का वजन वजनी होने का कारण गिद्धों की पैदावार बढ़ाने और इंसानों की पैदावार घटाने के लिए चलाए जा रहे अभियान हैं। कभी-कभी लगता है कि सरकार और विज्ञानियों को अब इंसानों की अपेक्षा गिद्धों की कहीं अधिक आवश्यकता है। गिद्धों की पैदावार घट रही है, यह सुनकर भी आश्चर्य होता है और इंसानियत विरोधी ऐसे लोगों की बुद्धि पर तरस भी आता है। वास्तविकता तो यह है कि पैदावार गिद्धों की नहीं, इंसानों की घट रही है। गिद्ध तो एक ढूंढों, हजार मिलते हैं और इंसान हजार के बीच एक भी मुश्किल से! हम इतना अवश्य स्वीकारते हैं कि मरे जानवरों को आहार बनाने वाले गिद्धनुमा विशाल परिंदे आसमान में अब नहीं दिखाई पड़ते, लेकिन उनकी न संख्या में कमी आई और न ही उनकी पैदावार घटी है, केवल स्वरूप बदला है। गिद्धों के परिवर्तित रूप को पहचानो और दृष्टिं बदलो, चारो ओर गिद्ध ही गिद्ध नजर आएंगे। उनके स्वरूप में ही नहीं, स्वभाव में भी परिवर्तन आया है। परिंदे मृत देह का भक्षण करते थे, परिवर्तित गिद्ध जीवित को अपना आहार बना रहे हैं। परिंदे पर्यावरण के लिए लाभदायक होते होंगे, हम इनकार नहीं करते, मगर परिवर्तित गिद्ध समाज के पर्यावरण को प्रदूषित कर रहे हैं। रूप परिवर्तन का यह सिद्धांत मनगढ़ंत नहीं, इसके पीछे ऐतिहासिक आधार है। कलियुग के साथ यह विडंबना रही है कि सतयुग, त्रेता अथवा द्वापरयुग में जब कभी किसी देवता ने रुष्ट-तुष्ट अवस्था में किसी को शाप या वरदान दिया तो कलियुग में मानव योनि प्राप्त होने का ही दिया। भगवान राम भी इससे अछूते नहीं रहे। वन से लौटने के समय भक्ति-भाव से प्रसन्न होकर उन्होंने किन्नरों को कलियुग में राज करने का वरदान दिया था। भगवान राम के उस वरदान का परिणाम सबके सामने है। हमारा अनुमान है कि जटायु की भक्ति से भी प्रसन्न होकर भगवान ने अवश्य उसे भी ऐसा ही कुछ वरदान दिया होगा, 'हम तुम्हारी भक्ति से प्रसन्न हुए वत्स। कलियुग में तुम्हें मनुष्य योनि प्राप्त होगी।'भगवान राम के वरदान का सहारा लेकर त्रेतायुग के सारे गिद्ध कलियुग में मनुष्य योनि को प्राप्त हो गए। जो चतुर सुजान थे, उन्होंने सत्ता का भी दरवाजा जा खटखटाया। इसमें भगवान राम की भी कोई गलती नहीं है। उन्होंने तो केवल जटायु को वरदान दिया था। उसका लाभ समूची प्रजाति ने उठा लिया। यह कलियुग की परंपरा है, क्योंकि इस युग के देवता स्वभावत: काफी उदार हैं। खैर, जो हुआ, विधि का विधान है, इस पर किसी का वश नहीं है, किंतु भूल सुधार की जा सकती है, की जानी चाहिए। खोज गिद्धों की नहीं, जटायु की होनी चाहिए। उन्हीं की घटती पैदावार चिंता का विषय होनी चाहिए।
संपर्क : 9868113044
Thursday, October 4, 2007
जमाना कुत्तों का

जमाना कुत्तों का
राजेद्र त्यागी
न्यूयार्क की बुढिया लियोन हेल्मले अपनी वसीयत में लाखों डालर अपने प्रिय कुत्ते ट्रबल के नाम कर गई। खबर पढ़ कर हमारा चेहरा सड़े कद्दू सा लटक गया। इनसान होने के अहसास को मन ही मन लानत दी, ''कितना अच्छा होता यदि हम भी किसी लियोना के प्रिय ट्रबल होते। दिन फाकों में तो न गुजरते। तलवे चाटते और बुढिया के मरने की खुदा से दुआ करते। भौंकने और तलुवे चाटने में हर्ज भी क्या है, यदि अरबपति बनने का सुनहरी अवसर प्राप्त होता हो जाए। अब कौन उसे कुत्ता कहने की हिमाकत करेगा। अब तक तलवे चाटे थे, अब वह अपने तलवे चटवाएगा।''
कुत्ते की किस्मत से रश्क करते-करते हम जमाने को गरियाने लगे, ''हाय! कैसा जमाना आ गया है, गधे कमाए, कुत्ते खाएं! बुढि़या ने एक बार भी गधों के बारे में नहीं सोचा, जिनकी मेहनत के बल पर वह अरबपति बनी। कोई बात नहीं, वही खाएगा जिसकी किस्मत में लिखा होगा, लेकिन जलालत तो यह है कि पंजीरी कुत्ते खाएं और बदनाम गधों को किया जाए। जहान का बोझा भी ढोएं और बदनाम भी हों। सरासर ज्यादती! हमने अपने मित्र से इस दुखद पहलू का कारण पूछा, तो वह तपाक से बोला, ''ढोने का काम जब है ही गधों का तो बदनामी ही कोई और क्यों ढोए!'' दरअसल हमारे मित्र व्यवहारिक किस्म के जीव हैं। कुत्तों के सद्गुण अपना कर निरंतर प्रगति पथ पर अग्रसर हैं।
अपनी इसी व्यथा को लेकर हमने कृशन चंदर के जहीन गधे से भी भेंट की थी। उनके प्रवचन सुन हमारे दिमाग की बंद सभी खिड़कियां एक-एक कर खुलती चली गई। उनकी जहानत से प्रभावित हो कर उन्हें सलाह दे बैठे, ''दादा! तुम्हें तो राजनीति में होना चाहिए था। तुम्हारे जैसे जहीन कई जीव राजनीति के शिखर तक पहुंच चुके हैं।'' हमारा प्रश्न सुन दादा भड़क गए और नथुने फुला कर बोले, ''किसी एक का नाम तो बताओ बरखुरदार? अरे, जहां मलाई कटती हो वहां हमारे जैसे ईमानदार और मेहनती जीवों को कौन जमने देता है।''
खिसकते-खिसकते हम मूल प्रश्न पर आए, ''दादा! 'गधे पंजीरी खा रहे हैं' फिर यह कहावत क्यों?'' दादा ने नथुने सिकोड़े और बोले, ''अरे, भाई! गधे पंजीरी ढोते भर हैं, खाते नहीं हैं। तुम्हारे ये टीवी चैनल वाले पंजीरी ढोते गधों के फोटो लेकर प्रचारित कर देते हैं, गधे पंजीरी खा रहे हैं। असल में पंजीरी कुत्ते ही खा रहे हैं, हमारे नाम तो बस वाउचर भरे जा रहे हैं।''
दादा की बात में जान दिखलाई दी। दिमाग की खुली खिड़की से हमारी अंतरात्मा झांकी, फिर मुसकराई और बोली, ''अबे, ओ बोड़म! जमाना कुत्तों का है। क्या रखा है इनसान होने में। इनसान गधा है। इंसानियत का त्याग कर कुत्ता बन जा। भौंकना सीख, तलवे चाटने की आदत डाल। आज नहीं तो कल कोई न कोई कंजूस तुझ पर भी आशिक हो जाएगी। अपना न सही मरते-मरते अरबपति तो बना ही जाएगी।''
...
राजेद्र त्यागी
न्यूयार्क की बुढिया लियोन हेल्मले अपनी वसीयत में लाखों डालर अपने प्रिय कुत्ते ट्रबल के नाम कर गई। खबर पढ़ कर हमारा चेहरा सड़े कद्दू सा लटक गया। इनसान होने के अहसास को मन ही मन लानत दी, ''कितना अच्छा होता यदि हम भी किसी लियोना के प्रिय ट्रबल होते। दिन फाकों में तो न गुजरते। तलवे चाटते और बुढिया के मरने की खुदा से दुआ करते। भौंकने और तलुवे चाटने में हर्ज भी क्या है, यदि अरबपति बनने का सुनहरी अवसर प्राप्त होता हो जाए। अब कौन उसे कुत्ता कहने की हिमाकत करेगा। अब तक तलवे चाटे थे, अब वह अपने तलवे चटवाएगा।''
कुत्ते की किस्मत से रश्क करते-करते हम जमाने को गरियाने लगे, ''हाय! कैसा जमाना आ गया है, गधे कमाए, कुत्ते खाएं! बुढि़या ने एक बार भी गधों के बारे में नहीं सोचा, जिनकी मेहनत के बल पर वह अरबपति बनी। कोई बात नहीं, वही खाएगा जिसकी किस्मत में लिखा होगा, लेकिन जलालत तो यह है कि पंजीरी कुत्ते खाएं और बदनाम गधों को किया जाए। जहान का बोझा भी ढोएं और बदनाम भी हों। सरासर ज्यादती! हमने अपने मित्र से इस दुखद पहलू का कारण पूछा, तो वह तपाक से बोला, ''ढोने का काम जब है ही गधों का तो बदनामी ही कोई और क्यों ढोए!'' दरअसल हमारे मित्र व्यवहारिक किस्म के जीव हैं। कुत्तों के सद्गुण अपना कर निरंतर प्रगति पथ पर अग्रसर हैं।
अपनी इसी व्यथा को लेकर हमने कृशन चंदर के जहीन गधे से भी भेंट की थी। उनके प्रवचन सुन हमारे दिमाग की बंद सभी खिड़कियां एक-एक कर खुलती चली गई। उनकी जहानत से प्रभावित हो कर उन्हें सलाह दे बैठे, ''दादा! तुम्हें तो राजनीति में होना चाहिए था। तुम्हारे जैसे जहीन कई जीव राजनीति के शिखर तक पहुंच चुके हैं।'' हमारा प्रश्न सुन दादा भड़क गए और नथुने फुला कर बोले, ''किसी एक का नाम तो बताओ बरखुरदार? अरे, जहां मलाई कटती हो वहां हमारे जैसे ईमानदार और मेहनती जीवों को कौन जमने देता है।''
खिसकते-खिसकते हम मूल प्रश्न पर आए, ''दादा! 'गधे पंजीरी खा रहे हैं' फिर यह कहावत क्यों?'' दादा ने नथुने सिकोड़े और बोले, ''अरे, भाई! गधे पंजीरी ढोते भर हैं, खाते नहीं हैं। तुम्हारे ये टीवी चैनल वाले पंजीरी ढोते गधों के फोटो लेकर प्रचारित कर देते हैं, गधे पंजीरी खा रहे हैं। असल में पंजीरी कुत्ते ही खा रहे हैं, हमारे नाम तो बस वाउचर भरे जा रहे हैं।''
दादा की बात में जान दिखलाई दी। दिमाग की खुली खिड़की से हमारी अंतरात्मा झांकी, फिर मुसकराई और बोली, ''अबे, ओ बोड़म! जमाना कुत्तों का है। क्या रखा है इनसान होने में। इनसान गधा है। इंसानियत का त्याग कर कुत्ता बन जा। भौंकना सीख, तलवे चाटने की आदत डाल। आज नहीं तो कल कोई न कोई कंजूस तुझ पर भी आशिक हो जाएगी। अपना न सही मरते-मरते अरबपति तो बना ही जाएगी।''
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