दुनिया-जहान के सभी पुण्य कार्य अंधेरे में संपन्न किए जाते हैं। दिन के उजाले में नहीं! लक्ष्मी भी अमावस्या की अंधेरी रात में विचरण करती है। पूर्णिमा की उजली रात में नहीं। फिर न जाने क्यों आदमी ''तमसो माँ ज्योतिर्गमय'' अंधेरे से उजाले की ओर जाने की कामना करता है? न जाने क्यों द्वार पर दीपक जलाकर लक्ष्मी के आने की आशा करता है?
कुछ लोगों की साजिश लगती है, यह! जब कभी कोई तीज-त्योहार आता है, साजिशन कुछ घिसे-पिटे जुमले बरसात में मेंढकों की तरह हवा में उछले जाते हैं। मसलन, पूरे वर्ष असत्य से मात खाते रहने वाला सत्य, दशहरा आते ही असत्य पर जीत का दावा करने लगता है। वेंटिलेटर पर अंतिम सांसें गिनती-गिनती अच्छाई अचानक बुराई पर विजय प्राप्त करने का दम भरने लगती है। जैसे-जैसे दीपावली नजदीक आती है, अंधकार के सहारे जीवन-यापन करने वाला प्रकाश उसी अंधकार पर विजय प्राप्त करने का दावा करने लगता है। गुमनाम जिंदगी बसर करने वाले ऐसे कथित मूल्यों का वर्ष में एक बार उछलना, पितरों का श्राद्ध मनाने जैसा लगता है।
मृत जुमले उछालने वाले लोगों से मुझे सख्त नफरत है, उनकी साजिश से नफरत है, मुझे! ..चालू किस्म के लोग, कथित मूल्यों से चिपके ऐसे बेदम जुमले उछाल कर अन्य लोगों को गुमराह करते हैं। ऐसा करने में ही उनका हित है। मेरी प्रार्थना है कि चालू किस्म के ऐसे लोगों की बातों में न आना। बुराई के पीछे छिपी अच्छाई को पहचानना। सकारात्मक सोच का इस्तेमाल कर उन अच्छाईओं को खोजना और उन्हीं का अनुसरण करना।
''तमसो माँ ज्योतिर्गमय'' अव्यवहारिक प्रार्थना है। सफल कोई भी व्यक्ति शायद ही अंधकार से प्रकाश में आने की ऐसी अव्यवहारिक कामना करता होगा, क्योंकि प्रकाशित होने पर पुण्य कार्य भी पाप में तब्दील हो जाते हैं! कौन व्यक्ति पुण्य नहीं कमाना चाहेगा? प्रकाश में आकर क्यों बदनाम होना चाहेगा? अंधकार से प्रकाश की ओर जाने की प्रार्थना केवल गुमराह करने के उद्देश्य से दुहराई जाती है, ताकि अन्य के पुण्य कार्य प्रकाशित हो कर पाप में तब्दील होते रहें और खुद वे अंधेरे में मस्ती काटते रहें।
अब आप ही बताएं, जिसका आधार ही अंधियारा है, क्या वह प्रकाश कभी अंधकार पर विजय प्राप्त कर पाएगा? क्यों भूल जाते हो, टिमटिमाते जिस दीपक के सहारे अंधकार पर प्रकाश की विजय की असत्य घोषणा कर रहे हो, वह दीपक खुद ही अंधकार में विराजमान है।
''दिए तले अंधेरा'' किसने नहीं देखा! कुछ देर टिमटिमाने के बाद दिया बुझ जाएगा और अंधकार फिर सारे वातावरण में छा जाएगा। अंधकार ही स्थायी है, प्रकाश अस्थायी। माँ से केवल यही प्रार्थना करो- मुझे प्रकाश से अंधकार की ओर ले चल, माँ! ..मुझे स्थायित्व प्रदान कर, माँ! ..लोग मूर्ख हैं, द्वार पर दीपक जलाकर लक्ष्मी का स्वागत रखने की इच्छा रखते हैं और लक्ष्मी अमावस्या के काले साये में स्याह दिलों को धन-धान्य से पूर्ण कर लौट जाती है। अंधकार विजयी हो जाता है और कुछ देर के बाद पराजित योद्धा की तरह प्रकाश भी अंधकार में विलीन हो जाता है!
दुनिया के सारे कारोबार असत्य के ही सहारे तो चलते हैं! असत्य ही प्रगति पथ का निर्धारक है, व्यवहारिक है और सत्य अव्यवहारिक है, प्रगति में बाधक है। चारों ओर असत्य ही का गुणगान हो रहा है! अत: असत्य ही सत्य है!
प्रत्येक व्यवहारिक व्यक्ति जब-जब असत्य न बोलने का दावा करता है, तब-तब वह असत्य ही का तो पालन करता है। जो व्यक्ति सदैव सत्य बोलता है, उसे सफाई देने की आवश्यकता क्या है? सत्य का इस्तेमाल केवल असत्य स्थापित करने के लिए किया जाता है। अत: वर्णमाला के प्रथम अक्षर के साथ चिपके सत्य को पहचानों। अकेले सत्य का त्याग कर 'अ' के चिपके सत्य का अनुसरण करो, प्रगति पथ पर बढ़ो! सत्य कभी का पराजित हो चुका है। असत्य ही की जय-जय कार है, इसलिए प्रकाश नहीं अंधेरों से दोस्ती करना सीखो!
संपर्क : 9868113044
Thursday, November 8, 2007
Wednesday, November 7, 2007
न दोस्ती अच्छी, न दुशमनी उनकी
मच्छरों की भिन-भिनाहट और कौवों की कांव-कांव से तमाम शहर परेशान है। मार्केटिंग में दोनों इतने उस्ताद हैं कि किसी को किसी की सुनने ही नहीं देते। बात सुनने-सुनाने तक ही सीमित हो तो भी सब्र कर लिया जाए, मगर मोका पड़ते ही दोनों डंक मारने से भी नहीं चूकते। डंक भी ऐसा कि पीड़ित पानी न मांगे। बावजूद इसके देखिए कि आदमी जानते-बूझते भी न मच्छरों से पीछा छुटाना चाहता है और न ही कौवों से। मच्छरों को रक्त पिला-पिला कर पाले हुए है और कौवों को श्रद्धा के साथ श्राद्ध का हलवा-पूरी। विडंबना देखिए कि दुष्ट कौवों को इतना विश्वासपात्र और शुभ मान लिया जाता है कि प्रिय के आने का सगुन भी कौवों की कांव-कांव से ही मनाया जाता है।
आदमी की मजबूरी है, क्योंकि मच्छर पानी में पनपते हैं। अब पानी रोको तो मच्छर पनपने का खतरा और वह भी डेंगू जैसे खतरनाक किस्म का, ऊपर से म्यूनिसपैलिटि वालों के चालान का डर। पानी उतर जाए तो समाज में किरकिरी। एक बूंद पानी चेहरे से लुड़का नहीं कि सुनने को मिल जाएगा, 'अरे, पानी उतर चेहरा लिए फिरता है। आंखों का पानी सूख गया है।' अब कहने वालों को भला कौन समझाए कि आंख में पानी रुक गया तो मच्छर पैदा हो जाएंगे, म्यूनिसपैलिटि वाले चालान काट जाएंगे। म्यूनिसपैलिटि वालों की आंख हालांकि शुष्क होती हैं, यानी के पानी विहीन होती हैं, इसलिए सूक्ष्मदर्शी होती हैं। फिर भी खुदा-ना-खास्ता किसी की आंख का पानी उनसे चूक भी गया तो, जनाब डेंगू बुखार का खतरा और देर-सबेर आंख बंद हो जाने का शुभ अवसर पैदा होने का खतरा। अब कहने वालों को कौन समझाए कि भइया चेहरे का पानी उतारने की वजह कुछ और नहीं बस मच्छरों से बचाव है।
समझ नहीं आता कि रहीम दादा किन परिस्थितियों में कह गए, 'रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून। पानी गए न उबरे, मोती-मानस चून।' ऐसा लगता है कि रहीम दादा के जमाने में मच्छर नहीं होते होंगे। होते भी होंगे, तो डेंगू किस्म के कतई नहीं होंगे। अगर डेंगू मच्छर होते तो म्यूनिसपैलिटि वाले उन्हें देशद्रोह के आरोप में बंद कर देते। खैर रहीम के दिन अच्छे थे, क्योंकि मच्छरों के आतंक से बचे हुए थे। मच्छर यदि होते तो यह बात भी गारंटी के साथ कह सकता हूं कि रहीम दादा की गिनती अकबर के नवरत्नों में न होती। तब उनका समूचा भक्ति साहित्य किसी डेंगू-साहित्य के नाम से प्रसिद्ध हुआ होता।
आज परिस्थितियां भिन्न हैं। हालांकि पानी का संकट है, चेहरों का पानी उतर गया है, आंखों का सूख गया है, फिर भी चारों तरफ मच्छरों की भिन-भिनाहट है, अर्थात मच्छरों का साम्राज्य है। फण्डा बड़ा साफ है, पानी उतर रहा है, अत: कहीं न कहीं तो रुकेगा ही। रुकेगा वहां, झील होगी और जहां झील होगी मच्छर भी वहीं पनपेंगे। मगर यह मत समझ लेना कि पानी में पनपने वाले मच्छर खुद में पानीदार होते हैं, नहीं-नहीं पानीदार जीव की प्रवृत्ति दूसरे जीवों का रक्त पीने की नहीं होती। इसे इस तरह भी कहा जा सकता है कि परजीवी वही होता है, जो पानी विहीन होता है।
अब रही बात कौवों की बड़े ही उस्ताद किस्म की जीव होते हैं। कोयल जैसा सुर नहीं, हंस जैसी तासीर नहीं फिर भी हलवा-पूरी मारते हैं। माल खुद चट कर जाते हैं और फतवा यह कि पितरों तक पहुंचा रहे हैं। माल न मिले तो कांव-कांव। आदमी समझता है कि उसकी प्रशंसा में गीत गा रहा है, मगर काग साहब अपना उल्लू सीधा करने में जुटे हैं। उल्लू है तो कोई न कोई सीधा करेगा ही, मगर उल्लू सीधा करते-करते यदि घायल कर जाए तो? हां, काग वृत्ति का यही कमाल है। सीता जी समझती रहीं होंगी का काग देव चरण-वंदना करने आ रहे हैं और वे जनाब उनके चरण घायल कर गए। यही कुछ जरूर कृष्ण भगवान के साथ भी हुआ होगा। वे भी सोच रहें होंगे कि कौआ बेचारा श्रद्धावश उनके पास आ रहा है और वह उनके हाथ से ले उड़ा माखन-रोटी। अब सूरदासजी भले ही काग के भाग्य की सराहना करते रहें, मगर वह भाग्य नहीं काग वृत्ति का कमाल था। अत: हमारी यही सलाह है कि मच्छर व काग वृत्ति को समझों, उन से दूर रहो। उनकी न दोस्ती अच्छी है और न ही दुशमनी।
संपर्क : 986811304
Tuesday, November 6, 2007
पाकिस्तान में तड़का लगे, छींके हिंदुस्तान
पाकिस्तान में इमरजेंसी की घोषणा, सुनकर भयावह आश्चर्य की अनुभूति हुई। इमरजेंसी-वार्ड में इमरजेंसी की घोषणा! जिस शिशु का जन्म ही इमरजेंसी-वार्ड में हुआ हो और अभी तक वेंटिलेटर पर सांसें गिन रहा हो, उसके लिए इमरजेंसी की घोषणा! मतलब साफ हैं, मामला कुछ गड़बड़ है, अंतिम दौर के आसपास है! भयावह इसलिए कि यदि इमरजेंसी-वार्ड की परिस्थितियां भी इमरजेंसी हो गई तो फिर वहां, इमरजेंसी नहीं, उससे ऊपर वाले किसी दर्जे की व्यवस्था की आवश्यकता है! संभवतया जनहित में घोषणा इमरजेंसी की कर दी गई होगी। एक विशेषज्ञ ने लगभग ठीक ही कहा है- यह इमरजेंसी और मार्शल लॉ के बीच की कोई स्थिति है। हम कहते हैं, यह मार्शल लॉ से भी ऊपर की कोई स्थिति है। मार्शल अपने से ऊपर की ही कोई स्थिति उत्पन्न करेगा, तभी तो उसका कद बढ़ेगा। पाकिस्तान की इमरजेंसी दूरदर्शनी-परिचर्चा का विषय है।
खैर कुछ भी सही , इस बारे में हम मुशर्रफ साहब की साफगोई के कायल हो गए। उन्होंने ठीक ही कहा,- ऐ पश्चिम वालों अभी हमारा बच्चा वेंटिलेटर पर हैं। डेमोक्रेसी के लक्जरी वार्ड में शिफ्ट करने में समय लगेगा! तुम्हें भी तो सदियों लगे थे डेमोक्रेसी-वार्ड में शिफ्ट होने में! सुनों, तुम हमारी तरह की इमरजेंसी नहीं ला सकते, हम तुम्हारी तरह की डेमोक्रेसी! पाकिस्तान की जनता ने 'मुशर्रफ कपड़े उतारो, कपड़े उतारो' चिल्ला-चिल्ला कर पाकिस्तान को नख्लिस्तान बना डाला, तो बेचारे मुशर्रफ साहब क्या करते, उन्होंने कपड़े उतार दिए। पता नहीं क्यों अब शेम-शेम चिल्ला रही है! जनता आतंकवाद-आतंकवाद का शोर मचाकर आतंक फैला रही थी। जिन महानुभावों के आतंकवाद से खतरा था, मुशर्रफ साहब ने उन्हें सुरक्षित-स्थान पर पहुंचा दिया। पता नहीं क्यों वे ही लोग अब उसे नजरबंदी बताकर इमरजेंसी का शोर मचा रहे हैं। किसी ने सच ही कहा है, कोई भी शख्स सभी को खुश नहीं रख सकता!
पाकिस्तान अपने हिंदुस्तान का पड़ोसी मुल्क है। पड़ोस में सड़ी मिर्च का तड़का लगेगा, तो छींक पड़ोसी को आएगी ही। पड़ोस में बरसात हो और पड़ोसी बौछार से बच जाए, यह असंभव है। भाजपा का इसमें कोई कुसूर नहीं है। वह तो पड़ोसी पाकिस्तान के तड़के के कारण छींक रही है। तो उसे याद आएगा ही कि हमारे वो भी एक दिन सड़ी मिर्चा ले आए थे। पाकिस्तान की इमरजेंसी के बहाने अपनी इमरजेंसी को कोसना स्वाभाविक है। रोने के लिए आखिर मुद्दा तो कोई चाहिए। रोएगी-चीखेगी नहीं तो भारत की जनता उसके मौन का अर्थ क्या लगाएगी, क्या यह बताने की भी जरूरत है। हमारी माताजी स्वर्गवासी हुई। मातम-पुरसी के लिए पड़ोसिन आई। हमारी माताजी का जिक्र करते-करते अपने-अपने स्वर्गवासियों के लिए विलाप करने लगीं। उनके उसी विलाप से हमें पता चला कि घूंघट में कौन सी पड़ोसिन छिपी हैं। किस-किसने रुदाली का कितना सशक्त अभिनय किया, उनके स्वजन-विलाप से ही हमें ज्ञात हुआ। जब उनके यहां कोई ताजा-ताजा स्वर्ग सिधारेगा, हम भी उसी के अनुरूप रुदन की परंपरा का निर्वाह करेंगे। उसी परंपरा का अनुसरण बेचारी भाजपा कर रही है।
पाकिस्तान की इमरजेंसी के आधार पर इंदिरा-युगीन इमरजेंसी को याद कर विलाप करना, भाजपा की मजबूरी भी है। महंगाई के मुद्दे पर वह विलाप कर नहीं सकती, क्योंकि उसके राज्य में भी महंगाई कम कृपावान नहीं थी। महंगाई एक ही किस्म की होती है, अत: महंगाई की किस्म भी विलाप का कारण नहीं बन सकती। 'गरीबी हटाओ-देश बचाओ' जैसे घटिया किस्म के विषय पर ध्यान देकर वह अपनी ऊर्जा फिजूल में नष्ट करने की पक्षधर कभी रही ही नहीं! बेचारी अभी तक परमाणु-डील के वाममार्गी टाइप मुद्दे पर आंसू बहा रही थी।
भगवान इमरजेंसी लगे अमेरिका में, वह मुद्दा भी बेचारी से छिन लिया। कभी किसिंजर, तो कभी मलफर्ड तो कभी टालबोट जैसे एक के बाद एक धमकाऊ-पूत भेजकर डील-मुद्दे को टालने के लिए दबाव डालती रही। क्या करती बेचारी आखिरकार डील-मुद्दे को टालमटोल की नीति भेंट चढ़ाना ही पड़ा। भला हो पाकिस्तान का इमरजेंसी लग गई। उसके दुख में विलाप करने के साथ-साथ अपनी इमरजेंसी पर भी विलाप करने की सुविधा मिल गई। भाजपा को वास्तव में पाकिस्तान का शुक्रगुजार होना चाहिए। भगवान राम के बाद यदि कोई उसे ऊर्जा प्रदान कर रहा है तो केवल पाकिस्तान। कभी कश्मीर के बहाने, तो कभी जिन्ना के और अब इमरजेंसी के बहाने ऊर्जा प्राप्त हो रही
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Monday, November 5, 2007
बॉस बनाम बांस
प्रश्न, बॉस किसे कहते हैं? उत्तर, जिसके हाथ में बांस हो, उसे बॉस कहते हैं। अगला प्रश्न बांस किसे कहते हैं? जिसे देख कर भूत भागते हैं, जिसके इशारे पर शेर नाचते हैं। जिससे बंद सीवर खोले जाते हैं। छोटा दीखता है, कुछ चिकना होता है, किंतु मारक होता है। वार कहीं करता है, घाव कहीं होता है।
सच बात है, बांस बिन बॉस की गरिमा नहीं, बांस बिना बॉस, बॉस नहीं। बॉस के हाथ में यदि बांस न हो तो वह न कभी अपनी और न ही दूसरों की बांसुरी बजा पाएगा। बांस रखना और बांसुरी बजाना बॉस का धर्म है। घनिष्ठ इस संबंध के अतिरिक्त बॉस और बांस के मध्य कुछ समानता भी हैं। मसलन, बॉस और बांस दोनों गांठ -गठीले होते है। प्रत्येक गांठ कुछ शंका, कुछ आशंकाओं, कुछ प्रश्न और कुछ रहस्यों से भरी होती हैं। एक गांठ का रहस्य सुलझाने का प्रयास करोगे, दूसरी गांठ पहली से ज्यादा मजबूत नजर आएगी। गांठें कच्चे धागे की गांठ के समान होती हैं, जो कभी खुलती ही नहीं हैं, प्रयास करने पर उलझती ही चली जाती हैं।
बॉस का और बांस का मुसकराना यदा-कदा ही होता है। सदियों में जाकर कभी बांस पर फूल खिलते हैं और जब खिलते हैं, तो अकाल साथ लेकर आते हैं। बॉस कभी मुस्कराते नहीं है और जब कभी मुस्कराते हैं तो किसी के लिए संकट के बादल लेकर आते हैं। ऐसी ही कुछ समानताओं के कारण बॉस और बांस कभी-कभी एक दूसरे के पर्यायवाची से लगते हैं।
अंग्रेज बॉस और बांस के पारस्परिक संबंधों से भीलीभांति परिचित थे, इसलिए वे और उनके अधिकारी हाथ में सदैव बांस रखते थे। उनके लिए बांस बॉसिज्म का प्रतीक था, जिसे वे रूल कहते थे। उस रूल के ही सहारे रूलिंग चलती थी। रूल के सामने शेष सभी 'रूल' व्यर्थ थे। बांस के सहारे ही वे 150 वर्ष तक भारत के शानदार बॉस बने रहे। बांस रूपी रूल का ही कमाल था कि उनके राज्य में कभी सूरज डूबा ही नहीं। बांस कमजोर हुआ तो सूरज ऐसा डूबा की अब ब्रिटेन में भी उगने का नाम भी नहीं ले रहा है।
विश्व की समूची राजनीति के दो ही आधार हैं, बॉसिज्म और बांसिज्म। नटनी के समान विश्व राजनीति भी बांस के सहारे ही तो पतली रस्सी पर चल कर अपना सफर पूरा करती है। हो भी क्यों ना राजनीति और नटनी सगी बहने ही तो हैं। ऊंट किस करवट बैठेगा, प्रयास करने पर पता किया जा सकता है, मगर राजनीति और नटनी कब किस करवट लुढ़क जाए किसे पता है।
''उसका बांस मेरे बांस से लंबा क्यों?'' बांसिज्म के इसी दर्शन पर विश्व की राजनीति टिकी है। समस्या कश्मीर की हो या अफगान की अथवा इराक की, जड़ में सभी के बांस है। अमेरिका आज अमेरिका न होता यदि उसके हाथ में बांस न होता। पाकिस्तान में आपातकाल लगाकर मुशर्रफ साहब ने अपने बांस को ही कुछ सशक्त, कुछ लंबा करने का प्रयास किया है। झगड़ा बांस का ही है। मेरे बांस से उसका बांस लंबा क्यों?
विकासशील सभी देश महाशक्ति बनने के लिए आज लंबे और मजबूत बांस की तलाश में हैं। हमारा मानना है कि तृतीय विश्वयुद्ध यदि कभी होगा भी तो, न तेल के लिए होगा और न ही पानी के लिए। होगा तो केवल बांस के लिए होगा, क्योंकि युद्ध जब कभी भी हुए हैं, बॉसिज्म और बांसिज्म को लेकर ही हुए हैं। मजबूत बांस वाला ही युद्ध में विजयी होगा और वही विश्व-बॉस कहलाएगा।
संपर्क : 9868113044
सच बात है, बांस बिन बॉस की गरिमा नहीं, बांस बिना बॉस, बॉस नहीं। बॉस के हाथ में यदि बांस न हो तो वह न कभी अपनी और न ही दूसरों की बांसुरी बजा पाएगा। बांस रखना और बांसुरी बजाना बॉस का धर्म है। घनिष्ठ इस संबंध के अतिरिक्त बॉस और बांस के मध्य कुछ समानता भी हैं। मसलन, बॉस और बांस दोनों गांठ -गठीले होते है। प्रत्येक गांठ कुछ शंका, कुछ आशंकाओं, कुछ प्रश्न और कुछ रहस्यों से भरी होती हैं। एक गांठ का रहस्य सुलझाने का प्रयास करोगे, दूसरी गांठ पहली से ज्यादा मजबूत नजर आएगी। गांठें कच्चे धागे की गांठ के समान होती हैं, जो कभी खुलती ही नहीं हैं, प्रयास करने पर उलझती ही चली जाती हैं।
बॉस का और बांस का मुसकराना यदा-कदा ही होता है। सदियों में जाकर कभी बांस पर फूल खिलते हैं और जब खिलते हैं, तो अकाल साथ लेकर आते हैं। बॉस कभी मुस्कराते नहीं है और जब कभी मुस्कराते हैं तो किसी के लिए संकट के बादल लेकर आते हैं। ऐसी ही कुछ समानताओं के कारण बॉस और बांस कभी-कभी एक दूसरे के पर्यायवाची से लगते हैं।
अंग्रेज बॉस और बांस के पारस्परिक संबंधों से भीलीभांति परिचित थे, इसलिए वे और उनके अधिकारी हाथ में सदैव बांस रखते थे। उनके लिए बांस बॉसिज्म का प्रतीक था, जिसे वे रूल कहते थे। उस रूल के ही सहारे रूलिंग चलती थी। रूल के सामने शेष सभी 'रूल' व्यर्थ थे। बांस के सहारे ही वे 150 वर्ष तक भारत के शानदार बॉस बने रहे। बांस रूपी रूल का ही कमाल था कि उनके राज्य में कभी सूरज डूबा ही नहीं। बांस कमजोर हुआ तो सूरज ऐसा डूबा की अब ब्रिटेन में भी उगने का नाम भी नहीं ले रहा है।
विश्व की समूची राजनीति के दो ही आधार हैं, बॉसिज्म और बांसिज्म। नटनी के समान विश्व राजनीति भी बांस के सहारे ही तो पतली रस्सी पर चल कर अपना सफर पूरा करती है। हो भी क्यों ना राजनीति और नटनी सगी बहने ही तो हैं। ऊंट किस करवट बैठेगा, प्रयास करने पर पता किया जा सकता है, मगर राजनीति और नटनी कब किस करवट लुढ़क जाए किसे पता है।
''उसका बांस मेरे बांस से लंबा क्यों?'' बांसिज्म के इसी दर्शन पर विश्व की राजनीति टिकी है। समस्या कश्मीर की हो या अफगान की अथवा इराक की, जड़ में सभी के बांस है। अमेरिका आज अमेरिका न होता यदि उसके हाथ में बांस न होता। पाकिस्तान में आपातकाल लगाकर मुशर्रफ साहब ने अपने बांस को ही कुछ सशक्त, कुछ लंबा करने का प्रयास किया है। झगड़ा बांस का ही है। मेरे बांस से उसका बांस लंबा क्यों?
विकासशील सभी देश महाशक्ति बनने के लिए आज लंबे और मजबूत बांस की तलाश में हैं। हमारा मानना है कि तृतीय विश्वयुद्ध यदि कभी होगा भी तो, न तेल के लिए होगा और न ही पानी के लिए। होगा तो केवल बांस के लिए होगा, क्योंकि युद्ध जब कभी भी हुए हैं, बॉसिज्म और बांसिज्म को लेकर ही हुए हैं। मजबूत बांस वाला ही युद्ध में विजयी होगा और वही विश्व-बॉस कहलाएगा।
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Sunday, November 4, 2007
हमाम के अंदर, हमाम के बाहर
जब से पढ़ा है कि जेबकतरे अब सूटेड-बूटेड हो कर जेबतराशी करने लगे हैं, तब से मैं स्वयं को हमाम के अंदर की अवस्था में पा रहा हूं। मुझे इस बात का गम नहीं है कि जेबतराश जेब हल्की करने के इस पवित्र व्यवसाय में मोबाइल का इस्तेमाल करने लगे हैं। विकारों की तरह मोबाइल का त्याग तो मैंने उसी दिन कर दिया था, जिस दिन से पड़ोसी की बाई ने मोबाइल पर अपॉइंटमेंट ग्रहण करने शुरू किए थे।
मुझे इस बात से भी कोई गिला नहीं है कि इस पवित्र धंधे में महिलाएं भी उतर आई हैं, क्योंकि मैं नारी-स्वातं˜य का समर्थक हूं। किसी भी धंधे में पुरुषों का ही एकाधिकार क्यों रहे। नारियों को भी पुरुष के कंधे से कंधा रगड़ कर चलने का अधिकार प्राप्त होना ही चाहिए।
मेरी पीड़ा का कारण तो केवल उनके सूटेड-बूटेड होने को लेकर है, क्योंकि अब मैं यह तय नहीं कर पा रहा हूं कि कौन से वस्त्र धारण कर बाहर निकलूं। हमाम के अंदर की अवस्था में यदि घर से बाहर कदम रखता हूं, तो व्यथा जाने बिना ही लोग पत्थरों से स्वागत करेंगे। बिना जांच-पड़ताल के ही पुलिस सार्वजनिक-स्थल पर अश्लील हरकत के जुर्म में मुझे अंदर कर देगी। इस तरह की सभी आशंकाओं को यदि दरकिनार कर भी दिया जाए तो लोकलाज हर कदम पर मेरे सामने आकर खड़ी हो जाती है। मेरा मानना है कि तमाम दुशवारियों के बावजूद लोकलाज के कुछ अवशेष अभी भी मौजूद हैं। अवशेष शेष न होते तो आधुनिक संस्कृति की प्रतिनिधि-बालाएं अर्द्धवस्त्र की सीमा रेखा पर ही आकर न रुक जातीं। ऐसी प्रगतिशील बालाएं जिस दिन अर्द्धवस्त्र की लक्ष्मण रेखा भी लांघ जाएंगी उस दिन मैं समझूंगा कि समाज अब लोकलाज की दकियानूसी व्यवस्था से पूर्ण रूपेण मुक्त हो गया है।
बात जेबकतरों के सूटेड-बूटेड होने और हमें हमाम के अंदर की अवस्था प्राप्त होने की चल रही थी। दिगंबर बने घर के अंदर कब तक बैठे रहते, दफ्तर तो जाना ही था। हमने श्रीमती जी से कपड़े मांगे। नए परिवर्तन से बे-खबर श्रीमती जी ने हमारे सामने वही पेंट-शर्ट ला कर पटक दी। हम बोले- इन्हें पहन कर दफ्तर जाऊंगा? श्रीमती जी बोली एक ही दिन तो पहने हैं। हमने उन्हें समझाया जेबकतरों ने अब इन्हें ही अपनी यूनिफार्म बना लिया है। लोग मुझे भी..!
श्रीमती जी कलफ लगा खादी का कुर्ता-पायजामा ले आई। हम तुनक कर बोले, इन्हें पहन कर आफिस जाऊं? श्रीमती जी ने पूछा, इनमें क्या खराबी है। जेबकतरे कुर्ते-पायजामे तो नहीं पहनते। हमारा जवाब था- उनके बॉस तो पहनते हैं। हमने तह खोलकर उनकी प्रत्येक सलवट पर लगे दाग दिखलाए। श्रीमती जी ने टका सा जवाब दिया- ऐसे दाग धोने के लिए अभी तक कोई डिटर्जट नहीं बना है। संदूक दर संदूक छानने के बाद वे कहीं से भगवा-वस्त्र खोज लाई। समझौतावादी सरकार की तरह हमने वामपंथी मन के साथ समझौता किया। सोचा भगवा धारण कर ही दफ्तर चले जाएंगे। यार-दोस्त हंसी ही तो उड़ाएंगे, मगर शक की निगाह से तो नहीं देखेंगे। अफसोस कि भगवा वस्त्र भी बेदाग नहीं निकले। उनकी प्रत्येक तह पर लिखा था, ''मुंह में राम बगल में माया''।
हम पुन: स्वयं को हमाम के अंदर की अवस्था में पा रहे थे। जेबकतरों को कोस रहे थे। कमबख्तों, पहनने के लिए तुम्हें सूट-बूट ही मिले थे। खादी का कुर्ता-पायजामा या भगवा चोगा धारण कर लेते। कुछ दाग पहले ही लगे थे, कुछ और लग जाते। उन्हें धारण करने के बाद भी तुम तो जैसे थे वैसे ही रहते। हमाम के अंदर-बाहर समान अवस्था में ही रहते। कम से कम हम तो अवस्था परिवर्तन के दुष्चक्र से बच जाते। फैशन डिजाइनरों से मेरी प्रार्थना है, कुछ इस प्रकार के भी वस्त्र डिजाइन करो, जिन्हें धारण कर हम जैसे भी हमाम से बाहर की अवस्था का अहसास कर सकें।
संपर्क 9868113044
मुझे इस बात से भी कोई गिला नहीं है कि इस पवित्र धंधे में महिलाएं भी उतर आई हैं, क्योंकि मैं नारी-स्वातं˜य का समर्थक हूं। किसी भी धंधे में पुरुषों का ही एकाधिकार क्यों रहे। नारियों को भी पुरुष के कंधे से कंधा रगड़ कर चलने का अधिकार प्राप्त होना ही चाहिए।
मेरी पीड़ा का कारण तो केवल उनके सूटेड-बूटेड होने को लेकर है, क्योंकि अब मैं यह तय नहीं कर पा रहा हूं कि कौन से वस्त्र धारण कर बाहर निकलूं। हमाम के अंदर की अवस्था में यदि घर से बाहर कदम रखता हूं, तो व्यथा जाने बिना ही लोग पत्थरों से स्वागत करेंगे। बिना जांच-पड़ताल के ही पुलिस सार्वजनिक-स्थल पर अश्लील हरकत के जुर्म में मुझे अंदर कर देगी। इस तरह की सभी आशंकाओं को यदि दरकिनार कर भी दिया जाए तो लोकलाज हर कदम पर मेरे सामने आकर खड़ी हो जाती है। मेरा मानना है कि तमाम दुशवारियों के बावजूद लोकलाज के कुछ अवशेष अभी भी मौजूद हैं। अवशेष शेष न होते तो आधुनिक संस्कृति की प्रतिनिधि-बालाएं अर्द्धवस्त्र की सीमा रेखा पर ही आकर न रुक जातीं। ऐसी प्रगतिशील बालाएं जिस दिन अर्द्धवस्त्र की लक्ष्मण रेखा भी लांघ जाएंगी उस दिन मैं समझूंगा कि समाज अब लोकलाज की दकियानूसी व्यवस्था से पूर्ण रूपेण मुक्त हो गया है।
बात जेबकतरों के सूटेड-बूटेड होने और हमें हमाम के अंदर की अवस्था प्राप्त होने की चल रही थी। दिगंबर बने घर के अंदर कब तक बैठे रहते, दफ्तर तो जाना ही था। हमने श्रीमती जी से कपड़े मांगे। नए परिवर्तन से बे-खबर श्रीमती जी ने हमारे सामने वही पेंट-शर्ट ला कर पटक दी। हम बोले- इन्हें पहन कर दफ्तर जाऊंगा? श्रीमती जी बोली एक ही दिन तो पहने हैं। हमने उन्हें समझाया जेबकतरों ने अब इन्हें ही अपनी यूनिफार्म बना लिया है। लोग मुझे भी..!
श्रीमती जी कलफ लगा खादी का कुर्ता-पायजामा ले आई। हम तुनक कर बोले, इन्हें पहन कर आफिस जाऊं? श्रीमती जी ने पूछा, इनमें क्या खराबी है। जेबकतरे कुर्ते-पायजामे तो नहीं पहनते। हमारा जवाब था- उनके बॉस तो पहनते हैं। हमने तह खोलकर उनकी प्रत्येक सलवट पर लगे दाग दिखलाए। श्रीमती जी ने टका सा जवाब दिया- ऐसे दाग धोने के लिए अभी तक कोई डिटर्जट नहीं बना है। संदूक दर संदूक छानने के बाद वे कहीं से भगवा-वस्त्र खोज लाई। समझौतावादी सरकार की तरह हमने वामपंथी मन के साथ समझौता किया। सोचा भगवा धारण कर ही दफ्तर चले जाएंगे। यार-दोस्त हंसी ही तो उड़ाएंगे, मगर शक की निगाह से तो नहीं देखेंगे। अफसोस कि भगवा वस्त्र भी बेदाग नहीं निकले। उनकी प्रत्येक तह पर लिखा था, ''मुंह में राम बगल में माया''।
हम पुन: स्वयं को हमाम के अंदर की अवस्था में पा रहे थे। जेबकतरों को कोस रहे थे। कमबख्तों, पहनने के लिए तुम्हें सूट-बूट ही मिले थे। खादी का कुर्ता-पायजामा या भगवा चोगा धारण कर लेते। कुछ दाग पहले ही लगे थे, कुछ और लग जाते। उन्हें धारण करने के बाद भी तुम तो जैसे थे वैसे ही रहते। हमाम के अंदर-बाहर समान अवस्था में ही रहते। कम से कम हम तो अवस्था परिवर्तन के दुष्चक्र से बच जाते। फैशन डिजाइनरों से मेरी प्रार्थना है, कुछ इस प्रकार के भी वस्त्र डिजाइन करो, जिन्हें धारण कर हम जैसे भी हमाम से बाहर की अवस्था का अहसास कर सकें।
संपर्क 9868113044
Saturday, November 3, 2007
काश! उल्लू प्रोफेशनल होता


उल्लू से हमने पूछा, भाई! तुम उल्लू क्यों, मूर्खता का पर्याय क्यों?
सहज भाव से वह बोला, बड़े भाई! लक्ष्मी को ढोते फिरते हैं। उसका उपभोग नहीं करते, इसीलिए हम उल्लू हैं, उल्लू कहलाते हैं।
लक्ष्मी! और उसका उपभोग नहीं! ऐसा क्यों?
वह बोला, लंबी कहानी है, तुम्हारे ऋषि-मुनियों की कारस्तानी है, भाई।
ऋषि-मुनियो का नाम सुन हम थोड़ा झिझके। फिर भी साहस किया और बोले, भइया संक्षेप में वर्णन करो।
सुनो, 'देवऋषी बहुत सुंदर प्रवचन दिया करते थे। हमारे पूर्वज उनके प्रवचनों के दीवाने थे। अत: जिस वृक्ष के तले बैठ कर वे प्रवचन देते, हमारे पूर्वज उसकी शाख पर बैठ कर नित्य-प्रति उनके प्रवचन सुनते। उनके प्रवचनों का सार था, जीव को काम, क्रोध, लोभ, मोह इन सभी पांच विकारों से दूर रहना चाहिए, अर्थात निर्विकारी होना चाहिए। तभी से हमारे पूर्वजों ने निर्विकारी होने का व्रत धारण कर लिया।'
'मगर देवऋषि जिन मनुष्य को प्रवचन देते थे, वे तो निर्विकारी नहीं?' हमने अपनी शंका मित्र उल्लू के समक्ष प्रस्तुत की।
हां! ठीक कहते हो मनुष्य निर्विकारी नहीं। दरअसल जैसे-जैसे सूर्य भगवान का रथ मंजिल की तरफ बढ़ा हमारे पूर्वज ऊंघने लगे, इसलिए वे प्रवचन का मर्म सुनने से अनभिज्ञ रह गए। मनुष्य संपूर्ण प्रवचन सुन कर ही अपने-अपने घर लौटे। सुना है, भइया! देवऋषि ने प्रवचन के अंत में मर्म बताया था, 'नैतिकता जीवन में उतारने के लिए नहीं केवल बखान करने के लिए है, उल्लू सीधा करने के लिए है। तभी से मनुष्य उल्लू सीधा करता आ रहा है और हम उल्लू बनते आ रहे हैं।'
महाशय, प्रवचन की मुद्रा में आ गए और अपनी बात को विस्तार देते हुए बोले, 'तुम्हारा कोई देवता या ऋषि-मुनि ऐसा है, जो किसी विकार से प्रभावित न रहा हो। कोई प्रेम प्रसंग में लिप्त रहा तो कोई क्रोध की ज्वाला में दहकता रहा। लोभ व मोह तो लगभग सभी पर हावी रहे। देवासुर संग्राम जब-जब भी हुआ कोई न कोई विकार ही आधार बना। फिर मनुष्य की क्या बिसात।'
'मगर लक्ष्मी की सवारी बनने का सौभाग्य कैसे प्राप्त हुआ?' हमने शंका-युक्त प्रश्न किया।
बड़े भाई बोले, 'यह भी उन्हीं देवऋषि का कमाल था, भइया। समुद्र मंथन के दौरान लक्ष्मीजी का उदय रात्रि प्रहर में हुआ। उन्हें एक सवारी की आवश्यकता हुई। महिला थी, रात्रि का समय था अत: सभी विकारों से मुक्त ऐसी सवारी की खोज हुई जिसे रात्रि में भी स्पष्ट दिखाई देता हो, अर्थात जिसकी 'हैड लाइट' ज्यादा तेज हों। देवऋषि ने हमारा नाम का प्रस्ताव रखा और विष्णु सहित लक्ष्मी ने उसे सहर्ष स्वीकार कर लिया।'
हम बोले, 'यह तो ठीक है कि विकारी नहीं हो, मगर तामसी प्रवृति के तो हो, निशाचर हो, दिन में सोते हो रात में जागते हो, दिन में दिखलाई भी नहीं पड़ते?'
वे मुस्कुराए और बोले, 'गीता पढ़ी है? पढ़ी होती तो पता होता रात्रि में जागना संत प्रवृति है। गीता में लिखा है, 'या निशा सर्व भूतानाम तस्यां जागृति संयमी। - रात्रि में जब सभी चर-अचर निद्रालीन हो जाते हैं, उस समय संयमी जागृत अवस्था में होते हैं।' तामसी प्रवृति के होते तो विकारी भी होते और विकार में अंधे जीव के लिए रात्रि के अंधकार की तरह दिन के उजाले का भी कोई अर्थ नहीं।
तुम्ही बताओ, अपने प्रेमियों के घर लक्ष्मी जब जाती ही रात्रि में हैं, तो इसमें हमारा क्या दोष? रात-रात भर लक्ष्मी को ढोएं और दिन में सोए भी नहीं, यह कैसे संभव है? दिन में दिखलाई तो देता है, मगर हम दिखलाई नहीं पड़ते, क्योंकि रात्रि की थकान उतारने के लिए एकांत किसी स्थान में विश्राम-अवस्था में होते हैं।'
हमारा अगला सवाल था, 'लक्ष्मी उल्लू पर सवार हो कर जिसके घर जाती है, वह विकारी हो जाता है। यह आरोप भी क्या मिथ्या है?'
'स्वार्थी मनुष्य ने बेचारी लक्ष्मी को भी नहीं बख्शा। यह आरोप भी यदि सत्य होता तो सर्वप्रथम विकारी हम होते। विकारी होते तो हम भी उल्लू नहीं लक्ष्मीपति होते।' महाशय फिर मुस्कुराए और बोले, 'फिर लक्ष्मी और उल्लू से जुड़े किस्सों के साथ बरखुरदार लक्ष्मी और विष्णु भगवान के तलाक के किस्से भी आम होते।'
'दरअसल मनुष्य बहुत स्वार्थी है, कोई भी लक्ष्मीपति नहीं चाहता कि लक्ष्मी उसके अलावा किसी और के घर जाए, इसलिए ही ऐसी अफवाहें उड़ा दी हैं। उल्लू पर बैठ कर लक्ष्मी का आना यदि अशुभ होता, तो बड़े भाई लक्ष्मीपति उल्लू न पालते। लक्ष्मीपति जब चैन की नींद सोता है, तब रात-रात भर जाग कर उल्लू उसके लिए लक्ष्मी ढोता है।'
महोदय ने आंखें मटकाई और बोले, 'सुनो! लक्ष्मी वाहक के इस रहस्य को अब तो सरस्वती पुत्र भी भांप गए हैं। उन्होंने अब हंस के साथ-साथ उल्लू सीधा करना भी सीख लिया है। हंस दिखाकर उल्लुओं को आकर्षित करते हैं, दोनों को एक ही पिंजरे में रखते हैं। लगता है, सरस्वती और लक्ष्मी के बीच अब वैर-भाव समाप्त हो गया है, अब तो सहोदर बहनों की तरह दोनों संग-संग रहने लगी हैं।'
उल्लू-चालीसा सुन हम सोचने लगे, 'काश! उल्लू भी प्रोफेशनल होता स्थान, काल और पात्रानुसार सद्ंगुण परिभाषित करता, तो उल्लू होते हुए भी उल्लू न कहलाता। वह भी लक्ष्मीपति होता।'
संपर्क : 9717095225
Saturday, October 27, 2007
मलफोर्ड व आडवाणी जी के मध्य गोपनीय वार्ता
भारत में अमेरिकी राजदूत डेविड मलफोर्ड परमाणु-डील पर समर्थन जुटाने के लिए भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी से मिले। श्री मलफोर्ड ने डील के संबंध में भाजपा को चिंता-मुक्त करने का प्रयास किया, परंतु सफलता हाथ नहीं लगी। सूत्रों के अनुसार श्री आडवाणी ने उनकी बातों को ध्यान से सुना, लेकिन डील का समर्थन करने का वायदा नहीं किया। यह जानकारी मीडिया सूत्रों के मुताबिक है। हमारे सूत्रों ने इस वार्ता का ब्यौरा कुछ इस प्रकार दिया है।
श्री आडवाणी ने उनसे स्पष्ट इनकार नहीं किया है। उन्होंने कहा था कि मैं आपके सुझाव का सिद्धांत: समर्थन करता हूं। उसके पक्ष में हूं, किंतु मैं पूर्व में दूध पीते-पीते जल चुका हूं, अत: शीतल-जल को भी फूंक-फूंक कर पीने का आदी हो गया हूं। मेरी पार्टी और हमारे बड़े भाई मुझे कहीं जिन्ना न बना दें, इसलिए आपका प्रस्ताव पार्टी की कार्यकारिणी के समक्ष प्रस्तुत करूंगा। उसके पक्ष में समर्थन जुटाऊंगा, तत्पश्चात ही आपको कोई आश्वासन दे सकूंगा वैसे भी मैं प्रधानमंत्री का दावेदार हूं। फू-फू किए बिना कुछ नहीं कहूंगा।
श्री मलफोर्ड के सुझाव के संबंध में भी हमारे सूत्र की जानकारी मीडिया के सूत्रों से भिन्न है। हमारे सूत्रों का कहना था कि परमाणु-डील का समर्थन करने की पेशकश वार्ता का एक बिंदु था। वार्ता का केंद्रबिंदु कांग्रेस और भाजपा के बीच गठजोड़ करने के संबंध में था। हमारे विश्वस्त सूत्रों के अनुसार श्री मलफोर्ड ने कुछ इस प्रकार कहा था-
न तुम उसकी काटो, न वह तुम्हारी काटे। गर्दन काट प्रतिस्पर्धा का त्याग करो, दोनों एक-दूजे को गले लगालो। वे तुम्हारी काटेंगे, तुम उनकी काटोगे, दोनों हेडलेस हो जाओगे। कोई हेडलेस चिकन कह देगा, खामोखां बुरा मान जाओगे, इसलिए न तुम उसकी काटो और न वह तुम्हारी काटे। अलग- अलग एक-एक दो कहलाते हैं। मिल जाएं तो एक और एक ग्यारह हो जाते हैं, अत: दोनों मिल जाओ, एक और एक ग्यारह हो जाओ। आगामी चुनाव में नो-दो ग्यारह होने से बच जाओ। उनकी सरकार राम भरोसे हैं। तुम्हारी सरकार बनना राम भरोसे है। रामभरोसे का भरोसा छोड़ो। एक-दूजे का भरोसा करो।
श्री मलफोर्ड ने उन्हें समझाया था- तुम अपने ढाई चावल अलग गलाते फिरो। वे अपने ढाई चावल अलग गलाते फिरें। न तुम्हारे गल पाएंगे, न उनके पक पाएंगे। दोनो ढाई जमा ढाई कर लो, मिलकर बिरयानी पकालो। जब तक चावल में दाल नहीं मिलती, तब तक खिचड़ी नहीं बनती। एक-दूजे को गले लगालो, घर में ही खिचड़ी बनालो। दाल जूतों में बटने से बचालो। 'तेरी छाछ, मेरे बैंगन' कब तक करते फिरोगे। कब तक दूसरों के चाटते फिरोगे। अरे, भाई! एक के पास बैंगन हैं, तो दूसरे के पास छाछ। फिर क्यों रहो उदास।
श्री मलफोर्ड ने विभिन्न दृष्टिंकोण से अपनी बात रखी। उन्होंने कहा- चाल,चरित्र,चित्र दोनों का समान है, फिर हाथ मिलाने में क्या एतराज है। अरे, भाई! तुम भी कम सेक्युलर नहीं, वे कम नहीं! तुम बहुसंख्यकों को पटाने में लगे हो, वे अल्पसंख्यकों फंसाने में लगे हो। दोनों मिल जाओ, मिलकर बहुजन को निशाना बनाओ। ''बहुजन हराए, बहुजन जिताए'' का सिद्धांत याद रखो। धंधेबाजी में भी दोनों में से कोई कम नहीं है। घोटालेबाज तुम्हारे यहां भी कम नहीं हैं, उनके यहां भी कम नहीं। दोनों में ही इक्कीस ही इक्कीस हैं, उन्नीस किसी में भी नहीं हैं। दोनों ही का इतिहास सुनहरी है, फिर एक-दूजे को गले लगाने में क्यों देरी है।
श्री मलफोर्ड ने अंत में चेतावनी देते हुए कहा- सुनों, नेताजी! उत्तर प्रदेश से बिल्ली आ रही है। ऐसा न हो, बंदरों की लड़ाई में बिल्ली पुलाव खा जाए। तुम लड़ते रहो छीका बिल्ली के भाग पर रीझ जाए। छीका भी तुम्हारा इंतजार कब तक करेगा। उसे तो आज नहीं कल टूटना ही है। तुम लड़ते रहोगे, वह बिल्ली के भाग पर मेहरबान हो जाएगा। अत: अंकल बुश की सलाह मानों, एक-दूजे को गले लगा लो। इसी में हमारा हित है, इसी में तुम्हारा हित है।
यद्यपि श्री मलफोर्ड व श्री आडवाणी के मध्य हुई इस वार्ता की अभी तक अधिकारिक पुष्टिं नहीं हुई है। फिर भी हमारे विश्वसनीय सूत्रों का कहना है कि इतना अवश्य है कि श्री मलफोर्ड बिरयानी खाने तो नहीं आए थे।
संपर्क – 9868113044
श्री आडवाणी ने उनसे स्पष्ट इनकार नहीं किया है। उन्होंने कहा था कि मैं आपके सुझाव का सिद्धांत: समर्थन करता हूं। उसके पक्ष में हूं, किंतु मैं पूर्व में दूध पीते-पीते जल चुका हूं, अत: शीतल-जल को भी फूंक-फूंक कर पीने का आदी हो गया हूं। मेरी पार्टी और हमारे बड़े भाई मुझे कहीं जिन्ना न बना दें, इसलिए आपका प्रस्ताव पार्टी की कार्यकारिणी के समक्ष प्रस्तुत करूंगा। उसके पक्ष में समर्थन जुटाऊंगा, तत्पश्चात ही आपको कोई आश्वासन दे सकूंगा वैसे भी मैं प्रधानमंत्री का दावेदार हूं। फू-फू किए बिना कुछ नहीं कहूंगा।
श्री मलफोर्ड के सुझाव के संबंध में भी हमारे सूत्र की जानकारी मीडिया के सूत्रों से भिन्न है। हमारे सूत्रों का कहना था कि परमाणु-डील का समर्थन करने की पेशकश वार्ता का एक बिंदु था। वार्ता का केंद्रबिंदु कांग्रेस और भाजपा के बीच गठजोड़ करने के संबंध में था। हमारे विश्वस्त सूत्रों के अनुसार श्री मलफोर्ड ने कुछ इस प्रकार कहा था-
न तुम उसकी काटो, न वह तुम्हारी काटे। गर्दन काट प्रतिस्पर्धा का त्याग करो, दोनों एक-दूजे को गले लगालो। वे तुम्हारी काटेंगे, तुम उनकी काटोगे, दोनों हेडलेस हो जाओगे। कोई हेडलेस चिकन कह देगा, खामोखां बुरा मान जाओगे, इसलिए न तुम उसकी काटो और न वह तुम्हारी काटे। अलग- अलग एक-एक दो कहलाते हैं। मिल जाएं तो एक और एक ग्यारह हो जाते हैं, अत: दोनों मिल जाओ, एक और एक ग्यारह हो जाओ। आगामी चुनाव में नो-दो ग्यारह होने से बच जाओ। उनकी सरकार राम भरोसे हैं। तुम्हारी सरकार बनना राम भरोसे है। रामभरोसे का भरोसा छोड़ो। एक-दूजे का भरोसा करो।
श्री मलफोर्ड ने उन्हें समझाया था- तुम अपने ढाई चावल अलग गलाते फिरो। वे अपने ढाई चावल अलग गलाते फिरें। न तुम्हारे गल पाएंगे, न उनके पक पाएंगे। दोनो ढाई जमा ढाई कर लो, मिलकर बिरयानी पकालो। जब तक चावल में दाल नहीं मिलती, तब तक खिचड़ी नहीं बनती। एक-दूजे को गले लगालो, घर में ही खिचड़ी बनालो। दाल जूतों में बटने से बचालो। 'तेरी छाछ, मेरे बैंगन' कब तक करते फिरोगे। कब तक दूसरों के चाटते फिरोगे। अरे, भाई! एक के पास बैंगन हैं, तो दूसरे के पास छाछ। फिर क्यों रहो उदास।
श्री मलफोर्ड ने विभिन्न दृष्टिंकोण से अपनी बात रखी। उन्होंने कहा- चाल,चरित्र,चित्र दोनों का समान है, फिर हाथ मिलाने में क्या एतराज है। अरे, भाई! तुम भी कम सेक्युलर नहीं, वे कम नहीं! तुम बहुसंख्यकों को पटाने में लगे हो, वे अल्पसंख्यकों फंसाने में लगे हो। दोनों मिल जाओ, मिलकर बहुजन को निशाना बनाओ। ''बहुजन हराए, बहुजन जिताए'' का सिद्धांत याद रखो। धंधेबाजी में भी दोनों में से कोई कम नहीं है। घोटालेबाज तुम्हारे यहां भी कम नहीं हैं, उनके यहां भी कम नहीं। दोनों में ही इक्कीस ही इक्कीस हैं, उन्नीस किसी में भी नहीं हैं। दोनों ही का इतिहास सुनहरी है, फिर एक-दूजे को गले लगाने में क्यों देरी है।
श्री मलफोर्ड ने अंत में चेतावनी देते हुए कहा- सुनों, नेताजी! उत्तर प्रदेश से बिल्ली आ रही है। ऐसा न हो, बंदरों की लड़ाई में बिल्ली पुलाव खा जाए। तुम लड़ते रहो छीका बिल्ली के भाग पर रीझ जाए। छीका भी तुम्हारा इंतजार कब तक करेगा। उसे तो आज नहीं कल टूटना ही है। तुम लड़ते रहोगे, वह बिल्ली के भाग पर मेहरबान हो जाएगा। अत: अंकल बुश की सलाह मानों, एक-दूजे को गले लगा लो। इसी में हमारा हित है, इसी में तुम्हारा हित है।
यद्यपि श्री मलफोर्ड व श्री आडवाणी के मध्य हुई इस वार्ता की अभी तक अधिकारिक पुष्टिं नहीं हुई है। फिर भी हमारे विश्वसनीय सूत्रों का कहना है कि इतना अवश्य है कि श्री मलफोर्ड बिरयानी खाने तो नहीं आए थे।
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