Sunday, April 6, 2008

' पांव-पान-पूजा' सफलता प्राप्ति का सफल सूत्र

भाग्यं फलति सर्वत्र:
न च विद्या न पौरुष:।
'
कैरियर को लेकर चिंतित मुन्नालाल के ऐसे वचन सुन आचार्य श्री के साफ्टवेयर-हार्डवेयर एक साथ एक्टिव हो गए और एक-एक कर सद्ंविचार उनके मन रूपी मानीटर पर डिसप्ले होने लगे। उसकी दशा-दिशा देख आचार्य श्री को उस पर दया आ गई और रामकृष्ण परमहंस की तरह अपने विवेकानन्द के सिर पर हाथ रख कर वे बोले, 'पुत्र! तू विवेक न खो, धैर्य रख। चिंता चिता समान है।'
आचार्य श्री आज मैनेजमेंट कंसलटेंट की तर्ज पर प्रवचन देने के मूड में थे। शायद इसलिए कि विषय कैरियर से संबंधित था।
शून्य में हाथ-पांव लहराते हुए ओजस्वी वाणी में फिर वह बोले, 'पुत्र ! तेरा भाग्य तेरे हाथ में है। यह उचित है कि जीवन रूपी इस कुरुक्षेत्र में भाग्य का अपना महत्व है, परंतु भाग्य के सामने पौरुष व विद्या को अंडर एस्टिमेट न कर। मक्खन प्रधान वर्तमान युग में भी भाग्य निर्माण में पौरुष व विद्या की महत्वपूर्ण भूमिका है।'
मालपुए के समान नरम-गरम वचन सुन मुन्नालाल को लगा जैसे महंगाई के इस दौर में सस्ती दर पर दाल-चावल मिलने का आश्वासन मिल गया हो! उसने धैर्य का प्रदर्शन करते हुए कहा, 'आचार्य श्री यह कैसे? मेरे पुरुषार्थ में भी कहीं कोई कमी नहीं है और ज्ञान में भी नहीं, फिर..?'
आचार्य श्री ने अपने आर्द्र वचनों से मुन्नालाल के मुरझाए मन को तरोताजा रखने का प्रयास करते हुए बोले, 'पुत्र! जिस कर्म द्वारा लक्ष्य प्राप्ति हो जाए वही पुरुषार्थ है, वरन् व्यर्थ की कवायद। इसी प्रकार वही ज्ञान सद-विद्या है, जिससे अभीष्ट की प्राप्ति हो। जिस विद्या से अभीष्ट फल प्राप्त न हो वह तो कोरा अज्ञान है। तू उसे पुरुषार्थ व ज्ञान की संज्ञा से क्यों सुशोभित करता है?'
'तू आत्मावलोकन कर और देख कि तेरा पुरुषार्थ लक्ष्य प्राप्ति में सहायक सिद्ध क्यों नहीं हो रहा है? अज्ञान बन कर तेरी विद्या तेरा मार्ग क्यों अवरुद्ध कर रही है? अत: तू दशा-दिशा का यथार्थ ज्ञान कर उचित दिशा में सार्थक प्रयास कर, तेरा कल्याण होगा, वत्स।'
'हे, वत्स! विद्या के संदर्भ में भी तू भ्रमित सा दिखलाई पड़ रहा है। डार्विन के विकास का सिद्धांत अप्लाई कर यदि तू सूर्य की गति का आंकलन करेगा तो ऐसी ही दुर्गति होगी। प्रॉब्लम गति की है, तो न्यूटन के गति का फार्मूला अप्लाई कर, दुर्गति का नहीं। प्राब्लम ट्रिगनेमेटरी की और फार्मूला ज्योमैट्री का! फिर तू सफलता वरण कैसे कर पाएगा? पौरुष और विद्या को अंडर एस्टिमेट कर वक्त बरबाद न कर उसकी गति पहचान, उसकी नब्ज पहचान।'
'सुन, पुत्र! वक्त की नब्ज पहचानने वाले व्यक्ति ही सफलता प्राप्त करते हैं। वक्त परिवर्तनशील है और परिवर्तन के इस चक्र में जड़-चेतन, आचार-विचार सभी परिवर्तित हो रहे हैं। मूल्य परिवर्तित हो रहे हैं, मूल्यों की परिभाषाएं परिवर्तित हो रही हैं। पुरातन, पुरातन युग में ही भूत के साथ सुरक्षित हो गया है। अर्वाचीन का सामना अर्वाचीन के साथ कर। शील का त्याग कर परिवर्तन का स्वागत कर।'
आचार्य श्री ने प्रवचन जारी रखते हुए कहा, 'बदलते इस दौर को पहचान और कार्तिकेय का पुरुषार्थ त्याग गणेश की रीति-नीति पहचान। पृथ्वी की परिक्रमा कर क्यों व्यर्थ ही समय और पुरुषार्थ जाया करता है। गणेश के समान अपने बॉस की परिक्रमा कर, चूहे की चाल चल कर भी पृथ्वी परिक्रमा का पुण्य प्राप्त कर और प्रथम पूज्य कहला।'
आचार्य श्री ने अपनी स्याह दाढ़ी सहलायी और बोले, 'वत्स, मुन्नालाल! इस मक्खनी युग में कैरियर बनाने का एक रपटीला फार्मूला आज तेरे समक्ष उजागर करता हूं, जिसे प्राप्त करने के लिए नारद मुनि ने तीनों लोक की खाक छानी थी। तू ध्यान से सुन और उसे जीवन में उतार।
हे, मुन्नालाल! नारद मुनि एक दिन अपनी व्यथा लेकर विष्णु भगवान की शरण में गए और साष्टांग प्रणाम कर विनीत भाव से बोले, 'हे, देवाधिपति देव! मैं पूर्ण समर्पण भाव से जन कल्याण में संलग्न हूं। सभी देवी-देवताओं के साथ मेरे मधुर संबंध हैं। सभी के सुख-दुख में प्रथम भागीदार हूं। लक्ष्मी व पार्वती सहित सभी माताओं का मुझे आशीर्वाद प्राप्त है। फिर भी देवताओं की मेरिट में मुझे आज तक शामिल नहीं किया गया। मैं आज भी मुनि ही की पदवी प्राप्त हूं, ऐसा क्यों, भगवन? मुझ पर कृपा करो भगवन और वह मार्ग बताओ, जिस पर चल कर मैं भी देव की पदवी प्राप्त करने का पुण्य प्राप्त कर सकूं।'
नारद मुनि के ऐसे वचन सुन विष्णु भगवान के होठ कमल के समान खिल गए और फिर बोले, 'प्रिय पुत्र नारद! मैं तुम्हारी व्यथा समझता हूं। इसके लिए तुम्हें भगवान शंकर की शरण में जाना होगा। वे ही तुम्हारा कल्याण करेंगे। एक बात और ध्यान रखना पुत्र, उनकी शरण में जाने से पूर्व यह भूल जाना कि माता पार्वती का तुम्हें आशीर्वाद प्राप्त है। वह तो तुम्हें है ही, परंतु भगवान शंकर का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए कुछ पत्रं-पुष्पं लेकर जाना। खाली हाथ मत चले जाना जैसे मेरे पास आए हो और अपनी व्यथा बाद में बताना पहले उनके चरणों में पत्र-पुष्प अर्पित कर देना।'
वीणा के तारों के साथ खेलते हुए नारद मुनि ने प्रसन्न भाव के साथ कैलाश पर्वत की ओर गमन किया। भगवान शंकर समाधिस्थ थे। उन्हें विष्णु भगवान का संदेश पूर्व ही प्राप्त हो गया था और नारद को देखते ही वे समाधिस्थ हो गये। विष्णु भगवान की शिक्षा का अक्षरश: पालन करते हुए नारद जी ने शंकर भगवान को मन ही मन प्रणाम किया और पत्र-पुष्प-फल उनके चरणों में अर्पित कर आदत के अनुसार अपनी उंगलियां वीणा के तारों पर फेरी। भगवान शंकर की समाधि टूटी और मुस्कुराते हुए बोले, 'वत्स! यहां आने के कष्ट का उद्देश्य..?' नारद जी ने क्षमा याचना करते हुए अपनी व्यथा शंकर भगवान के समक्ष प्रस्तुत की।
व्यथा सुन भगवान शंकर ने उन्हें इंद्र के पास जाने की सलाह दे डाली। सलाह की बूंदे कानों में पड़ते ही नारद जी असमंजस में पड़ गए और बोले, 'भगवन! इंद्र ही तो...।'
नारद जी के बात काटते हुए भगवान शंकर बोले, 'हां, पुत्र! में भलीभांति जानता हूं, पुलिस की तरह इंद्र ही ने तुम्हारे मार्ग में बैरिकेड किये हैं। वही तुम्हारे मिशन पर कुण्डली मारे बैठा है। परंतु जब तक बैरिकेड नहीं हटेंगे, तब तक गाड़ी आगे कैसे बढे़गी?'
हे, पुत्र नारद! काल की गति पहचानों और दुर्गति से बचो। स्वाभिमान प्रगति में बाधक है, अत: उसका त्याग कर उन्हीं की शरण में जाओ। उनके पास जब जाओ तो पत्र, पुष्प व फलों के वजन में वृद्धि कर के जाना। जिस तरह मेरे पास आए हो, उसी तरह मत चले जाना। जाकर उनके पांव छूना, पत्र, पुष्प व फल अर्पित करना और वीणा वादन नहीं, देवों के देव इंद्र की पूजा करना। जाओ वत्स, जाओ, इंद्र की शरण में जाओ तुम्हारा कल्याण होगा।'
इस प्रकार हे, वत्स मुन्नालाल! भगवान विष्णु और शंकर ने ''पांव-पान-पूजा'' का अमूल्य फार्मूला नारद मुनि को दिया और इस फार्मूले की ही सहायता से उन्होंने देव मुनि नारद का पद प्राप्त किया।
आदमी की तो बिसात क्या, पुत्र! देवताओं द्वारा आविष्कृत ''पांव पान पूजा'' के इस फार्मूले की हवा मात्र से पाषाण भी मक्खन समान चिकने व मुलायम बन जाते हैं। जो तेरे लक्ष्य पर नाग की तरह कुंडली मारे बैठा है, उसके चरण स्पर्श करना अपना स्वभाव बना, पत्रम्-पुष्पम् भेंट कर और निर्धारित सभी कर्तव्य-कर्मो का त्याग कर इसे ही प्रधान व सर्वोत्तम कर्तव्य मानते हुए प्रात: व सांय काल उसकी आरती उतार।'
'तू ऐसा जान कि बॉस ही तेरी माता है, वही तेरा पिता है, वही गुरु है और तेरे लिए वही सर्वोच्च देवता है। हे, वत्स! जब बॉस का स्वभाव तेरे प्रति लिपलिपा होने लगे तेरे मोह में उसका मन जब भ्रमित होने लगे, तब उसके चरण स्पर्श करते-करते एक दिन उसकी टांग खींच ले। लैग पुलिंग तेरा मिशन होना चाहिए विजन स्वत: साकार हो जाएगा।
अत: हे मुन्नालाल! विद्या और पुरुषार्थ के अर्वाचीन मापदण्ड को पहचान और तू जा, बॉस की शरण में जा, 'बॉस शरणं गच्छामि' इसी में तेरा भविष्य निहित है, इसी में कैरियर। कल्याणं अस्तु-कल्याणं अस्तु।'
संपर्क – 9868113044

Wednesday, April 2, 2008

पाषाण युग में प्रवेश

भोर भई, जनता जागी।
काश, जनता जागी होती!
सांझ होगी, जनता फिर सो जाएगी। शहर का नजारा देख जनता आश्चर्यचकित। यह क्या! गली-गली, नुक्कड़-नुक्कड़, चौराहे, तिराहे, दोराहे और हर मोड़ पर काले-चमकीले पत्थर, चस्पा। जब सोए थे, तब तलक तो सब सामान्य था। रात भर में यह कैसा चमत्कार, सारे शहर में पत्थर ही पत्थर। लोगों की उत्सुकता जागी।
काश लोगों की उत्सुकता जागी होती!
उन्होंने पत्थर पर खुदी इबारत बांची। पता चला मंत्री जी सड़कों पर, चौराहों पर, गली-मुहल्लों का शिलान्यास कर गए। अर्थात अपने शुभ नाम के पत्थर जड़ गए।
चूंकि पत्थर जड़ होते है, अत: शिलान्यास भी, इसलिए शिलान्यास के पत्थर जड़ दिए जाते हैं।
जनता फिर भौचक्का, एक साथ इतने पत्थर! किसी को पता भी न चला, अकेले, रात के अंधेरे में। किसने फेंके, ये पत्थर!
मुन्नालाल बोला, 'हां काले पत्थर काली रात में अकेले ही जड़े जाते हैं। मंत्री जी मूर्ख नहीं हैं, जो सोती जनता को जगाते। जनता विप्लवकारी है, मंत्री जी शांताकारी हैं। नेतातंत्र के लिए जनता का सोते रहना ही हितकारी है!'
काश! जनता विप्लवकारी होती!
पता चला, मंत्री जी न दिन में आए और न ही रात में। राजधानी में ही पत्थर इकट्ठा किए उन पर गंगा जल छिड़का और श्रद्धा के साथ शहर भिजवा दिए गए। श्रद्धा और श्राद्ध की दूरियां अर्थहीन होती हैं!
दूर से गर्द का एक गुबार जनता की तरफ बढ़ रहा था। लोगों ने देखा वह निरंतर उनकी तरफ आ रहा है। लोगों के बीच खुसर-फुसर हुई गुबार ने लोगों को घेर लिए। पता चला, यह विकास यात्रा के कारण उठा गुबार था। विकास गुबार की तरह ही उठता है और गुबार की तरह ही लुप्त हो जाता है।
विकास एक रथ पर सवार था। उसके साथ भीड़ थी। जिसे जनता नाम दिया जा रहा था, नेता जी की जनता। रथ पर सवार विकास ने शहर के लोगों की तरफ आश्वासन के पत्थर फेंकने शुरू किए।
जनता ने कहा हमें विकास का विकास नहीं, शहर का विकास चाहिए, जनता का विकास चाहिए। विकास रथ की लकीर पर चलने वाले लकीर के फकीरों ने शहर के लोगों के मुंह पर हाथ रख दिया। जनता ने जनता का मुंह बंद कर दिया। शहर की जनता खामोश हो गई।
काश! जनता खामोश न होती!
कुछ देर बाद शहर की तमाम सड़कों पर पत्थर ही पत्थर पड़े थे। वे सभी विकास के नाम पर विकास ही पर पड़े पत्थर थे। विकास जिस गुबार के साथ शहर में आया था, उसी गुबार के साथ अंतर्धान हो गया। बस अपने पीछे छोड़ गया कुछ शिलान्यास के, तो कुछ राह के पत्थर।
एक रथ का गुबार अंतर्धान हुआ, तो फिजा में दूसरे रथ का गुबार छा गया। शहर के लोगों ने गुबार से पूछा, 'भाई तुम्हारा ताल्लुक किस रथ से है।' गुबार ने जवाब दिया, 'मैं परिवर्तन रथ का गुबार हूं।'
हां, परिवर्तन विकसित रथ पर सवार था। उसके साथ भी उसकी अपनी जनता थी, शहर की जनता से बिलकुल भिन्न। रथ पर सवार परिवर्तन ने दूसरे रथ पर सवार विकास की तरफ परिवर्तन के पत्थर उछाले- 'परिवर्तन आना चाहिए, हम परिवर्तन लाएंगे।'
मुन्नालाल ने पूछा, 'नेता परिवर्तन अथवा व्यवस्था परिवर्तन?'
इसके साथ ही शहर के लोगों ने नारा दिया, 'हमें शक्ल नहीं व्यवस्था परिवर्तन चाहिए।' परिवर्तन रथ की जनता सक्रिय हुई और शहर के लोगों के मुंह पर ताले जड़ दिए। जनता ने जनता की आवाज फिर बंद कर दी।
काश! जनता बोलना सीख लेती!
गली-गली, नुक्कड़-नुक्कड़, चौराहे-चौराहे, तिराहे-तिराहे, दोराहे-दोराहे, हर जोड़ पर हर मोड़ पर पत्थर ही पत्थर। कहीं आश्वासनों के पत्थर तो कहीं आरोप-प्रत्यारोप के पत्थर।
काश! विकास की राह पथरीली न होती!
मुन्नालाल सोचने लगा, 'जब-जब चुनाव आते हैं, आखिर क्यों हम पाषाण युग में प्रवेश कर जाते हैं?'
मुन्नालाल ने अपनी जिज्ञासा आचार्य श्री के सम्मुख प्रस्तुत की। आचार्य श्री ने शंका निवारण किया, 'सुनो, वत्स! नेतातंत्र का यही सिद्धांत है। चुनाव के समय पानी-पानी नेता का हृदय चुनाव परिणाम के साथ ही जम जाता है। वह पत्थर दिल हो जाता है। चार साल पूरे होते हैं, चुनाव नजदीक आता है। नेता दिल हलका करने के लिए पत्थर फेंकना शुरू कर देता है। पत्थर किसी भी तरफ उछाले जाएं, गिरते जनता के ऊपर ही हैं।
..और, जनता! ..सीने पर पत्थर रखे-रखे जनता अहिल्या की गति को प्राप्त हो गई है। उद्धार के लिए एक अदद राम चाहिए।
काश! राम पुनः अवतरित हुआ होता!
संपर्क- 9868113044

Monday, March 31, 2008

चिंता प्रधान देश

एक गोष्ठी में जाना हुआ। चर्चा का विषय था, 'क्या भारत कृषि प्रधान देश है।' विषय सामयिक था। सभी विद्वान वक्ताओं के भिन्न-भिन्न मत थे, अत: वक्ताओं ने पक्ष-विपक्ष दोनों ही पहलुओं पर जमकर लतरानी की और विद्वत्ता का परिचय दिया। कहते हैं कि जहां सभी एक मत के लोग हों, वहां विद्वत्ता का अभाव होता है।
पहले वक्ता मुन्नालाल थे। उनका मानना था कि भारत कृषि प्रधान देश है। क्योंकि किसान आत्महत्या कर रहे हैं और उनके मुक्ति-आन्दोलन को मीडिया बराबर तरजीह दे रहा है। मीडिया केवल प्रधान विषयों को ही प्रधानता प्रदान करता है। बजट में किसानों के दयनीय हालत पर चिंता व्यक्त करते हुए, कर्ज-माफ किया गया। प्रधानमंत्री और भावी प्रधानमंत्री राहुल गांधी भी किसानों की दयनीय स्थिति पर चिंता व्यक्त कर चुके हैं। सोनिया जी तो रहती ही चिंतित है। भारत यदि कृषि प्रधान देश न होता, तो सरकार किसानों को लेकर चिंतित न होती।
दूसरे वक्ता मास्टर मुसद्दीलाल मुन्नालाल जी के मत से सहमत नहीं थे। उनका कहना था कि किसान की आत्महत्या के अकेले तर्क के आधार पर देश की अर्थ-प्रधानता का निर्धारण करना बेमानी होगा। उन्होंने बल देते हुए कहा कि भारत कृषि-प्रधान नहीं भ्रष्टाचार प्रधान देश है, क्योंकि समूची अर्थ व्यवस्था भ्रष्टाचार के फन पर उसी प्रकार टिकी है, जिस प्रकार शेषनाग के फन पर पृथ्वी। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने इस मुद्दे पर चिंता व्यक्त की थी।। उनके कहने का तात्पर्य था कि एक रुपये में से केवल 8भ् पैसे ही भ्रष्टाचार के माध्यम से देश की अर्थिक स्थिति को सुदृढ़ कर रहे हैं, शेष क्भ् पैसे फिजूल ही जाया हो रहे हैं। ऐसी ही चिंता भाव प्रधानमंत्री राहुल गांधी भी व्यक्त कर चुके हैं। हकीकत में भ्रष्टाचार का यह शिष्टाचार जिस दिन लुप्त हो जाएगा, अर्थ व्यवस्था रसातल में चली जाएगी। अत: इस देश में कृषि नहीं, भ्रष्टाचार प्रधान है।
मास्टर मुसद्दीलाल के उपरांत माइक संभाला प्रो. खैराती लाल जी ने। उनका मत पूर्व दोनों वक्ताओं से भिन्न था। उन्होंने उद्गार व्यक्त करते हुए कहा कि यह महंगाई प्रधान देश है। इस देश में ईमान के अलावा सभी कुछ महंगा है। इस देश में निरंतर यदि किसी ने प्रगति की है, तो वह महंगाई ही है। महंगाई हमेशा ही महंगी रही है, कभी सस्ती नहीं हुई। महंगाई जीवन-संगनी ही नहीं, पनघट से मरघट तक साथ देने वाली दिव्य प्रेयसी है। महंगाई देश की सुदृढ़ अर्थिक स्थिति का प्रतीक है। महंगाई का कद राजनीति से भी बड़ा हो गया है। महंगाई के बढ़ते रुतबे को देखकर पक्ष-विपक्ष दोनों आतंकित हैं। प्रधानमंत्री, भावी प्रधानमंत्री, राजमाता और पी.एम. वेटिंग सभी इस पर चिंता व्यक्त कर चुके हैं। किंतु यह भी सभी जानते हैं कि जिस दिन इस देश में 'टके सेर भाजी, टके सेर ख़्ाजा बिकने लगेगा' यह देश लाल बुझक्क्ड़ का देश कह लाया जाने लगेगा। कौन सरकार चाहेगी कि महंगाई दर में कटौती कर लाल बुझक्क्ड़ की सरकार कहलाए। अत: यह देश महंगाई प्रधान देश है।
संगोष्ठि-कक्ष से बाहर निकल कर हम सोच रहे हैं कि सभी वक्ता अपूर्ण सत्य का बखान करते रहे। पूर्ण सत्य की और किसी का ध्यान नहीं गया। यह देश न कृषि प्रधान है, न भ्रष्टाचार प्रधान और न ही महंगाई प्रधान है। यह देश चिंता प्रधान देश है। क्योंकि इस देश में प्रत्येक समस्या का समाधान केवल मात्र चिंतित होना है। यही पूर्ण सत्य है।
संपर्क – 9868113044

Saturday, March 29, 2008

जूं रेंगती नहीं अथवा अहसास नहीं होता

आजकल जूंओं के बारे में एक आम शिकायत है कि उन्होंने रेंगने छोड़ दिया है, निष्क्रिय हो गई हैं। पति को पत्‍‌नी की जूं से शिकायत हैं। घर कभी चिल्ड्रेन पार्क सा लगता है तो कभी कबाड़ी की दुकान सा। लाख कहने के बावजूद पत्नी के कान पर जूं नहीं रेंग रही है, घर व्यवस्थित नहीं कर पा रही है। पत्नी को पति की जूं से शिकायत है। बार-बार चीखने चिल्लाने और आंसू जाया करने के बाद भी पति की जूं सक्रिय नहीं हों रहीं है। पति रास्ते पर नहीं आ रहें हैं। संतान को मां-बाप की जूंओं से और मां-बाप को संतान की जूंओं से इसी तरह की शिकायत है।
इस प्रकार की शिकायतें केवल घरेलू जूंओं की ही नहीं है। राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इस प्रकार की शिकायतें बहुतायत में प्राप्त होती रहती हैं। स्वायत्ता के लिए तिब्बती आन्दोलन कर रहे हैं। उनके समर्थन में यूरोपिय देश भी चिल्ल-पौं मचा रहे हैं, मगर चीन के कान की जूं रेंग ही नहीं रही है। भारत व पाकिस्तान को भी एक-दूजे की जूंओं से कमोबेश ऐसी ही शिकायतें हैं। कैसी अजीब बात है कि जब जूं निष्क्रिय हों जाती हैं, तो सेनाएं सक्रिय हो जाती हैं और आतंकवाद की जूं शरीर पर चहलकदमी करने लगती हैं।
इसी प्रकार की शिकायतें राष्ट्र-राज्य स्तर पर भी है। महंगाई बढ़ रही है, किसान आत्महत्या कर रहें हैं और सरकार के कान पर जूं तक नहीं रेंग रही है। एक-आधा जूं ने करवट बदली भी थी, किसानों के कर्ज माफ कर दिए गए, मगर बाकी जूं उसका श्रेय लेने में जुट गई। बहरहाल किसानों का जीवन-मुक्ति अभियान जारी है! अजीब बात है कि देश का आम नागरिक भ्रष्टाचार की आग में झुलस रहा है और प्रशासन भ्रष्टाचार के आरामदेह गद्दों पर सुख की नींद सो रहा है। उसके कान पर एक जूं तक नहीं रेंग रही है।
शासन-तंत्र भले ही कोई हो जूंओं की मानसिकता अपरिवर्तनीय है। राजतंत्र हो या हो लोकतंत्र जूं समान भाव से ही रक्तपान करती हैं। वे अपने मन से ही सक्रिय होती हैं और अपने ही मन से निष्क्रिय। जब इच्छा होती है कान पर चहलकदमी करने लगती हैं, जब इच्छा होती है, तंद्रा में लीन हो जाती हैं। मगर एक अहम सवाल यह भी है कि जूं क्या वास्तव में अपने धर्म से विमुख हो गई हैं? क्या वास्तव में अब वे रेंगती नहीं हैं? हमें लगता है कि उन पर निष्क्रिय होने का आरोप लगाना जूंओं के प्रति अन्याय ही है।
हो सकता है, हताश कुछ लोगों की जूंओं ने रेंगना बंद कर दिया हो। रेंगने का जब कोई फर्क ही न पड़े तो व्यर्थ रेंगने का औचित्य भी क्या? जूं रेंगना शुरू भी कर दें, तो भी कौन बबूल पर आम लटकने लगेंगे और नहीं रेंग रहीं हैं, तो ही क्या आम के वृक्षों पर बबूल के कांटे उग आए हैं। दरअसल मसला जूंओं के रेंगने न रेंगने का नहीं है। असल मसला है अहसासीकरण का। जब अहसास होना ही बंद हो जाए तो ऐसी स्थिति में उनका रेंगने या न रेंगना स्वयं ही औचित्यहीन हो जाएगा।
जनता कितनी भोली है, जूंओं से उम्मीद करती है कि वे अपने पदचाप से सरकार को जागृत कर देंगी। सरकार निद्रा में नहीं है, जो जागृत अवस्था में आएगी। सरकार विदेह है, अर्थात अशरीरी और देह से परे आत्म स्थिति प्राप्त प्राणी के कान पर जूं रेंगे या न रेंगे कोई फर्क पड़ने वाला नहीं है।
जनता वास्तव में भोली है, वह नहीं जाती है कि प्रशासन भोग-योग, आसक्ति-विरक्ति और राग-वैराग्य से परे कर्मयोगी की स्थिति को प्राप्त हो गया है। वह भोगों का भोग करता है, मगर उनमें लिप्त होता नहीं है। वह भ्रष्टाचार करता है, मगर भ्रष्टाचार में लिप्त नहीं है, इसलिए वह भ्रष्टाचारी नहीं है। जब वह कर्म करते हुए भी कर्मो में लिप्त नहीं है, तब जूं रेंगे या न रेंगे फर्क क्या पड़ता है। अत: तोहमत जूंओं पर लगना वाजिब नहीं है। जूंओं का काम रेंगने है, आज भी रेंग रहीं हैं। उनके शरीर पर न सही तुम्हारे शरीर पर ही सही। असल मुद्दा अहसासीकरण का है। विदेह और कर्मयोगी अहसास विहीन होते हैं। अत: जूं रेंगने भी लगे तो फर्क क्या पड़ता है!
संपर्क – 9868113044

Monday, March 24, 2008

गधों को ‘गधे’ के विशेषण से नवाज़ा जाना

गधे क्या आदिकाल से ही 'गधे' थे या इस विशेषण से उन्हें बाद में नवाजा गया? प्रश्न मौलिक भी है, गंभीर भी और शोध का विषय भी! इसलिए जब से यह प्रश्न मेरे जहन में अवतरित हुआ है, तभी से मेरा मन प्रसव-पीड़ा के समान शोध-पीड़ा से पीड़ित है। मेरे जैसे खोजी प्रवृति व्यक्ति के लिए यह स्वाभाविक भी है! अत: स्वभाव के अनुरूप प्रश्न का जवाब खोजने की प्रक्रिया शुरू हो गई। जवाब हासिल करने के लिए मैंने गधों के चरित्र व स्वभाव पर एकाधिकार रखने वाले महान साहित्यकार कृशन चंदर के प्रिय गधे को चुना।
कृशन चंदर के गधे को खोजना भी अपने आप में दुष्कर कार्य था। मगर 'जिन खोजे तिन पाइए' की तर्ज पर एक दिन सफलता हासिल कर ही ली। महान साहित्यकार कृशन चंदर के प्रिय गधे का मिलना मेरे लिये सुखद आश्चर्य था! क्योंकि मैंने उसे कहां-कहां नहीं खोजा, सत्ता के गलियारों में, आश्रमों के बाड़ों में, विश्वविद्यालयों के बरामदों में, मगर नहीं मिला। मिला भी तो निर्जन एक खंडहर में।
अक्ल के पुतले गधे की दयनीय ऐसी दशा देख सुखद आश्चर्य यकायक दुखद आश्चर्य में तब्दील हो गया। अश्रुपूरित नेत्रों के साथ हम ने दादा को प्रणाम किया और फिर थोड़ा सा फासला बना कर उनके चरणों में बैठ गये।
आसन ग्रहण करने के साथ ही हमारे मुंह से निकला, ''क्या हाल बना रखा है, कुछ लेते क्यों नहीं, दादा?''
लेटे-लेटे ही दादा ने थूथड़ी ऊपर उठाई और बोले, ''मेरे हाल पर न जाओ, यह बताओ हमसे से इतनी दूरी क्यों? लगता है, आदमी अभी सुधरा नहीं।''
दादा ने पिछली टांगे जमीन से रगड़ी और बोले, ''सुनो बरखुरदार! आदमी की तरह हम गधे लोग बिना वजह दुलत्ती नहीं झाड़ते। वजह हो तो भी हर वजह पर नहीं। दुलत्ती झाड़ते भी हैं, तो सिर्फ आदमी को डराने के लिए। ..तुम ही बताओ अब तक कितने आदमी घायल हुए हमारी दुलत्ती से? अरे भाई! हम आदमी नहीं हैं कि आदमी को घायल करने के लिए, आदमी की तरह दुलत्ती झाड़ते रहें।''
दादा की अंतर्यामी क्षमता देख हम गदगद हो गये। उनके प्रति हमारे मन में उत्पन्न स्नेहमयी ज्वार-भाटा की गति और तेज हो गई। अपने आप पर शर्मिदा हुए और शर्म के ही वाहन पर आरूढ़ हो कर उनके चरणों के करीब पहुंच गये!
''दादा! आदमी और आदमी का दुलत्ती से संबंध हमारी समझ नहीं आया, जरा विस्तार से बताओ।''..अनायास उठी यह लघु शंका हमने उनके सामने प्रस्तुत की।
''सीधी सी बात है, बरखुरदार! दुलत्ती झाड़ना हमारी नहीं, आदमी की फितरत है।अपने अवगुणों को अन्य जीवों पर आरोपित करना भी आदमी ही की फितरत है।''
दादा आगे बोले, ''खैर, छोड़ो ये सब बातें। यह बताओ कि गरीब खाने में कैसे आना हुआ।''
औपचारिकता का निर्वाह करते हुए हमने बस इतना ही कहा, ''यों हीं बस आपकी आत्मकथा पढ़ी थी, मिलने की इच्छा जागृत हो गई।''
दादा ने त्यौरी पर बल डालते हुए कहा, ''झूठ मत बोलों! आदमी और बिना प्रयोजन किसी के पास जाए, वह भी मेरे जैसे उपेक्षित जीव के पास, असंभव!'
कृशन चंदर द्वारा लिखित इन महाशय की आत्मकथा हमने एक बार नहीं, कई बार पढ़ी थी। बौद्धिक और आदमी के मन की बात भांप लेने की उनकी क्षमता से प्रभावित भी हुए थे। मगर भेंट हुई तो आश्चर्यचकित हुए बिना नहीं रह पाए।
आखिरकार लागलपेट की मानवीय प्रवृति पर विराम लगाते हुए लघु शंका निवारण के बाद दीर्घ शंका निवारण के लिए मूल सवाल उनके सामने पटक दिया, ''सावन के बादलों की तरह एक सवाल हमारे जहन में अर्से से गरज रहा है, दादा! कृपया उसका निवारण करें।''
अनुमति प्राप्त होते ही हमने सवाल दाग दिया, ''दादा, क्या आपकी प्रजाति के जीव प्रारंभ से ही 'गधे' हैं अथवा बाद में कहलाये?''
हमारा सवाल सुनते ही दादा की आंख भर आई और ओस की बूंद से दो आंसू आंख से निकल थुथने पर लुढ़क गये। फिर अपने को संभाला और बोले, ''वत्स निष्ठंा, हां! निष्ठंा, और वह भी आदमी के प्रति। निष्ठंा की पराकाष्ठा ने ही हम गधों के साथ यह विशेषण जोड़ दिया। उससे पहले हम केवल नाम के ही गधे थे।''
क्षणिक मौन के उपरांत दादा आगे बोले, ''हां, वत्स! हमारे एक पूर्वज की निष्ठंावान गलती का खामियाजा पूरी बिरादरी आज तक ढो रही है। मालिक के घर में चोर घुस जाने पर यदि हमारा पूर्वज भी कुत्ते की तरह ही सोता रहता, तो हम भी आज सम्मान की जिंदगी जीते होते!''
कहते-कहते दादा की आंख-नाक दोनों से जल-धारा ऐसे प्रवाहित होने लगी, मानों पितरों के सम्मान में तर्पण-संस्कार पूर्ण कर रहे हों! दादा ने लंबी सांस खींच कर जल-धारा के प्रवाह के सामने अवरोध खड़ा करने का प्रयास कर बोले, ''उसके कर्तव्य क्षेत्र में भी नहीं था, धोबी को जगाना! ..मगर निष्ठंा ने उसका मुंह बंद नहीं रहने दिया और धोबी को जगाने की मंशा से वह जोर-जोर चिल्लाने लगा। ''
दादा ने आह भरी और बोले, ''..निष्ठंा की सजा उसे मौत मिली और पूरी बिरादरी को सदा-सदा के लिए अपमान! उस निष्ठंा के ही कारण पूरी बिरादरी को बेवकूफ की उपाधी से नवाजा गया! उससे पहले गधे भी 'गधे' नहीं कह लाए जाते थे! हम भी सामान्य जीवों की ही श्रेणी में आते थे, वत्स!'
लगता था कि उम्र के साथ-साथ दादा कुछ ज्यादा ही भावुक हो गये हैं। अक्ल का परिचय तो आज भी उन्होंने कृशन चंदर के ही जमाने का सा दिया, मगर उस तरह की शैतानी अब उनमें देखने को नहीं मिली।
गमगीन माहौल को कुछ हल्का करने के उद्देश्य से हमने अगला सवाल किया, ''दादा! तुम्हारी बुद्धिमत्ता के किस्से तो आज भी चर्चित हैं। तुम्हारे जैसे जहीन जीव को तो देश का नेतृत्व संभालना चाहिए। तुम राजनीति में क्यों नहीं आ जाते? वैसे भी राजनीति में तुम्हारी बिरादरी वालों की संख्या कुछ कम नहीं है। कई तो सत्ता तक पहुंच गये हैं।''
सवाल सुन दादा इस बार मुस्करा दिए, ''गलत! एक भी तो नहीं!'' दादा की थूथड़ी पर अचानक ही चिंतन की रेखाएं उभर आई और फिर विचार की मुद्रा में बोले, ''अच्छा! ..चलो एक-आधे का नाम तो बताओ?''
दादा ने फिर लंबी सांस खींची और गंभीर हो कर कर बोले, ''बरखुरदार! निष्ठंावान, ईमानदार, मेहनती, संतोषी, निर्विकारी जीव का भला राजनीति में क्या काम? अगर किसी ने हिम्मत की भी तो ऐसे जीव को टिकने कहां दिया गया!''
दादा के जवाब पर अप्रत्यक्ष असहमति व्यक्त करते हुए हमने अगला सवाल किया, ''दादा! 'गधे पंजीरी खा रहे हैं!' ..फिर यह कहावत क्यों?''
सवाल सुन कर इस बार न तो दादा की आंख में आंसू थे और न ही थूथड़ी पर मुस्कान की लकीरें। इस बार उनकी आंखों में क्रोध की लाल-लाल लकीरें जरूर थी।
दादा ने थूथड़ी अगले पैरों से रगड़ते हुए बोले, ''गलत, बिलकुल गलत! गधे नहीं, कुत्ते दूध-मलाई खा रहे हैं। अरे, बरखुरदार! गरदन झुकाकर ईमानदारी से काम में लगे रहने वालों केभाग्य में पंजीरी कहां?''
''मगर कहावत तो यही है, दादा!'' हमने दादा को कुरेदने की मानवीय चेष्टा की।
''.. यह कहावत गधों के खिलाफ साजिश है और इसके पीछे उसी आदमी और कुत्ते का दिमाग है, जिनके कारण गधा बेवकूफी का पर्यायवाची बना। इसके पीछे भी मंशा वही, बेईमानी की पंजीरी कोई खाए और बदनाम कोई और!''
'मगर दादा कुत्ता क्यों? कुत्ता भी तो वफादार जीवों की श्रेणी में आता है। हमने अगला सवाल उछाला।'
दादा बोले, ' निष्ठंा व चापलूसी में अंतर करना सीखो, बरखुरदार। चापलूस कभी निष्ठंावान नहीं हो सकता। कुत्ता निष्ठंावान नहीं चापलूस है। जिसने भी टुकड़ा डाल दिया उसी के आगे दुम हिला दी, उसी के तलवे चाट लिये। हमने कभी किसी के तलवे नहीं चाटे, दुम नहीं हिलाई। दिन भर मेहनत की और रात को सूखी घास चबा कर ही संतोष कर लिया।'
'आदमियों की दुनियां में चापलूस ही पंजीरी खा रहे है और हमारे जैसे गधे, 'गधे' कह लाए जा रहे हैं। इतना भी होता तो भी गनीमत थी, खा वे रहे हैं, वाउचर हमारे जैसों के नाम से भरे जा रहे हैं। हमारी नहीं कुत्तों की संस्कृति अपनाई है, तुम लोगों ने। मिल गये न सभी सवालों के जवाब, बरखुरदार! अब जाओ, मुझे भी आराम करने दो।'
लघु व दीर्घ हमारी भी सभी शंकाओं का समाधान हो चुका था। मगर इस बार कृशन चंदर के उस प्रिय गधे के प्रति हमारी श्रद्धा की धारा इतने ज्यादा वेग से उमड़ी की वह सभी बांध तोड़ने के लिये आतुर थी। इस बार आदमियत के कारण नहीं अपितु पूर्ण समर्पण भाव के साथ दादा के चरणों में गिर पड़े और बोले दादा तुम्हारी सेवा अब हम करेंगे।
आंख बंद करते-करते दादा बोले, 'बेवकूफ न बन। आदमी है, आदमी ही रह। गधे का बच्चा मत बन। गधे का बच्चा बनेगा तो सुखी घास में ही गुजारा करना पड़ेगा।'
संपर्क – 9868113044

Thursday, March 20, 2008

असत्य ही सत्य है

यह गांधी का देश है। 'सत्य अहिंसा परमोधर्म' इस देश का मूलमंत्र है। इस मूलमंत्र का जाप करते हुए हम शत-प्रतिशत गांधी के बताए मार्ग पर चल रहे हैं, अर्थात सत्य, अहिंसा और धर्म मार्ग पर। ये तीनों नैतिक मूल्य हमारी संस्कृति के आधार है। इनकी अवहेलना कर हम बे-पैंदी के लोटे बनना नहीं चाहते। सत्य! लाल-श्वेत रक्त कोशिकाओं की तरह सत्य तो हमारे रक्त में समाहित है, रग-रग में प्रवाहित है। अहिंसा, बाप-रे बाप! इस शब्द का विलोम भी हमारे शब्द कोष में नहीं है, न वाचा, न मनसा, न कर्मणा।
प्रतिक्रियावादी चंद लोग हमारे सत्य से कुंठित है, इसलिए उसे नकार रहे हैं। हमारे सत्य को गलत रूप में परिभाषित करने की चेष्टा कर रहे हैं। यह कहन भी अतिश्योक्ति न होगा कि इसके लिए वे झूठ का सहारा ले रहे हैं।
दरअसल हमारे सत्य के प्रतिक्रिया स्वरूप ही उन्होंने असत्य शब्द की रचना की है। मगर हम उनके इस असत्य 'सत्य' को भी अंगीकार करते हैं। क्योंकि छोटी-छोटी बात के लिए हम किसी के भी मन को व्यथित करना नहीं चाहते।
दरअसल हम स्वभाव से ही उदारवादी हैं, अहिंसावादी हैं। गांधीजी कह गये हैं कि हिंसा शारीरिक ही नहीं मानसिक भी होती है। पर मन को दुखित करना भी हिंसा है।
हमारे लिए उनका 'असत्य' भी सत्य है। क्योंकि हमारे शास्त्र भी इसका पोषण करते हैं और गांधीजी भी इसे स्वीकारते हैं। शास्त्र कहते हैं-
'सत्यम् ब्रुयात प्रियम् ब्रुयात,
न ब्रुयात सत्यम्ं अप्रियम्ं।'
अर्थात सत्य बोलो, प्रिय बोलो, मगर अप्रिय सत्य कभी न बोलो।
स्पष्ट है कि शास्त्र अप्रिय सत्य बोलने से साफ- साफ इनकार करते हैं। मगर प्रतिक्रियावादी हमारे जिस सत्य को असत्य कहते हैं, शास्त्र उसके बोलने पर पाबंदी नहीं लगाते। क्योंकि सत्य की तरह असत्य वचन कटु नहीं होते। उनमें शक्कर का सा मिठास होता है। ऐसे वचनों से किसी के मन को ठेस नहीं पहुंचती। तभी तो असत्य प्रशंसा सुन कर भी मन गार्डन-गार्डन हो जाता है।
विडंबना यही है कि प्रतिक्रियावादियों का सत्य कभी प्रिय नहीं होता। व्यावहारिक विज्ञान के अनुसार भी सत्य हमेशा ही कटु होता है। सत्य वचन हमेशा ही दूसरों के मन को व्यथित करते हैं, कष्ट पहुंचाते हैं। आचार-विचार में सत्य का सहारा लेने वाले व्यक्ति 'परिचित्तानुरंजन' प्रवृति के जीव होते हैं। 'परिचित्तानुरंजन' हिंसा है और हम हिंसावादी नहीं हैं। क्योंकि हम गांधी के मार्ग का अनुसरण करते हैं, इसलिए हम प्रतिक्रियावादियों के सत्यवादी मार्ग से सहमत नहीं हैं। यही कारण है कि हम उनके द्वारा परिभाषित सत्य को अपनाने से कतराते हैं।
सत्य अप्रिय होता है, शाश्वत सत्य है और मनीषियों ने सत्य को 'अप्रिय' विशेषण से वैसे ही विभूषित नहीं कर दिया। सत्य अप्रिय होता है! इसके पीछे भी कई कारण है। प्रथम सत्य वचन से पोल खुलने का भय बना रहता है। कौन चाहेगा कि उसकी पोल खुले। पोल न खुले इसलिए विशेष कुछ जीवों व क्षेत्रों को विशेषाधिकार दिये गये हैं। विशेषाधिकार का सीधा-सीधा ताल्लुक सत्यं ब्रुयात पर पाबंदी है। फिर भी यदि कोई सत्य के सहारे विशेषाधिकार संपन्न जीवों की पोल खोलने का दुस्साहस करे तो उसे दंडित किया जा सके। वैसे भी पोल खोलने से दूसरे के मन को पीड़ा पहुंचती और गांधीजी कह गए है, पर पीड़ा हिंसा है और हम गांधीजी के सत्य मार्ग पर आरूढ़ हैं।
द्वितीय निंदा का आधार भी सत्य ही है और पर पीड़ा की तरह निंदा भी हिंसा की ही श्रेणी में आती है। हिंसा मनुष्य का धर्म नहीं है, गांधीजी कह गए हैं। हम गांधीजी के बताए मार्ग पर चल रहे हैं।
असत्य पूर्णरूपेण मानवीय दृष्टिंकोण पर आधारित है, इसमें लेशमात्र भी संदेह नहीं है। अर्थात असत्यवादी पूरी तरह मानववादी है। मानव ही असत्य दर्शन का केंद्र बिंदु है। क्योंकि असत्य वचनों में हिंसा की मिलावट कतई नहीं है। असत्य वचन व्यक्त कर हम हिंसा से साफ-साफ बच जाते हैं। ऐसा करना ही मानव मात्र के लिए श्रेय कर है। गांधीजी भी कहते हैं, मनुष्य को मनसा,वाचा,कर्मणा अहिंसा वादी ही होना चाहिए। अत: हम गांधी के बताए मार्ग पर चल रहे हैं।
असत्य ही एक ऐसा फार्मूला है, जिससे व्यक्ति, समाज व राष्ट्र की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ होती है। क्योंकि असत्य भ्रष्टाचार का वाहक है और भ्रष्टाचार चार पुरुषार्थो में से अर्थ व काम नाम के महत्वपूर्ण दो पुरुषार्थो का आदि स्त्रोत है। भ्रंष्टाचार ही के कारण नेता व अधिकारियों के यश में वृद्धि होती है, धन-धान्य से परिपूर्ण होते है। भ्रष्टाचार सत्य वचन की तरह कोई पर पीड़ा दायक तो नहीं। यह तो इस हाथ ले और उस हाथ दे का स्वच्छ व ईमानदारी से परिपूर्ण सौदा है।
इस देश का बहुजन आज जब बगल में असत्य की बैसाखियां दबाए सत्य मार्ग का अनुसरण कर रहा है, धर्म मार्ग पर चल रहा है। ऐसे में अल्पजनों का सत्य-सत्य पुकारना, सत्य उजागर करना, सत्य खाना और सत्य पीना कहां तक जायज है। ऐसा करना राष्ट्र की मुख्य धारा से संबंध विच्छेद करना है, राष्ट्रीय नीति की अवहेलना है, राष्ट्र की अस्मिता पर आघात है, राष्ट्र द्रोह है।
अप्रिय सत्य की अपेक्षा असत्य वचन ही उत्तम हैं, यह हमारा नेताई मत ही नहीं है,दृढ़ विश्वास भी है। अप्रिय होने के कारण प्रतिक्रियावादियों का सत्य असत्य है। बस हमारा असत्य ही सत्य है, शाश्वत सत्य है। यही परम धर्म है। इस प्रकार यह देश गांधी और गांधी जैसे अन्य मनीषियों द्वारा दिखलाए सत्य मार्ग का अनुसरण कर रहा है। धर्म मार्ग पर चल रहा है। इसलिए ही यह देश महान है, हम महान हैं।
संपर्क : 9868113044


Tuesday, March 18, 2008

भारत रत्‍न गिल साहब!

भारतीय हॉकी टीम बीजिंग ओलंपिक में खेलने से वंचित रह गई। हॉकी टीम यदि 'टीम' होती तो बीजिंग में सैर-सपाटा करने से वंचित न रहती। पराजय को राष्ट्रीय शर्म का विषय बताया जा रहा है। समूचा राष्ट्र शरमसार है। केवल गिल साहब के अतिरिक्त! दरअसल गिल साहब प्रोफेशनल व्यक्ति हैं। प्रैक्टिकल अप्रोच वाले इनसान हैं। मेरा मानना है कि हॉकी को मोक्ष प्रदान करने के लिए वे कतई दोषी नहीं हैं। जो व्यक्ति गिल साहब की आलोचना कर रहे हैं, उनसे पूछना चाहूंगा कि संहारकर्ता को पुनर्जीवन का कार्य क्या सोच कर सौंप गया? मेरे दूसरा सवाल है- गिल साहब को हॉकी की बागडोर थमाते हुए क्या उन्हें बताया गया था कि आतंकवाद की तरह हॉकी को गडडी नहीं, चढ़ाना है, उसे पुनर्जीवित करना है?
राष्ट्रीय-चरित्र में 'शर्म' नाम का यह तत्व अचानक कहां से घुसपैंठ कर गया? मैं आश्चर्यचकित हूं! हकीकत में हॉकी टीम का ओलंपिक से वंचित रहना नहीं, राष्ट्रीय-चरित्र में 'शर्म' तत्व की घुसपैंठ शर्म का विषय है! गिल साहब की अध्यक्षता में चुनिंदा प्रोफेश्नल नेताओं की एक कमैटी गठित कर इस घुसपैंठ की जांच होनी चाहिए।
हॉकी को राष्ट्रीय खेल का दर्जा प्रदान करना, मेरे लिए आश्चर्य का पहला कारण है। पता नहीं किसने और क्यों अंग्रेजों के इस खेल को राष्ट्रीय-सम्मान से विभूषित करने की जुर्रत कर दी? भारत का राष्ट्रीय खेल कबड्डी होना चाहिए था। गूल्ली-डंडा हो सकता है। इनके अतिरिक्त कंचे-गोली को राष्ट्रीय खेल घोषित किया जा सकता था। ये सभी ऐसे खेल हैं, जो क्षेत्रवाद से ऊपर उठ कर गली-गली खेले जाते हैं। कंचे-गोली का तो जवाब नहीं! हमारी समूची राजनीति ही गोली बाजी पर आधारित है। ऐसा कौन सा दल और कौन से नेता है जो 'गोली' देने में माहिर नहीं है! यदि अंग्रेजों के खेल को ही राष्ट्रीय खेल का दर्जा देना है, तो क्रिकेट को दिया जा सकता है। ऊपर वाले की दुआ से आजकल क्रिकेट का झण्डा भी बुलंद है और खिलाडि़यों की बिकावली का बाजार भी गर्म है।
शरमसार होने का वैसे भी कोई औचित्य नहीं है, क्योंकि नाक ऊंची रखने के लिए हमारे पास एक नहीं अनेक विकल्प मौजूद हैं। हुड़दंगी-राजनैतिक संस्कृति क्या गर्व करने के लिए नाकाफी है? संसद से लेकर सड़क तक क्या हुड़दंग के खेल में हम किसी से पीछे हैं? भ्रष्टाचार में नित-निरंतर प्रगति क्या हमारे लिए राष्ट्रीय-गौरव का विषय नहीं हो सकता? राजनीति में भ्रष्टाचार की तरह वृद्धि को प्राप्त महंगाई पर क्या सिर ऊंचा नहीं कर सकते? ऐसी अनेकों उपलब्धि्यां राष्ट्रीय-कोष में जमा हैं, जिनपर गर्व किया जा सकता है। अत: राष्ट्रवासियों शर्म का त्याग करो। गिल साहब को भारतरत्‍न से सम्‍मानित करने की मांग करो!