Monday, October 15, 2007

दशानन की लोकतांत्रिक शक्ति




शानन का जनता दरबार लगा था। द्वार पर तैनात प्रहरी एक-एक व्यक्ति की जमा-तलाशी लेकर उन्हें दरबार में प्रवेश करा रहे थे। दरबार में प्रवेश कर वे महाराज का अभिवादन करते और उनका सचिव भ्राता खरदूषण छीनने की तर्ज पर उनके हाथ से ज्ञापन ले लेता। कोई व्यक्ति कुछ बोलने की हिम्मत करता कि उससे पूर्व ही सुरक्षा कर्मी उसे बाहर का रास्ता दिखला देते। जन-नायक दशानन के साथ जनता की भेंट का सिलसिला जारी था कि तभी दूत ने अभिवादन करते हुए दशानन को सूचना दी, 'महाराज! मलेच्छ प्रदेश की मुख्यमंत्री आदरणीय मंदोदरी पधारी हैं।' मंदोदरी ने दरबार में प्रवेश किया। उसके खुले केश हवा में ध्वज की समान लहरा रहे थे। कमल पात के समान विस्तृत नयन में अश्रु कण सुशोभित थे और चेहरा क्लांत था। महारानी मंदोदरी का ऐसा रूप देख दशानन का दरबार इस प्रकार सहम गया, मानो कोई वामपंथी दरबार में बलात प्रवेश कर गया हो। गरीबी रेखा के नीचे खिंची रेखा पर लटकी जनता के समान दशानन को प्रणाम कर मंदोदरी बोली, 'हे, नाथ! पीड़ा अब असहनीय हो गई है। मैं बार-बार विधवा होती रहूं, अब और सहन नहीं होता। बार-बार आपके दिवंगत होने और मेरे विधवा होने का यह सिलसिला आखिर कब तक चलता रहेगा। हे, प्राणनाथ! आपको तो भगवान शिव का वरदान प्राप्त है, जितनी बार दिवंगत होंगे, आप तो उतने ही नए शीश लेकर पुनर्जन्म को प्राप्त होंगे। आप तो जीवन-मरण की इस राजनीति में दशानन से शतानन् हो गए हो, मगर मैं? मैं तो निरीह जनता की तरह लोकतंत्र की इस चक्की में उसी तरह पिसे रहीं हूं, जिस तरह गेहूं के साथ घुन!'प्रिय मंदोदरी के ऐसे वचन सुन दशानन मुस्करा कर बोला, 'प्रिय तुम एक विशाल प्रदेश की मुख्यमंत्री हो और क्या चाहिए, तुम्हें? विधवा होने का नाटक भी नहीं कर सकती? प्रिय, राजतंत्र नहीं अब लोकतंत्र है और लोकतंत्र में सफलता प्राप्त करने के लिए नाटक परम् आवश्यक है। कौन कहता है, तुम बार-बार विधवा हो रही हो! त्रेता से लेकर आज तक तुम अक्षुण्ण सुहागिन हो और सदैव सुहागिन ही रहोगी। चिंता का त्याग करो, प्रिये और निश्चिंत हो कर सत्ता का सुखोपभोग करो।'
पलकों से टपके आंसू पोंछ मंदोदरी बोली, 'निश्चिंत हो कर सत्ता का सुखोपभोग करूं! ..कैसे? अपने सुहाग को रोज-रोज मरते देखती रहूं! ..कैसे? हे, नाथ! प्रतिदिन मृत्यु को प्राप्त होने की अपेक्षा एक बार ही मृत्यु का पूर्ण-वरण कर लेना श्रेयष्कर होगा और मैं भी निरंतर विधवा होने की पीड़ा से मुक्त हो जाऊंगी।''
प्रिय, मंदोदरी! तुम लोकतांत्रिक राजनीति के नैतिक मूल्यों से अनभिज्ञ हो। तुम नहीं जानती कि अब पूर्ण मृत्यु का वरण करने की अपेक्षा प्रतिक्षण मृत्यु को प्राप्त करने वाले ही चिरजीवी होते हैं। वही नेता सत्ता का परम् पद प्राप्त करने में सफल होता है, जो प्रतिक्षण मृत्यु का वरण करते हैं। प्रिये! जिसे तुम मृत्यु कह रही हो, वह मृत्यु नहीं, नव-जीवन है। लोकतंत्र में यही श्रेयष्कर है।' वक्ष-स्थल से खिसक आए साड़ी के पल्लू को पुन: यथास्थान जमाया, खुले केश संवारे और बूचड़खाने में बंधी बकरी के समान मिमियाते हुए बोली, 'नहीं-नहीं-नहीं, प्राणनाथ नहीं! विजयदशमी पुन: नजदीक है। आपका वध किया जाएगा और सार्वजनिक रूप से पुन: बंधु-बांधवों सहित आपका अंतिम संस्कार कर दिया जाएगा। मुझे इस पीड़ा से बचालो नाथ, इस पीड़ा से बचालो। भगवान राम के समक्ष आत्मसमर्पण कर दो नाथ और युगों से चली आ रही इस वैर पर सदैव के लिए विराम लगा दो, नाथ।'

अट्टहास करते हुए दशानन बोला, 'अंतिम संस्कार! नहीं, प्रिये मेरा अंतिम संस्कार करने के लिए, राम के पास अब पर्याप्त शक्ति कहां! मेरा अंतिम संस्कार नहीं, पुतले दहन कर कुण्ठा का निष्कासन है, यह। लोकतंत्र में पुतले दहन के अतिरिक्त विपक्ष के पास अन्य कोई विकल्प भी तो शेष नहीं है। सुनो, प्रिये! पुतले दहन कर राम मुझे महिमामंडित कर रहा है। ऐसा कर तुम्हारा राम बता रहा है कि सत्ता पर आज भी मेरा ही अधिकार है और मैं ही लंकेश हूं।''

क्या कहा तुमने, राम के समक्ष आत्मसमर्पण कर दूं! उसके समक्ष जो स्वयं शक्ति विहीन है। प्रिय तुम्हारा राम राजनीति के दुष्चक्र में फंस चुका है और उसकी तमाम शक्तियां आज मेरे साथ हैं। प्रिय भ्राता विभीषण का राम दरबार से मोह भंग हो चुका है। उसे लंका का राज्य तो क्या विधायक का भी टिकट नहीं दिला पाए राम। विभीषण आज लंका के गृहमंत्री पद पर सुशोभित हैं। प्रिय सुग्रीव खाद्य मंत्री हैं और मस्त हो कर चारा चर रहें हैं। बाली पुत्र प्रिय अंगद के हाथों में लंका का प्रतिरक्षा विभाग है और समुद्र वित्तमंत्री। प्रिय तुम्ही बताओ तुम्हारे राम के पास अब बचा ही क्या है।''

मगर, महाराज! यह तो आपके आदर्श व मर्यादा के विपरीत है।' मंदोदरी बोली।दशानन के अट्टहास से पुन: दरबार गूंज गया। अट्टंहास करते-करते वह बोला, 'आदर्श-गरिमा! राजनीति में आदर्श, दोस्ती और दुशमनी कभी स्थायी नहीं होती। मार्ग वही आदर्श कहलाता है, जो सत्ता तक पहुंचाए और सत्ता को अक्षुण्ण रखे। ऐसी गरिमा का क्या लाभ प्रिय, जो व्यक्ति को भटकने की राह पर ला खड़ा करे। गरिमा तो क्रय-विक्रय की वस्तु है। सत्ता यदि हाथ में हो तो गरिमा स्वयं वरण कर लेती है।''

प्रिय मंदोदरी! जाओ भयमुक्त हो कर राज करो। त्रेता से आज तक तुम्हारा पति लंकेश प्रति क्षण मृत्यु का वरण कर दशानन से सहस्त्र-सहस्त्र शतानन हो गया है और राम बेचारा तब भी वन-वन भटक रहा था और आज भी। जाओ सत्ता सुखोपभोग करो मंदोदरी, सत्ता सुखोपभोग करो।'
राजेंद्र त्यागी-9868113044

Saturday, October 13, 2007

गंजों के सिर पर बाल



जॉन हाकिंस यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर कैथरीन सी थामसन व उनके सहयोगियों ने जीन पर शोध कर गंजों की चांद पर बाल उगाने का आविष्कार किया है। अब सिंगल प्रोटीन के जरिए बंजर चांद पर भी फसल लहराने लगेगी। समाचार पढ़कर मेरी चांद के बाल इस तरह खड़े हो गए, लादेन का नाम सुनकर जिस तरह अमेरिका की एंटी एयर क्राफ्ट गन आसमान की तरफ मुंह उठा लेती हैं। मानव बम का नाम सुन पुलिस जिस प्रकार कथक करने लगती है, उसी प्रकार मेरा तन कांपने लगा। जमीन भी पैरों तले से खिसक गई। वैसे, नेताओं ने जब से जमीन से जुड़े होने के महत्व को समझा है, तब से नेता के पास कुछ हो या न हो, जमीन जरूर होती है। हकीकत तो यह है कि वामन अवतार की तरह नेताओं ने पूरी पृथ्वी ढाई पग में नापने का 'सर्वजन हिताय' अभियान शुरू कर रखा है, ताकि आम-जन के पैरों तले जमीन न रहे। न जमीन होगी, न खिसकने का डर रहेगा। फिर भी मामला यदि संवेदनशील हो तो जमीन हुए बिना भी पांव तले से जमीन खिसकने लगती है।मेरा भयभीत होना फिजूल नहीं है, उसके पीछे जायज कारण है।

मेरे मानना है कि गंजों के सिर पर बाल उगाना आतंकवाद को बढ़ावा देना है। सीधी सी बात है, 'भगवान गंजों को नाखून नहीं देता'। अब यदि गंजों की चांद भी हरी-भरी होने लगेगी तो पूर्व गंजों की उंगलियों में नाखून उगाना ऊपर वाले की मजबूरी हो जाएगी। जब नख संपन्न लोगों की तादाद में इजाफा हो जाएगा तो स्थिति क्या होगी, इसका अंदाज सहज ही लगाया जा सकता है। गंजापन दिखाने से हालांकि गंजे अभी भी बाज नहीं आते, मगर गनीमत यह है कि इसके लिए उन्हें दूसरों के नाखून तलाशने पड़ते हैं। जैसे भाई टोनी ब्लेयर को दूसरों की चांद लहूलुहान करने के लिए चचा जॉर्ज बुश के नाखूनों का सहारा लेना पड़ा।
चचा लादेन हालांकि सिर पर पगड़ी बांधे रहते हैं, उनके सिर का भूगोल दिखलाई नहीं पड़ता, फिर भी मैं दावे के साथ कह सकता हूं, वे गंजे नहीं हैं, क्योंकि उनके नाखून लंबे भी हैं और घातक भी। लोग कहते हैं कि झगड़ा नाक के कारण होता है, मगर मेरा मानना है कि नाक तो एक बहाना है। झगड़े की जड़ नाखून है, नाक नहीं। नाक तो फिजूल में बदनाम है, बेमतलब पानी-पानी हो रही है। नाक कितनी भी फूं-फां कर ले, यदि नाखून ही न होंगे तो नाक का सवाल हल करने के लिए, कोई भी किसी की चांद नाक से जख्मी नहीं कर पाएगा। खतरा बस नाखूनों से है।दिल्ली के एक स्वास्थ्य मंत्री ने अपने कार्यकाल में होटल-रेस्टोरेंट के बावरचियों के नाखून काटने का अभियान चलाया था। महाशय गंजे हैं, इसलिए नख विहीन थे। संभवतया कुंठावश उन्होंने यह अभियान छेड़ा हो। हमने तब उन्हें नेक सलाह दी, 'अरे भाई! सत्ता का नेलकटर बावरचियों पर चलाने का क्या लाभ! नाखून काटने हैं तो नेताओं के काटो। बावरचियों के नाखून तो घर की महिलाओं की तरह काम-काज में खुद ही घिस जाते हैं। नाखून तो नेताओं के घातक हैं।'
उन्होंने उस समय हमारी सलाह पर गौर नहीं फरमाया था, शायद यह उनकी राजनैतिक मजबूरी रही होगी। हालांकि उनके साथी नेताओं ने उन्हें भी नहीं बख्श था। अपने विषाक्त नाखूनों से उनकी बंजर चांद भी लहूलुहान कर दी। हमारी सलाह मान लेते तो शायद बच जाते।
खैर, उनकी वे जाने, हमारा मानना है कि हरी-भरी चांद वाले नेताओं को सत्ता से दूर रखना चाहिए, क्योंकि सत्ता और नाखून, दोनों का साथ रहना उतना ही खतरनाक है, जितना पाकिस्तान में आतंकवादी प्रशिक्षण कैंपों का होना। सत्ता और नाखून, मानों करेला नीम चढ़ा। सत्ता नाखूनों की धार तेज कर देती है। नाखून और सत्ता के घातक गठबंधन का उदाहरण देने की आवश्यकता नहीं है, देश से परदेस तक अनेक उदाहरण आपकी उंगलियों पर हैं।
विश्व के वैज्ञानिकों से हमारा तो बस यही अनुरोध है कि अनुसंधान आम आदमी के लिए हितकर होने चाहिए। अपने अनुसंधानों की दिशा में परिवर्तन करो। बंजर चांद को उपजाऊ बना कर नाखून वालों की तादाद में वृद्धि का इरादा त्याग दो। यही आम-जन के हित में होगा। कुछ ऐसी खोज करो कि विश्व के सभी नेता गंजे हो जाएं, नख विहीन हो जाएं। तृतीय विश्व युद्ध का खतरा टल जाए, विश्व में शांति स्थापित हो जाए।
राजेंद्र त्यागी- फोन 9868113044

Friday, October 12, 2007

आदमी से डर लगता है

राजेंद्र त्यागी

पिल्लू हमारा पालतू कुत्ता था। कुत्ता कहने में हम उसका अपमान और अपनी हिमाकत समझते थे। इसके विपरीत उसे पिल्लू कहलाना पसंद नहीं था, इसे वह अपना अपमान मानता था और कुत्ता कहलाने में गर्व। आजकल कुछ लोग भी आदमी बने रहने व कहलाने में शर्मिदगी महसूस करते हैं। जब उसका नामकरण पिल्लू किया गया, तो कमजोर देश की कमजोर सरकार की तरह उसने दांत निकाल कर विरोध दर्ज किया था। फिर भी अपने सुपीरियॉरिटी कॉम्पलेक्स के कारण हम उसे पिल्लू ही कहकर पुकारते रहे और अंतत: कमजोर देश की समझौतावादी सरकार की तरह उसने भी हालात से समझौता कर लिया और पिल्लू नाम स्वीकार कर लिया। इसके अलावा, उसके पास और कोई रास्ता भी नहीं था, किंतु जीवन भर वह इस नाम को लेकर त्रस्त रहा। एक बार प्यार में हम उसे झिड़ककर बोले, 'अबे, आदमी हो जा आदमी!' इतना सुनकर वह हम पर गुर्राया, 'मेरी भी अपनी इज्जत है। आदमी कहकर मुझे अपमानित क्यों करते हो?' फिर उसने आदमी केंद्रित दर्शन झाड़ा, 'आदमी अब खुद ही आदमी नहीं रहा है। जब से आदमी के अंदर से आदमियत का लोप हुआ है, वह 'आदिम' से भी ज्यादा हिंसक हो गया है। पता नहीं क्यों आप मेरा आदमीकरण करने पर तुले हैं। हम आदमी से बेहतर हैं, इसलिए मैं जैसा भी हूं, वैसा ही ठीक हूं।' इतना कहकर वह शांत हो गया।

उसका दर्द मुझे जायज लगा। अलबत्ता आदमियों के कुछ गुण उसने अपने अंदर विकसित कर लिए थे। मसलन उसका पीआर व मार्केटिंग बहुत जबरदस्त था। हालांकि वह ऐसे आदमीय सद्गुणों को भी अपनी प्रजाति की ही देन मानता था। उसके पीआर व मार्केटिंग का ही परिणाम था कि हमारे घर जो भी आता, हमें छोड़ उसके प्रति स्नेह भाव प्रदर्शित करने लग जाता। जिस तरह के ऑफर के लिए हम आज तक तरस रहे हैं, ऐसे अनेक ऑफर उसे मिलते रहे। उनमें एक लाख रुपये के पैकेज वाले ऑफर भी थे और इससे ऊपर वाले भी।
यह उसकी मार्केटिंग का ही असर है कि स्वर्गवास के एक वर्ष बाद भी, हमारे घर आने वालों के मुंह से एक ही वाक्य प्राथमिकता के आधार पर निकलता है, 'पिल्लू के बिना घर सूना लगता है जी।' लोग हमारा हाल बाद में पूछते हैं, पहले पिल्लू को श्रद्धांजलि पेश करते हैं। हमारा व्यक्तित्व उसके सामने लोवोल्टेज हो गया है। उसके व्यक्तित्व के कायल लोग आज भी कहना नहीं भूलते, 'जनाब, पिल्लू का व्यक्तित्व बड़ा रोबदार था'। मानो पिल्लू न हुआ, मुगले आजम का शहंशाह हो गया।
पीआर और मार्केटिंग के विवादास्पद सद्गुणों को यदि दरकिनार कर दिया जाए तो बहुत सारे ऐसे आदमीय गुण हैं, जिन्हें उसने नहीं अपनाए। मसलन तलवे चाटना उसका जातीय गुण था, किंतु तलवे चाटते-चाटते काटना नहीं सीख पाया। आदमी ने यह कला विकसित कर ली है। 'भौंकने वाले काटते नहीं हैं', पिल्लू चाहकर भी अपने इस जातीय संस्कार से मुक्त नहीं हो पाया। वह भौंकता बहुत था, किंतु काटता किसी को नहीं था। आदमी के बारे में ऐसा कुछ भी नहीं कहा जा सकता कि भौंकने वाला कटखना होता है अथवा मौन रहने वाला।
पिल्लू के चेहरे पर जो था, उसके दिल में भी वही था। यहां भी वह मार खा गया। जिस थाली में हम उसे भोजन परोसते थे, आज भी सुरक्षित है। कई बार उलट-पलट कर देखा, उसमें एक भी छेद नहीं दिखलाई पड़ा। पिल्लू जिसके टुकड़े तोड़ता रहा, उसके प्रति ही निष्ठावान बना रहा। टुकड़ों के साथ टुकड़ों-टुकड़ों में उसकी निष्ठा तो अवश्य तब्दील होती रही, किंतु टुकड़े किसी के निष्ठा किसी के प्रति, यह आदमीय सद्गुण भी उसने अपने अंदर विकसित नहीं किया। शायद ऐसे सभी सद्गुण उसे पसंद नहीं थे और संभवत: इसीलिए आदमी कहना उसे भद्दी गाली लगती थी।
उसके जीवनकाल में मैं उसे रूढि़वादी मानता रहा। मेरा मानना था कि आदमी की तरह प्रगतिशील रास्ता अपनाकर उसे अन्य आदमीय सद्गुणों के साथ आदमी बनना चाहिए था किंतु उसकी मृत्यु के उपरांत आज मुझे लगा कि पिल्लू ठीक था। हम ही गलत थे, क्योंकि अब मुझे भी आदमी से डर लगता है।

Thursday, October 11, 2007

नेकी तज अनेकी कर


नेकी तज अनेकी कर

राजेंद्र त्यागी
असामाजिक कृत्य नेकी करने वालों के प्रति भले लोगों की हमेशा से ही हमदर्दी रही है। यही कारण है कि नेकी करने के बाद जब-जब भी नेक इंसान पीड़ित हुए, भले मानुषों ने उन्हें दिलासा और सुझाव देने में तनिक भी कोताही नहीं बरती। नेकीकृत पीड़ा के ऐसे ही आड़े वक्त किसी भले मानुष ने सुझाव दिया होगा, 'नेकी कर दरिया में डाल।' नेकी के इतिहास में इसी का क्षेत्रीय संस्करण भी मिलता है, 'नेकी कर कुएं में डाल'। जिन क्षेत्रों में दरिया नहीं बहते होंगे या होते भी होंगे तो जमाने की दुश्वारियों से तंग आकर 'सरस्वती' की गति को प्राप्त हो गए होंगे, ऐसे ही क्षेत्रों के लोग नेकी डालने के लिए कुओं का इस्तेमाल करते होंगे और वहीं से सुझाव का यह क्षेत्री संस्करण उत्पन्न हुआ होगा। आधुनिक युग में परिदृश्य बिलकुल बदल गये हैं। दरिया व कुएं नेकियों के कारण पट गए हैं। दुर्भाग्यवश, अभी तक जो इस सदगति से वंचित हैं, ऐसे दरिया विकास की लाईन में लगे हैं। नेकी से अटे कुओं को समतल कर उन पर जन-सुविधा परिसर निर्मित कर दिये गये हैं। पानी के लिए लोग म्यूनिसपैल्टी के 'मिक्सचर' पर आश्रित हैं। फलस्वरूप नेकी करने वाले बेचारे बड़ी मुसीबत में हैं। जाने-अनजाने किसी से नेकी जैसे पाप कर्म हो जाए तो उसे छुपाने कहां जाए? बदलते इस परिवेश से पीड़ित हमारे मखौलकार मित्र आलोक पुराणिक ने मुसीबत से निजात दिलाने का नायाब हल प्रस्तुत किया है। नेकी करने वालों के लिए उनकी सलाह है,'न सही दरिया और कुएं, नेकी कर ही डाली है तो उसे अखबार में लपेट, यानी, 'नेकी कर अखबार में डाल।' हम प्रैक्टिकल अप्रोची हैं, प्रगतिवादी हैं, परिवर्तनवादी हैं। इसलिए हमारा मत इन से बिलकुल भिन्न है। नेकी करने का मूल सिद्धांत ही हमें फंडामेंटल लगता है, दकियानूसी लगता है। हमारा कहना है कि नेकी करे ही क्यों? पहले नेकी कर और फिर नाजायज औलाद की तरह अखबार में लपेट, दरिया-कुएं में दफनाता फिर। जरा से मजे के लिए जिंदगी भर की तोहमत, पागल कुत्ते ने काटा है? ऐसी नेकी से तो तोबा भली।ेनेकी के विरोध और अनेकी के पक्ष में हमारे पास सोलिड तर्क हैं, जैनविन कारण हैं।े हमारा कहना है, भाई! ऐसा कृत्य करते ही क्यों हो, जो समाज को स्वीकार्य न हो। स्वीकार होता तो दरियर या कुएं का मसला ही न उठता। हमारी मान! नेकी कर अपना नाम असामाजिक लोगों की सूचि में दर्ज न करा।
नेकी करेगा, भईया! फल अगले जन्म में मिलेगा, मरने के बाद स्वर्ग मिलेगा। पूरे एक जन्म का इंतजार!आंख बंद हो गई फिर किसने देखा।आज का भरोसा नहीं, कल किस ने देखा।अनेकी करेगा, हाथ के हाथ फल मिलेगा।जिंदगी भर मजा लूटेगा, इसी जन्म में स्वर्ग मिलेगा।नेकी करेगा! मूर्ख कह लाएगा।अनएफिसिऐंट का लेवल चस्पा हो जाएगा।मरने के बाद भले ही स्वर्ग मिल जाए।जीते जी तो नरक का हीभागी रहेगा।औलाद को भी गर्त में ढकेल जाएगा।अनेकी करेगा! बहुमुखी प्रतिभा के धनी कह लाएगा।देर-सबेर नेता भी बन जाएगा।जीवन भर सत्ता सुख भोगेगा।मरते-मरते, औलाद के लिए मार्ग प्रशस्त कर जाएगा।हमारी सलाह है, व्यवहारिक सलाह है।नेकी मत कर, अनेकी कर अनेक बार कर, बार-बार कर। सुखी रहेगा। नेकी फेयर है, अनेकी अफेयर। जमाना फेयर का नहीं अफेयर का है।फेयर करना गले में हड्डंी डालना है।हड्डंी चूस! कौन मना करता है?फेयर के चक्कर में गले न फंसा।फेयर करेगा जूते खाएगा।एक से भी हाथ धो जाएगा।फेयर नहीं 'अफेयर' कर। ढोल अपने नहीं दूसरे के गले पड़ा रहने दे। जब मन आए बजा लेना, मन न करे तो कान दबा कर खिसक जाना। 'अफेयर' कर खुल्लम-खुाल्ला कर, मन भर कर। 'अफेयर' करेगा तो नाजायज औलाद भी जायज होने का एडवांस प्रमाणपत्र लेकर पैदा होगी।खुद के साथ-साथ तेरा नाम भी रोशन कर जाएगी।
समाज में जिसने भी फेयर तज अफेयर किया वही अमर हो गया। लैला-मंजनू, हीर-रांझा, सोनी-महिवाल, सीरी-फरहाद बन गया। प्रेमियों के इतिहास में नाम अमर कर गया। फेयर जिसने किया घृणा का पात्र बन गया। हमारे एक मित्र हैं, नेकीराम जी! बेचारे नेकी मार्गी है। कहने को एम.ए.पीएचडी हैं, मगर मेरठ के लालकुर्ती चौराहे पर गोलगप्पे बेच कर नेक-नीयत के साथ भरण-पोषण करने की चेष्टा में रत्ं हैं। हमने लाख बार समझाया, बड़े भाई! व्यावहारिक बनो। नेकी-वेकी की राह छोड़ो अनेकी का मार्ग अपनाओ। नेकी करोगे तो दरिया या कुएं में कहीं न कहीं दफनानी पड़ेगी। उसके बाद भी समाज से लताड़ ही मिलेगी। मजाल जो उनके कान पर जूं भी रेंगी हो। उल्टे, आंखों से गंगा-यमुना की प्रदूषित धारा बहाते हुए बोले, 'क्या जमाना आ गया है, नेकी के पीछे लोग ऐसे पड़े हैं जैसे कश्मीर के लिए पाकिस्तान अड़ा है। ठीक है! जब नैतिक मूल्यों का ही पतन हो रहा है तो नेकी ही बेचारी कहां बच पाएगी।' उनके दिमाग का प्रदूषण दूर करने का असफल प्रयास करते हुए हमने कहा, 'भई जान! कौन से मूल्यों की बात करते हो? मंदी का दौर है, मुद्रास्फीति का भटकाव बराबर जारी है। ऐसे में तुम्हारे नैतिक मूल्यों का भव कोई क्या लगाएगा? गोलगप्पों के भाव बिक रहे हैं, तुम्हारे नैतिक मूल्य। इस भाव में भी उनका कोई खरीददार नहीं। ऐसे में नैतिक मूल्य अच्छे भाव दे जाएंगे, यह सोचना भी व्यर्थ की कवायद है। कभी-कभार अखबार का अर्थ पृष्ठं भी पलट कर देख लिया करो। तुम्हारी नेकी, बाजार में कभी भाव नहीं बना पाई। नेकी की राह पर चला तो था तुम्हारा राजा हरीशचंद्र, नेकी करने की हिमाकत की थी। क्या हाल हुआ उसका, जगजाहिर है। पीछा तब तक नहीं छूटा जब तक शमशान घाट जा कर नेकी का अंतिम संस्कार नहीं कर दिया। महात्मा गांधी भी नेकी मार्गी थे, एक लंगोटी, एक लाठी के सहारे तमाम जिंदगी काट दी। अनेकी की राह पर चलने वाले उनके चेले-चपाटे! खीमखाफ पहन सत्ता का सुख भोगते रहे। अनेकी की राह पकड़ एक शिष्य पाकिस्तान ले बैठा, पूरी जिंदगी राज करा। बाकी हिंदुस्तान पर काबिज हो गये। जब तक जिंदा रहे खुद राज करा, अब औलाद गुलछर्रे उड़ा रही है। जाने-अनजाने नेकी हो भी जाए तो हमारे मित्र पुराणिक की सलाह पर अखबार वालों के आसपास भी मत फटकना। अखबार और अखबार वालों से किनारा ही करना। नेकी जैसा कुकृत्य अखबार वालों के लिए कोई खबर नहीं है। खबर बन भी जाए तो उसे प्रकाशित करना जनर्लिस्टिक एथिक्स के विपरीत है। अनेकी करोगे तो 'भाई लोगों' की तरह खुद-ब-खुद हाईलाइट हो जाओगे।मगर, क्या कहा जाए? सभी की अपनी-अपनी समझ है, अपनी-अपनी सोच। दरअसल हर आदमी की बुद्धि किसी न किसी लक्ष्मण रेखा के दायरे में कैद है। उससे बाहर न सोचने के लिए बेचारा मजबूर है। फिर भी मेरी सलाह, व्यावहारिक सलाह! नेकी तज, अनेकी कर, एक नहीं अनेक बार कर, बार-बार कर।

संपर्क :-9868113044

Wednesday, October 10, 2007

राजनीति के ब्लैक होल




राजनीति विज्ञानी मुन्नालाल आजकल दिल्ली में हैं। उनके प्रेमियों ने उन्हें राजनीति विज्ञान के स्टीफन हाकिंग के नाम से नवाजा है। अधिसंख्य जनता उनके सिद्धांत आज भले ही न समझ पाती हो, मगर सभी उनका एक झलक पाने के लिए आतुर रहते हैं। उन्हें सुनना चाहते हैं। उनके सारगर्भित लेख पढ़ना चाहते हैं। वैज्ञानिक सिद्धांतों के आधार पर राजनीति के रहस्य सुलझाना उनकी महान उपलब्धि है। उन्होंने सिद्ध किया है कि छुट-भइया नेता और भ्रष्टाचार की शुरूआत वोट बैंक राजनीति से हुई। राजनीति के वायुमंडल में जिसकी परिणति ब्लैक होल के रूप में हुई। यह उन्होंने आइंस्‍टीन के सापेक्षवाद के सिद्धांत के आधार पर सिद्ध किया है।
विज्ञानी मुन्नालाल दिल्ली से पूर्व मुंबई में व्याख्यान दे चुके हैं। वहां उनके एक व्याख्यान का विषय था, 'संक्षेप में हमारा राजनैतिक ब्रह्माण्ड' और दूसरा विषय था, 'भविष्य में भ्रष्टाचार।' इन व्याख्यानों में मुन्नालाल ने 'लीडर ट्रैक' से शुरू कर 'सत्ता' के चारो तरफ विभिन्न ग्रहों की परिक्रमा व अन्य ग्रहों के निवासियों का राजनीति की भूमि पर आक्रमण विषयों पर चर्चा की थी। गांधी युग के बाद से राजनैतिक आकाश में कितने परिवर्तन आए, उन्होंने इस विषय पर भी प्रकाश डाला है। दिल्ली में उनके व्याख्यान का विषय होगा, 'राजनैतिक आकाश' में ब्लैक होल।
गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या थी। विज्ञानी मुन्नालाल का व्याख्यान सुनने के लिए जनमानस मनमोहन हॉल में घुसने के लिए इस तरह धक्का-मुक्की कर रहा था, हाल के भीतर सरकार जैसे बाढ़ पीड़ितों के लिए गुड़-चने बांट रहा हो। धीरे-धीरे मनमोहन  हॉल खचाखच भर गया। कुछ देर इंतजार के बाद उदघोषक ने मुन्नालाल के पधारने की घोषणा की। लोगों की निगाहें मंच के बैक डोर की तरफ उठी। दरअसल आजकल के महान नेता ऐसे ही बैक डोर के माध्यम से राजनैतिक मंच पर प्रवेश करते हैं।
हाकिंग की मुख मुद्रा का मास्क ओढ़े मुन्नालाल मंच पर पधारे। हॉल में एकत्रित संपूर्ण जनमानस ने घुटनों के बल झुक कर मुन्नालाल के शान में सजदा किया। हाकिंस की तर्ज पर मुन्नालाल ने धीरे से अपनी गर्दन बाई तरफ लुढ़काई और मुस्करा कर जनमानस का अभिवादन स्वीकार किया।
मुन्नालाल ने रडार के एंटीना की तरह हॉल की चारो दिशाओं में निगाह घुमाई और फिर बोले-'वर्तमान राजनीति से शोषित मेरे भाइयों और बहनों! नेताओं के सम्मान में कब तक घुटनों के बल झुके रहोगे। राजनैतिक ब्रह्माण्ड के रहस्य समझने का प्रयास करो, वरना तुम्हें एक दिन घुटने के बल रेंगना पड़ेगा।'
लानत-मनानत देने के बाद विज्ञानी आगे बोला, 'इस ब्रह्माण्ड के जटिल रहस्य समझाने के लिए आज फिर मैं आपके सामने उपस्थित हूं। शोषित भाइयों और बहनों राजनैतिक -ब्रह्माण्ड   दरअसल इतना प्रदूषित हो चुका है कि उसे एनेलाइज करने में मुझे भी एड़ी से चोटी तक पसीना बहाना पड़ा।'
वास्तव में राजनैतिक सृष्टिं अनिश्चितता (अनसर्टेटी) के सिद्धांत से बंधी है। इसलिए राजनीति और लोकतंत्र के भविष्य के बारे में जानना फिलहाल मुमकिन नहीं है। निश्चिततावाद (डिटर्मिनिजम) और अनिश्चिततावाद (अनसर्टेटी) विषय पर आजादी के बाद से ही बहस चल रही है। फिर भी अभी तक किसी नतीजे पर नहीं पहुंचा जा सका है। लेकिन आईंस्‍टीन के सापेक्षवाद और उसके उसके बाद क्वांटम सिद्धांत के आधार पर हम कुछ निष्कर्षो पर पहुंचे हैं।
प्राप्त निष्कर्षो के आधार पर कहा जा सकता है कि ब्रह्माण्ड के किसी कण की तरह नेता के भी दो प्रमुख गुण होते हैं-उसकी स्थिति (पोजीशन)और गति (मूवमेंट)। नेता की गति भ्रष्टाचार से संचालित है। इसलिए गति मापना नामुमकिन है। गति मापने चलेंगे तो उसकी स्थिति नहीं माप पाएंगे, क्योंकि नेता हमेशा गतिशील रहता है। मेरा दावा है कि नेता की गति ईश्वर भी नहीं माप पाया है। इसलिए नेता की गति का अनुमान उसके तरंग गुणों (वेव/मूड) से ही लगाया जा सकता है। जब तक नेता की गति व स्थिति का पता नहीं चलेगा तब तक राजनीति और लोकतंत्र के भविष्य के बारे में विज्ञान तो क्या ईश्वर भी कुछ कहने की स्थिति में नहीं है।
गर्दन इधर उधर ढलकाते हुए मोहक अंदाज में मुन्नालाल आगे बोले- दया के पात्र मेरे भाइयों-बहनों! वर्तमान राजनीति के आधार लोकतंत्र का विखंडन किया जाए तो परमाणु के रूप में सत्ता दृष्टिंगोचर होती है। उसका पुन: विखंडन करने पर नाभिक (न्यूक्लिअर) के रूप में कुर्सी के दर्शन होते हैं।
नाभिक (कुर्सी) के चारों तरफ नेता व अपराधी नाम के दो तत्व लगातार परिक्रमा कर रहे हैं। परमाणु विखंडन में एक तीसरा तत्व भी हाथ लगता है और वह है मतदाता। विज्ञान की भाषा में सूक्ष्म इन तत्वों को क्रमश: प्रोटोन, इलेक्ट्रोन और न्यूट्रोन कहते हैं। प्रोटोन की तरह नेता की प्रकृति धनात्मक, इलेक्ट्रोन की तरह अपराधी की प्रकृति ऋणात्मक होती है और न्यूट्रोन की तरह मतदाता निष्क्रिय होता है। नेता व अपराधी नाम के ये दोनो तत्व अपनी-अपनी प्रकृति के अनुसार एक दूसरे को आकर्षित करते हैं। वास्तव में इस प्रकृति के कारण इन दोनों का गठजोड़ बन जाता है। विज्ञान की भाषा में जिसे नैक्सस कहते हैं। क्योंकि मतदाता नामक तत्व अपनी प्रकृति के अनुरूप निष्क्रिय है, इसलिए राजनीति की न्यूक्लियर (कुर्सी) पर शेष दोनों ही तत्वों का नैक्सस हावी रहता है।
राजनैतिक वायुमंडल में 'ब्लैक होल' उत्पन्न होने के भी यही कारण हैं। नेता व अपराधी नामक दोनों ही तत्व एक कृत्रिम पदार्थ 'भ्रष्टाचार' से ऊर्जा प्राप्त करते हैं। भ्रष्टाचार की तुलना हम प्रकृति के कृत्रिम पदार्थ प्लास्टिक से कर सकते हैं। प्लास्टिक की तरह भ्रष्टाचार नामक यह तत्व भी कभी नष्ट न होने वाला है।
भ्रष्टाचार से नेता-अपराधी नैक्सस जब ऊर्जा प्राप्त करते हैं तो उस समय होने वाली रासायनिक प्रक्रिया से खतरनाक गैसें निकलती हैं। जिस तरह प्लास्टिक से निकलने वाली खतरनाक गैसें वायुमंडल के सुरक्षा कवच ओजोन पर्तो में छिद्र कर ब्लैक होल का निर्माण करती हैं। उसी प्रकार भ्रष्टाचार से निकलने वाली खतरनाक गैस भी राजनैतिक वायुमंडल के सुरक्षा कवच 'शुचिता, नैतिकता और राष्ट्रवाद' में छिद्र कर ब्लैक होल का निर्माण करती हैं। ये ब्लैक होल आकार में इतने विशाल होते हैं कि अनेकों सत्ताएं इनमें समा सकती हैं।
विज्ञानी मुन्नालाल ने अपने भाषण में आगे कहा भाइयों और बहनों ये ब्लैक होल दिखने में इतने श्वेत होते हैं कि राजनीतिक क्षितिज में दैदीप्त सितारों की चमक भी इनके कृत्रिम प्रकाश के सामने धूमिल पड़ जाती है और ये ब्लैक होल सितारों का भ्रम पैदा करने लगते है। इसलिए राजनीति के हे, शोषित भाइयों बहनों! राजनैतिक  ब्रह्माण्ड   के रहस्य को जानों और कृत्रिम ब्लैक होल के भ्रम से दूर रह कर राजनीति के वास्तविक सितारों को पहचानो।
विज्ञानी मुन्नालाल ने अपना व्याख्यान समाप्त किया और सजल नेत्रों के साथ फिर उसी बैक डोर से वापस लौट गया।
संपर्क - 9717095225

Tuesday, October 9, 2007

हाए! भ्रष्टाचार के खेल में पिट गए!





हाए! भ्रष्टाचार के खेल में पिट गए!


राजेंद्र त्यागी
मन खिन्न है। भविष्य के प्रति चिंतित है। पानी उतरा हमारा चेहरा शर्म से पानी-पानी है। उम्मीद थी कि भ्रष्टाचार के क्षेत्र में एक दिन हम विश्व के सिरमौर हो जाएंगे। अब उसमें भी हम पिछड़ते जा रहे हैं, सत्तर वे पायदान से खिसक कर बहत्तर वे पायदान पर आ गए हैं। इस खेल में हम म्यानमार और सोमालिया जैसे टटपूंजिए देशों के हाथ पिट गए, इसलिए मेरा मन शर्मसार है। इतना भी होता तो गनीमत थी। ट्वेंटी-ट्वेंटी में मात खाए पाकिस्तान और बांग्लादेश से फिफटी- फिफिटी के गेम में पिछड़ गए, इसी वजह से मेरा मन उदास है। रफ्तार यदि यही रही तो सौवें पायदान की गति को भी शीघ्र ही प्राप्त हो जाएंगे, विश्व में फिसड्डी कह लाएंगे!
अफसोस यह नहीं है कि भ्रष्टाचार उतार पर है। जिंदगी में उतार-चढ़ाव तो चलते ही रहते हैं। अफसोस तो यह है कि अब हम गर्व से कैसे कह पाएंगे कि हमारे हुक्मरानों के स्नानागारों में स्वर्ण-जड़ित नल की टोंटियां हैं। भ्रष्टाचार यदि पूर्णरूपेण समाप्त हो गया तो फिर राष्ट्रीय शिष्टाचार का क्या होगा? याद रखो जिस राष्ट्र का अपना का कोई शिष्टाचार नहीं है, जिस राष्ट्र का कई राष्ट्रीय-चरित्र नहीं है, वह राष्ट्र कहलाने के काबिल नहीं है।
जब मुझे कोई उलाहना देता था कि तुम्हारे देश का कोई राष्ट्रीय-चरित्र नहीं है, तब मेरा राष्ट्रवादी मन गर्व से कह उठता था, ''मूर्ख हो तुम! भ्रष्टाचार मेरे भारत-महान का राष्ट्रीय-चरित्र है!'' अब राष्ट्र-संस्‍कृतिवाद का यह सुनहरा पन्ना फटता नजर आ रहा है। यही कारण है कि मेरा राष्ट्रवादी मन आज खिन्न है। शुष्क चेहरा भी शर्म से पानी-पानी है।
भ्रष्टाचार का शिष्टाचार समाप्ति की और है, कोई बात नहीं। सांसकृतिक-मूल्य समय के अनुरूप बदलते रहते हैं। नए मूल्य पुराने मूल्यों का स्थान ले लेते हैं। वैकल्पिक मूल्य रिक्त-स्थान की पूर्ति कर देगें। मगर अफसोस तो यह है कि मेरा भारत-महान ईमानदारी के सैकड़े की ओर कदमताल कर रहा है। मैं इसे आत्मघाती कदम मानता हूं।
क्‍योंकि 'ऊपर-वाला' और 'बेईमानी' मनुष्य की जिंदगी में ये ही तो दो दैविक आसरे हैं। मगर ऊपर-वाले की कृपा से केवल परलोक सुधारता होगा, पता नहीं। किंतु सर्वविदित है, इहलोक तो बेईमानी के आशीर्वाद से ही फलता-फूलता है। ऊपर-वाला ऊपर की कमाई में रत्ती भर भी सहायक नहीं है। ऊपर की कमाई बेईमानी-देवी के ही आशीर्वाद से प्राप्त होती है। ऊपर की कमाई ही आर्थिक स्थिति को मजबूती प्रदान करती है। मनुष्य ऊपर-वाले का स्मरण केवल कष्ट में करता है और मनुष्य कष्ट में तब होता है, जब वह ईमानदार हो जाता है। अत: दोनों में से बेईमानी ही मनुष्य के सुखद जीवन के लिए महत्वपूर्ण दैविक आसरा है। बड़े-बुजुर्गो ने भी कहा है, ''बेईमानी तेरा ही आसरा''! मेरा भारत-महान प्रगतिशील मार्ग का त्याग कर ईमानदारी के आत्मघाती मार्ग का अनुसरण कर रहा है, मेरा पवित्र मन इसीलिए उदास है।
हे, भारत-महान के कर्णधारों! भ्रष्टाचार प्रगति मार्ग है, बेईमानी उसका आधार है। इस देश का सांस्कृतिक राष्ट्रवाद है, राष्ट्र की आर्थिक प्रगति का प्रतीक है, सुदृढ़ अर्थव्यवस्था का आधार है। देश में समाजवाद लाना है तो ईमानदारी जैसे घातक मार्ग का त्याग कर, बेईमानी की पूजा-अर्चाना करो। भ्रष्टाचार को सींचों, देश को आगे बढ़ाओ।
संपर्क – 9868113044

Monday, October 8, 2007

शिक्षा के क्षेत्र में हरित क्रांति


शिक्षा के क्षेत्र में हरित क्रांति
राजेंद्र त्यागी
कल एक समारोह में गया था। समारोह में शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान के लिए शिक्षाशास्त्री सम्मान प्रदान किया जाना था। सम्मान के लिए आदर के साथ नाम की घोषणा की गई। माननीय मुन्नालाल मंच पर पधारे। शक्ल-सूरत देख कर हम हतप्रभ रह गए। हमारे अन्त: करण से आवाज आई, ''अरे! ये तो अपना मुन्नाभाई पानवाला है। पानवाले से शिक्षाशास्त्री हो गया!'' मैं उसकी ऊंगलियों में पैन की स्याही के दाग खोजने की चेष्टा करने लगा। प्रत्येक चेष्टा में मुझे उसके हाथों में कत्थे-चूने के दाग पाए। हमने अपने मित्र को पीड़ा से अवगत कराया, ''भइया! मुन्नाभाई और शिक्षाशास्त्री! इसके लिए तो काला अक्षर और भैंस दोनों एक समान हैं।'' मित्र ने व्यंग्य किया है, ''मुन्नाभाई समाजवादी हैं, अत: भेदभाव उनकी प्रकृति में नहीं हैं।''
हम गंभीर थे, हमारे मित्र के मन में व्यंग्य-पुष्प खिल रहे थे। हमने अपनी गंभीरता का अर्थात दोहराया, ''ये जनाब तो पान, बीड़ी-सिगरट का हिसाब भी नहीं लिख पाते। जब पान खाने जाता था, तब मैं ही लिख कर आता था। अनपढ़ व्यक्ति और शिक्षाशास्त्री!'' हमने आश्चर्य भाव से पुन: प्रश्न किया। हमारे प्रश्न का उत्तर मित्र ने प्रश्नवाचक भाव में दिया, ''अक्ल बड़ी या भैंस?'' हम बोले, ''अक्ल!'' मित्र बोला, ''फिर काले अक्षर और भैंस के बीच समानता क्यों खोजते हो? दोनों के मध्य समानता का अख्यान देते समय अक्ल के तथ्य को क्यों भूल जाते हो? काला अक्षर और भैंस के मध्य समानता का आकलन अतीत का आख्यान हो गया है। अब अक्ल और भैंस के मध्य अनुपातिक समीकरण का जमाना है, अत: बिना भाव भावना को नीलाम कर दो और अक्ल से काम लो।''
मुन्नालाल को शिक्षाशास्त्री का तमगा मिलता देख हमारी अक्ल हमारा दामन छोड़ कर कहीं चली गई। भूखी भैंस की तरह शायद कहीं घास चरने गई होगी, यह सोच कर हमने संतोष किया। किंतु मित्र हमारी अक्ल को वापस हांक कर लाने के प्रयास में जुट गया। वह बोले, ''सुनो भाई! यह शिक्षा के क्षेत्र में हरित क्रांति का जमाना है।'' हमने पुन: आश्चर्य उडेला, ''शिक्षा के क्षेत्र में हरित क्रांति! हरित क्रांति का संबंध तो कृषि क्षेत्र से है? रास्ता भटकी भैंस की तरह हरित क्रांति शिक्षा के क्षेत्र में कहां से घुस आई़?''
मित्र ने माथा ठोका और फिर बोला, ''लगता है, तुम्हारी अक्ल अभी तक किसी घूरे पर घास चर रही है, लौट कर नहीं आई है।'' हमें सांत्वना देने के लहजे में वह फिर बोला, ''कोई बात नहीं, ध्यान से सुना, एकाग्रचित्त हो कर सुनों, लौट आएगी। श्कि्षा के क्षेत्र में हरित क्रांति सावन के अंधे की तरह नहीं आई है। वास्तव में आई है। शिक्षा के क्षेत्र में घुस कर तो देखो चारों तरफ हरा ही हरा नजर आएगा।''
हमने पुन: जिज्ञासा व्यक्त की, ''कैसे?'' वह बोला, ''हरा रंग खुशहाली का प्रतीक है, हरित क्रांति माल पैदा करने का प्रतीक है। शिक्षा के क्षेत्र में चारों तरफ माल ही माल है। जो भी इस क्षेत्र में घुस गया मालामाल हो गया। अपने मुन्नालाल का भी यही हाल है।'' हमने अगला प्रश्न किया, '' कैसे?'' वह बोला, ''अपने मुन्नलाल भाई पानवाले के चार इंजीनियरिंग कालेज हैं, दो मेडीकल कालेज हैं और पांच बिजनेस मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट हैं। भाई अब पानवाले नहीं इंस्टीट्यूट वाले हैं। भई अब मालामाल हैं, शिक्षाशास्त्री हैं।'' ''..किंतु यह हुआ कैसे?'' हमने पूछा। मित्र ने बताया, ''हमारी सलाह पर। मुन्नालाल एक दिन बोले, पान के काम में ससुर पैसा तो है, पर इज्जत ना है। कछु ऐसा काम बताओ जिसमें पैसा भी हो और ससुर इज्जत भी। हम बोले, भाई इंस्टीटंयूट खोल लो। मुन्नालाल बोले, मगर हम तो ससुर काला अक्षर भैंस बराबर है। पढ़ाई-लिखाई से तो हमारा जन्म-जन्म का बैर है। हम बोले बैर का त्याग करो, दोस्ती कर लो। अक्ल से काम लो अकबर बन जाओ, बीरबलों की कमी नहीं है। एक ढूंढों के हजार मिल जाएंगे। बस मुन्नालाल की अक्ल में हमारी बात धंस गई और शिक्षाशास्त्री हो गए। अगली सरकार में शिक्षामंत्री भी हो जाएंगे।'' मुन्नलाल पानवाला शिक्षाशास्त्री हो गया। हम बीरबल बने शिक्षा के क्षेत्र में हल चलाने में व्यस्त हैं। मुन्नालाल अकबर बन हरित क्रांति का माल लूटने में व्यस्त है।