Tuesday, October 23, 2007

लक्ष्मण को लंकेश की दीक्षा


(बलॉगर दोस्‍तों के नाम)

भगवान राम लंकेश के ऊपर लगातार बाणों की बौछार कर रहे थे, किंतु उसका राम नाम सत्य नहीं हो पा रहा था। हताश श्रीराम ने लंकेश-अनुज विभीषण के समक्ष अपनी व्यथा रखी। विभीषण मुस्करा कर बोले, ''हे, राम! मैं तुम्हारी व्यथा समझता हूं। धारा 144 के कारण आप अग्नि-बाणों का प्रयोग करने में असमर्थ हैं और बांस निर्मित बाणों से रावण-वध असंभव है। श्रद्धेय एक अन्य उपाय बताता हूं, ध्यान से सुनों- विद्वान स्वभाव से स्वाभिमानी होते हैं। स्वाभिमानी व्यक्ति प्रत्येक आपदा सहन कर सकता है, मगर अपमान नहीं। तनिक सा अपमान भी उसे आहत कर देता है। विद्वान होने के कारण लंकेश स्वाभिमानी है। अत: व्यंग्य-बाणों से उसके स्वाभिमान पर आक्रमण कीजिए।''
विभीषण के वचन सुन श्रीराम की सेना ने लंकेश के ऊपर व्यंग्य-बाणों की बौछार शुरू कर दी। स्वाभिमानी लंकेश व्यंग्य-बाणों की मार ज्यादा देर न झेल सका और शीघ्र ही धराशाई हो गया।
लंकेश के धराशाई होते ही श्रीराम ने अनुज लक्ष्मण से कहा, 'वत्स लंकेश के पास जाओ, वह राजनीति का प्रकांड पंडित है, उससे राजनीति के कुछ गुर सीख लो।' भगवान राम के आदेश का पालन करते हुए लक्ष्मण लंकेश के नजदीक गए, चरण स्पर्श कर उन्हें प्रणाम किया और राजनीति का पाठ पढ़ाने का आग्रह किया, मगर लंकेश मौन रहा।
निराश लिए लक्ष्मण भगवान राम के पास आए और अपनी व्यथा से अवगत कराया, 'भ्राता, त्रेता में तो लंकेश इसलिए मौन था कि मैं चरणों की ओर नहीं उसके शीश की तरफ जा कर खड़ा हो गया था, मगर इस बार तो न केवल चरणों की ओर खड़ा हुआ हूं, अपितु चरण वंदना भी की है। फिर लंकेश मौन क्यों?'
राम ने लक्ष्मण से पूछा, 'लंकेश के लिए गिफ्ट क्या लेकर गए थे।' गिफ्ट के नाम पर लक्ष्मण मौन थे।
लक्ष्मण की तरफ देख राम बोले, 'हे वत्स, कलियुग में त्रेतायुग का व्यवहार, अव्यवहारिक है। कुछ नहीं है तो पुष्प-पत्र लेकर ही सही, लंकेश के पास पुन: जाओ।' लक्ष्मण ने भ्राता राम के आदेश का पालन किया। लंकेश ने लक्ष्मण का प्रणाम स्वीकार किया और आने का कारण पूछा।
लक्ष्मण बोले, 'हे, राजनीति के प्रकांड पंडित दशानन! मुझे राजनीति के कखग की दीक्षा प्रदान कर अनुग्रहीत करें।'
लंकेश बोला, 'वत्स लक्ष्मण! कलियु" में सफलता प्राप्त करने के लिए चरणवंदना परम आवश्यक है। राजनीति का यह प्रथम सूत्र तो तुम्हें कंठस्थ है ही। गिफ्ट-महिमा का दूसरा सूत्र तुम्हें भगवान राम ने सिखा दिया और उसका अनुसरण तुमने किया ही है। इसके अतिरिक्त राजनीति के कुछ और प्रमुख गुर तुम्हें बताता हूं। तुम्हारे व्यक्तित्व-विकास में भी सहायक होंगे। वत्स, 'संकट काले मर्यादानास्ति' अत: संकट काल में गधे को भी बाप बना कर समझौता कर लेना ही सर्वमान्य व सफलतम् आदर्श है।'
'इनसान को छोड़ कर अन्य सभी जीव विश्वास के योग्य हैं। इनसान पर विश्वास कदापि नहीं करना चाहिए, क्योंकि विभीषण इनसानों में ही होते हैं, अन्य जीवों में नहीं। वत्स लक्ष्मण! धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष में केवल अर्थ श्रेष्ठं है, क्योंकि अर्थ से शेष तीनों पुरुषार्थ भी सहज ही प्राप्त किए जा सकते हैं। अत: राज कोष को अपनी निज संपत्ति मान कर चलना चाहिए और उसे विदेशी बैंकों में जमा कराना ही श्रेयष्कर है। ताकि संकट काल में काम आ सके।'
लक्ष्मण ने पूछा, 'हे लंकेश, लोकतंत्र में सफलता का राज क्या है?'
रावण बोला, 'वत्स! लोकतंत्र में वही सफल होता है, विचार-समाचार-प्रचार जिसकी मुठ्ठी में होते हैं। विचार से तात्पर्य बुद्धिजीवी से है और समाचार का अर्थ मीडिया। जिसकी जेब में ये दोनों ताकते हैं, वही सफल राजनीतिज्ञ कह लाया जाता है, क्योंकि युग प्रचार का है। प्रचार के महत्व को समझना चाहिए।'
लक्ष्मण का अगला सवाल था, 'अहंकार व्यक्ति को किस प्रकार नष्ट करता है?' रावण बोला, 'नहीं वत्स, अहंकार नहीं स्वाभिमान! व्यक्ति का सबसे बड़ा शत्रु स्वाभिमान ही है। अहंकार सफलता में अड़े नहीं आता, वत्स, क्योंकि वह अस्थाई भाव है और सफलता के बाद ही उत्पन्न होता है। लेकिन स्वाभिमान वंशानुगत होता है, जन्मजात होता है और सफलता के रास्ते में हमेशा ही अवरोध उत्पन्न करता है।'
लक्ष्मण ने अंतिम प्रश्न पूछने का प्रयास किया, मगर रावण बीच ही में बोला, 'वत्स बस और नहीं, शेष आगामी विजयादशमी पर!'
संपर्क : 9868113044

Monday, October 22, 2007

विजयदशमी पर भी राम उदास !



लंकेश और उसके बंधु-बंधवों के पुतले धू-धू कर जल रहे हैं। असत्य पर सत्य की विजय, बुराइयों पर अच्छाई की विजय और राम-नाम के जयघोष से चारों दिशाएं गूंज रही हैं। मंच के एक कोने में लक्ष्मण के साथ राम उदास बैठे हैं। लक्ष्मण आश्चर्य व्यक्त करते हुए भ्राता राम से प्रश्न करते हैं, ''भ्राता! लंकेश पर विजय प्राप्त करने के उपरांत भी यह उदासी! उदासी का कारण, भगवन?'' राम ने हताश नजरों से लक्ष्मण को निहारा और बोले, ''कब तक जारी रहेगा यह नाटक? लंकेश को जितनी बार जलाया, वह उतनी ही बार वह अधिक शक्तिशाली रूप में हमारे समक्ष प्रस्तुत हुआ। कभी-कभी मुझे लगता है कि विजयी हम नहीं, लंकेश हुआ है और हमारे भक्त प्रति वर्ष उसकी विजय का ही पर्व मनाते हैं। भ्राता लक्ष्मण यही मेरी उदासी का कारण है।''
श्रीराम और भ्राता लक्ष्मण के मध्य वार्ता चल ही रही थी, तभी लंकेश के पुतले से निकलते धुएं से अट्टहास की गूंजा सुनाई दी। राम-लक्ष्मण सहित सभी के आंख-कान उस ओर केंद्रित हो गए। एक क्षण के उपरांत लंकेश की आत्मा श्रीराम के सम्मुख उपस्थित थी। लंकेश ने श्रीराम को प्रणाम किया, लक्ष्मण को आशीर्वाद दिया और तत्पश्चात बोला, ''हे, अयोध्या पति राम! आपकी पीड़ा सार्थक है, किंतु उसके कारण आप और आपके भक्त स्वयं ही तो हैं। ..हे,राम! आत्मा अमर है। यह आप ही के द्वारा स्थापित सिद्धांत है! ..राम, आत्मा अमर है तो फिर आप मेरा अस्तित्व कैसे समाप्त कर सकते हो?'' लंकेश मुस्करा कर बोला, ''भगवन! वर्तमान नेताओं के समान, क्या आप भी अपने सिद्धांत की हत्या स्वयं ही करने की इच्छा रखते हो।''
लंकेश ने दया-भाव के साथ श्रीराम की ओर निहारा और फिर उसी भाव के साथ बोला, ''श्रद्धेय, राम! मैं कंचन-लंका का सम्राट हूं। जितनी बार जलाओगे उतनी ही बार कंचन के समान निखर कर आपके समक्ष उपस्थित हो जाऊंगा। देख नहीं रहे हो, श्रद्धेय राम! मेरा साम्राज्य अब लंका तक ही सीमित नहीं है! आपके आर्यावृत्त में भी मेरी ही टकसाल की स्वर्ण-मुद्राएं चलती हैं। चारों ओर राक्षस-संस्कृति का ही तो आधिपत्य है। आपका साम्राज्य सत्य और ईमानदारी के समान सीमित होता जा रहा है। असत्य और बेईमानी के समान मेरे साम्राज्य का विस्तार हो रहा है! .. इसके लिए मैं लंकेश नहीं, आप और आपके भक्त उत्तरदायी हैं, राम!'' भाव विह्वल हो कर लंकेश ने कहा, ''श्रद्धेय! त्रेता में भी आप मेरे लिए श्रद्धा के पत्र थे और आज भी पूजनीय हैं। आपके द्वारा मृत्यु प्राप्त कर मैं मुक्ति की इच्छा रखता था और अपने उद्देश्य में सफल भी हो गया था! किंतु, श्रद्धेय! मैं बार-बार पुनर्जीवित होता रहूं, यही आपके भक्तों के हित में है, अत: वे मुझे मुक्त नहीं होने देना चाहते!''
राम ने प्रथम लक्ष्मण को निहारा। लक्ष्मण मौन थे। इसके उपरांत निरीह भाव से उन्होंने लंकेश की ओर निहारा। लंकेश का मुख-मण्डल तेज, गौरव और गरिमा सहित सभी अलंकारों से सुसज्जित पाया। राम ने गर्दन झुकाई और मौन रह गए।
श्रीराम की ऐसी स्थिति देख लंकेश की विह्वलता में वृद्धि हो गई। उसके नेत्रों में खारा पानी छलक आया। नम आंखें पोंछते हुए वह बोला, ''नहीं-नहीं, श्रद्धेय! ..नहीं! आपका यह स्वरूप मेरे लिए असहनीय है, वेदना कारक है, राम! मैं आपकी त्रेता-युगीन-छवि के ही दर्शन करने की इच्छा रखता हूं।'' लंकेश ने अपने संवेगों पर नियंत्रण किया और बोला, ''श्रद्धेय! मेरा अस्तित्व किसी जर्जर ढांचे से नहीं जुड़ा है। मेरेअस्तित्व पर कभी कल्पना अथवा यथार्थ का प्रश्न-चिहन् भी नहीं लगा और न ही मेरी गरिमा पत्थरों से निर्मित किसी सेतु के आश्रय है। यह लंकेश का अहम् नहीं यथार्थ है!''
इतना कहने के उपरांत लंकेश ने वाणी को क्षणिक विराम दिया और तत्पश्चात बोला, ''श्रद्धेय! आपके भक्तों ने आपके अस्तित्व आपकी गरिमा को कितना सीमित कर दिया है, कितना निर्बल कर दिया है, सुन कर दुख होता है! ..आपके सर्वव्यापी अस्तित्व को जर्जर एक ढांचे के साथ संयुक्त कर दिया है। आपके व्यक्तित्व को मृत्यु-लोक के एक निर्बल शहंशाह के समकक्ष लाकर खड़ा कर दिया है, आपके भक्तों ने। ..जो राम रोम-रोम में व्याप्त है, एक साधारण ढांचे से उसके अस्तित्व को संबद्ध करना कितना हास्यास्पद सा लगता है! .. किसी जीवित व्यक्ति को यदि कोई मृत घोषित कर दे, तो क्या वह मृत्यु को प्राप्त हो जाएगा, नहीं ना श्रद्धेय! फिर त्रुटिवश भी यदि किसी ने काल्पनिक कह कर आपके अस्तित्व को चुनौती देने की चेष्टा की तो भक्तों ने हाहाकार मचा दिया! आपका अस्तित्व जल में उत्पन्न बुलबुला तो नहीं कि हवा के साथ समाप्त हो जाए। ..जो राम कल्पनातीत है, उसके संबंध में कल्पना और यथार्थ जैसे सांसारिक प्रश्नों का औचित्य क्या?'' वाणी को विराम देकर लंकेश पुन: पूर्व भाव से बोला, ''हे, मर्यादा पुरुषोत्तम राम! लंका और आर्यवृत्त के मध्य आदर्श और मर्यादा के जिस सेतु का आपने निर्माण किया था, उसे भुलाकर भक्तों ने तेरी गरिमा एक तुच्छ सेतु से संबद्ध कर दी। जिस मर्यादा पुरुषोत्तम की गरिमा के प्रकाश से यह सृष्टिं प्रकाशित है, उसकी गरिमा का किसी सेतु से संबद्ध करने का औचित्य क्या?''
अंत में लंकेश बोला, ''श्रद्धेय! आपकी पीड़ा आपके ही भक्तों द्वारा जनित है और मेरा चिर-अस्तित्व भी उन्हीं भक्तों द्वारा प्रदत्त वरदान है। अत: मुझसे नहीं कलियुग के इस प्रपंच और प्रपंचकारियों से मुक्ति प्राप्त करने का उपाय सोचो, भगवन! आप मुक्त हो जाओगे, तो मैं स्वमेव मुक्त हो जाऊंगा।'' इतना कह कर लंकेश आंसू पोंछता-पोंछता पुतलों से उठते धुएं में पुन: विलीन हो गया।

Friday, October 19, 2007

नेता का जमीन से जुड़ना


वर्षो बीत गए बुधवा को दरी बिछाते-बिछाते। कई नेताओं की दरी उसने सफलता पूर्वक बिछाई, मगर खुद की दरी बण्डल ही बनी रखी रही। जब कभी उसे अपनी बंडल-किस्मत का खयाल आता, चेहरा सड़ी तोरई की तरह लटका जाता। किसी के हाथ में चुनावी टिकट देखता तो स्वयं को बैरंग-लिफाफे की तरह महसूस करने लगता। बावजूद इसके फटे पोस्टर की तरह वह पार्टी कार्यालय की दीवार पर चिपका रहा। शायद इसी उम्मीद के साथ कि देर-सबेर किसी भले नेता की निगाह पोस्टर पर भी पड़ेगी और उस पर लिखी इबारत पढ़ी जाएगी। कभी-कभी वह सोचता, यदाकदा ही सही, जब अंधों के हाथ भी बटेर लग ही जाती है, अपन तो नैनसुख हैं। आज नहीं तो कल, कोई बटेर अवश्य ही मेरी हथेली पर मजमा लगाएगी।
जहन में नेताई कीड़ा कुलबुलाने का वाकया भी कम दिलचस्प नहीं है। पार्टी-कार्यकत्र्ताओं की बैठक में उसने एक बार सुन लिया था कि जमीन से जुड़ा व्यक्ति ही नेता बन पाता है और सफल भी वही होता है। नेताई इस फार्मूले ने एक दिन बुधवा की अक्ल की खिड़की पर दस्तक दी और दरी बिछाते-बिछाते बुधवा के ऊपर बुद्धिजीवी भूत हावी हो गया। उसने ठोढ़ी दाई हथेली पर टिकाई, मैल-संपन्न आंखें बंद की और अतीत खंगालने में मशगूल हो गया, ''मां कहती थी की तेरे होने के समय प्रसव-कर्म खेत के किनारे जमीन पर ही संपन्न हुआ था। पालना और पोटी-पॉट के लिए भी जमीन का ही सदुपयोग किया गया। कुछ बड़ा हुआ तो बिछावन भी जमीन पर ही बिछा। राजनीतिक की शुरुआत मैंने दरी बिछाने से की! अरे, वाह! मेरा तो अतीत, वर्तमान सभी जमीन से जुड़ा है। मैं तो पैदाइशी जमीन से चिपका हूं।'' इस प्रकार वह बुधवा से नेता बुद्धप्रकाश सिंह बनने के ख्वाब देखने लगा।
वह दरी बिछाता रहा, ख्वाब देखता रहा। बिहारी की विरहिणी नायिका के बसंत की तरह कई चुनाव आए और चले गए, मगर गले में पुष्प-हार पड़ने के आसार नहीं पैदा हुए। अलबत्ता एक दिन दरी झाड़ते-झाड़ते उसके हाथ कार्यकत्र्ता का बिल्ला अवश्य लग गया। बिल्ला पाकर वह कुछ इस अंदाज में प्रसन्न हुआ, जैसे साठ वर्षीय किसी जवान को चने के खेत में प्रेमवती प्राप्त गई हो। बुधवा ने बिल्ला अपने सीने पर जड़ लिया और वह स्वयं को पार्टी कार्यकर्ता मानने लगा। पर नेता न बन पाया। शहर में एक दिन स्वामी अवधूतानन्द का आगमन हुआ। उसके एक शुभचिंतक ने उसे स्वामीजी की शरण में जाने की सलाह दी। स्वामीजी और राजनीति के मध्य गोबर में गुबरीले वाले घनिष्ठ संबंध थे। बुधवा ने सलाह का अनुसरण किया और वह स्वामी शरणम् गच्छामि हो गया।

बुधवा स्वामीजी के समक्ष चारों-खाने ऐसे चित हुआ, मानों वह जमीन से चिपक कर जमीन से जुड़े होने का सबूत पेश करा रहा हो। दण्डवत् भक्ति से द्रवित स्वामीजी बोले - कहो भक्त क्या कष्ट है? बुधवा ने अपना कष्ट उनके सामने उड़ेल दिया। कष्ट सुनकर स्वामीजी बोले- पुत्र नेता बनना है, तो जमीन से जुड़ जाओ। बुधवा ने जन्मजात जुडे़ होने के सारे सबूत स्वामीजी के समक्ष प्रकट कर दिए। सबूत सुनकर स्वामीजी मुस्कराते हुए बोले- पुत्र! जमीन तुम्हारी हकीकत बन गई है, परंतु तुम जमीनी हकीकत के ज्ञान से वंचित हो। जमीन के साथ तुम्हारे वैसे ही संबंध है, जैसे लक्ष्मी के साथ उल्लू के। उल्लू दिन-रात लक्ष्मी ढोता है, पर उसका उपभोग नहीं करता। यही कारण है कि उल्लू आजतक उल्लू है, लक्ष्मीपति नहीं बन पाया। जमीनी हकीकत का भान करो, एक दिन अवश्य नेता बन जाओगे।
स्वामीजी से मंत्र प्राप्त कर बुधवा ने जमीन पर पकड़ और मजबूत कर ली, फिर भी बुधवा के सामने किसी ने घास नहीं डाली। गधों के आगे घास डालने के उदाहरण कम ही मिलते हैं। मिलते भी हैं तो सूखी घास डालने। निराश बुधवा पुन: स्वामीजी की शरण में गया, व्यथा सुनाई। व्यथा सुन स्वामीजी को उसकी बुद्धि पर तरस आया और गंभीर भाव से बोले- पुत्र! जमीनी हकीकत से तुम अभी भी अनभिज्ञ हो। ध्यान से सुनों- पुत्र! भगवान वामन अवतार ने ढाई पग में संपूर्ण पृथ्वी नाप ली थी। तुम एक इंच जमीन भी नहीं नाप पाए। अपने पग का विस्तार करो, पुत्र।
जमीनी हकीकत का रहस्य अब बुधवा के जहन में गीली मिट्टी में खूंटे की तरह धंस गया था। उसने ढाई पग से पहले ग्रामसभा की जमीन नापी। उसके बाद ढाई पग का विस्तार होता चला गया। वह सरकारी-गैरसरकारी जमीन नापता रहा। आज वह नेता बुधप्रकाश सिंह के नाम से प्रसिद्ध है। प्रदेश का शहरी विकास मंत्री है। अब वह नेता भी है, भूपति भी है और लक्ष्मी-पति भी।

संपर्क - 9868113044

Thursday, October 18, 2007

डॉन संस्कृति- सार्वभौम संस्कृति!


मित्र मुन्नालाल के साथ सुबह सैर पर निकला था। तभी लंबी-लंबी गाड़ियों का लंबा काफिल धूल उड़ाता वहां से गुजरा। देख उसे हमारी बुद्धि करने लगी मुजरा। हमने जिज्ञासा व्यक्त की मित्र मुन्नालाल, यह कौन सज्जन हमारे मुंह पर खाक डाल गया। हमें सुपुर्दे खाक कर गया? मुन्नालाल बोला, डॉन।

मैने पूछा, बिग बी या किंग खान? मुन्नालाल बोला, डॉन, डॉन के मध्य अंतर कैसा? केवल डॉन, न बिग बी न किंग खान, बस रीयल डॉन।
इतना सुनते ही मेरी वेदना, संवेदना अर्थात संपूर्ण चेतना डॉन नामक जीव पर केंद्रित हो गई। डॉन के उद्भव, विकास और समाज के लिए उसकी उपयोगिता से संबद्ध प्रश्न मेरे जहन में न्यूज चैनल की हैड लाइन की तरह एक-एक कर टपकने लगे।
हमारी जिज्ञासा भांप मुन्नालाल बोला, मजबूरी का नाम महात्मा गांधी और ताकत का नाम डॉन। जिस प्रकर धातुओं के विकल्प के रूप में प्लास्टिक का उद्भव हुआ, उसी प्रकार नेताओं के विकल्प के रूप में डॉन का विकास हुआ। प्लास्टिक की तरह डॉन भी अग्नि, जल, पावक तीनों से अप्रभावित है। जल में वह गलता नहीं है, इसलिए चुल्लू भर पानी भी उसके लिए निरर्थक है। अग्नि में भस्म नहीं होता, इसलिए प्रत्येक ताप-संताप में वह समान भाव रखता है। वायु भी उसके रासायनिक गुणों में परिवर्तन करने में असमर्थ है, क्योंकि वह हमेशा ही अपनी हवा में रहता है। वह मृत्युंजय है। वह मरता नहीं, केवल रूप परिवर्तन करता है।
हमने पूछा, डॉन के उद्भव-विकास का इतिहास क्या है? मुन्नालाल बोला, प्लास्टिक पेट्रोलियम पदार्थ से प्राप्त अंतिम तत्व है और डॉन समाज का सार-तत्व। हमने पूछा, इसका मतलब समाज का प्रथम व्यक्ति? हमारी जिज्ञासा पर मुन्नालाल ने आश्चर्य व्यक्त किया, प्रथम व्यक्ति! बोला, न प्रथम, न द्वितीय, न तृतीय और न ही अंतिम व्यक्ति! डॉन व्यक्ति वाचक संज्ञा से परिभाषित नहीं होते हैं, व्यक्ति उनसे परिभाषित होते हैं, उनसे प्रभावित होते हैं। हमने जिज्ञासा व्यक्त की तो क्या यह कोई नया उत्पाद है? मुन्नालाल बोला, नहीं, परंपरागत वाद है। आदि काल में कबीले का मुखिया कहलाता था। राजशाही का जन्म हुआ तो राजा कहलाने लगा। लोकतंत्र आया तो नेता कहलाया जाने लगा। नेताओं का परिष्कृत स्वरूप है, डॉन।
प्लास्टिक की तरह डॉन की दखल भी हमारे जीवन में प्रसूति गृह से लेकर शमशान घाट तक समान है। राजनीति में डॉन, आर्थिक क्षेत्र में डॉन, शिक्षा के क्षेत्र में डॉन, धर्म के क्षेत्र में डॉन, समाज सेवा के क्षेत्र में डॉन, सर्वव्यापी है डॉन, न जाने किस भेष में बाबा मिल जाए डॉन रे। मैने कहा फिर तो लोकतंत्र का पाँचवां स्तंभ हुआ डॉन! मुन्नालाल बोला, नहीं! लोकतंत्र का ऊर्जा स्तंभ। उसने स्पष्ट किया, लोकतंत्र के स्तंभ निर्धारित क्षेत्र में ही लोकतंत्र को ऊर्जा प्रदान कर रहे हैं। डॉन समूचे लोकतंत्र को एक मुश्त ऊर्जा प्रदान कर रहा है। डॉन को राजनीति का प्रकाश पुंज भी कहा जा सकता है, क्योंकि उसके प्रकाश में ही राजनीति अपनी मंजिल तलाश रही है, दिशा निर्धारित कर रही है। दशा का आकलन कर रही है।
सभी क्षेत्रों के अलग-अलग डॉन, फिर भी॥? मुन्नालाल बोला, कहा न डॉन व्यक्ति नहीं समष्टिं है, विविधता में एकता की संस्कृति है। न पूरब, न पश्चिम का भेद, न वामपंथी न दक्षिण पंथी, सार्वभौमिक संस्कृति है, डॉन। अरे रे रे, समझ गया, माफिया का दूसरा नाम है, डॉन! मुन्नालाल ने भूल सुधार की, नहीं-नहीं, माफिया संस्कृति का परिष्कृत स्वरूप है, डॉन। इस प्रकार मित्र मुन्नालाल ने हमें डॉन के विराट स्वरूप के दर्शन कराए। हमने मन ही मन डॉन को प्रणाम किया और सुरक्षित घर लौट आए।
संपर्क : 9868113044

Wednesday, October 17, 2007

केकड़ा संस्कृति



आज आपको एक कहानी सुनाता हूं। कहानी गूढ़ है, मगर नेताई चरित्र की तरह उलझी हुई नहीं। कहानी को हम रहस्यवादी भी कह सकते हैं, मगर उसका रहस्य राजनीति की तरह अगम-अगोचर नहीं है, क्योंकि यह आपके चारों तरफ की कहानी है, परीलोक या परलोक की नहीं इसी मिथ्या संसार की कहानी है। इसी समाज से जुड़ी कहानी है, लोकतंत्र की कहानी है। वैयक्तिक स्वतंत्रता की कहानी है। घर-घर की कहानी है, सास-बहू की कहानी है, आपकी अपनी कहानी है। हम सभी इस कहानी के पात्र हैं। कुछ पीड़ित पात्र हैं, कुछ पीड़ादायक अर्थात पीड़ा-कारक पात्र हैं।
लो सुनो कहानी- चीन ने भारत से केकड़े आयात किए। केकड़े कंटेनर में भर जहाज में लाद दिए गए। मंजिल की और रवाना होने से पूर्व चीनी-कप्तान ने जहाज का निरीक्षण किया और फिर जोर से चिल्लाया, 'अरे, मूर्खो! जहाज रवाना होने वाला है और केकड़ों से भरे सभी कंटेनरों के ढक्कन खुले पड़े हैं। क्या मूर्खता है, बंद करों इन्हें। ढक्कन खुले रहे तो सभी केकड़े कंटेनरों से बाहर निकल कर समुद्र में चले जाएंगे।'
कप्तान की बात सुन उसका सहायक मुस्कराया और फिर विनम्र भाव से बोला, 'हुजूर यह चिंता का विषय नहीं है, ढक्कन बंद करने की भी कोई आवश्यकता नहीं है। भारतीय केकडे़ हैं, कहीं नहीं जाएंगे।'
सहायक का रहस्यमय कथन कप्तान को मूर्खतापूर्ण लगा। परंपरा भी है, जब कभी कोई रहस्य अनसुलझा रह जाता है, तो उसे मूर्खता के खाते में डाल कर खाता बंद कर दिया जाता है। कप्तान पुन: चिल्लाया, 'मूर्खतापूर्ण बातें बंद कर, आदेश का पालन करो।'
सहायक फिर मुस्कराया और कप्तान से कंटेनरों के अंदर झांकने के लिए प्रार्थना की। कप्तान ने एक-एक कंटेनर में झांकना शुरू किया और अंदर का दृश्य देख आश्चर्यचकित रह गया। सभी केकड़े एक दूसरे के साथ उलझे हुए थे। जो भी केकड़ा कंटेनर से बाहर निकलने का प्रयास करता दूसरा केकड़ा टांग खींच उसे नीचे गिरा देता। रहस्य-रोमांच से भरपूर उस दृश्य को देख कप्तान ने आश्चर्य-भाव के साथ सहायक से पूछा, 'यह सब क्या है?'
रहस्यमयी पहली सुलझाते हुए सहायक बोला, 'हुजूर इसे केकड़ा संस्कृति कहते हैं। मैने कहा था ना, ये भारतीय केकड़े हैं, एक दूसरे को बाहर नहीं निकलने देंगे। भारतीयों को अपनी सांस्कृतिक परंपराओं से बहुत लगाव होता है, उसका सहज त्याग नहीं करते।'
कहानी समझ आई, ना। यह कहानी न केवल एटमी-डील के हश्र की है! अपितु समूची भारतीय राजनीति की है। आपके चारो-तरफ की आपकी अपनी कहानी। महसूस कर रहे हो ना, किसी न किसी रूप में हम सभी इस कहानी के एक पात्र हैं। कंटेनर से बाहर निकल मैं खुली हवा में सांस ले सकूं अथवा नहीं, पड़ोसी कंटेनर से बाहर नहीं जाना चाहिए। मेरे सपने साकार हों न हों, लेकिन दूसरों के सपनों में पलीता लगना जरूरी है। संपर्क : 9868113044---

Tuesday, October 16, 2007

गधे को बाप बनाना



रबुपुरा गांव की पैंठ में रह-रह कर यह आवाज आज भी सुनाई पड़ती है, 'रबुपुरा की पैंठ में मैं किसका फूफा री, रबुपुरा की पैंठ में मैं किसका फूफा री।' आवाज उस वृद्ध की है, फूफा-फूफा कहकर एक युवती जिसका शिकार कर फरार हो गई थी। हाथ में हांड़ी लेकर युवती उसके पास आई और बोली फूफा सौ रुपए उधार दे दे बदले में घी से भरी यह हांड़ी अपने पास रख ले। मैं अभी आई दूसरे दुकानदार का हिसाब चुकता कर आऊं। तेरे रुपये दे जाऊंगी, अपनी हांड़ी ले जाऊंगी। हांड़ी के मुंह पर जमी घी की पर्त धीरे-धीरे पिघलती गई और उसी रफ्तार से उसके नीचे जमा विशुद्ध गोबर प्रकट होता गया, मगर युवती अभी तक लौट कर नहीं आई। तब से आज तक वह कथित फूफा रबुपुरा की पैंठ में फूं-फा-फूं-फा करता विचरण कर रहा है।
बेचारे मुसद्दीलाल अपने दत्तक पुत्र की खोज में वात्सल्य और विरह के रिमिक्स अलापता घूम रहा है। आज सुबह ही सुबह उन्होंने हमारे दर पर दस्तक दी और बोले, 'भइया हम लुट गए। रामलाल चुना लगा गया। हम देखते रह गए और वह फरार हो गया।'
हम बोले, 'कौन रामलाल?' वे बोले, 'अरे वही, जो हमें पिता तुल्य मानता था। जिसे हमने पुत्र का स्नेह दिया था। जिसे हमने अपने घर आश्रय दिया, क्या-क्या नहीं किया हमने उसके लिए! आज हमें घर से बाहर गली में खड़ा कर गया, दगाबाज निकला कमबख्त।'
हम समझ गए कथित पिता व कथित पुत्र के रिश्तों के मध्य जमी घी की चिकनी पर्त पिघल गई। हम बोले, 'अच्छा-अच्छा वह तुम्हारा दत्तक पुत्र, रामलाल!' नम आंखें शुष्क करते हुए भाई मुसद्दीलाल बोले, 'ना-ना-ना, उस दगाबाज को पुत्र न कहो, पुत्र के नाम पर कलंक है।'
युवती ने वृद्ध को फूफा बना कर और रामलाल ने मुसद्दीलाल को बाप बना कर अपना उल्लू सीधा कर लिया। दुनिया का व्यापार ऐसे ही चल रहा है। उल्लू सीधा हो गया तो सारे जहां की नियामतें अपने कदमों तले समझो। सवाल बस उल्लू सीधा करने का है। सब अपने-अपने तरीके से उल्लू सीधा करने में जुटे हैं, कोई फूफा बना कर तो कोई बाप बना कर। बाप बना कर उल्लू सीधा करना अपेक्षाकृत सहज है, क्योंकि बाप बनाने में रिश्तों का समीकरण नहीं समझाना पड़ता। वैसे भी इंसान में बाप बनने की इच्छा प्रबल है अत: गधत्व भाव से बापत्व सहज स्वीकार कर लिया जाता है।
गधे को बाप बनाने की कहावत हालांकि सदियों पुरानी है और कहावत की पीछे छिपा रहस्य भी सर्वविदित है। फिर भी बनाने वाले गधों को बाप बना कर उल्लू सीधा कर रहें हैं और बनने वाले बन रहे हैं, देखती आंख मक्खी निगल रहे हैं, कथित पुत्र का भार ढो रहे हैं।
सभी मूल बाप गधे नहीं होते। चूंकि सभी मूल बाप गधे नहीं होते, इसलिए उल्लू सीधा करने के लिए गधे-बाप तलाशने पड़ते हैं, अर्थात गधों को बाप बनाना पड़ता है। प्रतिस्पर्धा का युग है, दुनिया तेजी से दौड़ रही है, अत: एक बाप के सहारे जीवन की दौड़ में बने रहना संभव नहीं है, इसलिए मूल बाप के अलावा एक और बाप चाहिए, 'गॉड फादर' चाहिए। एक घर का और एक बाहर का होना चाहिए।
बनने वाले जानते हैं कि बनाने वाला तुम्हें नहीं तुम्हारे गधत्व को बाप बना रहा है, अर्थात बाप, बाप कह कर तुम्हें गधा बना रहा है। बनने वाले फिर भी बन रहे हैं। एक ढूंढों हजार मिलते हैं कि कहावत चरितार्थ कर रहे हैं। गधे को बाप बनाना बनाने वाले का स्वभाव है और बाप बनना गधों का स्वभाव है। दोनों का अपना-अपना स्वभाव है। बनाने वाले बनाते रहेंगे और बनने वाले बनते रहेंगे। दुनिया का व्यापार ऐसे ही चलता है, ऐसे ही चलता रहेगा। रबुपुरा की पैंठ में वृद्ध अपने कथित साले की कथित पुत्री को खोजता रहेगा और मुसद्दीलाल अपने कथित पुत्र के कारनामों को यूं ही रोता रहेगा। रिश्तों की चिकनाई पिघलेगी, शुद्ध घी के नीचे छिपे विशुद्ध गोबर की सच्चाई भी उजागर होती रहेगी बावजूद इसके गधों को बाप बनाने का सिलसिला निर्बाध जारी रहेगा, क्योंकि यह स्वभाव है।
राजेंद्र त्यागी
संपर्क : 9868113044

Monday, October 15, 2007

दशानन की लोकतांत्रिक शक्ति




शानन का जनता दरबार लगा था। द्वार पर तैनात प्रहरी एक-एक व्यक्ति की जमा-तलाशी लेकर उन्हें दरबार में प्रवेश करा रहे थे। दरबार में प्रवेश कर वे महाराज का अभिवादन करते और उनका सचिव भ्राता खरदूषण छीनने की तर्ज पर उनके हाथ से ज्ञापन ले लेता। कोई व्यक्ति कुछ बोलने की हिम्मत करता कि उससे पूर्व ही सुरक्षा कर्मी उसे बाहर का रास्ता दिखला देते। जन-नायक दशानन के साथ जनता की भेंट का सिलसिला जारी था कि तभी दूत ने अभिवादन करते हुए दशानन को सूचना दी, 'महाराज! मलेच्छ प्रदेश की मुख्यमंत्री आदरणीय मंदोदरी पधारी हैं।' मंदोदरी ने दरबार में प्रवेश किया। उसके खुले केश हवा में ध्वज की समान लहरा रहे थे। कमल पात के समान विस्तृत नयन में अश्रु कण सुशोभित थे और चेहरा क्लांत था। महारानी मंदोदरी का ऐसा रूप देख दशानन का दरबार इस प्रकार सहम गया, मानो कोई वामपंथी दरबार में बलात प्रवेश कर गया हो। गरीबी रेखा के नीचे खिंची रेखा पर लटकी जनता के समान दशानन को प्रणाम कर मंदोदरी बोली, 'हे, नाथ! पीड़ा अब असहनीय हो गई है। मैं बार-बार विधवा होती रहूं, अब और सहन नहीं होता। बार-बार आपके दिवंगत होने और मेरे विधवा होने का यह सिलसिला आखिर कब तक चलता रहेगा। हे, प्राणनाथ! आपको तो भगवान शिव का वरदान प्राप्त है, जितनी बार दिवंगत होंगे, आप तो उतने ही नए शीश लेकर पुनर्जन्म को प्राप्त होंगे। आप तो जीवन-मरण की इस राजनीति में दशानन से शतानन् हो गए हो, मगर मैं? मैं तो निरीह जनता की तरह लोकतंत्र की इस चक्की में उसी तरह पिसे रहीं हूं, जिस तरह गेहूं के साथ घुन!'प्रिय मंदोदरी के ऐसे वचन सुन दशानन मुस्करा कर बोला, 'प्रिय तुम एक विशाल प्रदेश की मुख्यमंत्री हो और क्या चाहिए, तुम्हें? विधवा होने का नाटक भी नहीं कर सकती? प्रिय, राजतंत्र नहीं अब लोकतंत्र है और लोकतंत्र में सफलता प्राप्त करने के लिए नाटक परम् आवश्यक है। कौन कहता है, तुम बार-बार विधवा हो रही हो! त्रेता से लेकर आज तक तुम अक्षुण्ण सुहागिन हो और सदैव सुहागिन ही रहोगी। चिंता का त्याग करो, प्रिये और निश्चिंत हो कर सत्ता का सुखोपभोग करो।'
पलकों से टपके आंसू पोंछ मंदोदरी बोली, 'निश्चिंत हो कर सत्ता का सुखोपभोग करूं! ..कैसे? अपने सुहाग को रोज-रोज मरते देखती रहूं! ..कैसे? हे, नाथ! प्रतिदिन मृत्यु को प्राप्त होने की अपेक्षा एक बार ही मृत्यु का पूर्ण-वरण कर लेना श्रेयष्कर होगा और मैं भी निरंतर विधवा होने की पीड़ा से मुक्त हो जाऊंगी।''
प्रिय, मंदोदरी! तुम लोकतांत्रिक राजनीति के नैतिक मूल्यों से अनभिज्ञ हो। तुम नहीं जानती कि अब पूर्ण मृत्यु का वरण करने की अपेक्षा प्रतिक्षण मृत्यु को प्राप्त करने वाले ही चिरजीवी होते हैं। वही नेता सत्ता का परम् पद प्राप्त करने में सफल होता है, जो प्रतिक्षण मृत्यु का वरण करते हैं। प्रिये! जिसे तुम मृत्यु कह रही हो, वह मृत्यु नहीं, नव-जीवन है। लोकतंत्र में यही श्रेयष्कर है।' वक्ष-स्थल से खिसक आए साड़ी के पल्लू को पुन: यथास्थान जमाया, खुले केश संवारे और बूचड़खाने में बंधी बकरी के समान मिमियाते हुए बोली, 'नहीं-नहीं-नहीं, प्राणनाथ नहीं! विजयदशमी पुन: नजदीक है। आपका वध किया जाएगा और सार्वजनिक रूप से पुन: बंधु-बांधवों सहित आपका अंतिम संस्कार कर दिया जाएगा। मुझे इस पीड़ा से बचालो नाथ, इस पीड़ा से बचालो। भगवान राम के समक्ष आत्मसमर्पण कर दो नाथ और युगों से चली आ रही इस वैर पर सदैव के लिए विराम लगा दो, नाथ।'

अट्टहास करते हुए दशानन बोला, 'अंतिम संस्कार! नहीं, प्रिये मेरा अंतिम संस्कार करने के लिए, राम के पास अब पर्याप्त शक्ति कहां! मेरा अंतिम संस्कार नहीं, पुतले दहन कर कुण्ठा का निष्कासन है, यह। लोकतंत्र में पुतले दहन के अतिरिक्त विपक्ष के पास अन्य कोई विकल्प भी तो शेष नहीं है। सुनो, प्रिये! पुतले दहन कर राम मुझे महिमामंडित कर रहा है। ऐसा कर तुम्हारा राम बता रहा है कि सत्ता पर आज भी मेरा ही अधिकार है और मैं ही लंकेश हूं।''

क्या कहा तुमने, राम के समक्ष आत्मसमर्पण कर दूं! उसके समक्ष जो स्वयं शक्ति विहीन है। प्रिय तुम्हारा राम राजनीति के दुष्चक्र में फंस चुका है और उसकी तमाम शक्तियां आज मेरे साथ हैं। प्रिय भ्राता विभीषण का राम दरबार से मोह भंग हो चुका है। उसे लंका का राज्य तो क्या विधायक का भी टिकट नहीं दिला पाए राम। विभीषण आज लंका के गृहमंत्री पद पर सुशोभित हैं। प्रिय सुग्रीव खाद्य मंत्री हैं और मस्त हो कर चारा चर रहें हैं। बाली पुत्र प्रिय अंगद के हाथों में लंका का प्रतिरक्षा विभाग है और समुद्र वित्तमंत्री। प्रिय तुम्ही बताओ तुम्हारे राम के पास अब बचा ही क्या है।''

मगर, महाराज! यह तो आपके आदर्श व मर्यादा के विपरीत है।' मंदोदरी बोली।दशानन के अट्टहास से पुन: दरबार गूंज गया। अट्टंहास करते-करते वह बोला, 'आदर्श-गरिमा! राजनीति में आदर्श, दोस्ती और दुशमनी कभी स्थायी नहीं होती। मार्ग वही आदर्श कहलाता है, जो सत्ता तक पहुंचाए और सत्ता को अक्षुण्ण रखे। ऐसी गरिमा का क्या लाभ प्रिय, जो व्यक्ति को भटकने की राह पर ला खड़ा करे। गरिमा तो क्रय-विक्रय की वस्तु है। सत्ता यदि हाथ में हो तो गरिमा स्वयं वरण कर लेती है।''

प्रिय मंदोदरी! जाओ भयमुक्त हो कर राज करो। त्रेता से आज तक तुम्हारा पति लंकेश प्रति क्षण मृत्यु का वरण कर दशानन से सहस्त्र-सहस्त्र शतानन हो गया है और राम बेचारा तब भी वन-वन भटक रहा था और आज भी। जाओ सत्ता सुखोपभोग करो मंदोदरी, सत्ता सुखोपभोग करो।'
राजेंद्र त्यागी-9868113044