पानी और दाग, इन दोनों ने अपने आप को राष्ट्रीय समस्या के रूप में प्रस्तुत किया है। देश के कर्णधारों के समक्ष ये दोनों समस्याएं प्रधान है और शेष सभी गौण। यह भी कहा जा सकता है कि शेष सभी समस्याएं स्वयं समाप्त हो गई हैं। स्वाभाविक भी है, शहर में जब कोई बड़ा दादा पैदा हो जाता है तो बाकी दादा दुम दबाकर इधर-उधर हो जाते हैं। दोनों समस्याओं का साथ-साथ अवतरित होना महज संयोग नहीं है। चोली-दामन के संबंध की परंपरा में दोनों के बीच उसी तरह का पवित्र व अटूट गठजोड़ है, जिस तरह चोर-सिपाही, अपराध-राजनीति और नेता-दलाल के बीच।
आप सोच रहें होंगे कि चोर-सिपाही, अपराध-राजनीति और नेता दलाल की बात तो उचित है, मगर पानी संकट से दाग का क्या संबंध? है, अवश्य है! पवित्र इस गठजोड़ को आप इस प्रकार समझिए, जब पोखर का पानी उतरने लगता है तो तलहटी में जमी गाद चमकने लगती है। इसी प्रकार जब आंखों का पानी सूखने लगे और चेहरे का पानी उतरने लगे तो क्या होगा? वही होगा जो होता आया है और वही हम कह रहे हैं। अर्थात पानी उतरेगा तो दाग उभरेगा।
रहीम दास के मोती, मानस व चून नहीं हैं दाग, जो पानी उतरने पर उबरना बंद कर दे। दाग उभरता ही तब है, जब पानी उतरता है। यहां हम रहीम के 'मानस' की बात नहीं कर रहें हैं, क्योंकि उससे हम सहमत नहीं हैं। हमारा मानना है कि दाग की तरह कोई भी मानस तभी उभरता है, जब उसका पानी उतर जाता है। इस सूत्र के माध्यम से मानस व दाग के पारस्परिक संबंधों की भी व्याख्या की जा सकती है और कहा जा सकता है कि मानस के साथ दाग के बीच भी चोली दामन का संबंध है। अत: पानी और दाग के बीच प्रगाढ़ संबंध स्वत: सिद्ध है।
राष्ट्र की मूल समस्या नेताओं पर दाग की है अर्थात दागी नेताओं से जुड़ी है। यही वह समस्या है, जिसके कारण लोकतंत्र खतरे में पड़ता नजर आ रहा है। मगर समस्याओं की हमारी सूची में यह कोई समस्या ही नहीं है। इस कहावत पर जरा गौर कीजिए, 'वह मर्द ही क्या, जिसके ऊपर चार लांछन न हों।' सही बात है मर्द होगा तो लांछन होंगे ही। यह कहावत नेताओं पर भी शत-प्रतिशत लागू होती है, मगर कुछ अलग तरह से, 'वह नेता ही क्या जिसके कुर्ते पर दाग न हो।' इस नीति वाक्य को इस प्रकार भी कहा जा सकता है, 'नेता है तो दाग भी होगा ही।' दाग बगैर नेता की कल्पना करना उसी प्रकार गैरवाजिब है जिस तरह कर झूठखोरी के बिना व्यापार और घूसखोरी के बिना फाइल का खिसकना। इन सभी के बीच अर्थशास्त्रीय संबंध है।
नेता और दाग के बीच अटूट रिश्ता होने के कारण ही कभी-कभी तो यह सोचने पर मजबूर होना पड़ता है कि नेता में दाग है या नेता ही दाग है। यह ''दाग बीच नेता है कि नेता बीच दाग है। दाग ही नेता है कि नेता ही दाग है॥'' की स्थिति है। चूंकि नेता व दाग के बीच प्रेम संबंध हैं, अत: राजनीति से दाग का सीधा संबंध है। आप राजनीति करें और बेदाग रह जाएं, ऐसा संभव नहीं। अब आप ही बताइए, काजल की कोठरी में रह कर बेदाग रहना क्या संभव है? कोयले की दलाली करोगे तो मुंह न सही हाथ तो काले होंगे ही।
राजनीति के दाग इतने गहरे होते हैं कि छुटाए नहीं छूटते। ''कितना कमबख्त है यह दाग, बहुत छुड़ाया मगर छूट न सका।'' पीछा छुड़ाने की बात छोड़िए, जितना छुड़ाओगे उतना ही गहरा होता जाएगा-
''हजरत-ए-दाग जहां बैठ गए, बैठ गए
और होंगे तेरी महफिल से उभरने वाले।''
लानत भेजिए ऐसी राजनीति करने वालों पर, जिनके कुर्ते बेदाग हैं। दरअसल राजनीति एक राष्ट्र स्तरीय हमाम है और हमाम में सब नंगे हैं। अब सवाल यह पैदा होता है कि हमाम में जब सभी नंगे हैं, अर्थात राजनीति में जब सभी दागदार हैं, तो फिर यह शोर क्यों? सवाल का जवाब है, 'जब आदमी पानी में डूबा हो, तो उसे अपने दाग नहीं दिखते हैं।' सिर पर घड़ो पानी पड़ा हो और आप पानी-पानी हो गए हो, फिर कैसे दिखेंगे अपने दाग। मगर ऐसे लोगों की हकीकत कुछ इस तरह है-
''वो जमाना भी हमें याद है तुम कहते थे,
दोस्त दुनियां में नहीं दाग से बेहतर।''
अंत में हम तो बस यही कहेंगे-
''कोई मिटाता है, दाग-ए-दिल, ऐ दाग
जलेगा यह चिराग महशर तक।''
संपर्क : 9868113044
Monday, November 12, 2007
Saturday, November 10, 2007
लक्ष्मीजी के संग साक्षात्कार

मुन्नालाल के सपने में रात लक्ष्मीजी आई। लक्ष्मीजी ने जागृत अवस्था में मुन्नालाल पर कभी कृपा नहीं की, हमेशा परहेज ही रखा। खैर, सपने में ही सही, मगर आई तो सही। लक्ष्मीजी का आगमन हुआ, चित्त से चिंता का बहिर्गमन हुआ। मन मंदिर के सभी वाद्य यंत्र बज उठे। उसका हृदय ग्लैड-ग्लैड हुआ। उस लगा जैसे उसके भाग्य का छप्पर भी आज फट गया। बिल्ली के ही नहीं आज उसके भाग्य से भी छीका टूट गया। हालांकि आजकल ऐसी घटनाएं आम हैं। लिहाजा भाग्य के सहारे जीवनयापन करने वाली बिल्लियां भी अब बुद्धिजीवी-कर्मयोगी कहलाए जाने लगी हैं। आशा के विपरीत स्वप्न देख मुन्नालाल आश्चर्यचकित हुआ, गदगद होना स्वाभाविक था।
भावविभोर वह लक्ष्मीजी के सम्मान में चरणागत् हो गया। भक्ति-भाव देख लक्ष्मीजी भी प्रसन्न भई और बोली पुत्र मांगों क्या चाहिए। लक्ष्मीजी के कृपा वचन सुन मुन्नालाल का पत्रकार मन जागा और बोला, 'मां! साक्षात्कार चाहिए।' लक्ष्मीजी ने कहा, कमबख्त! मन ही मन मुस्कराई और सोचने लगी उल्लू को तो बाहर खड़ा किया था, अंदर कैसे आ गया? लक्ष्मीजी बोली- ठीक पुत्र, जैसी तुम्हारी इच्छा।
लक्ष्मीजी के साथ हमारे संवाददाता मुन्नालाल की बातचीत के प्रमुख अंश प्रस्तुत हैं।
- 'तमसो मा ज्यातिर्गमय' भक्त अंधकार से उजाले की तरफ जाने के लिए प्रार्थना करते हैं। मगर आप स्वयं रात्रि में ही गमन करती हैं। ऐसा क्यों?
ऐसी प्रार्थना मुझसे नहीं सरस्वती से की गई है। मेरे भक्त तो मुझे अंधकार में ही बुलाते हैं, प्रकाश में नहीं।
-आपके भक्त आपको अंधकार में ही क्यों बुलाते हैं?
क्योंकि सृष्टिं के सभी पुण्य कार्य अंधकार में ही संपन्न होते हैं।
आपकी पूजा अमावस्या की रात में ही होने का करण भी क्या यही है?
हां! यही है। अन्य कोई सवाल करो।
-क्या आपने कभी अपने भक्त-पुत्रों को समझाया नहीं कि अंधकार विनाश का और प्रकाश उन्नति का प्रतीक है?
आपने एक ही प्रश्न में दो प्रश्न कर डाले! मगर आपका पहला प्रश्न मिथ्या है। मेरे भक्त पुत्र नहीं पति कह लाए जाते हैं। पुत्र तो सरस्वती के होते हैं। जहां तक दूसरे प्रश्न का सवाल है, सरस्वती पुत्रों के लिए ही प्रकाश उन्नति का प्रतीक है। लक्ष्मी-पतियों के लिए तो अंधकार ही प्रगति-पथ प्रशस्त करता है।
-प्राय: आप एक ही स्वरूप के दर्शन होते हैं। क्या अन्य देवी-देवताओं के समान आपके अनेक रूप नहीं हैं?
स्वरूप तो मेरे भी अनेक हैं, लेकिन पृथ्वी लोक में मेरे दो रूप 'श्याम और श्वेत' ही प्रसिद्ध हैं। उनमें भी सर्वाधिक पूजा श्याम रूप की होती है। सांसरिक जीवों की धारणा है कि लक्ष्मी का केवल श्याम स्वरूप ही कल्याणकारी है।
-आपको चंचला क्यों कहा जाता है?
क्योंकि मेरे स्वामी अनेक हैं। अब तो सरस्वती पुत्र भी मेरे स्वामी बनने की कामना करने लगे हैं।
‘-कहा जाता है कि विष्णु भगवान के साथ गरुड़ पर सवार हो कर आपका आगमन कल्याणकारी है और रात्रि काल में जब आप उल्लू पर सवार हो कर अकेले आती हैं तो अशुभ होता है। क्या यह सत्य है?
यह पुरातन काल की बात है। अब परंपराएं बदल रही हैं, स्वभाव बदल रहें हैं और स्वभाव के अनुरूप मूल्य परिवर्तित हो रहे हैं। बदलते मूल्यों के इस युग में उल्लू पर सवार हो कर अकेले गमन करना ही भक्तों के लिए हितकारी है।
-उल्लू आपका प्रिय वाहन है। आपके सानिध्य में सर्वाधिक रहता है, फिर भी वह 'उल्लू' ऐसा क्यों?
क्योंकि वह मेरे प्रति आसक्त नहीं है। मेरा उपभोग नहीं करता, इसलिए आज भी उल्लू है। बिलकुल तुम्हारी तरह। तुम्हें मेरा वरण करना चाहिए था, मगर तुम साक्षात्कार में ही संतुष्ट हो गए!
-क्या 'उल्लू' मनुष्य योनि में भी पाए जाते हैं?
हां, मनुष्य योनि में दो प्रकार के उल्लू पाए जाते हैं। एक वे जो मुझे सिर पर तो लादे रहते हैं, मगर उपभोग नहीं करते। दूसरे वे जो मुझे अपने आसपास भी देखना पसंद नहीं करते, अपरिग्रह उनका आदर्श है। दोनों ही प्रकार के प्राणी अव्यवहारिक हैं। अत: मुन्नालाल यदि जीवन सफल बनाना है तो सरस्वती के साथ-साथ मेरा भी चिंतन कर। 'तमसो मा ज्योतिर्गमय' के स्थान पर 'ज्योतिर्मा तमसोगमय' का जाप कर।
संपर्क: 9868113044
Friday, November 9, 2007
दीपावली की ढेर सारी शुभकामनाएं

ज्योतिपर्व दीपावली पर मुन्नालाल की ओर से आप सभी को ढेर सारी शुभकामनाएं, बिंदास शुभकामनाएं। प्रथम और विशेष शुभकामनाएं उन रहनुमाओं को जिन्होंने दिए की रोशनी भी महंगी की है। अपना घर जगमग कर, हमें अंधेरों से दोस्ती करने की नसीहत दी है। उन्हें बधाई, उन्हें उनके त्याग के लिए बधाई! दूसरी बधाई उन मिलावटखोर महानुभावों को जिन्होंने सिंथेटिक दूध का आविष्कार कर, हमें नश्वर शरीर का बोध कराया है। आदमी को मृत्युलोक मुक्त कर, स्वर्ग का रास्ता दिखाया है।
बधाई बिंदास संस्कृति के वाहकों को भी। नई संस्कृति के जन्मदाताओं को, प्रचारकों को। यह उनके अथक प्रयास और विश्वास का ही परिणाम है कि बच्चों के आत्मविश्वास में वृद्धि हो रही है, हीनभावना का क्षय हो रहा है। सौंदर्य-बोध वृद्धि को प्राप्त हो रहा है! बच्चे बिंदास बोल रहे हैं, कंडोम-कंडोम खेल रहे हैं। सेक्सी-सेक्सी खेल रहे हैं, सेक्सी पहन रहे हैं, सेक्सी खा रहे हैं। समूचे वातावरण को सेक्सी-सेक्सी कर रह हैं।
शुभकामनाएं ऐसे धर्माचार्यो के लिए भी, जिन्होंने 'धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष' पुरुषार्थ-चतुष्टय की नए संदर्भ में व्याख्या की है। धर्म मार्ग भी अर्थ की ओर जाता है, इस नए सिद्धांत का प्रतिपादन किया। धर्म को अर्थ से जोड़ा और अर्थ को काम से। जिसके पास अर्थ है, काम है, मोक्ष उसे स्वमेव प्राप्त हो जाता है। शुभकामनाएं उन महान संतों को जिन्होंने राजनीति में धर्म के साथ-साथ अर्थ और काम का भी प्रवेश दिला कर उसे संपूर्णता प्रदान की। ऐसे ऋषियों को मुन्नालाल का शत्-शत् प्रणाम।
शुभकामना राष्ट्र के उन कर्णधारों को भी जिन्होंने धर्माचार्यो के वचन जीवन में उतारे और राजनीति का नवीन संस्करण प्रस्तुत किया। राजनीति को आर्थिक आधार प्रदान किया, उसका सेक्सिकरण किया। सेक्स-सेंस को नई ऊंचाईयाँ प्रदान की। सत्ता, सेक्स और अपराध तीनों के अंत:संबंध जनता के सामने प्रस्तुत किए। पौरुष की नई गाथा लिखी। दुर्योधन, दु:शासन प्रवृत्ति का विकास किया। द्रौपदी चीरहरण को नए आयाम दिए।
शत्-शत् नमन और विशेष शुभकामनाएं उन कामिनियों को भी जिन्होंने चीर की पीर को समझा और कमनीय काया को चीर के बोझ से कुछ तो मुक्त किया। न चीर होगा, न चीरहरण की त्रासदी और न चीर की पीर होगी! फिर न किसी दु:शासन और दुर्योधन पर चीर हरण का आरोप लगेगा। अपना पानी उतार पारदर्शिता सिद्धांत को सींचने वाली ऐसे पारदर्शी बालाएं, धन्य हैं! चाल- चरित्र और चेहरे में समानता का इससे उत्तम उदाहरण और क्या होगा? ये सभी महान विभूतियां बिंदास संस्कृति के प्रकाश स्तंभ हैं। सभी को मुन्नालाल कोटि-कोटि नमन करता है।
अंतिम शुभकामना उन भद्रजनों को जो भीष्म पितामह की परंपरा का निर्वाह कर रहे हैं। धर्म के गीत गाते हैं, किंतु चीरहरण के समय शीश झुका लेते हैं। लज्जा की प्रतिज्ञा से प्रतिज्ञाबद्ध हैं। संपूर्ण निष्ठा के साथ प्रतिज्ञा का पालन कर रहे हैं। धर्म उनका जीवन है, आदर्श है, किंतु अवसर जब धर्म और अधर्म के मध्य संघर्ष का आता है, तो सेनानायक पद अधर्म पक्ष का स्वीकारते हैं। वचन से धर्म, का और कर्म से अधर्म का निर्वाह करने वाले ऐसे भद्रजन, धन्य हैं।
राष्ट्र के लिए समर्पित जनता को कैसी शुभकामना, कैसा संदेश? बस, मुन्नालाल यही कह सकता है, अर्जुन की तरह गाण्डीव का बोझ कंधों पर उठाए रखना। भील गोपियां लूटते रहे, बस तुम देखते रहना। बृहन्नला का अभिनय करते रहना।
संपर्क : 9868113044
बधाई बिंदास संस्कृति के वाहकों को भी। नई संस्कृति के जन्मदाताओं को, प्रचारकों को। यह उनके अथक प्रयास और विश्वास का ही परिणाम है कि बच्चों के आत्मविश्वास में वृद्धि हो रही है, हीनभावना का क्षय हो रहा है। सौंदर्य-बोध वृद्धि को प्राप्त हो रहा है! बच्चे बिंदास बोल रहे हैं, कंडोम-कंडोम खेल रहे हैं। सेक्सी-सेक्सी खेल रहे हैं, सेक्सी पहन रहे हैं, सेक्सी खा रहे हैं। समूचे वातावरण को सेक्सी-सेक्सी कर रह हैं।
शुभकामनाएं ऐसे धर्माचार्यो के लिए भी, जिन्होंने 'धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष' पुरुषार्थ-चतुष्टय की नए संदर्भ में व्याख्या की है। धर्म मार्ग भी अर्थ की ओर जाता है, इस नए सिद्धांत का प्रतिपादन किया। धर्म को अर्थ से जोड़ा और अर्थ को काम से। जिसके पास अर्थ है, काम है, मोक्ष उसे स्वमेव प्राप्त हो जाता है। शुभकामनाएं उन महान संतों को जिन्होंने राजनीति में धर्म के साथ-साथ अर्थ और काम का भी प्रवेश दिला कर उसे संपूर्णता प्रदान की। ऐसे ऋषियों को मुन्नालाल का शत्-शत् प्रणाम।
शुभकामना राष्ट्र के उन कर्णधारों को भी जिन्होंने धर्माचार्यो के वचन जीवन में उतारे और राजनीति का नवीन संस्करण प्रस्तुत किया। राजनीति को आर्थिक आधार प्रदान किया, उसका सेक्सिकरण किया। सेक्स-सेंस को नई ऊंचाईयाँ प्रदान की। सत्ता, सेक्स और अपराध तीनों के अंत:संबंध जनता के सामने प्रस्तुत किए। पौरुष की नई गाथा लिखी। दुर्योधन, दु:शासन प्रवृत्ति का विकास किया। द्रौपदी चीरहरण को नए आयाम दिए।
शत्-शत् नमन और विशेष शुभकामनाएं उन कामिनियों को भी जिन्होंने चीर की पीर को समझा और कमनीय काया को चीर के बोझ से कुछ तो मुक्त किया। न चीर होगा, न चीरहरण की त्रासदी और न चीर की पीर होगी! फिर न किसी दु:शासन और दुर्योधन पर चीर हरण का आरोप लगेगा। अपना पानी उतार पारदर्शिता सिद्धांत को सींचने वाली ऐसे पारदर्शी बालाएं, धन्य हैं! चाल- चरित्र और चेहरे में समानता का इससे उत्तम उदाहरण और क्या होगा? ये सभी महान विभूतियां बिंदास संस्कृति के प्रकाश स्तंभ हैं। सभी को मुन्नालाल कोटि-कोटि नमन करता है।
अंतिम शुभकामना उन भद्रजनों को जो भीष्म पितामह की परंपरा का निर्वाह कर रहे हैं। धर्म के गीत गाते हैं, किंतु चीरहरण के समय शीश झुका लेते हैं। लज्जा की प्रतिज्ञा से प्रतिज्ञाबद्ध हैं। संपूर्ण निष्ठा के साथ प्रतिज्ञा का पालन कर रहे हैं। धर्म उनका जीवन है, आदर्श है, किंतु अवसर जब धर्म और अधर्म के मध्य संघर्ष का आता है, तो सेनानायक पद अधर्म पक्ष का स्वीकारते हैं। वचन से धर्म, का और कर्म से अधर्म का निर्वाह करने वाले ऐसे भद्रजन, धन्य हैं।
राष्ट्र के लिए समर्पित जनता को कैसी शुभकामना, कैसा संदेश? बस, मुन्नालाल यही कह सकता है, अर्जुन की तरह गाण्डीव का बोझ कंधों पर उठाए रखना। भील गोपियां लूटते रहे, बस तुम देखते रहना। बृहन्नला का अभिनय करते रहना।
संपर्क : 9868113044
Thursday, November 8, 2007
प्रकाश से अंधकार की ओर ले चल, माँ!
दुनिया-जहान के सभी पुण्य कार्य अंधेरे में संपन्न किए जाते हैं। दिन के उजाले में नहीं! लक्ष्मी भी अमावस्या की अंधेरी रात में विचरण करती है। पूर्णिमा की उजली रात में नहीं। फिर न जाने क्यों आदमी ''तमसो माँ ज्योतिर्गमय'' अंधेरे से उजाले की ओर जाने की कामना करता है? न जाने क्यों द्वार पर दीपक जलाकर लक्ष्मी के आने की आशा करता है?
कुछ लोगों की साजिश लगती है, यह! जब कभी कोई तीज-त्योहार आता है, साजिशन कुछ घिसे-पिटे जुमले बरसात में मेंढकों की तरह हवा में उछले जाते हैं। मसलन, पूरे वर्ष असत्य से मात खाते रहने वाला सत्य, दशहरा आते ही असत्य पर जीत का दावा करने लगता है। वेंटिलेटर पर अंतिम सांसें गिनती-गिनती अच्छाई अचानक बुराई पर विजय प्राप्त करने का दम भरने लगती है। जैसे-जैसे दीपावली नजदीक आती है, अंधकार के सहारे जीवन-यापन करने वाला प्रकाश उसी अंधकार पर विजय प्राप्त करने का दावा करने लगता है। गुमनाम जिंदगी बसर करने वाले ऐसे कथित मूल्यों का वर्ष में एक बार उछलना, पितरों का श्राद्ध मनाने जैसा लगता है।
मृत जुमले उछालने वाले लोगों से मुझे सख्त नफरत है, उनकी साजिश से नफरत है, मुझे! ..चालू किस्म के लोग, कथित मूल्यों से चिपके ऐसे बेदम जुमले उछाल कर अन्य लोगों को गुमराह करते हैं। ऐसा करने में ही उनका हित है। मेरी प्रार्थना है कि चालू किस्म के ऐसे लोगों की बातों में न आना। बुराई के पीछे छिपी अच्छाई को पहचानना। सकारात्मक सोच का इस्तेमाल कर उन अच्छाईओं को खोजना और उन्हीं का अनुसरण करना।
''तमसो माँ ज्योतिर्गमय'' अव्यवहारिक प्रार्थना है। सफल कोई भी व्यक्ति शायद ही अंधकार से प्रकाश में आने की ऐसी अव्यवहारिक कामना करता होगा, क्योंकि प्रकाशित होने पर पुण्य कार्य भी पाप में तब्दील हो जाते हैं! कौन व्यक्ति पुण्य नहीं कमाना चाहेगा? प्रकाश में आकर क्यों बदनाम होना चाहेगा? अंधकार से प्रकाश की ओर जाने की प्रार्थना केवल गुमराह करने के उद्देश्य से दुहराई जाती है, ताकि अन्य के पुण्य कार्य प्रकाशित हो कर पाप में तब्दील होते रहें और खुद वे अंधेरे में मस्ती काटते रहें।
अब आप ही बताएं, जिसका आधार ही अंधियारा है, क्या वह प्रकाश कभी अंधकार पर विजय प्राप्त कर पाएगा? क्यों भूल जाते हो, टिमटिमाते जिस दीपक के सहारे अंधकार पर प्रकाश की विजय की असत्य घोषणा कर रहे हो, वह दीपक खुद ही अंधकार में विराजमान है।
''दिए तले अंधेरा'' किसने नहीं देखा! कुछ देर टिमटिमाने के बाद दिया बुझ जाएगा और अंधकार फिर सारे वातावरण में छा जाएगा। अंधकार ही स्थायी है, प्रकाश अस्थायी। माँ से केवल यही प्रार्थना करो- मुझे प्रकाश से अंधकार की ओर ले चल, माँ! ..मुझे स्थायित्व प्रदान कर, माँ! ..लोग मूर्ख हैं, द्वार पर दीपक जलाकर लक्ष्मी का स्वागत रखने की इच्छा रखते हैं और लक्ष्मी अमावस्या के काले साये में स्याह दिलों को धन-धान्य से पूर्ण कर लौट जाती है। अंधकार विजयी हो जाता है और कुछ देर के बाद पराजित योद्धा की तरह प्रकाश भी अंधकार में विलीन हो जाता है!
दुनिया के सारे कारोबार असत्य के ही सहारे तो चलते हैं! असत्य ही प्रगति पथ का निर्धारक है, व्यवहारिक है और सत्य अव्यवहारिक है, प्रगति में बाधक है। चारों ओर असत्य ही का गुणगान हो रहा है! अत: असत्य ही सत्य है!
प्रत्येक व्यवहारिक व्यक्ति जब-जब असत्य न बोलने का दावा करता है, तब-तब वह असत्य ही का तो पालन करता है। जो व्यक्ति सदैव सत्य बोलता है, उसे सफाई देने की आवश्यकता क्या है? सत्य का इस्तेमाल केवल असत्य स्थापित करने के लिए किया जाता है। अत: वर्णमाला के प्रथम अक्षर के साथ चिपके सत्य को पहचानों। अकेले सत्य का त्याग कर 'अ' के चिपके सत्य का अनुसरण करो, प्रगति पथ पर बढ़ो! सत्य कभी का पराजित हो चुका है। असत्य ही की जय-जय कार है, इसलिए प्रकाश नहीं अंधेरों से दोस्ती करना सीखो!
संपर्क : 9868113044
कुछ लोगों की साजिश लगती है, यह! जब कभी कोई तीज-त्योहार आता है, साजिशन कुछ घिसे-पिटे जुमले बरसात में मेंढकों की तरह हवा में उछले जाते हैं। मसलन, पूरे वर्ष असत्य से मात खाते रहने वाला सत्य, दशहरा आते ही असत्य पर जीत का दावा करने लगता है। वेंटिलेटर पर अंतिम सांसें गिनती-गिनती अच्छाई अचानक बुराई पर विजय प्राप्त करने का दम भरने लगती है। जैसे-जैसे दीपावली नजदीक आती है, अंधकार के सहारे जीवन-यापन करने वाला प्रकाश उसी अंधकार पर विजय प्राप्त करने का दावा करने लगता है। गुमनाम जिंदगी बसर करने वाले ऐसे कथित मूल्यों का वर्ष में एक बार उछलना, पितरों का श्राद्ध मनाने जैसा लगता है।
मृत जुमले उछालने वाले लोगों से मुझे सख्त नफरत है, उनकी साजिश से नफरत है, मुझे! ..चालू किस्म के लोग, कथित मूल्यों से चिपके ऐसे बेदम जुमले उछाल कर अन्य लोगों को गुमराह करते हैं। ऐसा करने में ही उनका हित है। मेरी प्रार्थना है कि चालू किस्म के ऐसे लोगों की बातों में न आना। बुराई के पीछे छिपी अच्छाई को पहचानना। सकारात्मक सोच का इस्तेमाल कर उन अच्छाईओं को खोजना और उन्हीं का अनुसरण करना।
''तमसो माँ ज्योतिर्गमय'' अव्यवहारिक प्रार्थना है। सफल कोई भी व्यक्ति शायद ही अंधकार से प्रकाश में आने की ऐसी अव्यवहारिक कामना करता होगा, क्योंकि प्रकाशित होने पर पुण्य कार्य भी पाप में तब्दील हो जाते हैं! कौन व्यक्ति पुण्य नहीं कमाना चाहेगा? प्रकाश में आकर क्यों बदनाम होना चाहेगा? अंधकार से प्रकाश की ओर जाने की प्रार्थना केवल गुमराह करने के उद्देश्य से दुहराई जाती है, ताकि अन्य के पुण्य कार्य प्रकाशित हो कर पाप में तब्दील होते रहें और खुद वे अंधेरे में मस्ती काटते रहें।
अब आप ही बताएं, जिसका आधार ही अंधियारा है, क्या वह प्रकाश कभी अंधकार पर विजय प्राप्त कर पाएगा? क्यों भूल जाते हो, टिमटिमाते जिस दीपक के सहारे अंधकार पर प्रकाश की विजय की असत्य घोषणा कर रहे हो, वह दीपक खुद ही अंधकार में विराजमान है।
''दिए तले अंधेरा'' किसने नहीं देखा! कुछ देर टिमटिमाने के बाद दिया बुझ जाएगा और अंधकार फिर सारे वातावरण में छा जाएगा। अंधकार ही स्थायी है, प्रकाश अस्थायी। माँ से केवल यही प्रार्थना करो- मुझे प्रकाश से अंधकार की ओर ले चल, माँ! ..मुझे स्थायित्व प्रदान कर, माँ! ..लोग मूर्ख हैं, द्वार पर दीपक जलाकर लक्ष्मी का स्वागत रखने की इच्छा रखते हैं और लक्ष्मी अमावस्या के काले साये में स्याह दिलों को धन-धान्य से पूर्ण कर लौट जाती है। अंधकार विजयी हो जाता है और कुछ देर के बाद पराजित योद्धा की तरह प्रकाश भी अंधकार में विलीन हो जाता है!
दुनिया के सारे कारोबार असत्य के ही सहारे तो चलते हैं! असत्य ही प्रगति पथ का निर्धारक है, व्यवहारिक है और सत्य अव्यवहारिक है, प्रगति में बाधक है। चारों ओर असत्य ही का गुणगान हो रहा है! अत: असत्य ही सत्य है!
प्रत्येक व्यवहारिक व्यक्ति जब-जब असत्य न बोलने का दावा करता है, तब-तब वह असत्य ही का तो पालन करता है। जो व्यक्ति सदैव सत्य बोलता है, उसे सफाई देने की आवश्यकता क्या है? सत्य का इस्तेमाल केवल असत्य स्थापित करने के लिए किया जाता है। अत: वर्णमाला के प्रथम अक्षर के साथ चिपके सत्य को पहचानों। अकेले सत्य का त्याग कर 'अ' के चिपके सत्य का अनुसरण करो, प्रगति पथ पर बढ़ो! सत्य कभी का पराजित हो चुका है। असत्य ही की जय-जय कार है, इसलिए प्रकाश नहीं अंधेरों से दोस्ती करना सीखो!
संपर्क : 9868113044
Wednesday, November 7, 2007
न दोस्ती अच्छी, न दुशमनी उनकी
मच्छरों की भिन-भिनाहट और कौवों की कांव-कांव से तमाम शहर परेशान है। मार्केटिंग में दोनों इतने उस्ताद हैं कि किसी को किसी की सुनने ही नहीं देते। बात सुनने-सुनाने तक ही सीमित हो तो भी सब्र कर लिया जाए, मगर मोका पड़ते ही दोनों डंक मारने से भी नहीं चूकते। डंक भी ऐसा कि पीड़ित पानी न मांगे। बावजूद इसके देखिए कि आदमी जानते-बूझते भी न मच्छरों से पीछा छुटाना चाहता है और न ही कौवों से। मच्छरों को रक्त पिला-पिला कर पाले हुए है और कौवों को श्रद्धा के साथ श्राद्ध का हलवा-पूरी। विडंबना देखिए कि दुष्ट कौवों को इतना विश्वासपात्र और शुभ मान लिया जाता है कि प्रिय के आने का सगुन भी कौवों की कांव-कांव से ही मनाया जाता है।
आदमी की मजबूरी है, क्योंकि मच्छर पानी में पनपते हैं। अब पानी रोको तो मच्छर पनपने का खतरा और वह भी डेंगू जैसे खतरनाक किस्म का, ऊपर से म्यूनिसपैलिटि वालों के चालान का डर। पानी उतर जाए तो समाज में किरकिरी। एक बूंद पानी चेहरे से लुड़का नहीं कि सुनने को मिल जाएगा, 'अरे, पानी उतर चेहरा लिए फिरता है। आंखों का पानी सूख गया है।' अब कहने वालों को भला कौन समझाए कि आंख में पानी रुक गया तो मच्छर पैदा हो जाएंगे, म्यूनिसपैलिटि वाले चालान काट जाएंगे। म्यूनिसपैलिटि वालों की आंख हालांकि शुष्क होती हैं, यानी के पानी विहीन होती हैं, इसलिए सूक्ष्मदर्शी होती हैं। फिर भी खुदा-ना-खास्ता किसी की आंख का पानी उनसे चूक भी गया तो, जनाब डेंगू बुखार का खतरा और देर-सबेर आंख बंद हो जाने का शुभ अवसर पैदा होने का खतरा। अब कहने वालों को कौन समझाए कि भइया चेहरे का पानी उतारने की वजह कुछ और नहीं बस मच्छरों से बचाव है।
समझ नहीं आता कि रहीम दादा किन परिस्थितियों में कह गए, 'रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून। पानी गए न उबरे, मोती-मानस चून।' ऐसा लगता है कि रहीम दादा के जमाने में मच्छर नहीं होते होंगे। होते भी होंगे, तो डेंगू किस्म के कतई नहीं होंगे। अगर डेंगू मच्छर होते तो म्यूनिसपैलिटि वाले उन्हें देशद्रोह के आरोप में बंद कर देते। खैर रहीम के दिन अच्छे थे, क्योंकि मच्छरों के आतंक से बचे हुए थे। मच्छर यदि होते तो यह बात भी गारंटी के साथ कह सकता हूं कि रहीम दादा की गिनती अकबर के नवरत्नों में न होती। तब उनका समूचा भक्ति साहित्य किसी डेंगू-साहित्य के नाम से प्रसिद्ध हुआ होता।
आज परिस्थितियां भिन्न हैं। हालांकि पानी का संकट है, चेहरों का पानी उतर गया है, आंखों का सूख गया है, फिर भी चारों तरफ मच्छरों की भिन-भिनाहट है, अर्थात मच्छरों का साम्राज्य है। फण्डा बड़ा साफ है, पानी उतर रहा है, अत: कहीं न कहीं तो रुकेगा ही। रुकेगा वहां, झील होगी और जहां झील होगी मच्छर भी वहीं पनपेंगे। मगर यह मत समझ लेना कि पानी में पनपने वाले मच्छर खुद में पानीदार होते हैं, नहीं-नहीं पानीदार जीव की प्रवृत्ति दूसरे जीवों का रक्त पीने की नहीं होती। इसे इस तरह भी कहा जा सकता है कि परजीवी वही होता है, जो पानी विहीन होता है।
अब रही बात कौवों की बड़े ही उस्ताद किस्म की जीव होते हैं। कोयल जैसा सुर नहीं, हंस जैसी तासीर नहीं फिर भी हलवा-पूरी मारते हैं। माल खुद चट कर जाते हैं और फतवा यह कि पितरों तक पहुंचा रहे हैं। माल न मिले तो कांव-कांव। आदमी समझता है कि उसकी प्रशंसा में गीत गा रहा है, मगर काग साहब अपना उल्लू सीधा करने में जुटे हैं। उल्लू है तो कोई न कोई सीधा करेगा ही, मगर उल्लू सीधा करते-करते यदि घायल कर जाए तो? हां, काग वृत्ति का यही कमाल है। सीता जी समझती रहीं होंगी का काग देव चरण-वंदना करने आ रहे हैं और वे जनाब उनके चरण घायल कर गए। यही कुछ जरूर कृष्ण भगवान के साथ भी हुआ होगा। वे भी सोच रहें होंगे कि कौआ बेचारा श्रद्धावश उनके पास आ रहा है और वह उनके हाथ से ले उड़ा माखन-रोटी। अब सूरदासजी भले ही काग के भाग्य की सराहना करते रहें, मगर वह भाग्य नहीं काग वृत्ति का कमाल था। अत: हमारी यही सलाह है कि मच्छर व काग वृत्ति को समझों, उन से दूर रहो। उनकी न दोस्ती अच्छी है और न ही दुशमनी।
संपर्क : 986811304
Tuesday, November 6, 2007
पाकिस्तान में तड़का लगे, छींके हिंदुस्तान
पाकिस्तान में इमरजेंसी की घोषणा, सुनकर भयावह आश्चर्य की अनुभूति हुई। इमरजेंसी-वार्ड में इमरजेंसी की घोषणा! जिस शिशु का जन्म ही इमरजेंसी-वार्ड में हुआ हो और अभी तक वेंटिलेटर पर सांसें गिन रहा हो, उसके लिए इमरजेंसी की घोषणा! मतलब साफ हैं, मामला कुछ गड़बड़ है, अंतिम दौर के आसपास है! भयावह इसलिए कि यदि इमरजेंसी-वार्ड की परिस्थितियां भी इमरजेंसी हो गई तो फिर वहां, इमरजेंसी नहीं, उससे ऊपर वाले किसी दर्जे की व्यवस्था की आवश्यकता है! संभवतया जनहित में घोषणा इमरजेंसी की कर दी गई होगी। एक विशेषज्ञ ने लगभग ठीक ही कहा है- यह इमरजेंसी और मार्शल लॉ के बीच की कोई स्थिति है। हम कहते हैं, यह मार्शल लॉ से भी ऊपर की कोई स्थिति है। मार्शल अपने से ऊपर की ही कोई स्थिति उत्पन्न करेगा, तभी तो उसका कद बढ़ेगा। पाकिस्तान की इमरजेंसी दूरदर्शनी-परिचर्चा का विषय है।
खैर कुछ भी सही , इस बारे में हम मुशर्रफ साहब की साफगोई के कायल हो गए। उन्होंने ठीक ही कहा,- ऐ पश्चिम वालों अभी हमारा बच्चा वेंटिलेटर पर हैं। डेमोक्रेसी के लक्जरी वार्ड में शिफ्ट करने में समय लगेगा! तुम्हें भी तो सदियों लगे थे डेमोक्रेसी-वार्ड में शिफ्ट होने में! सुनों, तुम हमारी तरह की इमरजेंसी नहीं ला सकते, हम तुम्हारी तरह की डेमोक्रेसी! पाकिस्तान की जनता ने 'मुशर्रफ कपड़े उतारो, कपड़े उतारो' चिल्ला-चिल्ला कर पाकिस्तान को नख्लिस्तान बना डाला, तो बेचारे मुशर्रफ साहब क्या करते, उन्होंने कपड़े उतार दिए। पता नहीं क्यों अब शेम-शेम चिल्ला रही है! जनता आतंकवाद-आतंकवाद का शोर मचाकर आतंक फैला रही थी। जिन महानुभावों के आतंकवाद से खतरा था, मुशर्रफ साहब ने उन्हें सुरक्षित-स्थान पर पहुंचा दिया। पता नहीं क्यों वे ही लोग अब उसे नजरबंदी बताकर इमरजेंसी का शोर मचा रहे हैं। किसी ने सच ही कहा है, कोई भी शख्स सभी को खुश नहीं रख सकता!
पाकिस्तान अपने हिंदुस्तान का पड़ोसी मुल्क है। पड़ोस में सड़ी मिर्च का तड़का लगेगा, तो छींक पड़ोसी को आएगी ही। पड़ोस में बरसात हो और पड़ोसी बौछार से बच जाए, यह असंभव है। भाजपा का इसमें कोई कुसूर नहीं है। वह तो पड़ोसी पाकिस्तान के तड़के के कारण छींक रही है। तो उसे याद आएगा ही कि हमारे वो भी एक दिन सड़ी मिर्चा ले आए थे। पाकिस्तान की इमरजेंसी के बहाने अपनी इमरजेंसी को कोसना स्वाभाविक है। रोने के लिए आखिर मुद्दा तो कोई चाहिए। रोएगी-चीखेगी नहीं तो भारत की जनता उसके मौन का अर्थ क्या लगाएगी, क्या यह बताने की भी जरूरत है। हमारी माताजी स्वर्गवासी हुई। मातम-पुरसी के लिए पड़ोसिन आई। हमारी माताजी का जिक्र करते-करते अपने-अपने स्वर्गवासियों के लिए विलाप करने लगीं। उनके उसी विलाप से हमें पता चला कि घूंघट में कौन सी पड़ोसिन छिपी हैं। किस-किसने रुदाली का कितना सशक्त अभिनय किया, उनके स्वजन-विलाप से ही हमें ज्ञात हुआ। जब उनके यहां कोई ताजा-ताजा स्वर्ग सिधारेगा, हम भी उसी के अनुरूप रुदन की परंपरा का निर्वाह करेंगे। उसी परंपरा का अनुसरण बेचारी भाजपा कर रही है।
पाकिस्तान की इमरजेंसी के आधार पर इंदिरा-युगीन इमरजेंसी को याद कर विलाप करना, भाजपा की मजबूरी भी है। महंगाई के मुद्दे पर वह विलाप कर नहीं सकती, क्योंकि उसके राज्य में भी महंगाई कम कृपावान नहीं थी। महंगाई एक ही किस्म की होती है, अत: महंगाई की किस्म भी विलाप का कारण नहीं बन सकती। 'गरीबी हटाओ-देश बचाओ' जैसे घटिया किस्म के विषय पर ध्यान देकर वह अपनी ऊर्जा फिजूल में नष्ट करने की पक्षधर कभी रही ही नहीं! बेचारी अभी तक परमाणु-डील के वाममार्गी टाइप मुद्दे पर आंसू बहा रही थी।
भगवान इमरजेंसी लगे अमेरिका में, वह मुद्दा भी बेचारी से छिन लिया। कभी किसिंजर, तो कभी मलफर्ड तो कभी टालबोट जैसे एक के बाद एक धमकाऊ-पूत भेजकर डील-मुद्दे को टालने के लिए दबाव डालती रही। क्या करती बेचारी आखिरकार डील-मुद्दे को टालमटोल की नीति भेंट चढ़ाना ही पड़ा। भला हो पाकिस्तान का इमरजेंसी लग गई। उसके दुख में विलाप करने के साथ-साथ अपनी इमरजेंसी पर भी विलाप करने की सुविधा मिल गई। भाजपा को वास्तव में पाकिस्तान का शुक्रगुजार होना चाहिए। भगवान राम के बाद यदि कोई उसे ऊर्जा प्रदान कर रहा है तो केवल पाकिस्तान। कभी कश्मीर के बहाने, तो कभी जिन्ना के और अब इमरजेंसी के बहाने ऊर्जा प्राप्त हो रही
संपर्क- 9868113044
Monday, November 5, 2007
बॉस बनाम बांस
प्रश्न, बॉस किसे कहते हैं? उत्तर, जिसके हाथ में बांस हो, उसे बॉस कहते हैं। अगला प्रश्न बांस किसे कहते हैं? जिसे देख कर भूत भागते हैं, जिसके इशारे पर शेर नाचते हैं। जिससे बंद सीवर खोले जाते हैं। छोटा दीखता है, कुछ चिकना होता है, किंतु मारक होता है। वार कहीं करता है, घाव कहीं होता है।
सच बात है, बांस बिन बॉस की गरिमा नहीं, बांस बिना बॉस, बॉस नहीं। बॉस के हाथ में यदि बांस न हो तो वह न कभी अपनी और न ही दूसरों की बांसुरी बजा पाएगा। बांस रखना और बांसुरी बजाना बॉस का धर्म है। घनिष्ठ इस संबंध के अतिरिक्त बॉस और बांस के मध्य कुछ समानता भी हैं। मसलन, बॉस और बांस दोनों गांठ -गठीले होते है। प्रत्येक गांठ कुछ शंका, कुछ आशंकाओं, कुछ प्रश्न और कुछ रहस्यों से भरी होती हैं। एक गांठ का रहस्य सुलझाने का प्रयास करोगे, दूसरी गांठ पहली से ज्यादा मजबूत नजर आएगी। गांठें कच्चे धागे की गांठ के समान होती हैं, जो कभी खुलती ही नहीं हैं, प्रयास करने पर उलझती ही चली जाती हैं।
बॉस का और बांस का मुसकराना यदा-कदा ही होता है। सदियों में जाकर कभी बांस पर फूल खिलते हैं और जब खिलते हैं, तो अकाल साथ लेकर आते हैं। बॉस कभी मुस्कराते नहीं है और जब कभी मुस्कराते हैं तो किसी के लिए संकट के बादल लेकर आते हैं। ऐसी ही कुछ समानताओं के कारण बॉस और बांस कभी-कभी एक दूसरे के पर्यायवाची से लगते हैं।
अंग्रेज बॉस और बांस के पारस्परिक संबंधों से भीलीभांति परिचित थे, इसलिए वे और उनके अधिकारी हाथ में सदैव बांस रखते थे। उनके लिए बांस बॉसिज्म का प्रतीक था, जिसे वे रूल कहते थे। उस रूल के ही सहारे रूलिंग चलती थी। रूल के सामने शेष सभी 'रूल' व्यर्थ थे। बांस के सहारे ही वे 150 वर्ष तक भारत के शानदार बॉस बने रहे। बांस रूपी रूल का ही कमाल था कि उनके राज्य में कभी सूरज डूबा ही नहीं। बांस कमजोर हुआ तो सूरज ऐसा डूबा की अब ब्रिटेन में भी उगने का नाम भी नहीं ले रहा है।
विश्व की समूची राजनीति के दो ही आधार हैं, बॉसिज्म और बांसिज्म। नटनी के समान विश्व राजनीति भी बांस के सहारे ही तो पतली रस्सी पर चल कर अपना सफर पूरा करती है। हो भी क्यों ना राजनीति और नटनी सगी बहने ही तो हैं। ऊंट किस करवट बैठेगा, प्रयास करने पर पता किया जा सकता है, मगर राजनीति और नटनी कब किस करवट लुढ़क जाए किसे पता है।
''उसका बांस मेरे बांस से लंबा क्यों?'' बांसिज्म के इसी दर्शन पर विश्व की राजनीति टिकी है। समस्या कश्मीर की हो या अफगान की अथवा इराक की, जड़ में सभी के बांस है। अमेरिका आज अमेरिका न होता यदि उसके हाथ में बांस न होता। पाकिस्तान में आपातकाल लगाकर मुशर्रफ साहब ने अपने बांस को ही कुछ सशक्त, कुछ लंबा करने का प्रयास किया है। झगड़ा बांस का ही है। मेरे बांस से उसका बांस लंबा क्यों?
विकासशील सभी देश महाशक्ति बनने के लिए आज लंबे और मजबूत बांस की तलाश में हैं। हमारा मानना है कि तृतीय विश्वयुद्ध यदि कभी होगा भी तो, न तेल के लिए होगा और न ही पानी के लिए। होगा तो केवल बांस के लिए होगा, क्योंकि युद्ध जब कभी भी हुए हैं, बॉसिज्म और बांसिज्म को लेकर ही हुए हैं। मजबूत बांस वाला ही युद्ध में विजयी होगा और वही विश्व-बॉस कहलाएगा।
संपर्क : 9868113044
सच बात है, बांस बिन बॉस की गरिमा नहीं, बांस बिना बॉस, बॉस नहीं। बॉस के हाथ में यदि बांस न हो तो वह न कभी अपनी और न ही दूसरों की बांसुरी बजा पाएगा। बांस रखना और बांसुरी बजाना बॉस का धर्म है। घनिष्ठ इस संबंध के अतिरिक्त बॉस और बांस के मध्य कुछ समानता भी हैं। मसलन, बॉस और बांस दोनों गांठ -गठीले होते है। प्रत्येक गांठ कुछ शंका, कुछ आशंकाओं, कुछ प्रश्न और कुछ रहस्यों से भरी होती हैं। एक गांठ का रहस्य सुलझाने का प्रयास करोगे, दूसरी गांठ पहली से ज्यादा मजबूत नजर आएगी। गांठें कच्चे धागे की गांठ के समान होती हैं, जो कभी खुलती ही नहीं हैं, प्रयास करने पर उलझती ही चली जाती हैं।
बॉस का और बांस का मुसकराना यदा-कदा ही होता है। सदियों में जाकर कभी बांस पर फूल खिलते हैं और जब खिलते हैं, तो अकाल साथ लेकर आते हैं। बॉस कभी मुस्कराते नहीं है और जब कभी मुस्कराते हैं तो किसी के लिए संकट के बादल लेकर आते हैं। ऐसी ही कुछ समानताओं के कारण बॉस और बांस कभी-कभी एक दूसरे के पर्यायवाची से लगते हैं।
अंग्रेज बॉस और बांस के पारस्परिक संबंधों से भीलीभांति परिचित थे, इसलिए वे और उनके अधिकारी हाथ में सदैव बांस रखते थे। उनके लिए बांस बॉसिज्म का प्रतीक था, जिसे वे रूल कहते थे। उस रूल के ही सहारे रूलिंग चलती थी। रूल के सामने शेष सभी 'रूल' व्यर्थ थे। बांस के सहारे ही वे 150 वर्ष तक भारत के शानदार बॉस बने रहे। बांस रूपी रूल का ही कमाल था कि उनके राज्य में कभी सूरज डूबा ही नहीं। बांस कमजोर हुआ तो सूरज ऐसा डूबा की अब ब्रिटेन में भी उगने का नाम भी नहीं ले रहा है।
विश्व की समूची राजनीति के दो ही आधार हैं, बॉसिज्म और बांसिज्म। नटनी के समान विश्व राजनीति भी बांस के सहारे ही तो पतली रस्सी पर चल कर अपना सफर पूरा करती है। हो भी क्यों ना राजनीति और नटनी सगी बहने ही तो हैं। ऊंट किस करवट बैठेगा, प्रयास करने पर पता किया जा सकता है, मगर राजनीति और नटनी कब किस करवट लुढ़क जाए किसे पता है।
''उसका बांस मेरे बांस से लंबा क्यों?'' बांसिज्म के इसी दर्शन पर विश्व की राजनीति टिकी है। समस्या कश्मीर की हो या अफगान की अथवा इराक की, जड़ में सभी के बांस है। अमेरिका आज अमेरिका न होता यदि उसके हाथ में बांस न होता। पाकिस्तान में आपातकाल लगाकर मुशर्रफ साहब ने अपने बांस को ही कुछ सशक्त, कुछ लंबा करने का प्रयास किया है। झगड़ा बांस का ही है। मेरे बांस से उसका बांस लंबा क्यों?
विकासशील सभी देश महाशक्ति बनने के लिए आज लंबे और मजबूत बांस की तलाश में हैं। हमारा मानना है कि तृतीय विश्वयुद्ध यदि कभी होगा भी तो, न तेल के लिए होगा और न ही पानी के लिए। होगा तो केवल बांस के लिए होगा, क्योंकि युद्ध जब कभी भी हुए हैं, बॉसिज्म और बांसिज्म को लेकर ही हुए हैं। मजबूत बांस वाला ही युद्ध में विजयी होगा और वही विश्व-बॉस कहलाएगा।
संपर्क : 9868113044
Subscribe to:
Posts (Atom)