Thursday, April 24, 2008

बापू कैद में (व्यंग्य नाटक) - दो

(गतांक से आगे)----
(मुन्नालाल घुटनों के बल समाधि में प्रवेश करता है और बापू के चरण स्पर्श कर दबाने लगता है। आशीर्वाद के लिए बापू का दायां हाथ उसकी तरफ उठता है)
बापू (मुसकराते हुए) :
अच्छा, मुन्नालाल! आज तक मेरी पुण्य तिथि मनाई जाती है और वह भी श्रद्धा के साथ? इसका मतलब मैं आज भी प्रासंगिक हूं?
मुन्नालाल (ग्लानि भाव से) : ...श्रद्धा नहीं, श्राद्ध कह, बापू और पुण्य तिथि पर ही क्यों? ...प्रतिदिन मनाते हैं, तेरे भक्त। ...तेरे श्राद्ध के नाम पर ही तो हलवा-पूरी खा रहें हैं, देश के कर्णधार।
बापू (झुंझलाते हुए) : पुत्र, कभी तो पॉजेटिव हो जाया कर। जब भी आता है नीन-मेख ही निकालता आता है। ...पता नहीं तू और इस देश के अखबार कब पॉजेटिव होंगे?
मुन्नालाल : ...नेगेटिव को नेगेटिव कहना क्या पॉजेटिव नहीं है, बापू? ...बापू, मैं नेगेटिव नहीं, पॉजेटिव ही हूं। ...तेरे समक्ष असत्य नहीं सत्य ही का बखान कर रहा हूं। ...हां, बापू! तेरे नाम के सहारे ही मलाई मार रहे हैं, तेरे कथित शिष्य।
बापू (क्रोध का इजहार करते हुए) : ऐसा है तो, साधन और साध्य की पवित्रता...? (क्षोभ व्यक्त करते हुए) ...फिर तो, साधन भी अपवित्र और साध्य भी, हे राम, हे राम, हे राम!
मुन्नालाल (हँसते हुए) : अब तू भी नेगेटिव हो गया है, बापू!
बापू (मुन्नालाल को बीच ही में टोकते हुए) : ...वह कैसे पुत्र?
मुन्नालाल (मुसकराते हुए) : बापू! इतना भी नहीं समझता। ...अरेऽ ...बापू, दोनों ही तो पवित्र हैं, साधन भी और साध्य भी।
बापू (शब्दों पर जोर देते हुए) : ...वह कैसे पुत्र?
मुन्नालाल (रहस्यमयी अंदाज में) : बताता हूं, बताता हूं, धैर्य रख, बताता हूं। ...देख बापू! तेरे नाम पर खा रहें हैं, इसलिए तू साधन हुआ और तुझ से पवित्र और कौन हो सकता है, बापू? ॥तेरे शिष्य खुद खा रहे हैं, अर्थात 'चेरेटि बिगेंस फ्रॉम होम'। (विराम) बापूऽऽऽ! ॥ऐसे ही तो समाजवाद आएगा और आर्थिक समानता की तेरी अवधारण पूरी होगी। ...है-ना, साधन और साध्य दोनों पवित्र!
बापू (पीड़ा के साथ आसमान के तरफ मुंह उठाकर) : ...हे राम, हे राम, हे राम!
मुन्नालाल (मुसकराते हुए) : अच्छा, बापू! तू प्रासंगिकता की बात कर रहा था, ना? अरे, फिक्र न कर बापू! जब तक तेरे नाम का सिक्का चलता रहेगा, तब तक तू प्रासंगिक ही रहेगा।
बापू : अच्छा एक बात बता मुन्नालाल! ...जनता उनके खिलाफ सत्याग्रह क्यों नहीं करती?
मुन्नालाल (व्यंग्य भाव से) : करती तो है, बापू! ...अभी चार दिन पहले ही तो बसों में आग लगाई थी। चांदनी चौक लूटा था।
बापू (आश्चर्य व क्षोभ के साथ) : अरे, मूर्ख! मैं उपद्रव की नहीं, सत्याग्रह की बात कर रहा हूं!
मुन्नालाल (व्यंग्य भाव से) : अरे, पूज्य बापू! ...मैं भी तो सत्याग्रह की ही बात कर रहा हूं। ...लोकतांत्रिक सत्याग्रह की!
बापू (क्षोभ व्यक्त करते हुए) : यह कैसा सत्याग्रह! ...यह तो दुराग्रह है ...हिंसा का प्रदर्शन है...!
मुन्नालाल (पुन: व्यंग्य भाव से) : अरे नहीं बापू! ...दुराग्रह नहीं, हिंसा भी नहीं, बस वक्त के साथ बदलती परिभाषा है। (मुसकराते हुए) तेरे लिए तो खुशी की बात है बापू, बदलते इस दौर की बदलती परिभाषा में भी तेरा नाम नहीं भूले हैं, तेरे भक्त। बदलते इस दौर के सत्याग्रह के साथ भी तेरा ही नाम जुड़ा है!
बापू (क्षुब्ध भाव से) : हे राम, हे राम, हे राम! ऐसा है तो मुझे नहीं चाहिए अब और नाम। ॥यही सत्य है तो उनसे कह दे भूल जाएं मुझे।
मुन्नालाल : कैसे कह दूं, उनकी भावना को ठेस पहुंचेगी। ...बैठे-बिठाए यह तो हिंसा हो जाएगी।
बापू (जिज्ञासा भाव से) : ...मगर, मुन्नालाल! मेरी खादी, स्वदेशी और अहिंसा की क्या गति है।
मुन्नालाल (व्यंग्य से) : सभी सदगति को प्राप्त हैं, बापू!
बापू (जिज्ञासा भाव से) : ...कहना क्या चाहता है, पुत्र?
मुन्नालाल : वही, जो यथार्थ है।
बापू (उत्तेजना के साथ) : साफ-साफ कह ना!
मुन्नालाल : मतलब साफ है बापू, तेरी खादी प्रमोट हो रही है। स्वदेशी की धूम है। अहिंसा के पक्ष में आंदोलन जारी है।
बापू (उत्सुकता व्यक्त करते हुए) : बता-बता, जरा विस्तार से बता। मेरे इन आदर्शो को लेकर क्या चल रहा है। मेरे शिष्य उन्हें किस तरह प्रमोट कर रहें हैं।
मुन्नालाल (रहस्यमय लहजे में) : बापू! तेरी खादी, स्वदेशी व अहिंसा को लेकर आज दिल्ली में अलग-अलग फैशन शो आयोजित हो रहीं हैं। चलेगा देखने...?
बापू (हर्ष के साथ उत्सुक्ता व्यक्त करते हुए) : ...हाँ, हाँ, अवश्य पुत्र! ...चल-ले चल, चल- चलते हैं। देखूं तो सही मेरे शिष्य मेरी खातिर क्या-क्या कर रहें हैं।
मुन्नलाल : चल बापू, चल!
(दोनों चलने के लिए तैयार होते हैं, तभी रामधुन बजनी शुरू हो जाती है। नेता एक-एक कर बापू की समाधि पर आने लगते हैं)
मुन्नालाल :
ठहर बापू! ...तेरे कथित शिष्य तुझे पुष्पांजलि अर्पित करने आने लगे हैं।
बापू (सिर हिला कर सहमति व्यक्त करते हुए) : ...हां, ठीक है, उन्हें जाने दे। ...तब चलेंगे।
(दोनों पुन: बैठ जाते हैं। नेता एक-एक कर समाधि पर पुष्पांजलि अर्पित कर चले जाते हैं)
दृश्य-चार
(भव्य आडिटोरियम का भव्य रेंप। रेंप के पा‌र्श्व में एक विशाल बैनर टंगा है। जिस पर ऊपर की तरफ लिखा है, 'खादी प्रमोशन फैशन शो' उसके नीचे लिखा है 'बापू के सपनों का भारत' और उसके बाद प्रमोटर का नाम लिखा है, 'रोहित भारती'। बैनर पर लिखी इबारत पढ़ कर बापू प्रसन्न हो जाते हैं)
बापू (प्रसन्न भाव से) :
देख-देख, मुन्नालाल देख, क्या लिखा है, 'खादी प्रमोशन फैशन शो'। देख मेरा नाम भी लिखा है। (बैनर पर लिखी इबारत रुक-रुक कर पढ़ते हुए) ...'बापू के सपनों का भारत'। ये हैं मेरे सच्चे भक्त। देख, शिष्य रोहित अपने आपको भारतीय कहने में गर्व महसूस करता है। ...देख मुन्नालाल उसके नाम के आगे भारती लिखा है।
मुन्नालाल (व्यंग्य लहजे में) : हां, धैर्य धारण कर और देखता रह बापू।
(मादक संगीत और डिस्को लाइटों से आडिटोरियम जग-मागाने लगता है)
बापू (प्रसन्नता भाव से) : ...अरे, वाह! (मुन्नालाल की ओर मुँह कर) ...देख मुन्नालाल ...देख!
मुन्नालाल (मुसकरा कर) : ...देख रहा हूँ, बापू! ...तू भी देखता जा!
बापू (पूर्व भाव से) : देख पुत्र, कितना सुंदर है, ...अति सुंदर!
मुन्नालाल (व्यंग्य भाव से) : ...हाँ, बापू, सत्यं शिवं सुंदरम्! ...सत्य भी है, शुभ भी और सुंदर भी! ...(झटके के साथ) ...ले, यह भी देख ...सत्यं शिवं सुंदरम् की हकीकत देख!
(पाश्चात्य संगीत का स्वर तेज होता है और उसके साथ ही कैटवॉक करती अर्धनग्न एक मॉडल रेंप पर प्रवेश करती है। उसके अंग-प्रत्यंग खादी की कतरनों ढ़के हैं। अर्धनग्न मॉडल को देख बापू आंखें बंद कर मन ही मन हनुमान चालीसा का पाठ करने लगते हैं।
'जै-जै हनुमान गुसाई, कृपा करो गुरुदेव की नाई
जो सत बार पाठ करे कोई, छूटे ही बंध महा सुख होई'
कुछ देर बाद बापू आंखें खोलते हैं, एक और मॉडल इठलाती हुई उनकी नजरों के सामने से गुजरती है। उसके कपड़ों का साइज और भी कम है। बापू बेचैनी सी महसूस करते हैं। एक के बाद एक कई मॉडल एक साथ रेंप पर आती हैं। बापू से रहा नहीं जाता)
बापू (ग्लानि भाव से) :
...मुझे कहां ले आए, पुत्र?
मुन्नालाल : मौन!
बापू (आवेश में झिंझोड़ते हुए) : कुछ बोलते क्यों नहीं, पुत्र? ॥ क्यों मौन हो पुत्र? मेरा ब्लड प्रेसर हाई-फाई हो रहा है।
मुन्नालाल : पुन: मौन!
बापू (अधीर होते हुए) : धैर्य जवाब दे रहा है, पुत्र! ...मस्तिष्क शून्य होता जा रहा है, किंतु तू मौन?
मुन्नालाल (उपेक्षा भाव से) : ...देखता रह ना, बापू!
बापू (निरीह भाव से) : ...क्या कह रहे हो पुत्र! बस देखता रहूं। कब तक निहारता रहूं, इन अर्धनग्न बालाओं को? ...अब और नहीं देखा जाता। मुझे यहां से ले चल, पुत्र।
मुन्नालाल (तसल्ली देते हुए व्यंग्य लहजे में) : बापूऽऽ, धैर्य रख और बदलते दौर का बदलता स्वरूप देख। अपनी खादी की लोकप्रियता देख और उसका सम्मान देख!
बापू (विनीत भाव से) : ये चकाचौंध! ... नृत्य करती अर्धनग्न बालाएं! ...पहले यह तो बता पुत्र, यह सब है क्या?
मुन्नालाल (बापू की तरफ मुंह कर,आश्चर्य से) : भूल गया बापू! बताया तो था खादी प्रमोशन के लिए फैशन शो है। बालाएं तेरी खादी का प्रचार कर रहीं हैं!
बापू (क्रोध व आश्चर्य के मिश्रित भाव से) : यह कैसा प्रमोशन! ...इनके तन पर तो वस्त्र ही नहीं! यह तो पाप है।
मुन्नालाल (मुसकराते हुए) : ...तन पर कपड़े होते तो देखने कौन आता? ...कोई देखने न आता तो तेरी खादी का प्रमोशन क्या खाक होता?
बापू (मध्य ही में क्षुब्ध भाव से) : ...किंतु, अर्धनग्न! ...यह तो पाप है!
मुन्नालाल (समझाने के लहजे में) ...कैसा पाप, कैसा पुण्य! यह तो मार्केटिंग का फण्डा है। इसमें पाप क्या, बापू?
बापू (जिज्ञासा व्यक्त करते हुए) : मार्केटिंग? यह क्या...?
मुन्नालाल (व्यंग्य भाव से) : ...यह-वह कुछ नहीं बापू, बस मार्केटिंग है, मार्केटिंग! ...नेताओं को जब-कभी भीड़ जुटानी होती है, तब तेरे नाम का जयकारा लगते हैं, ना ...बस उसी तरह!
बापू (आश्चर्य व्यक्त करते हुए क्षुब्ध भाव से) : अर्धनग्न बालाएं! खादी का यह कैसा प्रमोशन, कैसी मार्केटिंग? भ्रष्ट, सभी कुछ भ्रष्ट! ...नहीं-नहीं, मुझे यहां से ले चल। मुझसे यह सब, अब और नहीं देखा जाता, पुत्र!
मुन्नालाल (व्यंग्य भाव से) : नग्न शरीर और भ्रष्ट बापू...!
बापू (मध्य ही में झुंझलाते हुए) : ...हां, हां, सभी कुछ भ्रष्ट!
मुन्नालाल (व्यंग्य भाव से) : चल तू कहता है तो मान लेता हूं, बापू! ...किंतु तू ही तो कहता था, 'बुरा मत देख' और तू ही भ्रष्ट नग्न शरीर देख रहा है! ...उनका नग्न शरीर न देख, बापू। गिलास आधा खाली नहीं आधा भरा देख। उनके अंगों पर पड़ी खादी की कतरने देख।
बापू (आग्रह पूर्वक) : यहां से ले चलो, पुत्र। ये अर्धनग्न बालाएं! अब और सहन नहीं होता, मुझसे।
मुन्नालाल (समझाने के लहजे में) : अर्धनग्न अश्लील शब्द है, बापू। ...उन्हें अश्लील कह कर अपनी जुबान गंदी न कर, उन्हें घृणा का पात्र न बना। ...वे अर्धनग्न नहीं, अर्धवस्त्रा हैं, अर्धवस्त्रा।
बापू (घृणा भाव से) : यहां सभी कुछ असत्य है। ...तुम मुझे यहां से ले चलो पुत्र।
(शरीर का वजन लाठी पर टिका बापू चलने के लिए खड़े होने लगते हैं)
मुन्नालाल (हाथ पकड़ कर बिठते हुए) :
बैठ, बापू और अपने सत्य के प्रयोग देख। असत्य नहीं, ये सत्य के प्रयोग हैं, बापू। ...सत्य हमेशा पारदर्शी होता है, ना बापू, इसलिए यहां सब कुछ पारदर्शी है, बापू। (मुसकराते हुए मुन्नालाल आगे बोला) ...बालाएं सत्य का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत कर रहीं हैं। ...तेरा अनुसरण कर रहीं हैं, तेरे सत्य का अनुसरण कर रहीं हैं।
बापू (खीजते हुए) : सत्य का यह कैसा अनुसरण, मेरा कैसा अनुसरण, पुत्र?
मुन्नालाल (तसल्ली देते हुए) : तू ही तो कहता था बापू! मनुष्य को मन से, वचन से, कर्म से सत्यवादी होना चाहिए, पारदर्शी होना चाहिए। ...अर्धवस्त्रा ये बालाएं पारदर्शिता के मध्यम से सत्य ही का तो प्रदर्शन कर रहीं हैं।
बापू (पुन: खीजते हुए) : सत्य, पारदर्शिता, प्रमोशन, अर्धवस्त्रा॥? तेरा यह दर्शन मेरी समझ से बाहर है, पुत्र!

मुन्नालाल (बापू को दिलासा देते हुए) : ...धीरज धर बापू, और देख-थोड़ा और देख। ...मेरा दर्शन नहीं, नए जमाने का नया दर्शन! तुझे तेरा दर्शन जीवित रखना है तो नए जमाने के दर्शन को स्वीकार कर, थोड़ा अपने को परिवर्तित कर!
बापू (क्रोध व्यक्त करते हुए) : नहीं, नहीं, यहां से चल। ...मुझे स्वीकार नहीं है, तेरे जमाने का यह चिथड़ा दर्शन?
मुन्नालाल (आश्चर्य भाव के साथ व्यंग्य करते हुए) : नए जमाने के वस्त्रों को चिथड़े कहता है, बापू! ...यह भी तेरी ही संस्कृति का अनुसरण है। ...तू ढाई गज में एक तन लपेटे है और ये ढाई गज में चार तन। है, ना तेरी ही संस्कृति का अनुसरण! ...तुझ से भी चार कदम आगे!
बापू (क्रोध में पुन: खड़े होते हैं) : ...नहीं, नहीं, नहीं, अब मैं यहां एक पल भी नहीं रुकूंगा।
मुन्नालाल (शरीर झटकते हुए) : ठीक है, ठीक है, नहीं देख पा रहा तो चल बापू।
(बापू माथे पर आए पसीने पौंछते हुए मुन्नालालके संग उठकर आडिटोरियम के बाहर चले आते हैं)
(..जारी)

Wednesday, April 23, 2008

बापू कैद में (व्यंग्य नाटक) - एक

दृश्य-एक
( दो अक्टूबर, प्रात: सात बजे, गांधी समाधि राजघाट। समाधि झाड़-पोंछ कर चमका दी गई है। समूचा राजघाट परिसर पुलिस कर्मियों से घिरा है। कुछ ही अंतराल के बाद लोगों का आना शुरू हो जाता है। प्रथम साजिंदों के साथ भजन गायकों की मंडली प्रार्थना सभा में प्रवेश करती है। बापू के प्रिय भजन ''वैष्णव जन तोरे कहिए..'' की स्वर लहरी हवा में गूंजने लगती है। पंक्तिबद्ध नेता समाधि की परिक्रमा करते हुए, गुलाब की पंखुड़ियां से बापू को पुष्पांजलि अर्पित कर रहे हैं। नेपथ्य से अट्टंहास के साथ आवाज गूंजती है)

आवाज : आहा हाऽऽऽ। देश के कर्णधारों, बापू के कथित भक्तों तुम किसे पुष्पांजलि अर्पित कर रहे हो? बापू तो यहां हैं ही नहीं, आहा ऽऽऽ..!
(चारों ओर भय का वातावरण उत्पन्न हो जाता है। नेताओं के चेहरों पर भय के चिह्न स्पष्ट नजर आने लगते हैं। सुरक्षा कर्मी घेरा और मजबूत करने में लग जाते हैं। रिवाल्वर ताने कुछ कमांडों आवाज की दिशा में बढ़ते हैं। आवाज अब पूर्व दिशा के स्थान पर उत्तर दिशा से आने लगती है)
आवाज :
...आहा हाऽऽऽ, मैं बिल्कुल ठीक कह रहा हूं। ..बापू यहां नहीं हैं। वह तो कैद हैं। ... तुम्हारी कैद में!
(फायर करने का आदेश हवा में गूंजता है और आवाज की दिशा में फायरिंग शुरू हो जाती है। चारों ओर अफरा-तफरी का माहौल उत्पन्न हो जाता है। फायर करते-करते सुरक्षाकर्मी उत्तर दिशा की ओर बढ़ते हैं और आवाज इस बार दक्षिण दिशा की ओर गूंजने लगती है)
आवाज : ...तुम मेरा कुछ नहीं बिगाड़ पाओगे। व्यर्थ की कवायद बंद करो। ..तुम्हारा और तुम्हारे नेताओं का अहित करना मेरा उद्देश्य नहीं है। मैं तुम लोगों की तरह हिंसक प्रवृत्ति का नहीं हूं। ..मैं गांधी का सच्चा अनुयायी हूं। हिंसा मेरा धर्म नहीं है। अत: निश्चिंत हो जाओ और मेरी बात ध्यान से सुनो..।
(हाथ का संकेत कर गृहमंत्री गोली न चलाने के निर्देश देते हैं)
आवाज : ठीक बहुत ठीक वैसे भी तुम लोग अब मेरा कुछ नहीं बिगाड़ पाओगे, क्योंकि अब मैं आजाद हूं, देह-मुक्त हूं। (विराम) ..तुम्ही ने तो अपनी गोली से मुझे आजाद किया था। ..हां-हां, मुझे आजाद किया था और बापू को कैद!
(कुछ देर रुकने के बाद) हां मैं ठीक कह रहा हूं, बापू तुम्हारी ही कैद में हैं। ..तुम्ही ने उन्हें कैद कर रखा है और तुम्ही बापू की समाधि पर..! (बल देते हुए) हां-हां-हां! आत्मविहीन समाधि पर पुष्पांजलि अर्पित कर रहे हो। है, ना मजाक। .. तुम नेता ही नहीं अव्वल दर्जे के अभिनेता भी हो। जाओ पहले बापू को आजाद करो और फिर आना उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करने।
(क्षण भर रुकने के बाद, अट्टहास का स्थान सिसकियां ले लेती हैं और रुंधे गले से वही आवाज पुन: आती है) ...नहीं-नहीं, तुम बापू को कभी आजाद नहीं करोगे, क्योंकि तुम में इतना साहस ही नहीं है। ..तुम डरपोक हो। तुम जानते हो, बापू यदि आजाद हो गए तो देश में क्रांति आ जाएगी और तुम्हारी दुकानदारी बंद हो जाएगी। (रुदन बंद और पुन: अट्टहास) जाओ ..अपने-अपने घर लौट जाओ, नाटक बंद करो। सिंहासन तुम्हारी प्रतीक्षा में है। बापू जब तक कैद हैं, तब तक तुम्हारा सिंहासन अटल है। ..क्यों गृहमंत्री जी ठीक कहा न मैने। मैं भी जा रहा हूं, तुम भी लौट जाओ।
(धीरे-धीरे राजघाट परिसर खाली हो जाता है)
दृश्य-दो
(करुणा और क्रोध की मिश्रित आवाज के साथ पर्दा उठता है और मंच के कोने में छाया प्रकट होती है। ऊपर से नीचे तक सफेद लबादे से ढकी है। फ्लैश लाइट उस पर केंद्रित हो जाती है)
छाया (करुण आवाज में रुक-रुक कर) : मैं मुन्नालाल हूं, मुन्नालाल की रूह! इस नाटक का सूत्रधार! पूज्य बापू की समाधि राजघाट पर मेरी ही आवाज गूंज रही थी। मेरा उद्देश्य आतंक फैलाना कतई नहीं था। ...मैं बापू का सच्चा अनुयायी हूं। हिंसा मेरा धर्म नहीं है। ..हां, मेरी आवाज के साथ राजघाट पर आतंक अवश्य व्याप्त हो गया था, मगर इसमें मेरा क्या दोष? (क्षणिक विराम, आंसू पोंछते हुए, दृढ़ता के साथ) ..हां-हां, आतंक फैलाना मेरा उद्देश्य नहीं था। राजघाट पर जमा कर्णधार मुझ से नहीं अपने कर्मो के कारण आतंकित थे। ..पोल खुल जाने के भय से भयभीत थे। मैं तो केवल हकीकत बयान कर रहा था। देश के कर्णधार और बापू के कथित भक्तों को उन्हीं की हकीकत से परिचित करा रहा था..।
(आवाज पुन: सिसकियों में बदल जाती है, गर्दन झुक जाती है। अपने आप को संयत कर पुन: दर्शकों की तरफ मुखातिब होते हुए)
...हां, मैं हकीकत बयान कर रहा था। जिन लोगों ने अपने स्वार्थ की खातिर बापू को कैद कर रखा है, वे ही समाधि पर बापू को पुष्पांजलि अर्पित करें! ...यह कोरा नाटक नहीं तो और क्या है? पुष्पांजलि अर्पित करने का उन्हें अधिकार क्या है, उसका औचित्य क्या है? ..उनके इसी कुकृत्य का पर्दाफाश करना मेरा उद्देश्य था। ...हां-हां, मेरा विश्वास करो बापू कैद में हैं, उन्हीं की कैद में। मेरी हत्या भी देश के इन्हीं कर्णधारों के आदेश पर की गई थी, क्योंकि मैं बापू के साथ था और उस पूरे कृत्य का चश्मदीद गवाह था।
(कुछ देर रुकने के बाद अपने आप को संयत कर पुन: धीरे-धीरे बोलना शुरू करता है) ...अब मैं आपकी अदालत में आया हूं। बापू को कैद करने की कहानी सुनाने और आपका फैसला सुनने, ..क्या उन्हें बापू की समाधि पर पुष्पांजलि अर्पित करने का अधिकार है?' ..फैसला आपके हाथ है। लो, सुनो कहानी।
(छाया अंतरध्यान हो जाती है और प्रकाश मंच के मध्य केंद्रित होने लगता है)
दृश्य तीन
(तीस जनवरी, प्रात: चार बजे, गांधी समाधि वातावारण शांत है, मगर रह-रह कर चिड़ियों का चह-चहाना और थोड़े-थोड़े अंतराल के बाद पहरे पर तैनात सिपाही के बूटों की आवाज शांति भंग कर रही है। राजघाट के मुख्य द्वार पर ताला लगा है। उसके पास ही एक सिपाही कुर्सी पर बैठा ऊंघ रहा है और एक अन्य सिपाही उनींदी निगाहों के साथ पहरा दे रहा है। बापू का शिष्य मुन्नालाल साधारण कुर्ता-पायजामा पहने और ठंड से बचने के लिए ऊपर से शाल लपेटे हुए है। पहरेदारों की आंखों से बचता-बचाता दबे पांव राजघाट परिसर में घुसने की जगह तलाश रहा है। सिपाही की निगाह से बचने के लिए वह कभी झाड़ियों की ओट लेता है तो कभी आंखों ही आंखों में चारदीवारी की ऊंचाई नापता है। पहरे पर तैनात सिपाही गश्त लगाने के लिए दूसरी दिशा में कदम बढ़ाता है और मौका पाकर मुन्नालाल चार-दीवारी लांघ दबे पांव बापू समाधि के नजदीक पहुंच जाता है। भयभीत मुन्नालाल पुन: चारों तरफ निगाह दौड़ाता है और आश्वस्त हो कर घुटनों के बल उकडू बैठ कर, मुंह के दोनो तरफ हथेलियों की ओट कर धीरे-धीरे बापू को आवाज लगाता है।)
मुन्नालाल : बापू-ओ-बापू। ..अरे ओऽऽऽ बापू!
मुन्नालाल (पूर्व स्थिति में पुन: धीरे से मगर शब्दों को खींचकर) : बापू-ओ-बापू। ..कुछ बोलता क्यों नहीं, बापू। ..अरे, अभी तक सोया है, बापूऽऽऽ! भोर हो गई, जाग। (गुनगुनाते हुए) उठ जाग मुसाफिर भोर भई ..अब रैन कहां जो सोवत है
(समाधि के अंदर एक कोने में रखा दीपक धीमा-धीमा प्रकाश बिखेर रहा है। जमीन पर एक बिस्तर लगा है। जिस पर बापू लेटे हुए हैं। उनके सिरहाने एक लाठी, लाठी के पास ही पानी से भरा तांबे का एक लोटा और गोल तकिए के पास जेब घड़ी रखी है। शय्या के समीप ही बापू का चरखा रखा है। पास ही एक कोने में खड़ी बापू की बकरी चारा चबा रही है। मुन्नालाल की आवाज सुन बापू दांए-बांए करवट बदलते हैं। खकारते हैं, आंखों पर धीरे-धीरे हथेली रगड़ते हैं और उसके बाद अस्त-व्यस्त धोती संवारते हुए इधर-उधर देख लाठी पर हाथ रख कर खड़े होने का प्रयास करते हैं, मगर खड़े नहीं हो पाते)
बापू (कांपती आवाज में) : हे राम-हे राम-हे राम, ..रघुपति राघव राजा राम। ..पतित पावन ..कौन है, भाई! सुबह-सुबह क्यों आ जगाया..।
मुन्नालाल (पुराने अंदाज में) :। ...मैंऽऽऽ, मैं मुन्नालाल, बापू!
बापू (आश्चर्य से) : अरेऽऽऽ! तू! ॥सुबह ही सुबह?
मुन्नालाल (धीरे से) : हांऽऽऽ! बापू मैं ही।
बापू (जिज्ञासा भाव से) : ...खैरियत तो है ना?
मुन्नालाल : हां, सब कुशल है, बापू।
बापू (आश्चर्य से) : फिर...?
मुन्नालाल (सहज भाव से) : आज तीस जनवरी है न, बापू।
बापू (झुंझलाते हुए) : तीस जनवरी, तो फिर? ...यह तो हर वर्ष आती है?
मुन्नालाल (सहमी सी आवाज में) : तेरी पुण्य तिथि है न बापू।
बापू (आश्चर्य से) : पुण्य तिथि! ...कैसा पुण्य ...कौन सी तिथि?
मुन्नालाल (बापू के ही अंदाज में) : अरे, बापू! ..वही तीस जनवरी, गौड़से ने जिस दिन तेरी हत्या की थी!
बापू (मुसकराते हुए) : अवश्य, अवश्य! पुण्य कार्य तो था ही। ..पुण्य कार्य था, इसलिए पुण्य तिथि भी..। (विराम के उपरांत मुसकराते हुए) अच्छाऽऽऽ! .. अब समझा, मेरी मृत्यु-तिथि को मेरे देशवासी पुण्य मानते हैं, फिर मेरी जन्म तिथि ..पाप तिथि?
मुन्नालाल (व्यंग्य भाव से) : अभी से ऐसा क्यों सोचता है, रे बापू!
बापू (क्रोध के क्रत्रिम भाव से) : ...बे-मतलब की बात! .. जगा तो ऐसे दिया, मानों किसी दाण्डी यात्रा के लिए मेरी फिर आवश्यकता आन पड़ी हो!
मुन्नालाल (व्यंग्य भाव से) : दाण्डी यात्रा के लिए अब तेरी क्या आवश्यकता बापू। ऐसी-वैसी समस्या सुलझाने के लिए तो तेरी लाठी ही काफी है।
बापू (झुंझलाते हुए) : ...तो फिर..?
मुन्नालाल (खुशामदी लहजे में सिर में खुजलाते हुए) : बस, बापू इच्छा हुई।मैंने सोचा दिन निकलते-निकलते तो तुझे तेरे भक्त आ घेरेंगे। यही वक्त था, अकेले में तन-मन की दो बातें करने का, सो सुबह-सुबह चला आया।
बापू (दया भाव से) : आऽजा-आऽजा, अंदर आजा। लोकतंत्र के किसी पहरेदार ने देख लिया तो तुझे-मुझे दोनों को अंदर कर देगा। (मुसकराते हुए) कोई जमानती भी नहीं मिलेगा।
(जारी...)
संपर्क ः 9868113044

Saturday, April 19, 2008

आम आदमी हटाओ देश बचाओ

आज सुबह घर में बोरिया-बिस्तर सहित एक मित्र का शुभागमन हुआ। कहने लगे, दिल्ली-दर्शन के लिए आया हैं। हम समझ गये कम से कम हफ्ता-पंद्रह दिन के लिए महंगाई में आटा गीला होने के आसार पैदा हो गए हैं। मित्र अतिथि के रूप में आए थे, क्योंकि उनके शुभागमन पूर्व निर्धारित न था, इसलिए हम बहाना बनाने के अवसर से भी वंचित रह गए। आगंतुक अतिथि हो या सतिथि महंगाई के इस जमाने में बलात आरोपित 'सेवा-कर' के समान लगते हैं। दो-चार दिन खर्च ज्यादा ही सही कम से कम सेवा का पुण्य तो प्राप्त होगा, मौजूदा दौर में इस आत्म-वंचना सुख से भी आदमी वंचित ही रहता है, क्योंकि अब सेवा करने से मेवा नहीं, सेवा-कर प्राप्त होता है। खैर सुबह ही सुबह आई मुसीबत को हमने नए सरकारी-कर की तरह स्वीकार कर लिया। यह स्वीकारोक्ति हमारी मजबूरी थी, इसके अलावा चारा भी क्या था। शायद इसे ही 'मजबूरी का नाम महात्मा गांधी' कहते हैं।
उनके शुभागमन और कम से कम हफ्ता-भर अतिथि-सत्कार का शुभ अवसर प्राप्ति का शुभ समाचार हमने पत्नी को सुनाया। समाचार सुनते ही उनकी भवें मुद्रास्फीति की तरह तन गई। उनके इरादे भांप हम सहज भाव से बोले, 'अतिथि देवो भव:'! वे बोली देवता है, तो उसकी किसी मंदिर में प्राण-प्रतिष्ठा कर दो। वास्तुशास्त्र के हिसाब से घर में देवता की प्राण-प्रतिष्ठा शुभ नहीं रहती है। वैसे भी देवता घर में रहेगा, तो उस पर चढ़ाने के लिए पान-सुपारी भी तो चाहिए। यहां रोटी के लाले पड़ रहे हैं, देवता के लिए पान-सुपारी का प्रबंध कहां से होगा? ऊपर का सुर साधते हुए पत्नी बोली, 'देवी दिन काट रही है, भक्त पर्चे मांगने में लगे हैं!'

पत्नीजी ने वाणी को अल्प विराम दिया और अनचाहे विज्ञापन के मॉडल की तरह हमने डॉयलाग झाड़ा, 'कोई बात नहीं, इनके चले जाने के बाद अपना लाइफ-स्टाइल कुछ दिन के लिए चेंज कर लेंगे। दो वक्त की जगह कुछ दिन एक वक्त ही भोजन कर बजट को पुन: सर्वहित बजट बना लेंगे।'
पति-पत्नी के मध्य जारी त्रासद संवाद के दौरान मित्र बाहर वाले कमरे में खुद को स्थापित करने की कवायद में जुटे थे। हम उनके पुरषार्थ से अभीभूत थे। जब हम उनके पास पहुंचे तो वे समाचार पत्र के पन्ने पलट रहे थे। हमें देख कर बोले- देखो महंगाई घटाने के लिए सरकार ने सीआरआर बढ़ा दिया है। अब देखते हैं, महंगाई कैसे पांव पसारती है। हमने प्रश्न किया- क्यों भाई सीआरआर से महंगाई का क्या संबंध? वे बोले- इससे पैसे का प्रवाह कम हो जाएगा अर्थात फिजूल खर्ची के लिए लोगों की जेब में पैसे ही नहीं होंगे। होम लोन-कार लोन पर ब्याज दर में वृद्धि हो जाएगी, तो कार-मकान सस्ते हो जाएंगे। उनका आर्थिक दर्शन सुन हमने जिज्ञासा व्यक्त की- फ्रिज, एसी, मोबाइल फोन, कार तो पहले ही सस्ते थे अब मकान भी सस्ते हो जाएंगे, मगर इससे आम आदमी की नून-तेल-लकड़ी की महंगाई पर क्या असर पड़ेगा?
मित्र थोड़ा गंभीर हो कर बोले- महंगाई पहले भी कहां थी? यह तो आम आदमी के लाइफ-स्टाइल चेंज करने के कारण थोड़े पांव पसार गई थी। अब जब पैसा ही नहीं होगा, तो फिर पुराना लाइफ-स्टाइल ही अपनाना पड़ेगा। महंगाई स्वत: ही कम हो जाएगी। हमने अगला प्रश्न किया- तो क्या लाइफ-स्टाइल में परिवर्तन कर आम आदमी नून-तेल-लकड़ी ज्यादा सटकने लगा था..? हमारा अधूरा प्रश्न सुनते ही वे तपाक से बोले- पुरानी बात छोड़ो, मगर अब जब पैसे ही जेब में नहीं होंगे, तो नून-तेल-लकड़ी भी कम खरीदेगा। इस तरह इनके दाम भी घट जाएंगे। इतना कहने के बाद मित्र रहस्य पूर्ण मुद्रा में बोले-यह आम आदमी ही सारी समस्याओं की जड़ है। आम आदमी के कारण ही महंगाई बढ़ती है, उसके कारण ही कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ती है।
मित्र का आर्थिक दर्शन सुन हम सोचने लगे- सत्य वचन! आम आदमी ही समस्याओं का मूल है। महंगाई बढ़े या बाजार में पैसे का प्रवाह कम हो, आम आदमी के लिए नून-तेल-लकड़ी त्रसदी का कारण ही बनी रहेंगी। क्योंकि यह देश नून-तेल-लकड़ी वाले आम आदमी के लिए नहीं है। कुछ खास लोगों के लिए है, जिन्हें महंगाई नहीं खाती, वे महंगाई को खाते हैं। इस देश में आम आदमी न हो तो सभी समस्याएं स्वत: समाप्त हो जाएंगी। राजनैतिक दलों को आगामी चुनाव में गरीबी हटाओ जैसे दकियानूसी नारे के स्थान पर आम आदमी हटाओ देश बचाओ जैसे प्रभावी नारे हवा में उछालने चाहिए।
संपर्क – 9868113044

Monday, April 14, 2008

पांव-पान-पूजा की विस्तृत विवेचना

माननीय ज्ञानदत्त पाण्डेय जी के चरण्-कमलों में समर्पित
आचार्य के मुखर बिंदु से सफलता का सफल सूत्र श्रवण कर मुन्नालाल ने जिज्ञासा व्यक्त की, 'हे, आचार्य श्रेष्ठ! 'पांव-पान-पूजा' के इस सूत्र के संबंध में तनिक विस्तार से बताने की कृपा करें। इस सूत्र का आविष्कार कब हुआ, इसका पालन किस प्रकार करना चाहिए और उसका महत्व क्या है?'
शिष्य मुन्नालाल के जिज्ञासु प्रश्न सुन आचार्यश्री मुस्करा दिये और फिर बोले, 'बहुत ही दुरूह प्रश्न किया है, तूने शिष्य। इसके आविष्कार-काल के संबंध में तो संभवतया त्रिदेव ब्रह्मंा, विष्णु, महेश भी अनभिज्ञ ही होंगे। पुत्र बस इतना कह सकता हूं कि यह सूत्र देव-काल से चला आ रहा है। देवता स्वयं अपने इष्ट को इसी सूत्र के माध्यम से प्रसन्न करते थे और स्वयं भी इसी से प्रसन्न होते थे। इतिहास पर थोड़ा और ध्यान दिया जाए तो कहा जा सकता है कि प्रथम, त्रेता में भरत ने भ्राता राम के प्रति निष्ठा व्यक्त करने में इस सूत्र के पांव पक्ष को साकार किया था। जब राम वन के लिए प्रस्थान कर गये थे, तो अनुज भरत ने सिंहासन उनकी चरण पादुका सुसज्जित कर अयोध्या का राज-काज चलाया था। तब से आज तक सफलता के इच्छुक जन् अपने इष्ट की चरण्-पादुकाएं सिर पर उठाए फिरते हैं।'
मुन्नालाल ने पुन: प्रश्न दोहराया, 'आचार्यश्री! इस सूत्र की विस्तृत विवेचना कर पारण विधि पर प्रकाश डालने का कष्ट करें!'
आचार्यश्री काशीफल के समान गंभीर मुख-मुद्रा बनाते हुए कहा, 'पुत्र पांव का सीधा अर्थ है, चरण-स्पर्श। पान उपहार का प्रतीक है और पूजा से तात्पर्य है, स्तुति-ज्ञान!' इतना कहने के उपरांत आचार्यश्री ने सफल नेता के समान मुख-मुद्रा में पुन: परिवर्तन किया और काशीफल की भाजी सा लिप-लिपा मुंह बना कर बोले, 'पुत्र! जिस किसी किसी भी जीव से तेरी स्वार्थ पूर्ति की संभावना हो, उसके चरण पकड़ जमीन पर लंबवत लेट जा। साष्टांग प्रणाम भी उसे ही कहते हैं। यह मत देख की उसके चरण कीचड़ में धंसे हैं। बस उन्हें कीचड़ में कमल के समान समझ 'चरण-कमल' के सदृश्य महत्व दे। दिन में जितनी बार भी भेंट हो, चरण-स्पर्श के साथ ही प्रारंभ होनी चाहिए। प्रहर की ओर ध्यान मत दे, प्रत्येक भेंट का समय तेरे लिए 'गुडमॉर्निग' ही होना चाहिए।'
मुन्नालाल ने प्रश्नवाचक दृष्टिं से आचार्यश्री की ओर देखा और बोला, 'स्वाभिमान..?'
उसकी जिज्ञासा को मध्य ही में लपकते हुए आचार्यश्री धिक्कार स्वर में बोले, 'मूर्ख! ..स्वाभिमान क्या होता है? स्वाभिमान तो मूर्ख व्यक्तियों का आभूषण है। श्रेष्ठजन, प्रगतिशील जन् इस प्रकार के आभूषण उतारकर खूंटी पर टांग देते हैं, क्योंकि स्वाभिमान-अवगुण प्रगति में टांग अड़ाता है।'
मुन्नालाल ने पुन: प्रश्नवाचक दृष्टिं से आचार्यश्री की ओर निहारा। उसकी जिज्ञासा का भाव भांप आचार्यश्री बोले यदि तेरे घर में खूंटी नहीं है और तू स्वाभिमान को अपने साथ ही टांगे रखना चाहता है, तो भी चरण-स्पर्श में तेरा स्वाभिमान आहत नहीं होता है। ..प्रिय शिष्य! तू चरण-स्पर्श कर श्रद्धा का बचाए रख। मन-मन में गाली देता रह। कौन सुनता है? चरण-स्पर्श कर भले ही मन में 'गुरु जी पनही लागै' का उच्चारण कर। इस प्रकार श्रद्धा सुरक्षित रहेगी, तो तेरा स्वाभिमान भी सुरक्षित रह जाएगा। चरण-स्पर्श के समान ही, प्रिया शिष्य 'पूजा' तत्व को अपना। तेरा इष्ट भले ही अवगुणों का भण्डार हो, किंतु तेरे लिए वह सद्गुणों की साक्षात प्रतिमा है। अंतर्मन में भले ही कुछ हो, किंतु उसके लिए तेरे मुख से स्तुति-गान के बोल ही निकलने चाहिए। आपने इष्ट की गंदी आदत पहचान और उन्हें सद्गुण समझ इष्ट की इच्छा पूर्ति कर। यदि उसमें ऐसी आदतों का अभाव है, तो उत्पन्न कर। शराब, शबाब, कबाब सभी प्रकृति प्रदत्त हैं। बिना किसी भेद भाव के इष्ट को अर्पित कर। इसी शुभ कर्म का प्रतीक पान है।'
आचार्य श्री ने वाणी को क्षणिक विराम दिया और आगे कहा, 'अब तू इसका महत्व सुन। इस सूत्र के पारण से तुच्छ मनुष्य भी परम्-पद को प्राप्त होता है। ..शिष्य मुन्नालाल श्रद्धा को सुरक्षित रख, निष्ठा का त्याग कर, स्वाभिमान को खूंटी पर टांग और सूत्र का पारण कर परम्-पद की प्राप्ति कर। मेरा आशीर्वाद तेरे साथ है। तेरा कल्याण हो, पुत्र !'
संपर्क – 9868113044

Sunday, April 13, 2008

विकास का सफर

परिंदों की सांसे थम गई,
पुष्प सभी मुरझा गये
पात सभी झर गये
शाखाएं सभी नग्न हो गई
बरगद ने दम तोड़ दिया
प्रकृति रो पड़ी!!!
और इनसान,
विकास की गाथा लिखता रहा!
विकास के इस पथरीले सफर की
मंजिल क्या है?
परिणति क्या है?
परिणाम क्या है?
क्या..!
पंछियों के गीतों पर विराम!
खिल-खिलाते पुष्पों का मौन!
लहलाते वृक्षों की हत्या!
प्रकृति का विनाश!
ओह!
कितना आत्मघाती है,
पथरीले विकास का यह सफर!

संपर्क ः 9868113044

Sunday, April 6, 2008

' पांव-पान-पूजा' सफलता प्राप्ति का सफल सूत्र

भाग्यं फलति सर्वत्र:
न च विद्या न पौरुष:।
'
कैरियर को लेकर चिंतित मुन्नालाल के ऐसे वचन सुन आचार्य श्री के साफ्टवेयर-हार्डवेयर एक साथ एक्टिव हो गए और एक-एक कर सद्ंविचार उनके मन रूपी मानीटर पर डिसप्ले होने लगे। उसकी दशा-दिशा देख आचार्य श्री को उस पर दया आ गई और रामकृष्ण परमहंस की तरह अपने विवेकानन्द के सिर पर हाथ रख कर वे बोले, 'पुत्र! तू विवेक न खो, धैर्य रख। चिंता चिता समान है।'
आचार्य श्री आज मैनेजमेंट कंसलटेंट की तर्ज पर प्रवचन देने के मूड में थे। शायद इसलिए कि विषय कैरियर से संबंधित था।
शून्य में हाथ-पांव लहराते हुए ओजस्वी वाणी में फिर वह बोले, 'पुत्र ! तेरा भाग्य तेरे हाथ में है। यह उचित है कि जीवन रूपी इस कुरुक्षेत्र में भाग्य का अपना महत्व है, परंतु भाग्य के सामने पौरुष व विद्या को अंडर एस्टिमेट न कर। मक्खन प्रधान वर्तमान युग में भी भाग्य निर्माण में पौरुष व विद्या की महत्वपूर्ण भूमिका है।'
मालपुए के समान नरम-गरम वचन सुन मुन्नालाल को लगा जैसे महंगाई के इस दौर में सस्ती दर पर दाल-चावल मिलने का आश्वासन मिल गया हो! उसने धैर्य का प्रदर्शन करते हुए कहा, 'आचार्य श्री यह कैसे? मेरे पुरुषार्थ में भी कहीं कोई कमी नहीं है और ज्ञान में भी नहीं, फिर..?'
आचार्य श्री ने अपने आर्द्र वचनों से मुन्नालाल के मुरझाए मन को तरोताजा रखने का प्रयास करते हुए बोले, 'पुत्र! जिस कर्म द्वारा लक्ष्य प्राप्ति हो जाए वही पुरुषार्थ है, वरन् व्यर्थ की कवायद। इसी प्रकार वही ज्ञान सद-विद्या है, जिससे अभीष्ट की प्राप्ति हो। जिस विद्या से अभीष्ट फल प्राप्त न हो वह तो कोरा अज्ञान है। तू उसे पुरुषार्थ व ज्ञान की संज्ञा से क्यों सुशोभित करता है?'
'तू आत्मावलोकन कर और देख कि तेरा पुरुषार्थ लक्ष्य प्राप्ति में सहायक सिद्ध क्यों नहीं हो रहा है? अज्ञान बन कर तेरी विद्या तेरा मार्ग क्यों अवरुद्ध कर रही है? अत: तू दशा-दिशा का यथार्थ ज्ञान कर उचित दिशा में सार्थक प्रयास कर, तेरा कल्याण होगा, वत्स।'
'हे, वत्स! विद्या के संदर्भ में भी तू भ्रमित सा दिखलाई पड़ रहा है। डार्विन के विकास का सिद्धांत अप्लाई कर यदि तू सूर्य की गति का आंकलन करेगा तो ऐसी ही दुर्गति होगी। प्रॉब्लम गति की है, तो न्यूटन के गति का फार्मूला अप्लाई कर, दुर्गति का नहीं। प्राब्लम ट्रिगनेमेटरी की और फार्मूला ज्योमैट्री का! फिर तू सफलता वरण कैसे कर पाएगा? पौरुष और विद्या को अंडर एस्टिमेट कर वक्त बरबाद न कर उसकी गति पहचान, उसकी नब्ज पहचान।'
'सुन, पुत्र! वक्त की नब्ज पहचानने वाले व्यक्ति ही सफलता प्राप्त करते हैं। वक्त परिवर्तनशील है और परिवर्तन के इस चक्र में जड़-चेतन, आचार-विचार सभी परिवर्तित हो रहे हैं। मूल्य परिवर्तित हो रहे हैं, मूल्यों की परिभाषाएं परिवर्तित हो रही हैं। पुरातन, पुरातन युग में ही भूत के साथ सुरक्षित हो गया है। अर्वाचीन का सामना अर्वाचीन के साथ कर। शील का त्याग कर परिवर्तन का स्वागत कर।'
आचार्य श्री ने प्रवचन जारी रखते हुए कहा, 'बदलते इस दौर को पहचान और कार्तिकेय का पुरुषार्थ त्याग गणेश की रीति-नीति पहचान। पृथ्वी की परिक्रमा कर क्यों व्यर्थ ही समय और पुरुषार्थ जाया करता है। गणेश के समान अपने बॉस की परिक्रमा कर, चूहे की चाल चल कर भी पृथ्वी परिक्रमा का पुण्य प्राप्त कर और प्रथम पूज्य कहला।'
आचार्य श्री ने अपनी स्याह दाढ़ी सहलायी और बोले, 'वत्स, मुन्नालाल! इस मक्खनी युग में कैरियर बनाने का एक रपटीला फार्मूला आज तेरे समक्ष उजागर करता हूं, जिसे प्राप्त करने के लिए नारद मुनि ने तीनों लोक की खाक छानी थी। तू ध्यान से सुन और उसे जीवन में उतार।
हे, मुन्नालाल! नारद मुनि एक दिन अपनी व्यथा लेकर विष्णु भगवान की शरण में गए और साष्टांग प्रणाम कर विनीत भाव से बोले, 'हे, देवाधिपति देव! मैं पूर्ण समर्पण भाव से जन कल्याण में संलग्न हूं। सभी देवी-देवताओं के साथ मेरे मधुर संबंध हैं। सभी के सुख-दुख में प्रथम भागीदार हूं। लक्ष्मी व पार्वती सहित सभी माताओं का मुझे आशीर्वाद प्राप्त है। फिर भी देवताओं की मेरिट में मुझे आज तक शामिल नहीं किया गया। मैं आज भी मुनि ही की पदवी प्राप्त हूं, ऐसा क्यों, भगवन? मुझ पर कृपा करो भगवन और वह मार्ग बताओ, जिस पर चल कर मैं भी देव की पदवी प्राप्त करने का पुण्य प्राप्त कर सकूं।'
नारद मुनि के ऐसे वचन सुन विष्णु भगवान के होठ कमल के समान खिल गए और फिर बोले, 'प्रिय पुत्र नारद! मैं तुम्हारी व्यथा समझता हूं। इसके लिए तुम्हें भगवान शंकर की शरण में जाना होगा। वे ही तुम्हारा कल्याण करेंगे। एक बात और ध्यान रखना पुत्र, उनकी शरण में जाने से पूर्व यह भूल जाना कि माता पार्वती का तुम्हें आशीर्वाद प्राप्त है। वह तो तुम्हें है ही, परंतु भगवान शंकर का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए कुछ पत्रं-पुष्पं लेकर जाना। खाली हाथ मत चले जाना जैसे मेरे पास आए हो और अपनी व्यथा बाद में बताना पहले उनके चरणों में पत्र-पुष्प अर्पित कर देना।'
वीणा के तारों के साथ खेलते हुए नारद मुनि ने प्रसन्न भाव के साथ कैलाश पर्वत की ओर गमन किया। भगवान शंकर समाधिस्थ थे। उन्हें विष्णु भगवान का संदेश पूर्व ही प्राप्त हो गया था और नारद को देखते ही वे समाधिस्थ हो गये। विष्णु भगवान की शिक्षा का अक्षरश: पालन करते हुए नारद जी ने शंकर भगवान को मन ही मन प्रणाम किया और पत्र-पुष्प-फल उनके चरणों में अर्पित कर आदत के अनुसार अपनी उंगलियां वीणा के तारों पर फेरी। भगवान शंकर की समाधि टूटी और मुस्कुराते हुए बोले, 'वत्स! यहां आने के कष्ट का उद्देश्य..?' नारद जी ने क्षमा याचना करते हुए अपनी व्यथा शंकर भगवान के समक्ष प्रस्तुत की।
व्यथा सुन भगवान शंकर ने उन्हें इंद्र के पास जाने की सलाह दे डाली। सलाह की बूंदे कानों में पड़ते ही नारद जी असमंजस में पड़ गए और बोले, 'भगवन! इंद्र ही तो...।'
नारद जी के बात काटते हुए भगवान शंकर बोले, 'हां, पुत्र! में भलीभांति जानता हूं, पुलिस की तरह इंद्र ही ने तुम्हारे मार्ग में बैरिकेड किये हैं। वही तुम्हारे मिशन पर कुण्डली मारे बैठा है। परंतु जब तक बैरिकेड नहीं हटेंगे, तब तक गाड़ी आगे कैसे बढे़गी?'
हे, पुत्र नारद! काल की गति पहचानों और दुर्गति से बचो। स्वाभिमान प्रगति में बाधक है, अत: उसका त्याग कर उन्हीं की शरण में जाओ। उनके पास जब जाओ तो पत्र, पुष्प व फलों के वजन में वृद्धि कर के जाना। जिस तरह मेरे पास आए हो, उसी तरह मत चले जाना। जाकर उनके पांव छूना, पत्र, पुष्प व फल अर्पित करना और वीणा वादन नहीं, देवों के देव इंद्र की पूजा करना। जाओ वत्स, जाओ, इंद्र की शरण में जाओ तुम्हारा कल्याण होगा।'
इस प्रकार हे, वत्स मुन्नालाल! भगवान विष्णु और शंकर ने ''पांव-पान-पूजा'' का अमूल्य फार्मूला नारद मुनि को दिया और इस फार्मूले की ही सहायता से उन्होंने देव मुनि नारद का पद प्राप्त किया।
आदमी की तो बिसात क्या, पुत्र! देवताओं द्वारा आविष्कृत ''पांव पान पूजा'' के इस फार्मूले की हवा मात्र से पाषाण भी मक्खन समान चिकने व मुलायम बन जाते हैं। जो तेरे लक्ष्य पर नाग की तरह कुंडली मारे बैठा है, उसके चरण स्पर्श करना अपना स्वभाव बना, पत्रम्-पुष्पम् भेंट कर और निर्धारित सभी कर्तव्य-कर्मो का त्याग कर इसे ही प्रधान व सर्वोत्तम कर्तव्य मानते हुए प्रात: व सांय काल उसकी आरती उतार।'
'तू ऐसा जान कि बॉस ही तेरी माता है, वही तेरा पिता है, वही गुरु है और तेरे लिए वही सर्वोच्च देवता है। हे, वत्स! जब बॉस का स्वभाव तेरे प्रति लिपलिपा होने लगे तेरे मोह में उसका मन जब भ्रमित होने लगे, तब उसके चरण स्पर्श करते-करते एक दिन उसकी टांग खींच ले। लैग पुलिंग तेरा मिशन होना चाहिए विजन स्वत: साकार हो जाएगा।
अत: हे मुन्नालाल! विद्या और पुरुषार्थ के अर्वाचीन मापदण्ड को पहचान और तू जा, बॉस की शरण में जा, 'बॉस शरणं गच्छामि' इसी में तेरा भविष्य निहित है, इसी में कैरियर। कल्याणं अस्तु-कल्याणं अस्तु।'
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Wednesday, April 2, 2008

पाषाण युग में प्रवेश

भोर भई, जनता जागी।
काश, जनता जागी होती!
सांझ होगी, जनता फिर सो जाएगी। शहर का नजारा देख जनता आश्चर्यचकित। यह क्या! गली-गली, नुक्कड़-नुक्कड़, चौराहे, तिराहे, दोराहे और हर मोड़ पर काले-चमकीले पत्थर, चस्पा। जब सोए थे, तब तलक तो सब सामान्य था। रात भर में यह कैसा चमत्कार, सारे शहर में पत्थर ही पत्थर। लोगों की उत्सुकता जागी।
काश लोगों की उत्सुकता जागी होती!
उन्होंने पत्थर पर खुदी इबारत बांची। पता चला मंत्री जी सड़कों पर, चौराहों पर, गली-मुहल्लों का शिलान्यास कर गए। अर्थात अपने शुभ नाम के पत्थर जड़ गए।
चूंकि पत्थर जड़ होते है, अत: शिलान्यास भी, इसलिए शिलान्यास के पत्थर जड़ दिए जाते हैं।
जनता फिर भौचक्का, एक साथ इतने पत्थर! किसी को पता भी न चला, अकेले, रात के अंधेरे में। किसने फेंके, ये पत्थर!
मुन्नालाल बोला, 'हां काले पत्थर काली रात में अकेले ही जड़े जाते हैं। मंत्री जी मूर्ख नहीं हैं, जो सोती जनता को जगाते। जनता विप्लवकारी है, मंत्री जी शांताकारी हैं। नेतातंत्र के लिए जनता का सोते रहना ही हितकारी है!'
काश! जनता विप्लवकारी होती!
पता चला, मंत्री जी न दिन में आए और न ही रात में। राजधानी में ही पत्थर इकट्ठा किए उन पर गंगा जल छिड़का और श्रद्धा के साथ शहर भिजवा दिए गए। श्रद्धा और श्राद्ध की दूरियां अर्थहीन होती हैं!
दूर से गर्द का एक गुबार जनता की तरफ बढ़ रहा था। लोगों ने देखा वह निरंतर उनकी तरफ आ रहा है। लोगों के बीच खुसर-फुसर हुई गुबार ने लोगों को घेर लिए। पता चला, यह विकास यात्रा के कारण उठा गुबार था। विकास गुबार की तरह ही उठता है और गुबार की तरह ही लुप्त हो जाता है।
विकास एक रथ पर सवार था। उसके साथ भीड़ थी। जिसे जनता नाम दिया जा रहा था, नेता जी की जनता। रथ पर सवार विकास ने शहर के लोगों की तरफ आश्वासन के पत्थर फेंकने शुरू किए।
जनता ने कहा हमें विकास का विकास नहीं, शहर का विकास चाहिए, जनता का विकास चाहिए। विकास रथ की लकीर पर चलने वाले लकीर के फकीरों ने शहर के लोगों के मुंह पर हाथ रख दिया। जनता ने जनता का मुंह बंद कर दिया। शहर की जनता खामोश हो गई।
काश! जनता खामोश न होती!
कुछ देर बाद शहर की तमाम सड़कों पर पत्थर ही पत्थर पड़े थे। वे सभी विकास के नाम पर विकास ही पर पड़े पत्थर थे। विकास जिस गुबार के साथ शहर में आया था, उसी गुबार के साथ अंतर्धान हो गया। बस अपने पीछे छोड़ गया कुछ शिलान्यास के, तो कुछ राह के पत्थर।
एक रथ का गुबार अंतर्धान हुआ, तो फिजा में दूसरे रथ का गुबार छा गया। शहर के लोगों ने गुबार से पूछा, 'भाई तुम्हारा ताल्लुक किस रथ से है।' गुबार ने जवाब दिया, 'मैं परिवर्तन रथ का गुबार हूं।'
हां, परिवर्तन विकसित रथ पर सवार था। उसके साथ भी उसकी अपनी जनता थी, शहर की जनता से बिलकुल भिन्न। रथ पर सवार परिवर्तन ने दूसरे रथ पर सवार विकास की तरफ परिवर्तन के पत्थर उछाले- 'परिवर्तन आना चाहिए, हम परिवर्तन लाएंगे।'
मुन्नालाल ने पूछा, 'नेता परिवर्तन अथवा व्यवस्था परिवर्तन?'
इसके साथ ही शहर के लोगों ने नारा दिया, 'हमें शक्ल नहीं व्यवस्था परिवर्तन चाहिए।' परिवर्तन रथ की जनता सक्रिय हुई और शहर के लोगों के मुंह पर ताले जड़ दिए। जनता ने जनता की आवाज फिर बंद कर दी।
काश! जनता बोलना सीख लेती!
गली-गली, नुक्कड़-नुक्कड़, चौराहे-चौराहे, तिराहे-तिराहे, दोराहे-दोराहे, हर जोड़ पर हर मोड़ पर पत्थर ही पत्थर। कहीं आश्वासनों के पत्थर तो कहीं आरोप-प्रत्यारोप के पत्थर।
काश! विकास की राह पथरीली न होती!
मुन्नालाल सोचने लगा, 'जब-जब चुनाव आते हैं, आखिर क्यों हम पाषाण युग में प्रवेश कर जाते हैं?'
मुन्नालाल ने अपनी जिज्ञासा आचार्य श्री के सम्मुख प्रस्तुत की। आचार्य श्री ने शंका निवारण किया, 'सुनो, वत्स! नेतातंत्र का यही सिद्धांत है। चुनाव के समय पानी-पानी नेता का हृदय चुनाव परिणाम के साथ ही जम जाता है। वह पत्थर दिल हो जाता है। चार साल पूरे होते हैं, चुनाव नजदीक आता है। नेता दिल हलका करने के लिए पत्थर फेंकना शुरू कर देता है। पत्थर किसी भी तरफ उछाले जाएं, गिरते जनता के ऊपर ही हैं।
..और, जनता! ..सीने पर पत्थर रखे-रखे जनता अहिल्या की गति को प्राप्त हो गई है। उद्धार के लिए एक अदद राम चाहिए।
काश! राम पुनः अवतरित हुआ होता!
संपर्क- 9868113044