Saturday, June 14, 2008

मूछों से घुटनों पर उतरती राजनीति

ग्लोबल कोई समस्या हो अथवा राजनीति घुटनों पर ही वार करती है। अब महंगाई को ही लीजिए, कमबख्त जब से ग्लोबल हुई है, उसने जनता के घुटने तोड़ दिए हैं। हालांकि महंगाई जनता को परेशान तब भी करती थी, जब देसी थी, मगर तब बदन में खुजली-सी ही करके रह जाती थी। जनता को घुटनों के बल रेंगने के लिए मजबूर नहीं करती थी। अब ग्लोबल राजनीति को देखलें, पहले अफगानिस्तान में तालिबान के घुटने तोड़े, फिर ईराक में सद्दाम के। पाकिस्तान के घुटने भी सुरक्षित नहीं हैं, ग्लोबल राजनीति उसके घुटनों पर मीठी-मीठी मार कर उन्हें कमजोर करने में लगी है। मोटे तौर पर देख जाए, ग्लोबल राजनीति से प्रेरणा प्राप्त कर अपनी देसी राजनीति भी ग्लोबल ही हो गई है। और, स्वदेशी राजनीति डायनासॉर की गति को प्राप्त हो गई है।

दरअसल राजनीति अब मूंछों से उतर कर, घुटनों पर आ गई है। लड़ाई व्यक्तिगत स्तर पर हो अथवा दलीय स्तर पर निशाना घुटनों पर ही साधा जाता है। आजकल इसके लिए विपक्ष हथियार के रूप में महंगाई का बेहतर इस्तेमाल कर रहा है। महंगाई से सरकार के घुटनों पर वार कर रहा है। सरकार को घुटनों के बल रेंगने के लिए मजबूर कर रहा है। इस तथ्य से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि पूर्व में लड़ाई भले ही मूंछों की रही हो, लेकिन घुटनों का महत्व दब भी कम नहीं था। उस समय भी प्रतिद्वंद्वी की मूंछें नीची करने की अपेक्षा उसे घुटने टेकने के लिए मजबूर करने पर ज्यादा जोर दिया जाता था। लेकिन अब तो हालात बिलकुल ही बदल गए हैं। राजनीति में अब मूंछें अल्पसंख्यक हो गई हैं। ग्लोबल राजनीति के जितने भी घुटने टिकाऊ राष्ट्राध्यक्ष हैं, वह चाहे अमेरिका का हो अथवा ब्रिटेन का या हो चीन का सभी मूंछ विहीन हैं। देसी राजनीति की तो बात ही अलग है। इतिहास गवाह है, भारतीय राजनीति में मूंछ-विहीन नेता ही सफलता को प्राप्त हुए हैं। कुछ नेताओं के अधरों पर अवश्य मूंछें दिखलाई दे जाती हैं, किंतु उन्हें मूंछ कहना मूंछों का अपमान है। दरअसल वे मूंछों के अवशेष हैं, जो भविष्य में मानवशास्त्रियों के लिए अध्ययन में सहायक सिद्ध होंगी।

मर्दो की शान कहे जाने वाली मूंछ-संस्कृति के पतन का आखिर कारण क्या है, विशेषरूप से राजनीति में? इस ज्वलंत विषय पर हमने गहन अध्ययन किया है। अध्ययन के उपरांत हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि मूंछें प्रगति में बाधक हैं। व्यक्ति हो अथवा नेता वही तरक्की को प्राप्त हुआ है, जिसने मूंछों को प्रमुखता प्रदान नहीं की है। दरअसल मूंछें नाक का बाल बनने में अवरोध उत्पन्न करती हैं और तरक्की व्यक्तिगत जीवन में करनी हो अथवा सार्वजनिक जीवन में किसी की नाक का बाल बनना परमावश्यक है। राजनीति में तो नाक का बाल विशेष महत्व रखता है। मूंछ-संस्कृति के पतन का दूसरा प्रमुख कारण है, मूंछों का स्टिंग-ऑपरेशन में सहायक सिद्ध होना। दरअसल मुछंदर व्यक्ति जब कभी मलाई चाटता है, तो मूंछें चुगली कर देती हैं, गोपनीय तथ्य को उजागर कर देती हैं। नेताओं के लिए यह विकट समस्या है, क्योंकि मलाई चाटना उनकी आदत है। अत: मूंछें अनुपयोगी हैं और अनुपयोगी मूंछों के भार से अधरों को भार-संपन्न करने का औचित्य क्या?

घुटनों का महत्व भी यद्यपि पुरातन काल से ही है, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता उन्हें एनडीए सरकार के समय प्राप्त हुई थी। उस समय सरकार के भाजपाई घुटने कुछ कमजोर पड़ गए थे, अत: पेंगुइन की चाल चलती-चलती सरकार सत्ता से बाहर हो गई। क्योंकि घुटने सरकार के थे, अत: राष्ट्रीय महत्व मिलना स्वाभाविक था। सुना है, अब भाजपा ने नए घुटने तलाश लिए हैं, देखना यह होगा कि नए घुटनों में कितनी जान है। एनडीए की सत्ता में वापसी करा पाते हैं, अथवा नहीं।

घुटनों के संबंध में प्रसिद्ध यह जुमला : 'गिरते हैं शह -सवार ही मैदान-ए-जंग में, वो क्या खाक जीएंगे जो घुटनों के बल चलते हैं।' भी घुटनों के महत्व को दर्शाता है, मगर अब स्थिति बदल गई है। अब वे ही लोग जीते हैं, जो अपने बॉस के सामने घुटनों के बल रेंगते हैं। सीधे घुटने वाले शख्स अक्सर गिरते देखे गए हैं। दरअसल घुटनों के बल रेंगना अब कला का रूप ले चुका है। आधुनिक युग में पांव-पान-पूजा की संस्कृति का महत्व भी बढ़ा है और उसमें भी घुटनों को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। क्योंकि, पूजा वही उत्तम कह लाई जाती है, जो घुटनों के बल बैठकर की जाती है और पांव छूने के लिए भी घटने मोड़ने ही पड़ते हैं। अत: मूछों की अपेक्षा अब घुटनों की राजनीति का महत्व बढ़ता जा रहा है।

संपर्क ः 9717095225

Sunday, June 1, 2008

मंत्री जी की अंगूठी

बिना विभाग के मंत्री जी ने उच्चस्तरीय कमेटी की बैठक बुलाई। बैठक में राष्ट्र के सर्वागीण विकास से संबद्ध योजना पर चर्चा की जानी थी। क्योंकि मंत्रालय बिना विभाग का था, इसलिए सर्वागीण विकास पर ही चर्चा लाजिम थी और मजबूरी भी। कांफ्रेंस हाल में एक-एक कर विभाग के सभी उच्चधिकारी उपस्थित हो चुके थे। बस शेष रह गए थे मंत्री जी। उपस्थिति पूर्ण होने की सूचना मंत्री जी के पास भेजी गई और इसी के साथ मोबाइल पर बतियाते-बतियाते मंत्री जी ने कांफ्रेंस हाल में प्रवेश किया। एक-एक कर सभी मातहतों ने उनकी चरण वंदना की। चरण वंदना कराना मंत्री जी का शौक था और करना मातहतों का परम कर्तव्य। चरण वंदना के घनत्व के आधार पर मंत्री जी अपने मातहतों की निष्ठा, कर्तव्य और कर्तव्य के प्रति ईमानदारी का आंकलन करते हैं।

मंत्री जी ने मोबाइल पीए साहब के हाथ में थमाया और दोनों हाथों की अंगुलियां एक दूसरे के बीच फंसाने की अदा का प्रदर्शन करते हुए तशरीफ का टोकरा कुर्सी पर टिकाया। मंत्री जी अभी पूरी तरह टिक भी न पाए थे कि दाएं हाथ की अंगुलियों से बांए हाथ की अंगुलियों के उद्ंगम स्थल को सहलाते हुए हवा में ऐसे उछले मानो कुर्सी के नीचे किसी ने आग लगा दी हो। इसके साथ ही उनके मुंह से निकला, 'हाय, मेरी अंगूठी!'

समूचा कांफ्रेंस हाल 'हाय मेरी अंगूठी' की प्रतिध्वनि से गुंजायमान हो गया।

पीए के मुंह से निकला 'हाय, मेरी अंगूठी' सचिव के मुंह से निकला 'हाय, मंत्री जी की अंगूठी'

मैडम बटरफ्लाई के मुंह से निकला 'हाय! उनकी अंगुठी।'

मानों सभी के टेप में एक ही नारा रिकार्ड था, 'हाय, अंगूठी-हाय अंगूठी।'

वैसे तो बिना विभाग के मंत्रालय के वरिष्ठं-कनिष्ठं सभी अधिकारी व्यवहारिक प्रकृति के जीव थे अर्थात प्रेक्टिकल एप्रोची थे। सभी अधिकारी खुला मक्खन हाथ में लिए घूमते थे, मगर मक्खनी आंखों वाली मैडम बटरफ्लाई उनमें बेजोड़ थी।

बटरफ्लाई मैडम का असली नाम नहीं था। असली नाम उनके स्वभाव से मेल नहीं खाता था। दरअसल मैडम बटरफ्लाई जब भी किसी की तरफ ताकती थी तो लगता था मानों उनकी आंखों से मक्खन की बौछार हो रही है। मंत्री व अधिकारियों के चारो तरफ ऐसे भिन-भिनाती रहती थी, जैसे फूल के चारों तरफ बटरफ्लाई और सुविधानुसार अपनी पसंद के किसी फूल पर काबिज होने के बाद उसके पराग का रसास्वादन तब तक जारी रखती थी, जब तक निचुड़ा फूल निरीह अवस्था में धरती की तरफ ताकने के लिए मजबूर नहीं हो जाए। ऐसे ही कई फूलों को वह मोक्ष की अवस्था तक पहुंचाने में सफलता प्राप्त कर चुकी थी। इसी विशेषता का आकलन करते हुए उनके सहकर्मियों ने उनका नाम बटरफ्लाई रख दिया था।

मंत्री जी के चेहरे पर पुरवा हवा के शुष्क झोंके स्पष्ट दिखलाई दे रहे थे। उन्हें लग रहा था, अंगुली से अंगूठी नहीं, वर्षो की कड़ी मेहनत से प्राप्त कुर्सी आज यकायक खिसक रही है।

मनुष्य जब-जब भी संकटावस्था में होता है, उसका अध्यात्म जागृत हो जाता है। कुछ क्षण के लिए मंत्री जी भी अध्यात्म की गंगा में सशरीर गोते लगाने लगे। सामने पड़ी कुर्सी आज उन्हें रज्जाू में सर्प की भांति भ्रम लग रही थी। जगत के मिथ्यात्व का यथार्थ ज्ञान पुष्ट हो रहा था। अत: वह कुर्सी पर पुन: विराजमान होने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे।

कांफ्रेंस हाल मौन था। मंत्री जी के सामने सभी अधिकारी हाथ बंधे सिर झुकाए गिरजाघर में एकत्रित श्रद्धालुओं की मुद्रा में खडे़ थे। मैडम बटरफ्लाई ने मौन तोड़ा, 'सर! क्या हुआ, आप की अंगूठी को? घर तो ठीक-ठाक थी!'

अबोध किसी बालक के समान रुंधे गले से मंत्री जी बोले, 'कहीं गिर गई।'

समूचे कांफ्रेंस हाल के मुंह से निकला, 'गिर गई!' और गिर गई की इस आवाज के साथ ही समूचा कांफ्रेंस हाल गतिमान हो गया। मैडम बटरफ्लाई ने मौके की नजाकत भांपते हुए मंत्री जी के चरणों में मोर्चा जमाया और वह दंडवत अंदाज में उनके चरण तले अंगूठी खोजने लगी। मैडम का अनुसरण करते हुए जो जहां खड़ा था, वहीं झुका और अपने-अपने पैरों तले अंगूठी ऐसे खोजने लगा, मानो मंत्री जी की अंगूठी नहीं उनके पैरों तले की जमीन खिसक गई हो। यह मंत्री जी के प्रति उनकी निष्ठा का प्रदर्शन था।

सचिव साहब ने हाल के चारों कोनों की खाक उड़ाई तो पीए साहब ने फर्श पर बिछे गलीचे की। मानों अंगूठी नहीं, राजनीति की गेंद हो गई थी, अंगूठी। अत: सभी ने अपने-अपने पाले में तलाशी। मगर गेंद किसी के हाथ नहीं लग पाई। शायद किसी और के पाले में चली गई थी। राजनीति स्वयं गेंद खिसकाने का खेल है। एक दूसरे के पाले में खिसका कर खिलाड़ी स्वयं ही ताली बजाते हैं।

तलाश की हताशा के बाद मैडम बटरफ्लाई ने मंत्री जी का हाथ पकड़ा और दिलासा के साथ उन्हें कुर्सी पर बिठाया। एक-एक कर सभी अपने-अपने आसन पर विराजमान हो गए और अंगूठी को लेकर चिंतन-मंथन का दौर शुरू हुआ। पहल पुन: मैडम ही ने की, 'सर! घर फोन करूं शायद वहीं छूट गई हो।'

'नहीं! कमबख्त फोन भी नहीं मिल रहा है।'

'सर! यह तो अपशकुन है। अंगूठी भी गायब है, फोन भी नहीं मिला!'

'यही सोच-सोच कर तो मैं चिंतित हूं।'

सचिव बोले, 'सर! मुझे तो इस मामले में विपक्ष की साजिश लगती है।'

'ठीक ही कहते हो, मेहता जी। विदेशी हाथ भी हो सकता है।' पीए साहब बोले।

मंत्री जी ने चेहरे पर हाथ फेरा और बोले, 'मुझे अपनी कुर्सी की चिंता नहीं है, मेहता साहब। हालांकि बाल्टी बाबा से यह अंगूठी मिलने के बाद ही मुझे मंत्री पद मिला था। मगर इसी तरह यदि मंत्रियों की अंगूठियां गायब होती रही तो एक दिन सरकार का भी पतन हो जाएगा। सरकार यदि गिर गई तो इस देश का क्या होगा? बस मैं तो यही सोच-सोच कर परेशान हूं, मैडम!'

मक्खनी आंखों में आंसू छलकाते हुए मैडम बोली, 'ठीक कहते हो सर! आप हमेशा ही इस देश की चिंता में भुनते रहे हैं। अंगूठी का खोना मुझे भी किसी गंभीर साजिश का परिणाम लगता है।'

सचिव बोले, 'क्यों न इस बारे में प्रधानमंत्री जी को अवगत करा दिया जाए।'

बटरफ्लाई बोली, 'नोट तैयार करूं, सर!'

मंत्री जी ने सचिव को झाड़ पिलाई, 'मेहता साहब कभी-कभी तो मूर्खता की सभी हदें पार कर जाते हो। प्रधानमंत्री जी को बताने का नतीजा जानते हो? अभी इस मामले को यहीं दबा रहने दो।'

मंत्री जी का मोबाइल घन-घनाया। मंत्री जी जंग खाई तार से कांप गए। उन्हें लगा कि बात शायद प्रधानमंत्री जी तक पहुंच गई है और फोन त्यागपत्र देने का आदेश लिए हुए है।

मंत्री जी ने फोन ऑन किया, 'यऽऽऽस! यस, सर!!!'

आवाज प्रधानमंत्री की नहीं मंत्री जी की पत्‍‌नी की थी। हड़काने का लहजा लिए पत्‍‌नी की आवाज कान में पड़ी, 'अंगूठी भूल गए! हां, हां, हां, बाथरूम में।'

'ओऽऽऽहो! सॉरी, मैडम आज स्नान किया था।'

'मना किया था, स्नान मत किया करो, जब भी स्नान करते हो कोई न कोई अपशकुन हो जाता है।'

'वेरी सॉरी! आइंदा ध्यान रखूंगा।'

बटर फंलाई ने आंसू पोंछ मक्खन का सटीक उपयोग करते हुए पूछा, 'सर! कॉल कौन सी मैडम की थी?'

मंत्री जी के चेहरे पर भी पुरवा के स्थान पर पछवा हवा के अस्थाई चिन्ह प्रकट हुए और बोले, 'पत्‍‌नी की, अंगूठी मिल गई। आज स्नान किया था। अंगूठी बाथरूम में ही भूल आया। कमबख्त जब कभी स्नान करता हूं, कोई न कोई अपशकुन हो ही जाता है। अंगूठी बाल्टी बाबा ने दी थी। स्नान से परहेज करने की सलाह लोटा बाबा ने दी थी।'

'सऽऽऽर! इसी खुशी में फिर तो लंच हो जाए।'

बटफ्लाई के मुंह से लंच निकला और सचिव महोदय ने एक गाड़ी पंचतारा होटल रवाना कर दी और दूसरी गाड़ी अंगूठी लेने के लिए मंत्री जी के निवास पर। पत्‍‌नी पहले ही अंगूठी लेकर तीसरी गाड़ी मंत्री जी के कार्यालय की ओर रवाना कर चुकी थी।

शाम होते-होते प्रधानमंत्री कार्यालय से एक फरमान जारी हुआ, 'कोई भी मंत्री किसी भी स्थिति में अंगूठी नहीं उतारेगा। आदेश की अवहेलना करने वाले मंत्री के खिलाफ पोटा के तहत कार्रवाई की जा सकती है।'

आपात स्थिति से निपटने के लिए प्रधानमंत्री राहत कोष से विभिन्न रत्न जड़ित अंगूठियां तैयार कराने के आदेश भी दे दिए जा चुके थे। ताकि वक्त-जरूरत पर काम आ सके और सरकार पर आने वाले संभावित खतरे को टाला जा सके।

संपर्क : 9717095225

Saturday, May 31, 2008

मसला एक अदद लाइसेंस का है !

दिल्ली पुलिस ने एक चौराहे से ट्रैफिक पुलिस-वर्दी-धारी एक शख्स को गिरफ्तार किया। वह कमबख्त व्यवसायिक वाहनों से अवैध वसूली का गैर-कानूनी धंधा कर रहा था। फिर तो पुलिस ने गिरफ्तार करना ही था। उसे गिरफ्तार कर पुलिस ने वास्तव में कानून का पालन किया। यह आश्चर्य की बात नहीं है, पुलिस भी कभी-कभी कानून का पालन कर लेती है! वैसे तो पुलिस का काम केवल कानून का पालन करवाना है, कानून का पालन करना नहीं! हो, सकता है, कभी-कभी अभ्यास के लिए कानून का पालन करने संबंधी नागरिक-दायित्व का निर्वाह करना पुलिस की मजबूरी होती हो!

अब आप पूछेंगे कि उस शख्स की वसूली अवैध वसूली क्यों थी? पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर कानून का पालन कैसे किया? प्रश्न के पक्ष में आपका तर्क होगा कि ट्रैफिक पुलिस की वर्दी पहने लोगों को आपने अक्सर वसूली करते देख है। एक-दो बार आपने भी जेब ढीली कर ऐसे कर्तव्यपरायण वर्दी-धारियों के राष्ट्रीय-दायित्व में महत्वपूर्ण योगदान दिया है आपका तर्क भी जायज है और प्रश्न भी।

आपका कहना उचित है कि टै्रफिक-पुलिस की वर्दी पहने लोग चौराहों, दोराहों, राजपथों, जनपथों पर अक्सर वसूली करते रहते हैं। मगर वसूली के इस परम्-कर्म के लिए उनके पास सरकारी लाइसेंस होता है, अत: उनकी वसूली वैध वसूली होती है। जिस कमबख्त को पुलिस ने गिरफ्तार किया है, उसके पास ऐसा कोई लाइसेंस नहीं था। बस यही गलती थी, उस कमबख्त की। उसे यदि वसूली करनी ही थी, तो लाइसेंस न सही पुलिस विभाग से फ्रैंचाईज ही ले लेता। ट्रैफिक वार्डन बन जाता, खुल्ला-खेल फर्रुखाबादी खेलता! वैध वसूली करता!

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Wednesday, May 28, 2008

सांड़-सांड़ की पाचन शक्ति

गाजियाबाद में नन्दी पार्क के नाम से सांड़शाला है। जहां आवारा सांड़ रखे जाते हैं। जाहिर है कि नन्दी पार्क में बंद सभी सांड़ 'जन' किस्म के होंगे, क्योंकि राजनैतिक और सरकारी सांड़ आवारा सांड़ नहीं कहलाए जाते हैं, आवारागर्दी करना उनका मौलिक अधिकार है। आवारागर्दी-विरोधी कानून केवल 'जन' किस्म के प्राणियों पर ही लागू है।

दो-तीन दिन पहले उस सांड़शाला के दो सांड़ परलोक-गमन कर गए। सांड़-भक्तों (नन्दी-भक्त) की भावनाएं आहत हुई। मन शोक संपन्न हो गया। जाहिर है कि जब किसी समुदाय विशेष की भावनाओं को ठेस पहुंचती है, तो मुंह से एक आह-सी निकलती है। वही आह बढ़ते-बढ़ते शोर-गुल और आंदोलन में तब्दील हो जाती है। सांड़-भक्तों की मांग पर मृत-सांड़ों का पोस्टमार्टम हुआ।

उन्हीं में से एक सांड़ के पेट से दो रत्ती सोना, पांच व दो रुपये के चंद सिक्के, सौ ग्राम लोहे की कील, दो सौ ग्राम लोहे के वार्सल और न जाने क्या-क्या निकला। सांड़ के पेट से बरामद वस्तुएं देखकर लोगों को आश्चर्य हुआ, लेकिन बरामदगी सोचने के लिए हमें एक विषय दे गई।

हम विषय पर सोचते-सोचते सो गए। फिर सपने में नन्दी महाराज प्रकट हुए। बोले- भक्त! चिंता में भुट्टे की तरह क्यों भुनते जा रहे हो? हमने उनके सामने चिंता का कारण बयान कर दिया। हमारा चिंतनीय प्रश्न सुनकर नन्दी महाराज हंस दिए और फिर बोले- भक्त वह सांड़, जन-सांड़ था, सरकारी अथवा राजनैतिक सांड़ नहीं! उन दोनों में से किसी किस्म का सांड़ होता तो तुम्हारे मन में चिंतनीय यह प्रश्न ही उत्पन्न न होता।

हमने प्रश्न किया- क्यों, महाराज? नन्दी महाराज पुन: मुस्करा दिए और बोले- भक्त! राजनैतिक व सरकारी सांड़ों की पाचनशक्ति ़गजब की होती है। चंद सिक्के, रत्ती-दो रत्ती सोना और चंद कीलों की तो बात क्या, वे तो टकसाल की टकसाल हजम कर जाते हैं। सोने की समूची खदान हजम कर जाते हैं। लोहे की कील तो क्या वे टैंक के टैंक हजम कर जाते हैं और डकार भी नहीं लेते। भक्त मृत सांड़ भी यदि राजनैतिक अथवा सरकारी सांड़ होता, तो तुम और तुम्हारे डाक्टर बस ढूंढते रह जाते। भक्त! गलती की इस सांड़ ने जन-सांड़ होकर राजनैतिक व सरकारी सांड़ों जैसा भोजन करने की चेष्टा की। फिर तो उसकी ऐसी दुर्गति होनी ही थी। इतना कहकर नन्दी महाराज अंतर्धान हो गए और हम जाग गए।

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Wednesday, May 21, 2008

ज्ञान के प्रकाश से अंतरात्मा को प्रकाशित करो

रात्रि का समय था। हवा शांत थी, गर्मी अशांत थी। भव्य पंडाल में सत्यानंद जी प्रवचन-प्रसारण चल रहा था, 'हे मां! हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले चल। असत्य से सत्य की ओर तथा मृत्यु से अमृत की ओर ले चल।' तभी बिजली धोखा दे गयी। चरों ओर अंधकार छा गया। माइक गला बंद हो गया। भक्तजनों में खलबली मच गयी। परनिंदा में माहिर भक्तजन् सरकार को कोसने लगे। कुछ अंधकार से प्रकाश की ओर गमन करने की सद्-इच्छा से इधर-उधर हाथ-पांव पटकने लगे। एक भक्त ने जींस की जेब से लाइटर निकालकर अंधकार से प्रकाश की ओर गमन करने का सार्थक प्रयास किया। मंच पर गैस की लालटेन को माचिस दिखलाई गई। इस प्रकार अंधकार से प्रकाश की ओर जाने का एक दौर संपन्न हुआ। प्रवचन की धारा पुन: प्रवाहित होने लगी।

भक्तजनों के तेवर देख महाराज ने प्रवचन की दिशा में मामूली सा परिवर्तन किया। ब्रह्मं सत्य, जगत मिथ्या की तर्ज पर महाराज ने ओजस्वी वाणी से अमृत वर्षा करते हुए कहा, 'भकतजनों! प्रकाश असत्य है। अंधकार ही सत्य है। जीवन के सभी पुण्य कार्य अंधकार में ही संपन्न होते हैं। प्रकाश में संपन्न पुण्य कार्य भी पाप-कर्म में परिवर्तित हो जाते हैं। अंधकार मिटाने के लिए हमें प्रकाश की व्यवस्था करनी पड़ती है, किंतु प्रकाश से निपटने के लिए अंधकार की व्यवस्था नहीं की जाती, अपितु प्रकाश को ही समाप्त कर दिया जाता है। अत: अंधकार ही शाश्वत है, प्रकाश नश्वर है।'

महाराज ने वाणी को विराम देकर दीर्घ श्वास का पान किया और फिर बोले, 'विडंबना यह है कि प्रकृति परिवेश में जीना त्याग कर हमने अपने चारों ओर कृत्रिम परिवेश का जाल बुन लिया है। यही दुख का कारण है। प्रकाश की इच्छा रखते हो, तो अपने मन मंदिर में ज्ञान के दीप प्रज्ज्वलित करो। आज पुन: हम प्रकृति की ओर लौट रहे हैं। हमें सरकार और बिजली विभाग का आभारी होना चाहिए कि वे हमें प्रकृति की ओर गमन करने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। हे भक्तजनों! प्रकाश की आशा उससे करनी चाहिए जो स्वयं प्रकाश-पुंज हो। स्वयं ही जिसका भविष्य अंधकार में है, वह किसी को किस प्रकार आलोकित कर सकता है, अत: सरकार से प्रकाश की आशा का त्याग कर, सूर्य और चंद्रमा के प्रकाश से जीवन को आलोकित करो।'

प्रवचन के मध्य ही एक भक्त ने प्रश्न उछाला, 'महाराज! पानी-संकट?' महाराज बोले, 'सत्य वचन! पानी का घोर संकट है। ऐसा संकट न त्रेता में था और न ही द्वापर में, जैसा कि कलियुग में है। आंखों का पानी सूख गया है। चेहरों का पानी उतर गया है। रहीम दास जी का वचन असत्य हो गया है। अब पानी-विहीन मोती और पानी-विहीन मानुष्य ही सच्चे कह लाए जाते हैं। पानी-विहीन ही उबरते हैं। अत: पानी संकट का लाभ उठाओ। पानी का मोह त्याग, तुम भी महान बन जाओ!' प्रवचन के मध्य ही प्यासे होंठ और शुष्क वाणी से एक अन्य भक्त ने उच्चार किया, 'किंतु महाराज! पेय जल संकट?' भक्त का प्रश्न सुन महाराज मुस्करा दिए और बोले, 'पुत्र! शरीर और मन की तृष्णा कभी नहीं बुझती है। उसका त्याग करो और ज्ञान की पवित्र धारा से अंतरात्मा की तृष्णा को शांत करो।'

सत्यानंद महाराज अंधकार-प्रकाश, सत्य-असत्य और तृष्णा-त्याग पर अंधकार में प्रकाश डाल रहे थे। तभी उनका कर-कमल कनपटी पर पटका। भक्तों के झुंड से एक आवाज भिनभिनाई 'मच्छर' है। एक अन्य आवाज उठी- डेंगू का होगा! तभी करुणा-भाव से एक भक्त का हाथ महाराज की कनपटी की ओर उठा। महाराज संभले और बोले, ' अहिंसा परमोधर्म:! जीवों पर दया करो।' एक भक्त बोला, 'मलेरिया विभाग निकम्मा है। मच्छरों ने हमारा जीना दूभर कर दिया है!'

करुण रस की वर्षा करते हुए महाराज ने भक्त की जिज्ञासा शांत की, 'वत्स! मच्छर हमारे शत्रु नहीं, मित्र हैं। 'चैन की नींद सोना है, तो जागते रहो' का पवित्र संदेश प्रसारित कर हमें निद्रा से जागृत अवस्था में लाने का महत्वपूर्ण कार्य करते हैं। साधुवाद की पात्र है सरकार जिसने मच्छरों को नष्ट न करने की शपथ लेकर 'अहिंसा परमोधर्म:' का निर्वाह किया है।' इतना कह कर महाराज ने पुन: कनपटी सहलाई और बोले, 'भक्तजनों! तुम आत्मा हो और आत्मा अमर है। फिर डेंगू के मच्छर से कैसा भय! मच्छर तुम्हारे नश्वर शरीर को तो हानि पहुंचा सकता है, किंतु आत्मा को तो नहीं। तुम आत्मा हो।' महाराज ने पुन: दीर्घ श्वास का पान किया और बोले, 'तमसो मां ज्योतिर्गमय!' तभी बिजली विभाग की कृपा हुई और पण्डाल प्रकाशमान हुआ। इसके साथ ही अंधकार से प्रकाश की यात्रा का समापन हुआ।

संपर्क- 9869113044

Friday, May 16, 2008

टीले का रहस्य

आज आपको एक कहानी सुनाता हूं। कहानी न अतीत की है और न ही वर्तमान की। कहानी भविष्य की है। भविष्य की है, किंतु कोरी कल्पना नहीं। कल्पना कोरी कल्पना कभी होती भी नहीं है। प्रत्येक कल्पना किसी न किसी यथार्थ पर ही आधारित होती है। अत: इस कहानी को कोरी कल्पना समझ कर यों ही हंसी में मत उड़ा देना। अच्छा कहानी सुनों-
सूनामी गांव में एक ग्वाला रहता था। ईमानदार था, प्रेमी जीव था, सत्यवादी था, अहंकार करने के लिए उसके पास कुछ था ही नहीं, अत: अहंकार-मुक्त भी था। जब उसे अहंकार ही नहीं था, तो क्रोध कहां से होता! वैसे क्रोध के लिए भी पल्ले कुछ होना आवश्यक है। कुल मिलाकर सज्जनता के सर्वगुणों से संपन्न था। यही उसकी पूंजी थी और यही उसकी संपन्नता।
वह रोज सुबह उठता। अपने साथियों के साथ दूर जंगलों में पशु चराने ले जाता। साथी ग्वालों को प्रेम का पाठ पढ़ाता, आपस में विवाद होने पर सहज भाव से उसे निपटा देता। खुद घाटे में रहता मगर विवाद को तूल न पकड़ने देता। पशु चरने में व्यस्त हो जाते, तो उसके साथी उसे घेरकर लोक-परलोक की कहानियां सुनते। ग्वाला वैसे तो निरक्षर था। यहां तक कि अपना नाम भी लिखना नहीं जानता था। संस्कृत और संस्कृत-निष्ठ भाषा बोलने का तो प्रश्न ही नहीं। किंतु, न जाने कौन शक्ति उसकी आत्मा में प्रवेश कर जाती कि वह कहानी सुनाते-सुनाते आध्यात्मिक-प्रवचन सुनाने लगता। जिसमें वेद-पुराण और गीता-उपनिषदों के दृष्टांत भी होते। उसके साथी उस के ज्ञान पर आश्चर्य भी करते, किंतु बहुत ही ध्यान से उसे सुनते। कुछ ज्ञान की जिज्ञासा वश तो कुछ चमत्कार की जिज्ञासा के कारण।
गांव भर में वह ग्वाला संत के नाम से मशहूर हो गया। उसके ज्ञान के बारे में जितने मुंह, उतनी ही धारणाएं उत्पन्न हो गई। कोई कहता कि इस पर भूत-प्रेत का साया है, तो कोई कहता कि विशेष स्थिति में किसी संत की आत्मा इसके शरीर में प्रवेश कर जाती हैं। गांव वालों ने उसे पंडितों को दिखाया, तांत्रिकों को दिखाया, ओझा-बूझा को दिखाया, मगर किसी के हाथ कुछ न आया। प्रवचन का सिलसिला बदस्तूर जारी है।
एक दिन की बात है, वह अपने साथियों के साथ पशुओं को लेकर घने जंगल की ओर निकल गया। एक स्थान पर हरी-भरी घास देखकर सभी ने वहीं पशु चराने का फैसला किया और पेड़ों की छांव में सुस्ताने बैठ गए। उसी जंगल में एक वृक्ष के नीचे मिट्टी का एक टीला देखकर संत-ग्वाला उस पर जाकर बैठ गया। प्रवचन सुनने की इच्छा से उसके साथी अपने-अपने स्थान से उठकर उसके आसपास आकर बैठ गए। उन्हें देखकर प्रतिदिन की तरह उस ग्वाले-संत ने नेत्र बंद किए और बोलना शुरू कर दिया। मगर यह क्या! आज रोजाना जैसे तो प्रवचन नहीं! साथी पहले तो हैरान हुए और फिर यह सोचकर कि शायद यह भी प्रवचन का ही हिस्सा है, सभी शांत हो कर सुनने लगे। लेकिन, तब उन्हें हैरानी हुई जब संत ने कहा कि मैं आप लोगों को प्रतिदिन अच्छी-अच्छी कहानी सुनाता हूं, उसके बदले में सभी ग्वाले कर के रूप में मुझे अपनी-अपनी गायों का दूध दिया करेंगे। यह संपूर्ण जंगल और यहां उगने वाली घास पर भी मेरा अधिकार है।
कुछ देर तक अपनी महिमा का बखान कर संत-ग्वाला उस टीले से नीचे उतर आया और फिर अपने साथियों के साथ, पूर्व का सा व्यवहार करने लगा। संत के बदलते स्वरूप को देखकर उसके साथियों की हैरान बढ़ती जा रही थी। रोज की तरह अगले दिन फिर सभी ग्वाले उसी जंगल में पशु चराने गए और कुछ देर के बाद संत-ग्वाला उसी टीले पर जाकर बैठ गया और बैठते ही उसके व्यवहार में परिवर्तन शुरू हो गए। कल उसने जंगल और उसकी घास पर अपना अधिकार जमाया था, आज व दूसरे ग्वालों के पशुओं पर भी अपना हक जमाने लगा। उसी टीले पर बैठ कर एक दिन उसने एक-एक कर अपने साथियों को बुलाया और प्रत्येक के कान में कुछ कहा। परिणामस्वरूप परस्पर मनमुटाव पनपने लगा और दो गुट बन गए। एक गुट संत का साथ देने लगा और दूसरा गुट उसका विरोधी हो गया।
बावजूद इसके उसके साथी इस बात को लेकर हैरान थे कि संत टीले पर बैठकर अगड़म-बगड़म बकता है और टीले से नीचे उतर कर फिर पूर्व जैसा ही सद्-व्यवहार करने लगता है। सभी को प्रेम का पाठ पढ़ाने लगता है, सुख-दुख में एक दूसरे की मदद करने के लिए प्रेरित करने लगता है। साथी सोचने लगे आखिर माजरा क्या है! माजरे की तह तक जाने के लिए सभी ग्वाले गांव के जहीन-बुजुर्ग के पास गए। एक दिन ग्वालों के साथ जंगल जाकर बुजुर्ग ने पूरी स्थिति का जायजा लिया। पहले तो वह भी हैरान हुआ, लेकिन फिर वह इस नतीजे पर पहुंचा कि संत की प्रकृति में कोई विकृति नहीं है। संत की प्रकृति में विकृति पैदा होती, तो टीले से नीचे उतरकर भी वह बरकरार रहती, किंतु ऐसा तो कुछ नहीं है। हो-न-हो इस टीले में ही कुछ करामात है।
बुजुर्ग ने टीले की खुदाई कराने का निर्णय किया। टीले की खुदाई शुरू हो गई। खुदाई के दौरान सबसे पहले कुर्सी-नुमा काले रंग का एक सिंहासन मिला। उसके नीचे आकूत धन दब पड़ा था। धन भी काले ही रंग का था। काले रंग की इस दौलत का रहस्य जानने के लिए पुरातत्व-वेत्ताओं और भूगर्भ-शास्त्रियों को बुलाया गया और उसका अध्ययन शुरू हो गया। अध्ययन से पता चला कि कभी यहां भारत नाम का एक देश हुआ करता था। लोकतंत्र-काल में वहां की शासन व्यवस्था पर नेता नामक जीवों का कब्जा था। उन्हीं नेताओं के सद्कर्मो के कारण पहले लोकतंत्र का खातमा हुआ और धीरे-धीरे पूरा देश ही रसातल में चला गया। उन नेताओं को काला रंग बहुत प्रिय था। अत: वे काले रंग के ही कारनामे करते थे और काला ही धन एकत्रित करते थे। खुदाई में प्राप्त काला सिंहासन और काला धन लोकतंत्र काल के ऐसे ही किसी नेता का रहा होगा।
अधिकारियों ने वाकया अपने राजा को सुनाया। आश्चर्य व्यक्त करते हुए राजा ने सारा धन राजकोष में जमा कराने का आदेश दिया। किंतु राजा के मंत्री इस आदेश से सहमत नहीं थे। उन्होंने खुदाई में प्राप्त सारा धन समुद्र में डुबो देने का सुझाव दिया। राजा ने कारण पूछा, तो मंत्रियों ने कहा कि महाराज यह काला धन है, इसे यदि राजकोष में रखा गया, तो समूची राज-व्यवस्था काली हो जाएगी और भारत की तरह हमारा राज भी रसातल में चला जाएगा। अत: इसे नष्ट करना ही राज हित में होगा। राजा ने मंत्रियों की सलाह पर सारा काला धन समुद्र में फिंकवा दिया। गांव वालों ने राहत की सांस ली। उन्हें उनका संत फिर मिल गया था।
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Tuesday, May 13, 2008

संकट पाने का

समूचा राष्ट्र पानी संकट से ग्रस्त है। कहीं पानी उतरने का संकट है तो कहीं पानी चढ़ने का। कहीं पानी न होने का संकट है तो कहीं पानी-पानी होने का और कहीं-कहीं तो घड़ो पानी डालने के बाद भी पानी-पानी न होना संकट का कारण है।
कल तक जो पानीदार थे, आज बेपानी हो रहे हैं औरों के किए-धरे पर पानी फेर रहें हैं, मगरमच्छी आंसू बहा रहे हैं। हां, पानी जनित भिन्न-भिन्न प्रकार के संकट हैं। चरों तरफ संकट ही संकट है।
हमारे व्याख्यान लपक मुन्नालाल जी बोले, 'भईया! यह तो बताओ, पानी का संकट है या पानी खुद में संकट है अथवा पानी संकट में है?'
सवाल वाजिब था। हमारा चकराना भी लाजिम था। फिर भी हमने साहस जुटाया, लप्पेबाजी की और रहीम दास जी का स्मरण कर बोले-
'रहिमन पानी राखिए बिन पानी सब सून।
पानी गए ऊबरे मोती मानस चून॥'
मुन्नालाल जी ने विपक्षी बाउंसर दागा, 'हमारे सवाल का रहीम के इस दोहे से क्या वास्ता?'
मन ही मन हम बोले, 'लालू स्टाइल में हमने अपना जवाब तो फेंक ही दिया। न सही वास्ता, जवाब तो दे ही दिया। तुक मिले न मिले बोझ तो मरेगा। हमारे बेजा जवाब पर आह तो भरेगा।'
अपना मन नियंत्रित कर हम फिर बोले, 'वास्ता क्यों नहीं है, वास्ता है। रहीम दादा ने इस दोहे में पानी ही का तो संकट बताया है। उनके कहने का मतलब है, भइया! मोती, मानस, चून का जब पानी उतर जाता है तो तीनों ही बेभाव हो जाते हैं, अर्थात महत्वहीन हो जाते हैं। अत: पानी संकट न होने दो।'
मुन्नालाल जी बोले, 'नहीं-नहीं! रहीम तंत्र की मिसाल लोकतंत्र पर न बिठाओ। जमाना बदल गया है, नए जमाने की नई मिसाल बनाओ। लोकतांत्रिक इस युग में पानी उतरे चेहरे ही महान होते हैं। भावशून्य ही भाव वाले होते हैं।'
'अरे, पानी चढ़ा चेहरा नकली कहलाएगा। शुष्क होगा तो असली माल में बिक जाएगा। अत: इस युग में मानस वे ही उबरते हैं, जिनके चेहरे पानी-विहीन होते हैं। जिसके चेहरे पर पानी ठहर गया, धोबी के कुत्ते की तरह वह घर-घाट दोनों से गया। पानी उतरा चेहरा ही मोती कहलाएगा, सूखे चून को भी पचा जाएगा।'
रहीम और हमारे ऊपर एक ही छोर से बाउंसर दागते हुए मुन्नालाल जी आगे बोले, 'जिसकी आंख में पानी होगा, वही निर्बल कहलाएगा। जिसकी आंखों का पानी सूखा वह सबल हो जाएगा। जिसकी आंख में पानी होगा, बात-बात पर आठ-आठ आंसू रोएगा। तरक्की के मार्ग
को कीचड़-कीचड़ करेगा। किस्मत तरक्की के दरवाजे खोलेगी और पानी वाली आंखें शर्मसार होंगी, वक्त-बेवक्त पानी-पानी होंगी। खुले दरवाजे बंद हो जाएंगे। तरक्की के मार्ग अवरुद्ध हो जाएंगे।'
मुन्नालाल जी का प्रवचन हमारे सिर के ऊपर से उतर गया। मानो यूपीए की भैंस के साथ भैंसा पानी में उतर गया। सिर के ऊपर से पानी उतरता देख, हमने पूछा, 'जब पानी ही संकट है, फिर पानी-पानी का शोर कैसा?'
मुन्ना भाई बोले, 'जहां झील होती है पानी वहीं मरता है। पानी भरेगा तो झील वासी पानी-पानी ही चिल्लाएंगे। अपनी झील से पानी उलीच दूसरों के सिर पर गिराएंगे। पानी यहां भी संकट है, पानी वहां भी संकट है। अत: कोई अपनी झील में पानी नहीं चाहता। पानी उसकी झील में हो, मगर कमल मेरी झील में खिले। संतान उसके घर पैदा हो, मगर बधाई मुझे मिले। चिकने घड़े बनोगे, पानीदार कहलाओगे। पानी की परवाह करोगे तो उसी में डूब जाओगे। कुआं खोद कर पानी पीना मूर्खता कहलाता है, घाट-घाट का पानी पी कर मानस बुद्धिजीवी बन जाता है।'
'मुन्नाभाई! बात तुम्हारी सवा सोलह आने उचित है, अब तो पानी को ही संकट कहना उचित है।'
'नहीं, नहीं! न पानी संकट है, न पानी का संकट है। बस पाने का संकट है। पाना है, बस पाना है। आंखों में पानी भर कर पाना है, आंखों का पानी मार कर पाना है, चेहरों का पानी उतार कर पाना है। पानी-पानी होकर पाना है, चिकने घड़े होकर पाना है। निर्जल होकर पाना है, निर्लज्जा होकर पाना है। बस पाना है।'
संपर्क- 9717095225