Friday, May 23, 2014

नैकिता के मायने



                    डॉक्टर वात्स्यायन से महर्षि अरविन्द-दर्शन पर टिप्स लेने के लिए मेरठ आया था। 'अरविन्द-दर्शन में मानववाद' मेरे शोध-प्रबन्ध का विषय था। विचार कुछ बदला, सोचा पहले कुछ समय कॉलेज की लाइब्रेरी में ही बैठकर अरविन्द दर्शन पर नोट ले लिए जाएं और मैं लाइब्रेरी की ओर मुड़ गया। कॉलेज लाइब्रेरी वृत्ताकार एक हॉल में थी और उसके एक हिस्से में अ‌र्द्धवृत्ताकार बैल्कनि स्थित थी। जिसमें शोधछात्रों के लिए अध्ययन की विशेष व्यवस्था थी। मैं बैल्कनि में जाकर बैठा ही था कि मेरी नजर सुनीता पर पड़ी। सुनीता वहाँ पहले ही से बैठी थी। उसका चेहरा मुझे कुछ-कुछ उदास-सा लगा। वह शंकर-भाष्य-ब्रह्मंसूत्र के पन्ने कुछ इस प्रकार उलट-पलट रही थी, मानो कहीं कुछ खो गया है और उसे ब्रह्मंसूत्र के पन्नों में खोज रही है। मन उदास होने के कारण उसका ध्यान ब्रह्मंसूत्र-अध्ययन में नहीं था। शंकराचार्य का दर्शन उसके शोध प्रबन्ध का विषय था। मैं उसके पास गया और उसका मन उदासी के आवरण से मुक्त करने के उद्देश्य से हलकी-सी चुटकी ली, ''ओ ऐऽऽऽ! ..ये दीपावली के बुझे दिए का सा चेहरा क्यों बना रखा है?''
  सुनीता मेरी तरफ कुछ इस अन्दाज में घूरी, मानो भगवान शिव कामदेव को भस्म करने के लिए उस पर दृष्टिंपात कर रहे हों। उसी तेवर में वह बोली, ''कुछ पता है..!'' आधे-अधूरे इस वाक्य के साथ ही उसकी आँखें नम हो गई।
  ''अरे, कुछ हुआ भी..! बताओ तो सही..!'' नम आँखें और 'कुछ पता है' का अनुभव कर मेरा मन विभिन्न शंका-आशंकाओं से घिर गया था।
  उसने अपने आप को थोड़ा संयत किया और साहस-सा बटोर कर बोली, ''शोभा! ..लौट आई है..!''
  ''शोभा लौट आई है..!''  मैने आश्चर्य व्यक्त करते हुए आगे कहा, '' एक महीने की छुट्टी बिताकर चार-पाँच दिन पहले ही तो बनारस गई थी!''
  ''हाँ!'' उसने कहा।
  ''क्यों?'' मैने पूछा।
  ''बता न पाऊंगी! ..उसी से पूछ लेना! उसके घर हो आना..! उसे कुछ..!''
  ''तुम भी चलो।''
  ''नहीं, मैं वहीं से आ रही हूँ!'' फिर उसने हिदायत देते हुए कहा, ''देखो! वह बेचारी बहुत परेशान है। ..उसके चेहरे को बुझा..!'' आँखों से नमी बाहर आ गई थी।
  ''ठीक है..!'' स्थिति की भयावहता का अनुमान कर मैं तुरन्त ही शोभा के घर की ओर रवाना हो गया था।
              शोभा, सुनीता और मैने एक साथ ही दर्शनशास्त्र में एमए किया था। शोभा यूनिवर्सिटी की गोल्ड मेडलिस्ट थी। एमए करने के बाद मै विभागाध्यक्ष डॉ. वात्स्यायन के निर्देशन में शोध कार्य करने लगा था। डॉ. वात्स्यायन ने ही डॉ. दिनेश के निर्देशन में शोभा का रजिस्ट्रशन बनारस करा दिया था। और, सुनीता कॉलेज के ही प्रोफेसर डॉ. गर्ग के निर्देशन में शोध कार्य करने लगी थी। जिस समय मैं शोभा के घर पहुँचा वह उदास मन लिए वीणा के तार सहला रही थी। मुझे देखकर उसने निगाह वीणा से हटाकर मेरी ओर की और इस के साथ ही पलकों में छिपी ओस की सी दो बूँदें उसके गाल गीले कर गई। तभी उसकी माँ चाय के बहाने मुझे अलग कमरे में ले गई। वीणा के तार पुन: झनझना ने लगे थे। 
  चाय का कप मेरे हाथ में थमाने के बाद शोभा की माँ कहने लगीं, ''बेटा! तुम्हीं इसे समझाओ! ..जो कुछ हुआ उसे भूल जाए! ..रास्ते तो और भी बहुत हैं..!'' वह इतना कहकर कमरे से बाहर चली गई। सम्भवतया नेत्रों के रास्ते बहती भावनाओं पर नियंत्रण करने के उद्देश्य से।
  एक क्षण के बाद ही वे फिर लौट आई और मैने पूछ लिया, ''आखिर हुआ क्या? मम्मी..!'' हम सभी शोभा की माँ को मम्मी कह कर सम्बोधित करते थे। उन्होंने जो दु:खद वृतान्त बताया उसके अनुसार डॉ. दिनेश ने धीरे-धीरे शोभा के साथ आत्मीय सम्बन्ध स्थापित करने शुरू कर दिए थे। यूनिवर्सिटी के स्थान पर उसे वे अपने निवास पर बुलाने लगे और फिर एक दिन डॉ. दिनेश ने शोभा के सामने पुत्र के साथ शादी का प्रस्ताव रख दिया। शोभ ने प्रस्ताव ठुकरा दिया तो डॉ. दिनेश तरह-तरह से परेशान कर उस पर दबाव बनाने लगे।
  वृतान्त सुनने के बाद मैने पूछा, ''मगर इसमें परेशान होने की क्या बात थी! ..डॉ. दिनेश प्रतिष्ठित व्यक्ति हैं। घर-बाहर भी अच्छा ही होगा, फिर शोभा की शादी तो करनी ही है!''
  आँखों में छलकते आँसू पोंछ कर वे केवल इतना ही बोली, ''लड़का हॉफ मैड था..!''
  लड़के की मानसिक स्थिति सुनकर मेरा तन सिहर उठा और अनैच्छिक क्रिया के समान मेरे मुँह से निकला, ''अफ़्सोस! ..निहित स्वार्थ के लिए होनहार एक लड़की के भविष्य पर प्रश्न चिह्नं!'' इसके बाद शोभा के पास जाने के लिए मेरे पास हिम्मत शेष नहीं थी। हालाँकि उसकी माँ ने कह था कि बेटा तुम भी शोभा को समझाने का प्रयास करो।
  ''अभी उसका मन ठीक नहीं है! कल आऊंगा!'' बहाना बनाकर मैं उसके घर से निकल कर सड़क पर आ गया था।
  डॉ. दिनेश नीतिशास्त्र व तर्कशास्त्र के ख्याति प्राप्त व्याख्याता थे। नैतिकता विषय पर उनके व्याख्यान मैं सुन चुका था। डॉ. दिनेश के नैतिक प्रवचन और शोभा के प्रति स्वार्थपूर्ण व्यवहार की तुलनात्मक समीक्षा करते हुए मैं डॉ. वात्स्यायन के बंगले की और जा रहा था। अब डॉ. वत्स्यायन से अरविन्द-दर्शन टिप्स लेना मेरा उद्देश्य नहीं था। विचार-विमर्श का विषय अब शोभा के साथ डॉ. दिनेश का अमानवीय व्यवहार था। डॉ. वात्स्यायन ही ने शोभा का परिचय डॉ. दिनेश से कराया था।
                 दोपहर के लगभग 12 बजे होंगे। धूप धीरे-धीरे तेज होने लगी थी। मैं 'वात्स्यायन निवास' की लॉबी  में बैठा उनका इन्तजार कर रहा था। पहली मीटिंग के दौरान उन्होंने अवश्य ही ड्राइंग रूम में बैठा कर मुझे कृतार्थ किया था और जिसे मैने अपना सौभाग्य मान था। हैड आफॅ दा डिपार्टमेंट के बंगले के एसी ड्राइंगरूम में बैठनामेरे जैसे व्यक्ति के लिए सौभाग्य का विषय होना स्वाभाविक ही था। थोड़ी देर के इन्तजार के बाद उनका घरेलू नौकर डॉ. वात्स्यायन के बाहर आने का संदेश लेकर आया और संदेश देने के साथ ही लॉबी के पंखें का स्विच भी ऑन कर गया। एक क्षण के उपरान्त सिल्क का कुर्ता सफेद पायजामा और पाँव में सफेद रंग के ही स्लीपर पहने डॉ. वात्स्यायन  बाहर आए। अभिवादन के आदान-प्रदान के साथ ही भूजल स्रोत के समान मन की पीड़ा उनके समक्ष फूटने लगी, ''सर! पता है, शोभा के साथ क्या हुआ!''
  ''क्या हुआ?'' डॉ. वात्स्यायन ने आश्चर्य के साथ पूछा।
  ''सर! डॉ. दिनेश ने अपने लड़के के साथ शादी करने के लिए उस पर दबाव डाला था!''
  ''तो क्या हुआ! शादी कर लेनी चाहिए थी!''
  ''सर! वह पागल है!''
  ''तो क्या हुआ! ..इलाज तो चल रहा था। कल ठीक भी हो जाता। शादी के बाद तो वैसे भी ठीक हो जाना था!'' इतना कहकर डॉ. वात्स्यायन के मुखमंडल पर एक कुटिल मुस्कान व्याप्त हो गई थी। और उसके बाद मुस्कराते हुए पुन: बोले, ''..और, इतनी-सी बात पर वह डॉक्टर साहब का अपमान कर चली आई!'' अब मुझे पता चला कि डॉ. वात्स्यायन इस घटना से अनभिज्ञ नहीं थे। शायद मेरे मन की बात लेने के लिए ही वे अनजान बने हुए थे।
   ''सर! डॉ. दिनेश जैसे विद्वान व्यक्ति से ऐसे अनैतिक व्यवहार की आशा नहीं थी!''
  ''क्या होता है, नैतिक-अनैतिक?'' डॉ. वात्स्यायन ने बडे़ ही सहज अन्दाज से प्रश्न मेरे सामने फैंक-सा दिया था। 
  संवेदनहीन उनके व्यवहार का अनुभव कर मेरे चेहरे पर जुगुप्सा-भाव उतर आए थे। और, मेरे मुख से अचानक ही टीस भरी 'ओह!' निकल गई थी। उसके बाद आश्चर्य से मैं उनका मुँह ताकने लगा था।
  डॉ. वात्स्यायन ने सम्भवतया मेरे चेहरे पर उतर आए जुगुप्सा के भावों को नजर-अन्दाज कर दिया था और पूर्व भाव से ही उन्होंने कहना जारी रखा, ''..तुम्हारे लिए जो अनैतिक है, वही कृत्य नैतिकता की मेरी कसौटी पर खरा उतर सकता है! नैतिक और अनैतिक के बीच बस झीनी-सी अर्थहीन एक रेखा ही तो है!''
   नैतिक और अनैतिक के बीच की रेखा को अर्थहीन बता कर डॉ. वात्स्यायन मुस्करा दिए और होठों पर उसी कुटिलता को कायम रखते हुए बोले,  ''..नैतिक-ता! नीतिशास्त्र के पन्नों में ही खूबसूरत लगती है। पढ़ने-पढ़ाने तक तो ठीक है, जीवन में उतारने के लिए नहीं होती।'' ..नीति वाक्य सुना कर डा. शर्मा पुन: मुस्करा दिये थे। ..एक कुटिल मुस्कान!
  ..शोभा की पीड़ा विचारों के घने जंगल में कहीं गुम-सी हो गई थी और मैं नैतिकता के नए मायनो के साथ अब भविष्य की अंधेरी गलियों में विचरण करने लगा था। ..उनके नीति वाक्य और विषाक्त मुस्कान ने मेरा अन्तरमन घायल कर दिया था। मैं घायल किसी परिंदे की तरह बस तड़प  कर रह गया। ..बहेलिये के जाल में फँसे पँछी की गति और हो भी क्या सकती थी!
  डॉ. वात्स्यायन के निर्देशन में शोध कार्य करते हुए दूसरा वर्ष शुरू हो गया था। मगर इस तरह का व्यवहार पहले कभी नहीं दिखालाई दिया था। जब कभी दोस्तों के बीच डॉ. वात्स्यायन का जिक्र चलता तो दोस्त इतना जरूर कहते, ''यार, तेरा गाइड लालची-सा लगता है।'' मगर श्रद्धा व भक्ति के पाग में पगा मैं डॉ. वात्स्यायन को कभी खुली आँख से देखने का विचार भी मन में न ला सका। लेकिन उस दिन डॉ. वात्स्यायन ने ही आंखों पर बंधी श्रद्धा-भक्ति की पट्टंी तार-तार करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। लगा कि जैसे भाषण पिलाने के लिए वे पहले ही से तैयार बैठे थे। ''..सुनो, मेरे साथ काम करते-करते तुम्हें दो साल तो हो गए हैं, है ना।''
 स्वीकारोक्ति में मैंने आज्ञाकारी किसी शिष्य की तरह बस गरदन हिला दी थी।
  ''..इन दो साल के अन्दर तुम्हारे आचरण में एक बार भी व्यवहारिकता नजर नहीं आई।'' चिकनी चांद से पसीने पौंछते-पौंछते डॉ. वात्स्यायन बोले।
 ''..जानते हो तुम्हारे डॉ. गर्ग ने भी मेरे अंडर में ही डाक्ट्रेट की है।''
 ''जी, सर!''
 ''..गर्ग मेरे बच्चों को पढ़ाया करता था। जब कभी जरूरत पड़ती थी तो दूध-सब्जी भी ला दिया करता था। तुम्हारे साथ विनायक भी मेरे ही अंडर रिसर्च कर रहा है, ना!'' विनायक का जिक्र करते हुए उनके चेहरे पर कृतज्ञता के कृत्रिम भाव उतर आए थे। स्वार्थ से प्रेरित व्यक्ति क्या कभी किसी के प्रति यथार्थ में कृतज्ञ होता होगा, मुझे असम्भव-सा लगा।
 पूर्व भाव चेहरे पर चिपकाए हुए उन्होंने आगे कहा, ''..जानते हो! कितनी सेवा करता है, विनायक। बहुत व्यवहारिक लड़का है। ..और तुम..?''
  मैंने अपने आप को संभाला और बोलने की हिम्मत जुटाई।  ''सर, मेरी निष्ठ में कहीं कुछ कमी रह गई क्या? सेवा के लिए मैं हमेशा तैयार रहता हूँ। ..मैं समझ नहीं पा रहा हूँ , सर! ..श्रद्धा, सम्मान में मुझ से कहाँ चूक हुई?'' मैं लगभग गिड़गिड़ाने के स्थिति में सफाई दे रहा था।
  इसी बीच नौकर एक गिलास शीतल पेय लाया। डॉ.वात्स्यायन ने ट्रे से गिलास उठाया और घूँट-घूँट अपनी प्यास बुझाने लगे। मारे गरमी के प्यास मुझे भी सता रही थी और उनके प्रत्येक घूँट के साथ मैं अपने सूखे होंठों पर जीभ फेर कर प्यास बुझाने की चेष्टा कर रहा था। घँूट भरते-भरते डॉ. वात्स्यायन ने आगे कहा, ''..एमरजेंसी के चक्कर में मैं एक हफ्ता जेल में रहा, तुम एक दिन भी मुझ से मिलने आए? ..नहीं ना! ..विनायक रोज आता था।''
 ''जी, सर! गलती हो गई।'' बोलने की हिम्मत तो जुटाई, मगर हिम्मत में आत्मविश्वास नहीं था। मैं बता नहीं पाया कि उस दौरान मैं जब-जब आपके बंगले पर आया मुझे बाहर से बाहर ही लौटा दिया गया। मुझ से यह भी नहीं पूछा गया कि मैं क्यों और किस लिए आया हूँ।
  ''गलती नहीं..!'' इतना कहकर उन्होंने अपनी दृष्टिं मेरे चेहरे पर केन्द्रित की। सम्भवतया चेहरे पर उतरते-चढ़ते भाव पढ़ने की मंशा से। अगले ही क्षण बोले, ''..थोड़ा व्यावहारिक बनो। व्यावहारिक नहीं हो इसलिए ही बार-बार गलती करते हो।''
 क्षणिक विचार करने के उपरान्त डॉ. वात्स्यायन आगे बोले, ''..अच्छा सुनो, जिला कांग्रेस अध्यक्ष तुम्हारे रिश्तेदार हैं, ना। उनसे कह कर मेरे मामले खत्म कराओ।''
 ''जी, सर।'' गरदन झुकाए-झुकाए मैंने कहा।
 डॉ. वात्स्यायन फिर बोले, ''तुम्हारे यहाँ तो खेती होती है? गेंहू भी होते होंगे! मेरे यहां साल भर में पाँच बोरी गेंहू लगता है। ..देखो, चमचागीरी का जमाना है। कामयाब होना है, तो कुछ सीखो जमाने से।''
  डॉ. वात्स्यायन के ताने और तानों के सहारे मंशा व्यक्त करने का तरीका देख-सुन अब मेरा धैर्य और श्रद्धा दोनों ही चूर-चूर होने लगी थे। शीशे की तरह चूर-चूर होते विश्वास के बीच से मेरे अन्तरमन से अनायास ही आवाज निकली,  ''सर, चमचागीरी करना मेरे बस की बात नहीं है। श्रद्धा-भक्ति में कमी नहीं आएगी।''
  ''श्रद्धा-भक्ति और चमचागीरी में अन्तर क्या है? बस शब्द ही तो अलग-अलग हैं।'' डॉ. वात्स्यायन ने अपना पक्ष रखते हुए कहा।
साहस और आत्मविश्वास दोनों ही अब मेरे डरपोक मन पर काबिज हो गए थे और अब डर नहीं वे ही दोनों मेरी जिह्वा पर बैठे थे।
मेरे मुँह से निकला, ''चमचागीरी में नैतिकता नहीं होती, इसलिए चमचागीरी करने वाले कभी भी निष्ठवान नहीं हो सकते।''
 डॉ. वात्स्यायन आश्चर्य भाव से बोले, ''नैतिक-ता..! चमचागीरी नहीं करोगे तो जिंदगी में कभी कामयाब नहीं हो पाओगे।'' कहते-कहते डॉ. वात्स्यायन घर के अन्दर चले गए।
मैं, बंगले की लॉबी में खड़ा पसीना पोंछता रह गया। पैर लड़खड़ाने लगे। मुझे अहसास हुआ कि मन पर काबिज साहस और आत्मविश्वास एक अस्थाई भाव था, मियादी बुखार की तरह जो धीरे-धीरे अब स्वयं ही उतरने लगा था। किंकर्तव्य विमूढ़-सा, लड़खड़ाते पैरों से मैं बंगले के बाहर आया। ..दिशा विहीन-सा हो गया था। तैय नहीं कर पा रहा था, किधर जाना है। तभी पास से एक रिक्शा गुजरी। रोकने का इशारा करने के लिए जैसे हाथ स्वयं ही उठ गया और मैं रिक्शा पर सवार हो गया। रिक्शा वाले ने भी मंजिल का पता पूछे बिना ही पैडल घुमाने शुरू कर दिए। आगे तिराहा था, जहां उसने पूछा, ''किधर जाना है, बाउजी?''
अनायास ही मुँह से निकल, ''मेरठ कॉलेज'' और रिक्शा वाले ने रिक्शा का रुख कॉलेज की तरफ मोड़ दिया।
 जब-जब मन उदास होता था, तब-तब मुझे कॉलेज लाइब्रेरी का शान्त वातावरण अच्छा लगता था। शैल्फ से निकाल कर एक-दो पुस्तके पलटने का प्रयास किया मगर मन नहीं लगा। मन तो अतीत के वे काले पन्ने पलट रहा था। डॉ. वात्स्यायन ने जिन पर अपने बंगले पर आकर भेंट करने का आमंत्रण छाप दिया था।
        एम. ए. फाइनल परीक्षा का परिणाम आया था, उस दिन। डॉ. वात्स्यायन सहित तीनों प्रोफेसरों ने उज्ज्वल भविष्य के लिए छात्रों को अपने-अपने तरीके से शुभकामनाएं दी थी। डॉ. वात्स्यायन ने शुभकामना देते हुए मुझ से कहा था, ''आगे क्या करने का इरादा है?''
 झिझकते हुए मैंने कहा था, ''अभी सोचा नहीं सर।''
  ''अभी सोचा नहीं..!'' आश्चर्य व्यक्त करते हुए डॉ. वात्स्यायन मुस्करा दिए थे और फिर बोले, ''अरे, कैसे लड़के हो! एमए कर लिया और भविष्य के बारे में सोचा नहीं! ठीक है, कल सुबह मुझ से घर पर मिलना।''
  मैंने फिर उसी लहजे में कहा था, ''जी सर! ..सर आपका घर..?''
  डॉ. शर्मा ने पुन: आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा, ''अपने हैड आफ दा डिपार्टमेंट का घर नहीं जानते!'' और, इसके साथ उन्होंने जेब से विजीटिंग कार्ड निकाल कर मेरी तरफ बढ़ा दिया था।
  मेरे लिए वह रंग-बिरंगे चंद अक्षरों से सुसज्जिात केवल विजीटिंग कार्ड ही नहीं था, गुरु का पर्ंम आशीर्वाद था। कल की सुबह के इन्तजार में उस दिन रात भर सोया नहीं था, मैं। रात के बाद उस दिन भी सुबह अपने वक्त पर ही आई थी, मगर मुझे लगा था आज की रात कुछ लंबी हो गई है या सुबह ने ही आने में देर कर दी है।
  बहरहाल सुबह हुई और फटाफट तैयार हो कर डॉ. वात्स्यायन के चरणों में मिष्ठान अर्पित करने के उद्देश्य से मैं उनके बंगले पर था। उन्होंने मुस्करा कर मेरा स्वागत किया था। श्रद्धा को चमचागीरी का पर्यायवाची बताने के समय भी वह मुस्कराए थे। मगर दोनों में जमीन-आसमान का अन्तर था। पहले दिन की मुस्कराहट में स्वागत भाव था, सौम्यता थी और अपनत्व था। दूसरी मुस्कराहट में कुटिलता थी।
  मेरे शुभचिंतक कहते थे, ''तू पहचान नहीं पाया, कुटिलता पहले दिन की मुस्कराहट में भी रही होगी। सौम्यता की चादर तो उठा कर देखता, असलियत नजर आ जाती। मोटे-मोटे होठों के बीच से प्रत्येक अवसर पर निकली उसकी मुस्कराहट कुटिलता लिए ही होती है।''
  डॉ. वात्स्यायन ने उस दिन चाय भी पेश की थी, शायद पहली और अंतिम बार। चाय की चुस्कियों के बीच ही उन्होंने फिर वही सवाल दोहराया था, ''भविष्य के बारे में क्या सोचा है।''
 ''सर अभी तो कुछ सोचा नहीं।''
  ''खैर, कोई बात नहीं! ..अच्छा यह बताओ पीएचडी करोगे?'' मेरे चेहरे पर उतरते-चढ़ते भावों का आकलन करने के उपरान्त डॉ. वात्स्यायन बोले, ''तुम में काबलियत है, करलोगे।''
हैड आफ दॉ डिपार्टमेंट के मुंह से पीएचडी का आफर, किसी भी विद्यार्थी के लिए इससे बड़ा सौभाग्य और क्या हो सकता है।
जिस तरह नवजात परिंदा कोमल पंख उगते ही नीड़ त्याग आसमान की गहराई नापने की चेष्ठा करने लगता है। कुछ वैसी ही स्थिति मेरे भी थी। कार्ड पाते ही मुझे लगा कि मेरे शरीर में पँख उग आए हैं और आसमान की ऊँचाई छूने का ख़्वाब बस अब हकीकत में तब्दील होने जा रहा है। 
           पहली मुलाकात के पन्द्रह दिन बाद पुन: भेंट करना निश्चित हुआ था। उस मीटिंग में पाश्चात्य दर्शन से सम्बद्ध हिन्द-अंग्रेजी की कुछ पुस्तकें पकड़ा दी गई और साथ में दो पन्नों की एक रूपरेखा। मुझ से कहा गया कि 'समकालीन पाश्चात्य दर्शन' नाम की पुस्तक के कुछ अध्याय लिखने हैं। इससे तुम्हें शोध प्रबन्ध लिखने में मदद मिलेगी। पुस्तक के लेखक के रूप में अपने साथ तुम्हारा नाम भी दूँगा।
            मैं खुश था, डॉ. वात्स्यायन जैसी शख़्िसयत ने मुझे सेवा का अवसर प्रदान किया। गुरु का प्रसाद पाकर मैं खुशी-खुशी घर लौट आया। और, पुस्तक लिखने में जुट गया। पुस्तक का अध्याय लिख कर पूरा करता। डॉ. वात्स्यायन को दिखलाता कुछ संशोधन और प्रशंसा के साथ घर लौट आता। इस प्रकार धीरे-धीरे एक वर्ष गुजर गया।
 पुस्तक के सभी अध्याय पूरे होने के बाद एक दिन डॉ. वात्स्यायन ने मुझे मेरे शोध प्रबन्ध के विषय से सम्बन्धित चार पन्नों की एक सिनॉपसिस मेरे हाथ में पकड़ा दी और उसके आधार पर शोध प्रबन्ध लिखने के लिए कहा। मैं पहले से ज़्यादा प्रसन्न था। लेकिन प्रसन्नता का यह भाव ज़्यादा दिन न टिक सका। क्योंकि डॉ. वात्स्यायन शनै: शनै: अपने मूल कुटिल स्वरूप में आने लगे थे। आज भी जब कभी वह दिन याद करता हूँ तो सिहर उठता हूँ, जिस दिन डॉ. वात्स्यायन को मैं अपने शोध प्रबन्ध का पहला चैप्टर दिखलाने गया था। डॉ. वात्स्यायन ने मेरे चैप्टर पर सरसरी नजर डालकर मुझे इस प्रकार घूरना शुरू किया था, मानो कोई बड़ा अपराध कर बैठा हूँ। वे बोले थे, ''तुम अंग्रेजी तो जानते ही नहीं, हिन्दी भी ठीक तरह नहीं जानते! ..यह भी कोई लिखने का तरीका है!'' इतना कहकर उन्होंने सभी पन्ने घायल कबूतर के पँख की तरह उड़ा दिए थे। संतप्त मन से मैं सोच रहा था- डॉ. वात्स्यायन की पुस्तक पूरी करते ही मेरी योग्यता कहीं खो गई अथवा उनका व्यवहार परिवर्तित हो गया।
   एक ओर श्रद्धा, निष्ठा और सेवा और दूसरी ओर मनोबल ह्रंास की प्रक्रिया से गुजरते-गुजरते तीन वर्ष पूरे होने जा रहे थे। एक दिन डॉ. वात्स्यायन ने खुलकर कह ही दिया, ''देखो! आप कोई टयूशन फीस तो मुझे देते नहीं हो और न ही शोध कराने के लिए हमें यूनिवर्सिटी कुछ पे करती है! ..फिर फिजूल तुम्हारे साथ मेहनत क्यों की जाए!'' क्षणिक अन्तराल के बाद डॉ. वात्स्यायन ने बहुत ही आत्मविश्वास के साथ कहा था, ''देखा! तुम्हारे लिए थीसिस लगभग तैयार पड़ी है। तुम्हें उसके लिए ज़्यादा मेहनत नहीं करनी पड़गी। आरडीसी की आगामी मीटिंग के लिए थीसिस सॅबमिट करा दूँगा। ..उसके लिए तुम्हें केवल बीस हजार रुपए देने होंगे!'' उस समय हमारे जैसे मध्यवर्गीय परिवार के लिए बीस हजार रुपए बहुत बड़ी रकम होती थी।
  मुझे प्रतीत हुआ कि निष्ठा, श्रद्धा और सेवा पर स्वार्थ भारी पड़ता जा रहा है। मगर, मांगी गई रकम का प्रबन्ध करना मेरी मजबूरी थी, क्योंकि जीवन के बहुमूल्य तीन वर्ष व्यर्थ ही मुझे मेरे हाथों से फिसलते नजर आ रहे थे। यही सोचकर मैं रुपयों का प्रबन्ध करने का ताना-बाना बुनता घर की ओर लौट रहा था। घर पहुँचा तो माँ ने मेरे हाथ में एक पत्र थमा दिया था। पत्र यूनिवर्सिटी से आया था। जिसमें लिखा था, ''आपके गाइड डॉ. वात्स्यायन की सलाह पर आपका रजिस्ट्रेशन रद्द किया जाता है।'' कभी मैं पत्र को देखता था, तो कभी आसमान की गहराइयों को। मुझे लगा कि जैसे आकाश की गहराई नापते हुए पंछी के पर कतर दिए गए हैं और फड़फड़ाता हुआ वह जमीन पर आ गिर है।
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Monday, September 16, 2013

मातमपुर्सी



                स्नेहिल नेत्रों से मैं  दीवार पर टंगे चित्र को निहार रहा हूँ। चित्र मेरी माँ का है। माँ थी! ..ऐसा ही कह रहे हैं, सभी लोग-माँ थी..! मेरा हृदय यह स्वीकारने के लिए तैयार नहीं है। भला माँ 'थी' कैसे हो सकती है! माँ तो माँ है, कल भी वह माँ थी आज भी माँ ही है। न जाने लोग क्यों, माँ को भी अतीत और वर्तमान के पैमाने से नापने लगते हैं? माँ ने शरीर-त्याग किया और वह वर्तमान से अतीत हो गई! ..'है' से 'थी' हो गई, आश्चर्य! ऐसा कैसे हो सकता है? ..माँ कोई शरीर तो नहीं। यदि माँ शरीर ही है, फिर शरीर तो कहीं नहीं गया था? शरीर तो हमारे सामने ही था। हम ही ने तो पँचभूत में विलीन किया था, उसे। ..क्यों किया था? माँ यदि शरीर है, तो फिर अपने ही हाथों हमने माँ को क्यों मार डाला? क्यों! ..हमने स्वयं ही कालातीत माँ को 'है' से 'थी' में परिवर्तित कर दिया? ..काल का सम्बन्ध उम्र से है और माँ की कोई उम्र नहीं होती। उम्र शरीर को होती है, इसलिए शरीर ही काल-सापेक्ष है, माँ नहीं! ..नहीं-नहीं! माँ शरीर नहीं, वह  तो एक अनुभूति है। अनुभूति का काल से क्या सम्बन्ध? अनुभति तो प्रत्येक काल में वर्तमान रहती है। ..हाँ! ..माँ शरीर नहीं है। शरीर तो केवल उनके लिए ही अनुभूति का आलम्बन हो सकता है, जिन्होंने माँ के यथार्थ-दर्शन नहीं किए।
           चित्र मुस्करा रहा है और मैं चित्र-दर्शन में तल्लीन हूँ। अपनी अनुभूति में गहरे डूबता जा रहा हूँ। ..कृष्ण भी तो यही कहते हैं-आत्मा अमर है, शरीर नश्वर। फिर माँ 'है' से 'थी' कैसे हो सकती है? शरीर त्याग के उपरान्त यदि माँ 'थी' हो गई तो क्या अब उससे रिश्ता बदल गए। अब वह माँ नहीं कुछ और हो गई अथवा कुछ भी नहीं रही? क्या वह पूर्व हो गई और वर्तमान में किसी अन्य शरीर के साथ माँ का रिश्ता जुड़ गया? ..नहीं-नहीं! कतई नहीं! आज माँ सपनों में आती है। रूई के फोया-सी नर्म हथेलियों से स्नेहिल थपकी देकर सुलाती है। कभी-कभी घृणा विहीन डाट की घुट्टी पिलाती है। कभी कभी कान पकड़कर सीधी राह दिखलाती है। वही सब कुछ तो करती है, जैसा कि शरीर त्याग से पूर्व जाग्रत अवस्था में करती थी। फिर कैसे मान लू ..! हाँ, अवस्थाओं के भेद के अलावा जाग्रत और स्वप्नावस्था में अन्तर भी क्या है! स्वप्नावस्था में भी तो वैसे ही सभी क्रिया-कलाप सम्पन्न होते हैं, जैसे और जो जाग्रत-अवस्था में सम्पन्न होते हैं। फिर किस आधार पर यह स्वीकार कर लूँ कि जाग्रत-अवस्था ही सत्य है और स्वप्न मिथ्या! ..नहीं! यदि जाग्रत-अवस्था सत्य है तो स्वप्नावस्था भी सत्य है। दोनों के अपने-अपने संसार हैं। माँ है, आज भी है। बस, जर्जर शरीर का त्याग कर वह अनन्त में लीन हो गई है। ज्योति, ज्योति-पुँज में लीन हो गई है! किन्तु शरीर के समान अस्तित्वहीन तो नहीं हुई है। सीमित अस्तित्व का त्याग कर उसने विराट अस्तीत्व  ग्रहण कर लिया है। न जाने क्यों लोग कह रहे हैं- माँ 'है' नहीं, 'थी'!  यह तो उनका भ्रम मात्र है! ..माँ तो कल भी अनुभूत थी, आज भी अनुभूत है।
          आज माँ की तेरहवीं है, अर्थात ब्रह्मभोज। घर के बाहर मातमपुर्सी के लिए आगन्तुकों की चहलकदमी बढ़ने लगी है। आहट से मेरा ध्यान भंग हो गया है। माँ के चित्र पर से दृष्टिं हट गई है। परिवार वालों ने आज ही शोकसभा का भी आयोजन किया है। मालूम नहीं शोक किसलिए और किसके लिए! मैं शोक का औचित्य समझ नहीं पा रहा हूँ! माँ तो कल भी थी आज भी है। क्या शोक उस शरीर के लिए जिसका त्याग कर माँ विराट में समा गई? यदि शरीर के लिए शोक तो फिर क्यों आपने ही हाथों से उसे पँचतत्व में विलीन कर दिया? ..सहेज कर क्यों नहीं रख लिया? शोक केवल इसलिए कि शरीर त्याग को जीवन-समाप्ति के रूप में स्वीकार कर मृतक के प्रति संवेदना व्यक्त करने की परम्परा है! प्रश्नों की इस श्रृंखला में एक प्रश्न यह भी है कि यदि माँ के प्रति संवेदना व्यक्त करने का प्रदर्शन आवश्यक ही था तो फिर तेरह दिन पूर्ण होने पर ही तेरहवीं क्यों नहीं? क्यों सात दिन पूर्ण होने पर ही तेरहवीं की औपचारिकता पूर्ण करने फैसला ले लिया? तेरहवीं कितने दिन पर की जाए, परिवार में इस विषय पर अच्छी-खासी चर्चा हुई थी। शायद इसलिए कि तेरह दिन तक शोक का नाटक करते रहना परिवार के लिए असहनीय था। पुरोहित ने जब बताया कि तेरह दिन पर तेहरवीं पुरुषों की होती है। महिलाओं के लिए शोककाल केवल ग्यारह दिन का होता है। पुरोहित के मुख से शास्त्र-व्यवस्था सुनकर परिवार को कुछ राहत मिली थी।  ऊंगलियों पर तिथियों की गणना करते हुए चाचा जी बोले, ''तो फिर ग्यारह दिन मतलब, कृष्णपक्ष की तृतीया की तेरहवीं पड़ी!''
  ''ग्यारह दिन! एक-दो दिन ओर फालतू लग जाएंगे! ..मतलब वही पंद्रह दिन के करीब! बीमारी की सुनकर दो दिन पहले ही आ गया था!'' पत्नी से सलाह-मश्विरा करने के बाद मन्द स्वर में भाई साहब बोले, ''..इसका मतलब छुट्टी बढ़ानी पड़ेगीं!''
  ''हाँ! तेरहवीं की रस्म तक तेरा रहना जरूरी है, रमेश। मातमपुर्सी के लिए लोग आएंगे उनके लिए बैठक में तेरा बैठना जरूरी है।'' भाई साहब की ओर मुख़्ातिब हो कर चाचाजी ने कहा।
  ''मगर चाचाजी! इस काम में तो कोई कीर्ति की आँख ना है! यह काम तो कंवल भी कर लेगा!'' बचाव की मुद्रा में भई साहब ने सुझाव दिया था।
  भाई साहब का सुझाव शास्त्रों के अनुकूल नहीं था। अत: चाचाजी  तत्काल ही बोले, ''नहीं-नहीं! कैसी बात करता है! रस्म पूरी होने तक दाग देने वाले को ही जमीन पर कपड़ा बिछाकर बैठना होता है! ..फिर, पगड़ी भी तो तेरे ही सिर बंधनी है, रमेश!''
  चाचाजी की व्यवस्था सुनकर भाई साहब ने ऐसे मुँह बना लिया था, जैसे किसी ने उन्हें नीम के पत्तों की चटनी चटा दी हो। लेकिन पगड़ी बंधने की बात में उन्हें कुछ वजन दिखाई दिया, इसलिए ही तो उन्होंने कहा था, ''पगड़ी.. ठीक है। कुछ करता हूँ!''
  तभी पुरोहित जी ने पत्रे पर से निगाह उठाई और बोले, ''मगर, जिजमान! इस बीच शरद पूर्णिमा भी तो है! ..कृष्णपक्ष की तृतीया की तेरहवीं करने पर पूर्णिमा की आन पड़ जाएगी। ..फिर कभी पूर्णिमा नहीं मना पाओगे जिजमान!''
  पुरोहित जी की बात सुनकर भाई साहब का जायका कुछ सुधरा था। और, चाचा जी को बोलने का मौका न देकर वे बोले, ''बात तो आपकी भी सही है, पंडिजी! ..फिर क्या किया जाए!''
  ''ब्रह्मंभोज के लिए चतुर्दशी का दिन भी शुभ है, जिजमान!''
  ''तब तो सात दिन की तेरहवीं हो जाएगी, पंडिजी!'' चाचाजी ने हिसाब लगा कर कहा था।
  ''कोई बात ना है! शुक्लपक्ष शुभ होता है, जिजमान! ..आजकल तो बरसी की रस्म भी तेरहवीं के दिन ही पूरी कर लेते हैं!''
  संवेदनशीलता के उत्कृष्ट मानदंडों का पालन करने वाले मेरे परिवार के लिए तेरह अथवा ग्यारह दिन तक पूर्ण शोक और एक वर्ष तक आंशिक शोक की वेदना झेलना असहनीय था। अत: पंडिजी की बात सहर्ष स्वीकार कर ली गई थी। माँ के प्रति परिवार की संवेदना और संवेदनशील उनकी भावनाओं पर विचार करते-करते मेरे चेहरे पर बरबस ही व्यंग्य भाव उतर आए हैं।
            परिवार की संवेदनशील भावनाओं पर विचार करते-करते माँ की जीवन-यात्रा के अन्तिम दिन चलचित्र की भांति एक-एक कर मेरे मस्तिष्क में उतरने लगे हैं। लगभग एक घण्टा पहले ही मैं पत्नी को माँ के पास छोड़कर अस्पताल से कार्यालय आया था। मैं कार्यालय में छोटे-छोटे किन्तु आवश्यक कार्य निपटाने में व्यस्त था। उसी दौरान भर्राई आवाज में पत्नी ने फोन पर बताया था- माँ! ..चली गई! भावुकतावश इतना कहने के बाद वह मौन हो गई थी। उस समय मेरे मुँह से 'अच्छा! ..मैं आता हूँ!' सहज भाव के साथ ऐसे निकला मानों कुछ हुआ ही नहीं, सभी कुछ सामान्य है! कार्यालय से अस्पताल की दूरी अधिक नहीं थी। अस्पताल तक जाते-जाते माँ के रहने न रहने से उत्पन्न भाव-अभाव मेरे मस्तिष्क में उतरने लगे थे और भाव-अभाव के ऊष्ण दबाव के कारण मेरे मन में विक्षोभ-सा उत्पन्न हो गया था। पत्नी के समक्ष पहुंचते-पहुंचते नेत्रों से पसीने की सी दो बूंद चेहर पर आकर रुक गई थी। मुझे देखकर रुंधे गले से पत्नी बोली, ''माँ जी चली गई! ..कुछ दिन और सेवा करने का मौका दे देती..!'' बस इतना कह कर पत्नी अन्दर ही अन्दर सुबकने लगी थी। माँ के वियोग से उत्पन्न अभावों के अपने और सेवा से प्राप्त होने वाले पुण्य सम्बन्धी पत्नी के स्वार्थ से मुझे अहसास हुआ कि प्रियजन की मृत्यु का समाचार प्राप्त होते ही नेत्र क्यों सजल नहीं होते हैं? हृदय-तल से हिचकियाँ क्यों नहीं उठती? आँखें नम होने के लिए एक क्षण ही सही, मगर समय क्यों लगता है? ..यथार्थ में आँखें प्रियजन-शोक में नहीं, उसके चले जाने से उत्पन्न अभावों के कारण नम होती हैं! स्वार्थ जितना गहरा होता है, हृदय-तल की उतनी ही गहराई और उतने ही वेग से शोक आसुओं में परिवर्तित हो कर नेत्रों की सीमाएं लांघता है।
        शरीर-त्याग से पंद्रह-सोलह दिन पहले ही की तो बात है। माँ का फोन आया था, ''सुन तेरा भाई बीमार है। उसे तुरत यहाँ से ले जा।'' मैं घबरा गया था। ऐसा क्या हो गया है, रवि को जो माँ इतनी परेशान है। पत्नी के साथ गाडं़ी उठाकर मैं तुरन्त ही गाँव के लिए रवाना हो गया था। गाँव पहुँच कर पाया, रवि तेज बुखार से तप रहा है। अगले दिन सुबह मैं भाई के साथ माँ को लेकर दिल्ली के लिए रवाना हो गया था। पूरा रास्ता माँ के साथ बात करने में तय हुआ था, तुम्हारी तबियत कैसी है? ..अब चक्कर तो नहीं आते ? ..दवाई ले रही हो या नहीं? प्रत्येक प्रश्न का माँ के पास एक ही जवाब था, ''तू मेरी फिकर छोड़! पहले इसका इलाज करा, हर दूसरे दिन बुखार में तपने लगता है!'' कभी माँ से तो कभी रवि से बात करते-करते हम घर पहुँच गए थे। हाँ रास्ते में एक जगह हम सभी ने मलाई वाली कुलफी का स्वाद अवश्य लिया था। यह सोचकर कि कुलफी खाने से रवि के तपते बदन और रवि के ताप से संतप्त माँ के ताप में कुछ गिरावट आएगी और दोनों को ही कुछ सुकून प्राप्त होगा!
    दरअसल माँ को कुलफी पसन्द थी। हफ्ते में एक-दो बार गाँव में भी कुलफी बेचने वाला आया करता था। छोटी-सी चार पहियों की एक रेहड़ी में मटका रखा होता था। जिसमें नमक व बर्फ के मिश्रण के बीच टीन से बनी शंकु-आकृतियों दब रहती थी, जिन्हें कुलफी कहते थे। उन्हीं कुल्फियों में एक-दो पिस्ते के कतरों के साथ रबड़ी जमा कर बर्फ तैयार की जाती थी। क्योंकि कुल्फियों में बर्फ जमाई जाती थी। सम्भवतया  इसलिए ही रबड़ी वाली उस बर्फ का नाम भी  कुलफी ही पड़ गया होगा। और, क्योंकि कुलफी मटके में भरी होती थी, इसलिए उन्हें मटके वाली कुलफी कहने लगे थे।  घर के बाहर जैसे ही कुलफी वाला अपने विशिष्ट स्वर में आवाज लगाता-म-ट-केऽऽऽ वाऽऽऽ-ली, कु-ल-फीऽऽऽ! वैसे ही बच्चे अपनी-अपनी कमीज के पल्ले में अनाज भरकर उसके पास पहुंच जाते थे। हाँ, उस समय तक भारतीय मुद्रा के अतिरिक्त अनाज भी विनिमय का माध्यम था। कुलफी वाला हमारे घर के सामने अवश्य आवाज लगाता था, क्योंकि उसे मालूम था कि इस घर से तो खरीददारी होनी सुनिश्चित है।
     गाड़ी से उतरकर माँ आपने पाँव सही-सलामत सोफे पर जा कर बैठ गई थी।  चरण-स्पर्श कर पौत्र-वधू माँ के लिए पीने का पानी लेने चली गई। जबतक पानी लेकर लौटी, तबतक माँ कुछ निडाल-सी हो गई थी। बहू ने पानी पीने के लिए कहा, परन्तु माँ ने किसी भी प्रकार को कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की। माँ निढाल हो चुकी थी। दरअसल माँ कोमा में चली गई थी और पंद्रह दिन बाद शरीर-त्याग कर कोमा से भी बाहर चली गई थी। रवि जिसका इलाज कराने दिल्ली लाया था, माँ की देखभाल के चक्कर में उसकी सुध ही नहीं रही और मामूली दवा-दारू से ही उसका बुखार उतर गया था और तब से आज तक उसका बदन कम से कम बुखार से तो नहीं तपा। माँ चली गई थी और रवि स्वस्थ हो गया था। सहसा ही मुझे बाबर के बीमार होने और हुमायूँ के स्वस्थ हो जाने की कहानी हकीकत-सी लगने लगी। कहते हैं कि मु़गल शहजादा हुमायूँ एक बार ला-इलाज बीमारी के चपेट में आ गया था। हकीम-हुकमरान सभी ने हाथ खड़े कर दिए। मु़गल-ख़्ानदान का चिराग बुझने के करीब था। उसी दौरान हुमायूँ के वालिद शहंशाह-ए-हिन्दोस्तान बाबर ने दुआ के लिए दोनो हाथ उठाकर अल्लाह से इल्तजा की, ''हे, परवदिगार मु़गल-ख़्ानदान का चिराग न बुझा। उसे रोशन कर, परवरदिगार! ..चाहे, उसके सारे मर्ज मुझे दे दे, मगर शहजादे की जान बख़्श दे।'' कहते हैं आहिस्ता-आहिस्ता शहंशाह बाबर बीमार पड़ने लगा और शहजादा हुमायुं स्वस्थ होने लगा।
   माँ की प्रबल इच्छा थी कि जब भी वह प्राण-त्याग करे अपने गाँव अपनी मिट्टी में ही करे। किन्तुविधि के विधान को कौन जान पाया है। क्योंकि, उसके विधान का कोई विशेषज्ञ नहीं है, इसलिए उसकी अपील भी कहीं नहीं है। महानगर की आबोहवा में उनका दम-सा घुटता था। गाँव से जब कभी उन्हें लेकर आया हफ्ता-दस दिन से ज़्यादा नहीं रहीं। कहती, ''तेरी दिल्ली में मेरा मन ना लगै है। दिन भर कमरा में बंद बैठे रहो। ..मेरा मन ना लगै!''  कभी बहाना बनाती, ''देख! ..झुम्मन जुलाहे की माँ पांच सौ रुपए उधार लेगी थी। अब की इकादशी कू देने थे। ना जाऊंगी तै रुपए मारे जावेंगे! तू छोड़ आ मुझे!'' जब कोई बहाना न चलता तो माँ बिना वजह बहू पर नाराज हो जाती। मैं समझ जाता अब माँ का मन उछट
गया है, गाँव जाने की इच्छा है। मैं कहता माँ चल कल तुझे गाँव छोड़ आऊं। माँ खुश हो जाती और मुझे लाख आशीष देती। महानगर के इस कृत्रिम समाज, कृत्रिम संस्कृति में माँ का मन लगता भी कैसे! गाँव में बिमला की बिब्बी, नरेश की माँ, राकेश की ताई, उर्मिला की चाची, हुसैनपुर वाली,
खरखोदे वाली, तलहैटा वाली आदि-आदि का एक स्वनिर्मित अपना समाज था। वहाँ एक-दूसरे के दुख-सुख की सुनने वाली देवरानी-जिठानियों का समूह था। बस बात-बात में यूं ही दिन, महीना, वर्ष और जीवन बीत जाता था। महानगर में मन लगता भी कैसे न देवरानी, न जेठानी बस दस नम्बर वाली, चार नम्बर वाली या बारह नम्बर वाली। माँ का भला इन नम्बरों से क्या वास्ता! नम्बर न सुख की कहें और न दुख की सुने! नम्बर तो बस नम्बर हैं। नम्बरों का क्या? नम्बर तो गूंगे-बहरे होते हैं!
           अतीत की विथिकाओं में विचरता, मैं विधि के विधान का संशलेषण-विश्लेषण कर रहा था। तभी रवि का आवाज मेरे कानों में पड़ी-भईया जैन साहब आए हैं! चाचाजी ऊंची आवज में कह रहे थे-मेहमान आ गए हैं, मिलने-जुलने वाले भी आने लगे हैं, बरखुरदार हैं कि नदारद! बैठे होंगे घर के किसी कोने में समाधी लगाए! माँ के चित्र को अकेला छोड़ मैं उस ओर चल दिया, जहाँ मातमपुर्सी के लिए सभी लोग इकटठा हो रहे थे। जैन साहब भी उन्हीं में से एक थे। पुरुषों के लिए दरवाजे के बाहर सड़क घेर कर शामियाना लगाया गया था। उसी के एक ओर ब्रह्मंभोज का तैयारी चल रही थी। घर के अन्दर हॉल में बैठी महिलाएं विलाप कर माँ के प्रति संवेदना व्यक्त कर रहीं थी। उनका विलाप धारावाहिक अनुशासन का पालन कर रहा था। विलाप माँ का स्मरण कर प्रारम्भ होता और एक क्षण के बाद ही माँ का विस्मरण कर अपने-अपने मृत परिजन का नाम लेकर विलाप करने लगती। कुछ देर बाद ही विलाप ऐसे थम जाता, जैसे किसी ने रिमोट का ऑफ बटन दबा दिया हो। एक ही घटना को लंबा खींचने से नाटक उबाऊ हो जाता है, अत: अच्छा नाटक वही है, जिसमें घटनाएं तेजी के साथ बदलती रहें।
   विलाप का दौर समाप्त हो जाने के उपरान्त सभी महिलाएं यथा-स्थिति में दो-दो, चार-चार के समूह में विभक्त होती और एक दूसरे के साथ पारिवारिक अपनी-अपनी वेदना साझा करने में व्यस्त हो जाती। उम्र और रिश्तों के हिसाब से सास-ससुर, देवर-देवरानी, जेठ-जिठानी, नन्द-नन्दाोई मसलन पारिवारिक सभी रिश्ते समीक्षा के विषय थे। उन्हीं में हमारी चाची रवि की पत्नी को समझा रही थी, ''बावली ना बन! ..बीवजी का गाँव में जितना पैसा है, उसे घर जाते ही अपनी गाँठ में लगा। बुढ़ापे में बीवजी की सेवा तूने ही तो की है। ..अर, सुन! बीवजी के हाथ में सोने की दो-दो चूड़िया भी तो थी! मुझै तो लगै है, बक्सर वाली दबा बैठी है। ..बावली क्यों बनै है, रसम पूरी होते ही अपना हिस्सा माँग लियौ!'' ताई मेरी पत्नी को समझा रहीं थी, ''दिके! रामपुर वाली ने गाँव में जितना पैसा चढ़ा रक्खा था, वो तो छोटी दबा कै बैठ जावेगी। ..उसके हाथ की चूड़ी तो उतार ली ना। उन्हें किसी कू मत दियो, हारी-बिमारी मैं तो तू ई काम आई, ना! माँगै तो कह दियो, पहलै गाँव के एक-एक पैसे की हिसाब दे ओ। ..तू बावली थोड़े ही है। आखरी बख्त में तो रामपुर वाली की सेवा तू ने ही करी है। ..तेरा हक पूरा बनै है!'' जब-जब कोई नई महिला मातमपुर्सी के लिए हॉल में प्रवेश करती धारावाहिक का अगला भाग प्रारम्भ हो जाता है। आगन्तुक महिला की उपस्थिति का भान कर उपस्थित सभी महिलाएं एक साथ उसी प्रकार पुन: विलाप करने लगती, जैसे बैंड मास्टर की ऊंगली हवा में उठते ही वादक अपने-अपने वाद्य यन्त्र बजाने लगते हैं।
       मैं ने जब बाहर लगेशामियाने में प्रवेश किया तब उपस्थित अधिसंख्य पुरुष अपनी-अपनी रुचि के मुताबिक गली-मोहल्ले, देश-विदेश की अर्थनीति, राजनीति, धर्मनीति की समीक्षा करने में व्यस्त थे। मेरे उपस्थिति की अहसास कर क्षणभर के लिए समीक्षा पर विराम-सा लग गया और चेहरों से वेदना के  स्वर टपकने लगे। मुझे देखकर परम्परागत मातमी आवरण धारण कर जैन साहब खड़े हुए और दोनों हाथ जोड़ कर नमस्कार किया। वेदना युक्त अभिवादन के उपरान्त जैन साहब मुँह मेरी कान के समीप लाकर बोले, ''क्या बात है, पिल्लू  नहीं दिखाई दे रहा है?'' पिल्लू हमारा पालतू कुत्ता था। बीमारी के कारण जिसकी मृत्यु हो गई थी। जैन साहब के प्रश्न को आकस्मात उत्पन्न किसी जिज्ञासा के रूप में लेते हुए मैं ने सहज भाव से उन्हें बताया, ''हाँ, पिल्लू मर गया है।'' मैंने सोचा जैन साहब की जिज्ञासा अब शान्त हो गई होगी। किन्तु मेरा अनुमान गलत निकला पिल्लू के बारे में जैन साहब की जिज्ञासा शान्त नहीं हुई, क्योंकि वह आकस्मिक नहीं, अपितु साभिप्राय थी। मेरा उत्तर सुनते ही उनके चेहरे पर व्याप्त वेदना की लकीरे माँ से पिल्लू के शोक में परिवर्तित हो कर ओर गहरी हो गई थी। और, वे पिल्लू का चरित्र-वर्णन करने में व्यस्त हो गए थे। उनके मुख से पिल्लू का चरित्र-वर्णन सुनने  के बाद मामतपुर्सी के लिए आए अन्य महानुभावों का ध्यान भी आकर्षित हुआ और पिल्लू-चरित्र-चालीसा विषय पर शुरू वार्ता कुत्तों की विभिन्न प्रजातियों व उनके चरित्र विषय पर विचार गोष्ठी में परिवर्तित गई थी। एक ओर पगड़ी रस्म के उपरान्त शोकसभा में वक्ता आत्मा की अमरता और दिवंगत आत्मा के सद्गुणों पर प्रकाश डालकर माँ को श्रद्धांजलि अर्पित करने की चेष्ठा कर रहे थे। दूसरी ओर कुत्ता-प्रेमी कुत्ता-विचार-गोष्ठी में व्यस्त थे। उनके लिए माँ और मातमपुर्सी कहीं नेपथ्य में चली गई थी! विचार गोष्ठी ब्रह्मंभोज प्रारम्भ होने तक जारी रही।
     किसके पुत्रों ने अपने पिता अथवा माता के ब्रह्मंभोज में स्वादिष्ट कितने व्यंजनों का भोज दिया, इसी विषय पर चर्चा करते-करते मातमपुर्सी-पुरुष और महिलाओं ने भोज का भोग कर अपनी-अपनी राह पकड़ी। बाहर खान-पान-सम्मान की औपचारिता पूरी की जा रही थी। घर के अन्दर माँ की बहुएं पगड़ी की रस्म में भाइयों की ससुराल से आए वस्त्र, नकदी और भोज से बच्चे लड्डूओं का बटवारा कर रहीं थी। बटवारे का दृश्य देखकर मुझे लगा की जाते-जाते माँ बंदरों के बीच गुड़ की भेली रख गई है।
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