Saturday, December 15, 2007

सेक्सी युग की सेक्सी संस्कृति


हमारा पौत्र तीन वर्ष का जवान है। उम्र से कहीं ज्यादा बन-ठन कर रहता है। उसकी माँ को उसे नहलाने, कपड़े बदलने, परफ्यूम लगाने व कंघी आदि करने के लिए वैसे हाय-तौबा नहीं करनी पड़ती, जैसी की हमारी माँ को बचपन में हमारे साथ करनी पड़ती थी। हमारी हालत तो ऐसी थी कि जब कभी हमारी माँ नहलाने के लिए हमें पानी भरी बाल्टी के पास ले जाती थी। हमें लगता था कि कसाई किसी निरीह गाय को बूचड़खाने ले जा रहा है। नहाने से पहले ही हम रौ-रौ कर कम से कम मुंह तो आंसुओं से ही धो डालते थे। अब हालात बदल गए हैं। हमारी बहू को पुत्र-स्नान से पूर्व की चिल्ल-पौं सुनने की जहमत नहीं उठाने पड़ती, क्योंकि हमारा पौत्र आंख खुलते ही नित्य-नैमेतिक कर्म कराने के लिए अपनी माँ को मजबूर कर देता है।
एक दिन हमारे एक मित्र पत्नी सहित दोपहर के भोजन पर घर पधारे। उनकी पत्नी ने हमारे पौत्र को देखा और उसकी ओर आकर्षित हुई। उसे उन्होंने गोद में बिठाया और बतियाने लगी। बतियाने के इस क्रम में उन्होंने पौत्र से पूछा- बेटे बड़े होकर क्या बनोगे। पौत्र ने बिंदास जवाब दिया, ''सैक्सी!'' उसकी हाजिर जवाबी और जवाब सुनकर हमारा व पत्नी सहित मित्र का चेहरा कंडोम के विज्ञापन वाले उस ड्राइवर की तरह लटक गया, जिसे उसके साथी 'कंडोम' बिंदास बोलने के लिए प्रेरित करते हैं। इसके साथ ही क्षण भर के लिए ड्राइंगरूम में सन्नाटा छा गया। इसी बीच उनकी पत्नी उठ कर रसोई की तरफ चली गई और चेहरे की सुर्खी कुछ कम करते हुए मित्र बोले- मुन्नालाल जी आपके पौत्र का सौंदर्य बोध गजब का है।
हम बोले- हाँ! कमबख्त शाहरुख खान का फैन है। जब से उसने टीवी पर देखा है, शाहरुख खान सैक्सी नंबर वन घोषित हुआ है, उसी दिन से इसने सैक्सी बनने की ठान ली है। पहनने के लिए सैक्सी कपड़े चाहिए, खाना भी सैक्सी होना चाहिए, खिलौने के लिए भी सैक्सी-सैक्सी की रट लगाए रहता है। चेहरे पर निराशा के भाव ओढ़ कर हम आगे बोले- क्या बताएं, जनाब! दुनिया के सुपुत्रों की तरह इसका सौंदर्य बोध भी पालने में ही नजर आने लगा था। कमबख्त हर एक महिला की गोद में खेलना पसंद नहीं करता था। जब कभी रोता था, तो पड़ोसन को बुलाना पड़ता था। उसकी गोद में जाकर कहीं भैरवी-राग आलापना बंद कर सौ जाता था। हम सोचते रहे कि पुनर्जन्म के संस्कार हैं, मगर अब पता चला कि पड़ोसिन हमारी खूबसूरत है, सैक्सी लगती है, इसलिए ही उसे पसंद थी। दादी को तो उसने पालने की उम्र में ही रिजेक्ट कर दिया था। न तब उसकी गोद में जाता था और न ही अब उसके आसपास फटकता। राज पर से पर्दा अब उठा, दरअसल हमारी बुढि़या उसे सैक्सी नहीं दीखती। हाँ! एक दिन जरूर उसने दादी की अंगुली पकड़ी थी। उस दिन शादी में जाने के लिए उसने बूढ़ी घोड़ी लाल लगाम वाली कहावत चरितार्थ की थी। उस दिन साहबजादे बोले थे- दादी अम्मा आज तो बड़ी सैक्सी-सैक्सी लग रही हो। हमारे पौत्र की कैफियत सुनकर मित्र बोले- अच्छा है! आगे-आगे सैक्स और सैक्सी लोगों का ही सेंसेक्स आसमान छूएगा। हम जैसे रसहीन चेहरों का सेंसेक्स तो उतार पर ही है।
भोजन कर मित्र व उनकी पत्नी चली गई, लेकिन पौत्र ने हमें उलझा दिया। हम तभी से सेक्स-संस्कृति के संबंध में सोच रहे हैं- कितनी सेक्सी-सेक्सी हो गया है जमाना। राजनीति सेक्सी, समाज सेक्सी, शिक्षा सेक्सी, व्यापार सेक्सी! कौन सा क्षेत्र है, जहां सेक्स का वर्चस्व नहीं है! सेक्स धर्म है, सेक्स कर्म है, सेक्स मोक्ष प्राप्ति का सुगम मार्ग है। 21 वीं सदी के अन्त तक केवल सेक्स शेष रह जाएगा, बाकी सभी गौण। तब सेक्स मूल्यों के साथ सेक्स-प्रधान होगी संस्कृति! हम सेक्स के सुनहरी भविष्य की कल्पना में डूबे थे, तभी हमारा पौत्र हमारे पास आया और तोतली जुबान में गुनगुनाने लगा- दे दे चुम्मा, चुम्मा दे दे..! शायद किसी फिल्म का गीत है।
फोन-9869113044

Friday, December 14, 2007

गुड डील नहीं गुड फील चाहिए

''अमेरिका के साथ परमाणु-डील किसी भी दृष्टिंकोण से व्यावहारिक नहीं है। न पार्टी हित में है, न सरकार हित में और न ही बैसाखी-दलों के हित में। जहाँ तक प्रधानमंत्री जी का सवाल है, इस डील के बाद से मोहनी सूरत पर व्याप्त उदासी चिल्ला-चिल्ला कर हाल-ए-दिल खुद-ब-खुद ही बयान कर रही है। बेचारे अपना डील-डोल भुला डील कर बैठे।'' राजनीति के मर्मज्ञ लाल बुझक्कड़ जी परमाणु डील पर अपना व्याख्यान झाड़ रहे थे। हम अपना राष्ट्रवादी-चिंतन लिए जनता की तरह चुप सुन रहे थे। हमारे राष्ट्रवाद ने मौसमी अंगड़ाई ली और हम बोले- मगर राष्ट्र-हित में तो है! लाल बुझक्कड़ खिलखिला कर बोले- कैसी दकियानूसी बातें करते हो! राष्ट्र को गुडफील चाहिए, गुड डील नहीं! राष्ट्रहित में होता, तो वामपंथी क्यों विलाप करते। कहीं तुम्हें उनके राष्ट्रवादी होने पर शक तो नहीं? अंगरेजी राज से लेकर आज तक उनसे बड़ा, क्या कोई राष्ट्रवादी हुआ है? ..कोई नहीं, इतिहास गवाह है!
वे आगे बोले- सुनों बरखुरदार! प्रधानमंत्री अल्पमत में बहुमत के ख्वाब देख बैठे। डील करने से पहले कनस्तर के दाने तो गिन लेते। ''घर में नहीं दाने, अम्मा चली भुनाने'' वाली कहावत चरितार्थ कर दी, तुम्हारे प्रधानमंत्री ने। जब दाने ही नहीं थे, तो भड़भूजा क्या अम्मा का सिर भूने। प्रधानमंत्री जी जब जानते हैं कि जनता ने पार्टी को खण्डित जनादेश दिया है, फिर कुलांचे भरने की क्या जरूरत थी। अरे, भाई बैसाखियों के सहारे कुलांचे भरोगे, तो गिरोगे ही। उन्हें ''जैसा तेरा नाचना-गाना, वैसा मेरा वार-फेर'' के सिद्धांत का पालन करना चाहिए था। ऐसा करते तो कम से कम पांच वर्ष सुखी जीवन व्यतीत कर लेते। जनता ने उन्हें सत्ता-सुख भोगने का आदेश दिया था। वे काम में वक्त जाया करने लगे। बरखुरदार! हमारी धर्म-संस्कृति में 'काम' से दूर रहने की हिदायत दी गई है। काम में लिप्त हो जाओगे तो पतन निश्चित है।
हमें लगा चचा लाल बुझक्कड़ के सामने तर्क पेश करना, वामपंथियों के साथ सिर खपाने के समान है, अत: हम मौन बने रहे।
चचा ने मुख पर कुछ इस प्रकार गंभीर भाव उतारे मानों किसी रहस्य पर से परदा उठा रहे हों। फिर बोले- गठबंधन सरकारें काम करने के लिए नहीं, काम का शोर मचाने के लिए हुआ करती हैं। गुड़ भले ही न दे, मगर गुड़ जैसी बात करने के लिए होती हैं। इन्हें भी गुड़ बांटे बिना गुड़ का अहसास कराना चाहिए था। बातों ही बातों में जनता को गुडफील कराना चाहिए था। अब देखो न! अपने बाजपेयी जी कविता सुना-सुना कर मस्ती में पांच साल काट गए। उनका अनुसरण करते तो रात के अंधेरे में भी सन-साइन का अहसास होता। बैठे-बिठाए दिन में तारे न गिनने पड़ते। जनता को गुडफील कराने के लिए देश में मुद्दों की कमी थोड़े ही है। अरे, भाई कुछ न मिला था, तो गरीबी हटाने के परंपरागत मुद्दे को ही उठा लेते। टका एक खर्च न करते, बस शोर मचाते। वोटर खुश हो जाता, मुद्दा ज्यों का त्यों बचा रह जाता, अगली बार फिर काम आ जाता। गरीबी से रंजिश थी तो प्याज को ही मुद्दा बना लेते। लालकिले से प्याज के दाम घटाने की घोषणा कर देते। सीधा जनता-जनार्दन से जड़ा मुद्दा था। सरकारों को जब कुछ नहीं मिलता, तो महंगाई बढ़ा कर, महंगाई का ही मुद्दा उठा लेती हैं। चार आने बढ़ाती है, एक आना कम कर देती है। चारों ओर गुडफील-गुडफील हो जाती है। महंगाई को तो सत्ता के भवसागर से पार उतरने के लिए गाय की पूंछ समझो।
बस और कुछ भी नहीं एक अनुभव का टोटा है। व्यक्ति वही जीनियस कहलाता है, जो दूसरों को ठोकर खिलाकर खुद अनुभव का लाभ उठाले। कोई नहीं मिला था, तो राव साहब के अनुभव से सीख ले सकते थे। न डील, न फील मौनी बाबा बनकर ही पूरे पांच साल सरकार चला गए। उनमें समर्पण-अर्पण दोनों भाव थे। देश और जनता के प्रति समर्पित और सहयोगियों के प्रति अर्पित। कहने वाले घोटाले-बाज कहते रहे। वे गए तो क्लीन चिट लेकर गए। समर्पण-अर्पण का भाव उनसे सीख लेते तो आज संघी भाइयों के कटाक्ष न सुनने पड़ते। वामपंथियों के नखरे न सहने पड़ते। अमेरिका के साथ डील करनी ही, तो भइया ब्ल्यू-लाइन डील कर लेते। डील की फील भी हो जाती और वामपंथी भी जुबान न खोलते।

फोन-9868113044

Friday, November 16, 2007

पैकेज संस्कृति का युग है जी

हम ने तनख्वाह की रकम पत्‍‌नी के हाथ पर रखी, मगर इस बार पत्‍‌नी के चेहरे पर तनख्वाई झलक सफाचट नजर आई। आज उनके चेहरे पर परंपरागत प्रणय भाव का अभाव था। तनख्वाह वाले दिन उनके चेहरे पर अभाव के ऐसे भाव पहले कभी देखने में नहीं आए। तनख्वाह दिवस पर तो वे शरबत में नहाई रसभरी की माफिक नजर आती रही हैं। चेहरे पर ऐसे ही रसीले भाव देखकर हमारा पौत्र अक्सर कह देता है, 'दादीमां आज तो सैक्सी-सैक्सी सी लग रही हो।'
आशा के विपरीत नाक-भौ सिकोड़ते हुए पत्‍‌नी बोली, 'अब ऐसे नहीं चलेगा जी। महीने में पूरे तीस दिन लंच बांध कर ले जाते हो, तनख्वाह अट्ठाइस दिन की ही लाते हो। सुनो जी! दस हजार में तो बस डिनर, ब्रेकफास्ट ही मिलेगा। लंच का इंतजाम कहीं और कर लेना या फास्ट रख लेना। हथेली पर पंद्रह हजार रखोगे तभी लंच, डिनर दोनों मिलेंगे। ब्रेक फास्ट भी चाहिए तो कपड़े धुले-धुलाए नहीं मिलेंगे। कपड़े धुले-धुलाए पहनने हैं तो ब्रेक फास्ट की छुट्टी। सभी सुविधाएं चाहिए तो बीस हजार रुपये महीने देने होंगे।'
तनख्वाह के दिन भी पत्‍‌नी का तनखईया व्यवहार देख हमारे तनख्वाही गौरव एक ही झटके में चूर-चूर होता दिखलाई दिया। हम सोचने लगे, दफ्तर से घर के लिए चले थे, होटल कैसे पहुंच गए?
हमने साहस जुटाया और शंका समाधान के लिए श्रीमती जी से पूछा, 'यह क्या जी, यह सौदा कैसा जी?' श्रीमती जी फरमाई, 'सच्चा सौदा है, जी! पैकेज संस्कृति का युग है, जी। यह हमारा घरेलू पैकेज है, जी।' हमने माथा ठोका और मन ही मन सोचा, 'यह तो गजब हो गया जी, पैकेज संस्कृति की हवा के झोंके होटल से घर तक पहुंच गए जी।'
कल ही की तो बात है, अस्पताल के पैकेज को लेकर जब मास्टर जी अपना मुकद्दर कोस रहे थे। दरअसल मस्टराइन की डयू डेट नजदीक थी। मास्टर जी जच्चा-बच्चा अस्पताल के चक्कर लगा रहे थे, पैकेज का जोड़-भाग लगा रहे थे। सिंगल डिलवरी का पैकेज दस हजार रुपए डबल का बीस हजार, मगर डबल पर 25 प्रतिशत की छूट मिलेगी। अर्थात डबल डिलवरी पर कुल 15 हजार रुपये का खर्चा आएगा। जी ने घटा-जोड़ लगाया, दिमाग में बिजली से कौंधी, '15 हजार में क्यों न दो प्राप्त कर लूं! पैदावार के मामले में ईश्वर हम पर पहले ही से मेहरबान है, साल भर बाद फिर अस्पताल के चक्कर लगाने होंगे, फिर दस हजार खर्च करने पड़ेंगे। अच्छा है, एक बार में ही किस्सा निपटा लूं। '
मास्टर जी ने 25 प्रतिशत की छूट का लाभ उठाते हुए अस्पताल में 15 हजार रुपए जमा कर दिए। मगर ऊपर वाले ने साथ नहीं दिया, बदकिस्मती से मस्टराइन ने एक ही बच्चा जना।
डाक्टर पांच हजार रुपये वापस करने लगा। मास्टर जी को बुरा लगा। वे बोले, 'रुपये वापस नहीं चाहिए। पांच हजार का घाटा क्यों उठाऊं। अग्रीमंट डबल डिलवरी के पैकेज का हुआ था। पेमेंट भी उसी हिसाब से किया था। पांच हजार अपने पास रख, हजार-पांच सौ और चाहिए तो बोल, मगर पैकेज के हिसाब से बच्चा एक नहीं दो लूंगा।'
डाक्टर परेशान था। मास्टर को पैकेज का अर्थ समझाया और फिर बताया, 'डिलीवरी सिंगल हो या डबल, इसमें डाक्टर का कोई रोल नहीं है। ऊपर वाले की कृपा है, तुम्हारा मुकद्दर।'
अस्पताल में यदि पैकेज न होता तो बैठे-बिठाए मास्टर को नकद पांच हजार का घाटा न होता। मास्टर जी तभी से कभी अपने मुकद्दर को तो कभी अस्पताल के पैकेज को कोस रहें हैं। कैसी अजीब बात है, घर में पैकेज, होटल में पैकेज, हास्पिटल में पैकेज। पैकेज संस्कृति न हुई सांस्कृतिक राष्ट्रवाद हो गया। जहां देखो उसी की रामधुन।
21 वी सदी अर्थ और संस्कृति का पुनर्जागरण काल है। तरह-तरह के घोटाले व पैकेज स्कीम ने अर्थ व संस्कृति के क्षेत्र में इस सदी ने नए आयाम स्थापित किए हैं, क्रांतिकारी परिवर्तन किए हैं। अब तो लगता है, 22 वी सदी के आते-आते दोनों क्षेत्रों में आमूलचूल परिवर्तन का बिगुल बज जाएगा और तब पैकेज संस्कृति राजनीति, घर, होटल व हास्पिटल से निकल कर मरघट तक पहुंच जाएगी। तब मुन्नालाल की यही कामना होगी काश पिताश्री व माताश्री दोनों की आत्माएं एक साथ ही परमात्मा में लीन हो जाए और अंतिम संस्कार पैकेज का लाभ मिल जाए।
संपर्क : 9868113044

Thursday, November 15, 2007

उधार की जिंदगी जीता इनसान


सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ प्राणी इनसान उधार की जिंदगी जी रहा है। जब कभी उसके जीवन-परिचय के पन्ने उलटता-पलटता हूं। मन वेदना से भर जाता है। सिर धुनने लगता हूं। उसके पास अपना कुछ भी तो नहीं है, न चाल, न चेहरा और न ही चरित्र! इनसान उल्लू का पठ्ठा हो सकता है। सूअर का बच्चा हो सकता है। गधे का बच्चा हो सकता है और बंदर की औलाद भी! न जाने क्यों इनसान आज तक भी इनसान का बच्चा नहीं बन पाया। बस यही सोच-सोच कर मैं शहर के अंदेशे में काजी जी की तरह दुबला हुए जा रहा हूं।
वैसे उधार का खाने वाले ही सफल कह लाए जाते हैं, परंतु सफलता का यह पैमाना इनसानों के मध्य ही प्रचलित है। सृष्टिं के अन्य प्राणियों के लिए सफलता-असफलता की कसौटी नहीं। जैसे कोई चोर कुछ विशिष्ट सद्गुणों के कारण चोरों के बीच सफल-असफल हो सकता है, किंतु वे ही गुण आम इनसान के बीच उसे सफलता अथवा असफल की डिग्री नहीं दिलाते हैं।
अपनी प्रेयसी को जब-कभी सर्वागीण निहारता हूं, तो उसकी संपूर्ण सुंदरता किसी महाजन के यहां गिरवी सी रखी नजर आती है। वह कोकिला कण्ठ है। उसका चेहरा चांद सा है। आंखें मीन के समान हैं। नाक तोते जैसी, होंठ गुलाब-पुष्प की पंखुड़ी के समान और केश काली घटाओ का अहसास कराती हैं और गरदन सुराही का आभास कराती है। मद मस्त हथनी का सा यौवन लिए जब वह ठुमक-ठुमक कर चलती है, तो कभी बिल्ली की चाल (कैट वॉक), तो कभी हिरनी की चाल के समान दिव्य आनंद की अनुभूति होती है। चपल-चंचला मेरी प्रेयसी कभी जलपरी सी लगती है, तो कभी आकाश-परी के समान।
जब कभी मैं इश्क की चाशनी से बाहर निकलता हूं, तो सोचता हूं- हे, अप्रतिम सुंदरी! तुम आनंद प्रदायनी हो, परमानंदनी हो, तुम दिव्य हो! ..परंतु हे, परमानंदनी, हे दिव्यानंदनी! तुम सृष्टिं की सभी महिलाओं में सुंदरतम् हो, किंतु यह क्या? तुम्हारा विराट व्यक्तित्व सृष्टिं के विभिन्न जीव-जंतु और मृत पिण्डों के अलंकार व उपमाओं से लदा है। तुम्हारे अंदर क्या कुछ भी ऐसा नहीं है, जिसका वर्णन मैं किसी इनसानी उपमा के आधार पर कर सकूं? हे, परम प्रिय! तुम यथार्थ स्वरूप में कब आओगी, तुम इनसान कब कह लाओगी?
समस्या प्रेयसी तक ही सीमित नहीं है। हमारे मित्र भी किसी की बेटी-बहू से कम नहीं है, क्योंकि उनके जीवन-परिचय में भी इनसानी सद्गुण एक भी नहीं है! हाथी की सूंड़ सी बलिष्ठ भुजाओं वाले मेरे मित्र, शेर के समान सीना लिए घूमते हैं। जब वे बोलते हैं, तो सिंह-गर्जन का अहसास होता है। सूर्य के तेज से चमकते मुखमण्डल पर धनुष कमान से झुकी भंवें अर्जुन के गाण्डीव का अहसास कराती हैं। उनमें चीते की सी चपलता है। जब हाथी की मदमस्त चाल से वे चलते हैं, तो धरती भी हिल जाती है। उनके व्यक्तित्व में वे सभी जानवरीय सद्गुण विद्यमान हैं, जिनके कारण कोई इनसान महान कहलाया जाता है। मसलन स्वान निद्रा, बको ध्यानम् और काग चेष्टा! इनसान और इनसानी व्यक्तित्व से उनका भी दूर-दूर का वास्ता नहीं है।
कहते हैं, आदिकाल में इनसान इनसानी सद्गुणों से ओतप्रोत था। मगर जब से उसके अंदर सभ्यता ने घुसपैठ की है, इनसानी गुणों का त्याग कर उसने सृष्टिं के अन्य प्राणियों की उपमाएं ओढ़ ली हैं और अब वह इनसान कम जीव-जंतुओं का रिमिक्स बन गया है। मैं उस दिन के इंतजार में हूं, जब इनसान कथित सभ्यता के आवरण से बाहर आएगा और इनसान का बच्चा कह लाएगा!
संपर्क : 9868113044

Wednesday, November 14, 2007

शहर में बंदर, चुनाव आ गए क्या?


चचा मुन्नालाल ने भड़भड़ाते हुए हमारे घर प्रवेश किया। चचा झक कुर्ता, पायजामा और गांधी टोपी में सुसज्जित थे। चचा की चाल लालूई, चेहरा कराती और चरित्र राहुली। खिचड़ी सरकार साक्षात मूर्ति! जिस घनत्व के साथ वे भड़भड़ा कर घर में घुसे, उनकी शक्ल-ओ सूरत देखकर उसी घनत्व में हम अचकचाए। चचा चुनाव के मौसम में ही इस बहुरूपिया रूप में प्रकट होते हैं। अत: हम सोचने लगे शरद ऋतु में यह बसंत बहार कैसी? हमने चचा से पूछा- क्यों, चुनाव आ गए क्या? चचा बोले- भतीजे हम यही बताने तो आए हैं।
चचा का जवाब सुनकर हमारी अचकचाहट वृद्धि को प्राप्त हुई। मन ही मन हम बोले- चुनाव? वामपंथी-लाली तो काफी हल्की हुई है, फिर अचानक चुनाव कैसे? दिल्ली के तो आसपास भी चुनाव की आहट नहीं! फिर चचा और चुनाव?
हमने पुन: अपने जहन पर जोर डाला और अनुमान लगाया कि कहीं चचा की सूरत-शीरत पाकिस्तान-राजनीति की समीक्षा तो नहीं कर रही है? हम अनुमान के आधार पर बोले- अच्छा-अच्छा मुशर्रफ साहब ने कपड़े पहनने का जो प्रयास किया है..!
हम अपना वक्तव्य पूरा भी न कर पाए थे कि चचा ने हमें बीच ही में लपक लिया- तुम्हारे भी सामान्य-ज्ञान का कमाल है, भतीजे! मुशर्रफ अभी तक वर्दी धारण किए हुए हैं और तुम दुबारा कपड़े पहना रहे हो। हमने चचा को समझाया- चचाजानी! पकिस्तान का अवाम वर्दी उतारने पर जोर दे रहा था। पाक दामन मुशर्रफ साहब ने कहा छोड़ो वर्दी का राग हम कपड़े ही उतार देते हैं। उन्होंने कपड़े अपने उतारे, आवाम को लगा मुशर्रफ साहब ने उनके उतार दिए। अवाम इमरजेंसी-इमरजेंसी चिल्लाने लगा। ताऊ बुश ने आंखें दिखाई, मुशर्रफ भाई ने फौरन कपड़े पहनने का ऐलान कर दिया। मगर चचा! चुनाव-चर्चा पाकिस्तान में हो रही है और रंग हिंदुस्तान की गिरगिट बदल रही है, भला क्यों?
चचा को हमारी गिरगिटिया समीक्षा कुछ तीखी-तीखी सी लगी। उन्होंने करेले सा कड़वा मुँह बनाया और बोले- भतीजे! पॉलटिक्स के ज्ञान में तुम कतई मनमोहन सिंह हो। अरे भतीजे पाकिस्तान की पॉलटिक्स से हमारा क्या मतलब! हम तो हिंदुस्तान की बात कर रहे हैं, राजधानी की बात कर रहे हैं।
हमारा सिर फिर चकराया। हम बोले- चचा तुम्हारी पॉलटिक्स हमारे जहन से बाहर की बात है। हिंदुस्तान में अभी चुनाव की आहट तक नहीं सुनाई दे रही है और तुम चुनाव चर्चा में मशगूल! अच्छा, चचा तुम्हीं बताओ, यह चुनाव बे-मौसम तुम्हारे जहन में कहां से आ टपका?
चचा ने कद्दू सा मुंह फुलाया और फिर जहानती अंदाज में बोले- भतीजे शहर की गलियों में बंदर नहीं दिखलाई दे रहे हैं, क्या? अभी किसी बंदर से साबि़का नहीं हुआ है, शायद? हमने पूछा- मगर शहर की गलियों में बंदर और चुनाव! इन दोनों के बीच कौन सी रिश्तेदारी है? थोड़ा खुल कर बताओ, चचा!
भतीजे! बंदर कल प्रियंका जी के बंगले तक भी पहुंच गए। फिर भी तुम्हें नहीं लगता चुनाव का मौसम आ गया है? हम झड़बेरी से झुंझलाए और फिर आत्मसमर्पण भाव से बोले- चचाजानी साफ-साफ कहो ना, क्यों परमाणु समझौते की तरह मामले को उलझाए जा रहे हो?
वामपंथी मुस्कराहट के साथ चचा बोले- इतना भी नहीं समझते भतीजे, बंदरों ने जन-संपर्क शुरू कर दिया है। आलाकमान की चौखट पर दस्तक देनी शुरू कर दी है। इतना कह कर चचा ने हमारे चेहरे की ओर देखा। हमारे चेहरे पर उन्होंने पूरे बारह बजे पाए। वे मुस्कराए और बोले- सुनो भतीजे! बंदरों के पास इतनी फुर्सत कहां कि वे बे-मतलब शहर गली-गली चक्कर लगाएं, जन-संपर्क कायम करें। जब-जब चुनाव आते हैं, तभी-तभी बंदर संसद के गलियारों से निकल कर शहर की गलियों के चक्कर लगाते हैं! अत: हमारी मानों देहली की देहरी पर चुनावी मौसम दस्तक दे रहा है। राजनीति के क्षितिज पर चुनावी बादल छाने लगे हैं। संसद की दीवार फांद कर बंदर शहर में आने लगे हैं!
संपर्क - 9868113044

Monday, November 12, 2007

दोस्त दुनियां में नहीं दाग से बेहतर

पानी और दाग, इन दोनों ने अपने आप को राष्ट्रीय समस्या के रूप में प्रस्तुत किया है। देश के कर्णधारों के समक्ष ये दोनों समस्याएं प्रधान है और शेष सभी गौण। यह भी कहा जा सकता है कि शेष सभी समस्याएं स्वयं समाप्त हो गई हैं। स्वाभाविक भी है, शहर में जब कोई बड़ा दादा पैदा हो जाता है तो बाकी दादा दुम दबाकर इधर-उधर हो जाते हैं। दोनों समस्याओं का साथ-साथ अवतरित होना महज संयोग नहीं है। चोली-दामन के संबंध की परंपरा में दोनों के बीच उसी तरह का पवित्र व अटूट गठजोड़ है, जिस तरह चोर-सिपाही, अपराध-राजनीति और नेता-दलाल के बीच।
आप सोच रहें होंगे कि चोर-सिपाही, अपराध-राजनीति और नेता दलाल की बात तो उचित है, मगर पानी संकट से दाग का क्या संबंध? है, अवश्य है! पवित्र इस गठजोड़ को आप इस प्रकार समझिए, जब पोखर का पानी उतरने लगता है तो तलहटी में जमी गाद चमकने लगती है। इसी प्रकार जब आंखों का पानी सूखने लगे और चेहरे का पानी उतरने लगे तो क्या होगा? वही होगा जो होता आया है और वही हम कह रहे हैं। अर्थात पानी उतरेगा तो दाग उभरेगा।
रहीम दास के मोती, मानस व चून नहीं हैं दाग, जो पानी उतरने पर उबरना बंद कर दे। दाग उभरता ही तब है, जब पानी उतरता है। यहां हम रहीम के 'मानस' की बात नहीं कर रहें हैं, क्योंकि उससे हम सहमत नहीं हैं। हमारा मानना है कि दाग की तरह कोई भी मानस तभी उभरता है, जब उसका पानी उतर जाता है। इस सूत्र के माध्यम से मानस व दाग के पारस्परिक संबंधों की भी व्याख्या की जा सकती है और कहा जा सकता है कि मानस के साथ दाग के बीच भी चोली दामन का संबंध है। अत: पानी और दाग के बीच प्रगाढ़ संबंध स्वत: सिद्ध है।
राष्ट्र की मूल समस्या नेताओं पर दाग की है अर्थात दागी नेताओं से जुड़ी है। यही वह समस्या है, जिसके कारण लोकतंत्र खतरे में पड़ता नजर आ रहा है। मगर समस्याओं की हमारी सूची में यह कोई समस्या ही नहीं है। इस कहावत पर जरा गौर कीजिए, 'वह मर्द ही क्या, जिसके ऊपर चार लांछन न हों।' सही बात है मर्द होगा तो लांछन होंगे ही। यह कहावत नेताओं पर भी शत-प्रतिशत लागू होती है, मगर कुछ अलग तरह से, 'वह नेता ही क्या जिसके कुर्ते पर दाग न हो।' इस नीति वाक्य को इस प्रकार भी कहा जा सकता है, 'नेता है तो दाग भी होगा ही।' दाग बगैर नेता की कल्पना करना उसी प्रकार गैरवाजिब है जिस तरह कर झूठखोरी के बिना व्यापार और घूसखोरी के बिना फाइल का खिसकना। इन सभी के बीच अर्थशास्त्रीय संबंध है।
नेता और दाग के बीच अटूट रिश्ता होने के कारण ही कभी-कभी तो यह सोचने पर मजबूर होना पड़ता है कि नेता में दाग है या नेता ही दाग है। यह ''दाग बीच नेता है कि नेता बीच दाग है। दाग ही नेता है कि नेता ही दाग है॥'' की स्थिति है। चूंकि नेता व दाग के बीच प्रेम संबंध हैं, अत: राजनीति से दाग का सीधा संबंध है। आप राजनीति करें और बेदाग रह जाएं, ऐसा संभव नहीं। अब आप ही बताइए, काजल की कोठरी में रह कर बेदाग रहना क्या संभव है? कोयले की दलाली करोगे तो मुंह न सही हाथ तो काले होंगे ही।
राजनीति के दाग इतने गहरे होते हैं कि छुटाए नहीं छूटते। ''कितना कमबख्त है यह दाग, बहुत छुड़ाया मगर छूट न सका।'' पीछा छुड़ाने की बात छोड़िए, जितना छुड़ाओगे उतना ही गहरा होता जाएगा-
''हजरत-ए-दाग जहां बैठ गए, बैठ गए
और होंगे तेरी महफिल से उभरने वाले।''
लानत भेजिए ऐसी राजनीति करने वालों पर, जिनके कुर्ते बेदाग हैं। दरअसल राजनीति एक राष्ट्र स्तरीय हमाम है और हमाम में सब नंगे हैं। अब सवाल यह पैदा होता है कि हमाम में जब सभी नंगे हैं, अर्थात राजनीति में जब सभी दागदार हैं, तो फिर यह शोर क्यों? सवाल का जवाब है, 'जब आदमी पानी में डूबा हो, तो उसे अपने दाग नहीं दिखते हैं।' सिर पर घड़ो पानी पड़ा हो और आप पानी-पानी हो गए हो, फिर कैसे दिखेंगे अपने दाग। मगर ऐसे लोगों की हकीकत कुछ इस तरह है-
''वो जमाना भी हमें याद है तुम कहते थे,
दोस्त दुनियां में नहीं दाग से बेहतर।''
अंत में हम तो बस यही कहेंगे-
''कोई मिटाता है, दाग-ए-दिल, ऐ दाग
जलेगा यह चिराग महशर तक।''

संपर्क : 9868113044

Saturday, November 10, 2007

लक्ष्मीजी के संग साक्षात्कार



मुन्नालाल के सपने में रात लक्ष्मीजी आई। लक्ष्मीजी ने जागृत अवस्था में मुन्नालाल पर कभी कृपा नहीं की, हमेशा परहेज ही रखा। खैर, सपने में ही सही, मगर आई तो सही। लक्ष्मीजी का आगमन हुआ, चित्त से चिंता का बहिर्गमन हुआ। मन मंदिर के सभी वाद्य यंत्र बज उठे। उसका हृदय ग्लैड-ग्लैड हुआ। उस लगा जैसे उसके भाग्य का छप्पर भी आज फट गया। बिल्ली के ही नहीं आज उसके भाग्य से भी छीका टूट गया। हालांकि आजकल ऐसी घटनाएं आम हैं। लिहाजा भाग्य के सहारे जीवनयापन करने वाली बिल्लियां भी अब बुद्धिजीवी-कर्मयोगी कहलाए जाने लगी हैं। आशा के विपरीत स्वप्न देख मुन्नालाल आश्चर्यचकित हुआ, गदगद होना स्वाभाविक था।
भावविभोर वह लक्ष्मीजी के सम्मान में चरणागत् हो गया। भक्ति-भाव देख लक्ष्मीजी भी प्रसन्न भई और बोली पुत्र मांगों क्या चाहिए। लक्ष्मीजी के कृपा वचन सुन मुन्नालाल का पत्रकार मन जागा और बोला, 'मां! साक्षात्कार चाहिए।' लक्ष्मीजी ने कहा, कमबख्त! मन ही मन मुस्कराई और सोचने लगी उल्लू को तो बाहर खड़ा किया था, अंदर कैसे आ गया? लक्ष्मीजी बोली- ठीक पुत्र, जैसी तुम्हारी इच्छा।
लक्ष्मीजी के साथ हमारे संवाददाता मुन्नालाल की बातचीत के प्रमुख अंश प्रस्तुत हैं।
- 'तमसो मा ज्यातिर्गमय' भक्त अंधकार से उजाले की तरफ जाने के लिए प्रार्थना करते हैं। मगर आप स्वयं रात्रि में ही गमन करती हैं। ऐसा क्यों?
ऐसी प्रार्थना मुझसे नहीं सरस्वती से की गई है। मेरे भक्त तो मुझे अंधकार में ही बुलाते हैं, प्रकाश में नहीं।
-आपके भक्त आपको अंधकार में ही क्यों बुलाते हैं?
क्योंकि सृष्टिं के सभी पुण्य कार्य अंधकार में ही संपन्न होते हैं।
आपकी पूजा अमावस्या की रात में ही होने का करण भी क्या यही है?
हां! यही है। अन्य कोई सवाल करो।
-क्या आपने कभी अपने भक्त-पुत्रों को समझाया नहीं कि अंधकार विनाश का और प्रकाश उन्नति का प्रतीक है?
आपने एक ही प्रश्न में दो प्रश्न कर डाले! मगर आपका पहला प्रश्न मिथ्या है। मेरे भक्त पुत्र नहीं पति कह लाए जाते हैं। पुत्र तो सरस्वती के होते हैं। जहां तक दूसरे प्रश्न का सवाल है, सरस्वती पुत्रों के लिए ही प्रकाश उन्नति का प्रतीक है। लक्ष्मी-पतियों के लिए तो अंधकार ही प्रगति-पथ प्रशस्त करता है।
-प्राय: आप एक ही स्वरूप के दर्शन होते हैं। क्या अन्य देवी-देवताओं के समान आपके अनेक रूप नहीं हैं?
स्वरूप तो मेरे भी अनेक हैं, लेकिन पृथ्वी लोक में मेरे दो रूप 'श्याम और श्वेत' ही प्रसिद्ध हैं। उनमें भी सर्वाधिक पूजा श्याम रूप की होती है। सांसरिक जीवों की धारणा है कि लक्ष्मी का केवल श्याम स्वरूप ही कल्याणकारी है।
-आपको चंचला क्यों कहा जाता है?
क्योंकि मेरे स्वामी अनेक हैं। अब तो सरस्वती पुत्र भी मेरे स्वामी बनने की कामना करने लगे हैं।
‘-कहा जाता है कि विष्णु भगवान के साथ गरुड़ पर सवार हो कर आपका आगमन कल्याणकारी है और रात्रि काल में जब आप उल्लू पर सवार हो कर अकेले आती हैं तो अशुभ होता है। क्या यह सत्य है?
यह पुरातन काल की बात है। अब परंपराएं बदल रही हैं, स्वभाव बदल रहें हैं और स्वभाव के अनुरूप मूल्य परिवर्तित हो रहे हैं। बदलते मूल्यों के इस युग में उल्लू पर सवार हो कर अकेले गमन करना ही भक्तों के लिए हितकारी है।
-उल्लू आपका प्रिय वाहन है। आपके सानिध्य में सर्वाधिक रहता है, फिर भी वह 'उल्लू' ऐसा क्यों?
क्योंकि वह मेरे प्रति आसक्त नहीं है। मेरा उपभोग नहीं करता, इसलिए आज भी उल्लू है। बिलकुल तुम्हारी तरह। तुम्हें मेरा वरण करना चाहिए था, मगर तुम साक्षात्कार में ही संतुष्ट हो गए!
-क्या 'उल्लू' मनुष्य योनि में भी पाए जाते हैं?
हां, मनुष्य योनि में दो प्रकार के उल्लू पाए जाते हैं। एक वे जो मुझे सिर पर तो लादे रहते हैं, मगर उपभोग नहीं करते। दूसरे वे जो मुझे अपने आसपास भी देखना पसंद नहीं करते, अपरिग्रह उनका आदर्श है। दोनों ही प्रकार के प्राणी अव्यवहारिक हैं। अत: मुन्नालाल यदि जीवन सफल बनाना है तो सरस्वती के साथ-साथ मेरा भी चिंतन कर। 'तमसो मा ज्योतिर्गमय' के स्थान पर 'ज्योतिर्मा तमसोगमय' का जाप कर।

संपर्क: 9868113044