Thursday, October 2, 2008

गांधी ने आत्महत्या कर ली!

हल्की-हल्की ठंड थी। रैंप पर हिठलाती माडल की तरह प्रकृति के अंग-प्रत्यंग चथड़े-चिथड़े कोहरे की भीनी चादर से बाहर झांकने का प्रयास कर रहे थे। सड़क को बोझ का अहसास कराती सरकारी बस मंजिल तक पहुंचने के लिए चेष्टा रत्ं थी। विभिन्न मुद्राओं में अपनी-अपनी सीटों पर पसरीं सवारियां भांति-भांति के जीवों की आकृति साकार कर रही थीं। कुछ सवारियां मुंह से बीड़ी का धुआं-धुआं उगल कोहरे की चिथड़ा चादर तार-तार कर फैशन शो के दर्शकों की तरह नग्न आंखों से प्रकृति के विराट स्वरूप के साक्षात दर्शन करने की चेष्टा कर रहीं थीं।
भ्रष्टाचार के शिष्टाचार में पगे विकासशील देश की तरह बस जैसे-तैसे कुछ ही सफर पूरा कर पाई थी कि झटके के साथ रुक गई। बस के साथ संवेदनशील रिश्ते जोड़ते हुए सवारियां शंका निवारण की मंशा से दरवाजे की तरफ मुखातिब होने लगीं। तभी खटपट-खटपट करते पुलिस वर्दीधारी कुछ लोगों ने बस के अंदर प्रवेश किया और अमेरिकी लहजे में सवारियों को अपनी-अपनी जगह बैठ जाने की हिदायत दे डाली। मिस्टर बुश की तर्ज पर उनकी दूसरी हिदायत थी, 'जिसके पास जो कुछ है निकाल दो।'
इसी के साथ उनमें से कुछ संयुक्त राष्ट्र प्रतिनिधियों की तरह सवारियों की खानातलाशी में जुट गए।
इकहरी धोती में लिपटा एक वृद्ध भी सवारियों की गिनती में इजाफा कर रहा था। वर्दीधारियों की चेतावनी कानों में टपकते ही उसने आंखों पर रखी गोल-गोल ऐनक के बटन नुमा शीशे साफ किए और इसी के साथ उनमें से एक व्यक्ति उसके पास पहुंच गया। तभी स्वयंभू कमांडर की आवाज गूंजी, 'अबे छोड़ ना! जाके बदन पै तो जूं भी भुख्खी मरे हैं, तू चला तिजाब वाले हथियार ढूंढनै। आगे बढ़ किसी सद्दाम अ देख।'
आतंक की स्याह लकीरों ने वृद्ध के चेहरे पर कश्मीर का नक्शा उतर आया था।
सीमापार आतंकियों की तरह अपना काम कर वर्दीधारी एक-एक कर रफूचक्कर हो गए। सरकारी कामकाज की तरह बस फिर अपने पथ पर अग्रसर हो गई।
समय और दूरी के अनुपात को झांसा देते हुए बस चंद फर्लाग की ही दूरी तय कर पाई थी पुराने चेहरे एक बार फिर बस के अंदर प्रगट हुए। मगर इस बार उनके चेहरे पर आतंकी रुआब नहीं चुनावी मौसम का नेताई सौम्य भाव था। बस में प्रवेश करते ही उनके स्वयंभू कमांडर ने हाथ जोड़ कर इस तरह बोलना शुरू किया मानों कोई नेता पिछले चुनावी वायदे पूरे न कर पाने के लिए क्षमा याचना के साथ वोट के लिए जनता के सामने पुन: याचिका दायर कर रहा हो।
थोपड़े पर सौम्य भाव उतारते हुए स्वयंभू कमांडर बोला, 'माफ करना भइया! परेसान करा, जे लो अपना माल-पत्ता। सुन भाई कंडटर्र जे ले, जिसके जितने थे बांट दें।'
हृदय परिवर्तित उनके व्यवहार को देख प्रश्न और आश्चर्य के भाव सवारियों के चेहरों पर भारत महान का नक्शा बन रहे थे, मिटा रहे थे।
इंसानी मूल्यों की तरह उतरते-चढ़ते भावों के बीच एक मुसाफिर के मुंह से अनायास ही निकला, 'अर्रे वाह! का ईमानदारी है तमैं तो ससुर पालिटिक्स में है ना चाइए था। तुम जैसेन लोग पालिटिक्स आ जावें तो, ससुर कुछ तो धरम-धोरों बचा रै।'
एक जुटता के साथ डिनर टेबुल पर काबिज पक्ष-विपक्ष की तरह आशा-निराशा के भाव स्वयंभू के चेहरे पर इस बार साथ-साथ काबिज थे।
मुसाफिर के सद्ंवचन सुन स्वयंभू बोला, 'ठीक कैरे ओ भइया! हम भी ससुर या ई चावै हैं। पालिटिक्स में कदम जमाने के लय्यां ई तमै या कष्ट दिया। ससुर! टिकट लेवें की ताई भी पैसा चइए अर चुनाव लड़वे की खातिर भी। बस याई जुगाड़ में दिन-रात एक कर रखी है। कोई बात नहीं! ऊपर वाले की जैसी मरजी।'
इस बार ऐनक वाले वृद्ध का बेदांती मुंह खुला, 'तो, फिर लोटा क्यों रहे हो?'
अंत:वस्त्रों की सीमा का अतिक्रमण करते हुए स्वयंभू बोला, 'बाब्बा! आगे साल्ला दरोग्गा खड़ा है, ख्भ् हजार में ठेक्का दिया था। तुमारे से सब मिलाकर क्भ् ही हाथ लगे, खाल्ली-पिल्ली में दस का अपनी जेब ते भरे?'
बस ठुमक-ठुमक कर पुन: आगे खिसकने लगी। अगले फर्लाग पर दरोगा तैनात थे। दरोगा जी ने हाथ दिया और खटाक की आवाज के साथ सेल्यूट के लहजे में ड्राइवर का पैर बस के ब्रेक पर पड़ा।
दरोगा जी ने बस के अंदर प्रवेश किया ड्राइवर से पूछा, 'सब कुछ ठीक है णा।'
ड्राइवर ने कहा, 'आपकी मेरबानी है, साब!'
ड्राइवर का सकारात्मक उत्तर सुन दरोगा जी के थोपड़े की चमड़ी म्0 अंश के कोण पर झुक ज्यामिति आकृति का निर्माण करने लगीं।
दरोगा जी को तसल्ली नहीं हुई। कन्फर्मेशन करने के लिहाज से इस बार उन्होंने जोर देकर पूछा, 'सब ठीक है णा, कोई राहजणी-वाजणी ता ना हुई।'
दरोगा जी को शौर्य चक्र प्रदान करने के लहजे में ड्राइवर ने जवाब दिया, 'साबबादुर के रैत्ते किस की मजाल, भला!'
ड्राइवर का कन्फर्म जवाब सुन साबबादुर का चेहरा तुषार पात से पीड़ित लता की तरह लटक गया। कद्दू सा बोझ भरा सिर लटकाए दरोगा के चरण बस से नीचे उतरे और वह कथक नृत्यांगना की मुद्रा में पेड़ के नीचे जा खड़ा हुआ।
अपनी धोती-लाठी संभाल वृद्ध महाशय भी उसी के साथ बस से उतर गए। बस फिर अपने गंतव्य की तरफ रेंगने लगी।
अहिंसक चप्पलें रगड़ते हुए वृद्ध महाशय ने दरोगा जी के समीप पहुंचे और हमदर्दी का परफ्यूम छिड़कते हुए बोले, 'साहब बहादुर! आप कुछ परेशान नजर आ रहे हैं। क्या आपकी परेशानी का कारण जान सकता हूं? मैं यदि आपके कुछ काम आ सका तो..।'
गुम चोट से पीड़ित दरोगा ने वृद्ध को झिड़का, 'के तो-तो..! तू के मेरा बाब्बा लगै। पैले अपनी परेसानी तै हल करलै। फिरै एक धोत्ति सी में लिपटा। लगै है, गरीबी रेख्खा के तले वाली रेख्खा के भी तलै का बाश्ंिादा सा, चला रामसिंह दरोग्गा की मुसीबत हल करवै। खोपड़ीए खराब ना कर, अपना रासता पकड़।'
वृद्ध ने अपने मधुर वचनों से दरोगा की चोट सहलाई और हमदर्दी की ऊष्मा से उसकी सिकाई की। ज़जबातों की गर्मी से दरोगा के सीने पर रखा पत्थर पिघलने लगा और इसी के साथ भावनाओं का स्रोत फूट पड़ा, 'कल कपतान साब के यहां सलाम ठोकने जाना है। अभी तक पचास हजार का भी जुगाड़ नहीं हुआ। साल्ला नेता भी धोख्खा दे गिया। पता नी फिरोत्ती वाला भी आएगा या नी।'
वृद्ध के बेदांती मुंह से निकला, फिरोती!
हां, एक समाजवादी से पकड़ कराई थी, दरोगा बोला।
कोहरे के चिथड़ा चादर धीरे-धीरे गायब होने लगी थी, प्रकृति के बदन से भी और वृद्ध के दिमाग से भी। इसी के साथ वृद्ध के चेहरे पर बिहार का नक्शा उभर आया।
अगले दिन कोहरे में लिपटी सुबह ने फिर मुंह चमकाया। कुछ नए उद्ंघाटनों के साथ, कुछ नए परिवर्तन और नए मूल्यों के साथ। नए मूल्य और परिभाषाओं के साथ वृद्ध सीधा मुख्यमंत्री निवास पहुंचा।
मुख्यमंत्री निवास पर आज कानून-व्यवस्था से संबद्ध प्रदेश के आला पुलिस अधिकारियों की बैठक थी। मुख्यमंत्री का दरबार सजा था, कानून-व्यवस्था स्थिति के ब्यौरे के साथ-साथ अधिकारी एक-एक कर मुख्यमंत्री के हुजूर में नजराना भी पेश कर रहे थे। नजराने के वजन के हिसाब से मुख्यमंत्री अधिकारियों की कर्तव्य परायणता, निष्ठंा और योग्यता जैसे नैतिक मूल्य परिभाषित कर रहे थे और उसी आधार पर पदोन्नति व तबादलों का निर्धारण।
वृद्ध, चिकनी चांद पकड़े टुकुर-टुकुर सब देखता रहा।
कानून-व्यवस्था का समीक्षा का दौर समाप्त हुआ। कानून-व्यवस्था के भार के साथ मुख्यमंत्री विश्राम कक्ष की तरफ चले गए। नजरानों का भार हल्का कर और नए दायित्व के भार से लदे अधिकारी एक-एक कर बाहर निकलने लगे। मगर खास कुछ अधिकारी अभी भी जमे थे। दरअसल अब सांप्रदायिक सौहार्द की बैठक शुरू होने जा रही थी।
नई सजधज के साथ मुख्यमंत्री का कक्ष में पुन: प्रवेश हुआ। मुख्यमंत्री जी बोल रहे थे, अधिकारी नोट कर रहे थे।
'प्रदेश में सांप्रदायिक सौहार्द की भावना लुप्त सी होती जा रही है। लगता है, यह शब्द ही पाताल में चला गया है। कहीं कोई हलचल नहीं। पाताल से पुन: निकाल कर लाना है, उसे जीवित करना
है। सांप्रदायिक सौहार्द हमारा नारा है, आदर्श है। देखा गया है, जब-जब दंगे हुए तब-तब
सांप्रदायिक सौहार्द का नारा बुलंद हुआ, लोगों में भावना जागृत हुई। इस विषय में हमें फिर सोचना होगा। याद रखें हम संप्रदाय के आधार पर मनुष्य-मनुष्य के बीच भेद नहीं करते, हमारे लिए सभी समान हैं। महान इस उद्देश्य को हासिल करने के लिए सभी संप्रदाय के लोगों का इस्तेमाल करना है। मगर ध्यान रखें हिंदू और मुसलमानों में सांप्रदायिक सौहार्द की भावना कुछ ज्यादा ही प्रबल है, इसलिए उनका इस्तेमाल विशेष रूप से किया जाना चाहिए। सांप्रदायिक सौहार्द हमारी प्राथमिकता है, जाओ प्रयास करों।'
बहनजी के संक्षिप्त मगर आध्यात्मिक प्रवचनों की तरह गूढ़ भाषण के रहस्य को आत्मसात कर अधिकारियों न अपनी-अपनी राह पकड़ी। मगर ठंड में सिकुड़े मेंढक की तरह वृद्ध कुछ देर तक वहीं पसरा रहा है, क्योंकि गूढ़ ज्ञान का रहस्य समझ में उसके भी आ गया था और रहस्य के आवेग से खिंची लकीरों ने उसके चेहरे पर उत्तर प्रदेश और गुजरात के मानचित्रों का एक साथ उतर आना रहस्य की गूढ़ता के पुख्ता सबूत बयान कर रहे थे।
मुख्यमंत्री जी के पास वह आया था, सफर की घटना का जिक्र करने, उस पर रोष व्यक्त करने अर्थात दरोगा की शिकायत करने। मगर वह ऐसा कर न सका। आत्मज्ञान प्राप्त हो जाने के बाद माया-मोह में लिप्त मनुष्य जिस तरह जगत मिथ्या का विचार मन में रख ब्रह्मं साक्षात्कार के लिए बेचैन होने लगता है, उसी तरह देश के शीर्ष कर्णधारों से भेंट करने के लिए वृद्ध बेचैन हो उठा। उसने सीधे देश की राजधानी की राह पकड़ी।
चमची-चमचों, पीए-पीओ और रथी-महारथियों के चक्रव्यूह का भेदन करते हुए अभिमन्यु की तरह वह देश के भीष्म पितामह 'गृह मंत्री' के सम्मुख प्रगट हो गया। सीनियर सिटीजन के रूप में अपना परिचय देते हुए उसने बैताल की कहानी की तरह शुरू से अंत तक की पूरी कहानी एक ही सांस में बयान कर दी।
वृद्ध की व्यथा-कथा सुन गृहमंत्री ने मरहम का फोया सा लगाते हुए कहा, 'महाशय ये सब राज-काज की बातें हैं, इनके चक्कर में क्यों पड़ते हो। व्यक्तिगत कोई समस्या हो तो बताओ।'
इसी के साथ मंत्री महोदय ने पीए साहब की तरफ इशारा किया और उसने वृद्ध की हथेली पर गांधी छाप दो नोट रखने का प्रयास किया।
नोट देख वृद्ध बांस की खरपच्ची की तरह कांप उठा, 'श्रीमान, प्रधानमंत्री राहत कोष से भीख लेने नहीं आया। देश गर्त में जा रहा है और आप राज-काज की बात कह कर टाल रहे हैं।'
मंत्रीजी मुस्कुराए, 'जब मुगल थे देश तब भी यहीं था। अंग्रेज आए चले गए, देश वहीं का वहीं है। फिर हमारे आने से देश गर्त में कैसे चला जाएगा?'
'देश गर्त में नहीं जा रहा है! कानून-व्यवस्था नाम की कोई चीज नहीं है, भ्रष्टाचार चरम पर है। साध्य और साधन दोनों की ही पवित्रता नष्ट कर दी गई है। मेरा मुंह भी आप नोट दे कर बंद कर देना चाहते हैं, श्रीमान।' वृद्ध ने कुनैन के से कड़वे घूंट पीते हुए कहा।
गीता का सहज भाव आत्मसात करते हुए मंत्री जी ने कहा, ' तुम गलत कह रहे हो, महाशय!
साधन वही पवित्र कहलाया जाता है, जिससे साध्य की प्राप्ति हो जाए। इस तरह हम साध्य-साधन
दोनों ही की पवित्रता बरकरार रखने के लिए हमेशा ही प्रयास करते रहते हैं। वैसे भी साम, दाम, दण्ड, भेद का पाठ भी गांधी सरीखे महानुभाव ही पढ़ा कर गए हैं। हम तो गांधी के पुजारी हैं, महाशय! यह उन्हीं का रामराज है। जिस राज में कानून का शासन हो उसे रामराज कैसे कह सकते हैं? कानून की धुरी पर रामराज नहीं चला करते। जिसे मुद्रा विनिमय को आप भ्रष्टाचार कहते हैं, वह भी गांधी के ही सिद्धांतों का आदान-प्रदान है।'
सड़क पर खड़े होकर लघुशंका करने वाले भतीजी-भतीजो की शिकायत करने की मंशा से वह चाचा के पास गया था। चाचा को छत के ऊपर खड़े हो कर लघुशंका निवृत्त करते पाया। वृद्ध को जैसे लकवा मार गया।
सुरक्षा कर्मियों ने लकवा ग्रस्त वृद्ध का शरीर गृहमंत्री निवास के बाहर एक कोने में रख दिया। अगले दिन हिंदी समाचार पत्रों में दस लाइन का एक संक्षिप्त समाचार था, 'गृहमंत्री निवास के बाहर लावारिस हालत में एक वृद्ध का शव बरामद हुआ है। उसके शरीर पर मात्र एक धोती लिपटी थी और बदन पर लटके एक धागे से जेब घड़ी बंधी थी। शव के पास से ही घुन खाई एक लाठी भी बरामद हुई है। प्राप्त जानकारी के अनुसार वृद्ध भारत भ्रमण पर निकला था। पुलिस का मानना है कि वृद्ध ने आत्महत्या की है क्योंकि उसके शरीर पर चोट के निशान नहीं पाए गए, मगर चेहरे की झुर्रीयों के बीच भारत महान का मानचित्र अवश्य अंकित था। बाद में उसकी पहचान गांधी के रूप में की गई है। कुछ लोगों का मानना है कि महात्मा गांधी नाम का एक व्यक्ति स्वतंत्रता सेनानी हुआ करता था। गृहमंत्री ने घटना के बारे में अनभिज्ञता जाहिर की है।'

2 comments:

  1. सुन्दर बिम्ब बनाती सच्ची पोस्ट...। आज की समस्याए हमारे नेताओं की पैदा की हुई जरूर हैं लेकिन इन नेताओं को पैदा करने का दोष तो हमारे सिर ही जाएगा...।

    लीजिए मेरी ताजी पंक्तियाँ...

    ले झाँक गि़रेबाँ ऐ कातिल, रमजान भी जाने वाला है।
    बापू शास्त्री का दिवस मना पड़ चुकी गले में माला है॥

    मज़हब को क्यूँ बदनाम करे, खेले क्यूँ खूनी खेल अरे।
    आँगन में मस्जिद एक ओर, तो दूजी ओर शिवाला है॥

    क्यों हाथ कटार लिया तूने,क्यों कर तेरे हाथ में भाला है?
    कहाँ पाक-कुरान को छोड़ दिया,कहाँ तेरी वो जाप की माला है?

    जब आज नमाज अता करना,या गंगाजी से जल भरना।
    तो ऊपर देख लिया करना, बस एक वही रखवाला है॥

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