Tuesday, October 16, 2007

गधे को बाप बनाना



रबुपुरा गांव की पैंठ में रह-रह कर यह आवाज आज भी सुनाई पड़ती है, 'रबुपुरा की पैंठ में मैं किसका फूफा री, रबुपुरा की पैंठ में मैं किसका फूफा री।' आवाज उस वृद्ध की है, फूफा-फूफा कहकर एक युवती जिसका शिकार कर फरार हो गई थी। हाथ में हांड़ी लेकर युवती उसके पास आई और बोली फूफा सौ रुपए उधार दे दे बदले में घी से भरी यह हांड़ी अपने पास रख ले। मैं अभी आई दूसरे दुकानदार का हिसाब चुकता कर आऊं। तेरे रुपये दे जाऊंगी, अपनी हांड़ी ले जाऊंगी। हांड़ी के मुंह पर जमी घी की पर्त धीरे-धीरे पिघलती गई और उसी रफ्तार से उसके नीचे जमा विशुद्ध गोबर प्रकट होता गया, मगर युवती अभी तक लौट कर नहीं आई। तब से आज तक वह कथित फूफा रबुपुरा की पैंठ में फूं-फा-फूं-फा करता विचरण कर रहा है।
बेचारे मुसद्दीलाल अपने दत्तक पुत्र की खोज में वात्सल्य और विरह के रिमिक्स अलापता घूम रहा है। आज सुबह ही सुबह उन्होंने हमारे दर पर दस्तक दी और बोले, 'भइया हम लुट गए। रामलाल चुना लगा गया। हम देखते रह गए और वह फरार हो गया।'
हम बोले, 'कौन रामलाल?' वे बोले, 'अरे वही, जो हमें पिता तुल्य मानता था। जिसे हमने पुत्र का स्नेह दिया था। जिसे हमने अपने घर आश्रय दिया, क्या-क्या नहीं किया हमने उसके लिए! आज हमें घर से बाहर गली में खड़ा कर गया, दगाबाज निकला कमबख्त।'
हम समझ गए कथित पिता व कथित पुत्र के रिश्तों के मध्य जमी घी की चिकनी पर्त पिघल गई। हम बोले, 'अच्छा-अच्छा वह तुम्हारा दत्तक पुत्र, रामलाल!' नम आंखें शुष्क करते हुए भाई मुसद्दीलाल बोले, 'ना-ना-ना, उस दगाबाज को पुत्र न कहो, पुत्र के नाम पर कलंक है।'
युवती ने वृद्ध को फूफा बना कर और रामलाल ने मुसद्दीलाल को बाप बना कर अपना उल्लू सीधा कर लिया। दुनिया का व्यापार ऐसे ही चल रहा है। उल्लू सीधा हो गया तो सारे जहां की नियामतें अपने कदमों तले समझो। सवाल बस उल्लू सीधा करने का है। सब अपने-अपने तरीके से उल्लू सीधा करने में जुटे हैं, कोई फूफा बना कर तो कोई बाप बना कर। बाप बना कर उल्लू सीधा करना अपेक्षाकृत सहज है, क्योंकि बाप बनाने में रिश्तों का समीकरण नहीं समझाना पड़ता। वैसे भी इंसान में बाप बनने की इच्छा प्रबल है अत: गधत्व भाव से बापत्व सहज स्वीकार कर लिया जाता है।
गधे को बाप बनाने की कहावत हालांकि सदियों पुरानी है और कहावत की पीछे छिपा रहस्य भी सर्वविदित है। फिर भी बनाने वाले गधों को बाप बना कर उल्लू सीधा कर रहें हैं और बनने वाले बन रहे हैं, देखती आंख मक्खी निगल रहे हैं, कथित पुत्र का भार ढो रहे हैं।
सभी मूल बाप गधे नहीं होते। चूंकि सभी मूल बाप गधे नहीं होते, इसलिए उल्लू सीधा करने के लिए गधे-बाप तलाशने पड़ते हैं, अर्थात गधों को बाप बनाना पड़ता है। प्रतिस्पर्धा का युग है, दुनिया तेजी से दौड़ रही है, अत: एक बाप के सहारे जीवन की दौड़ में बने रहना संभव नहीं है, इसलिए मूल बाप के अलावा एक और बाप चाहिए, 'गॉड फादर' चाहिए। एक घर का और एक बाहर का होना चाहिए।
बनने वाले जानते हैं कि बनाने वाला तुम्हें नहीं तुम्हारे गधत्व को बाप बना रहा है, अर्थात बाप, बाप कह कर तुम्हें गधा बना रहा है। बनने वाले फिर भी बन रहे हैं। एक ढूंढों हजार मिलते हैं कि कहावत चरितार्थ कर रहे हैं। गधे को बाप बनाना बनाने वाले का स्वभाव है और बाप बनना गधों का स्वभाव है। दोनों का अपना-अपना स्वभाव है। बनाने वाले बनाते रहेंगे और बनने वाले बनते रहेंगे। दुनिया का व्यापार ऐसे ही चलता है, ऐसे ही चलता रहेगा। रबुपुरा की पैंठ में वृद्ध अपने कथित साले की कथित पुत्री को खोजता रहेगा और मुसद्दीलाल अपने कथित पुत्र के कारनामों को यूं ही रोता रहेगा। रिश्तों की चिकनाई पिघलेगी, शुद्ध घी के नीचे छिपे विशुद्ध गोबर की सच्चाई भी उजागर होती रहेगी बावजूद इसके गधों को बाप बनाने का सिलसिला निर्बाध जारी रहेगा, क्योंकि यह स्वभाव है।
राजेंद्र त्यागी
संपर्क : 9868113044

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