Saturday, February 2, 2008

आदमी बंदर की औलाद!

डार्विन ने कहा आदमी बंदर की औलाद है! न मालूम डार्विन ने इस प्रकार का दावा किस आधार पर कर दिया? न जाने उनके पास ऐसे कौन से सबूत थे, जिनके आधार पर ऐसा मुंह -फट बयान देने की जुर्रत कर दी! उनके विकासवादी सिद्धांत में किसी प्रकार के ऐसे अवशेष प्राप्त होने का जिक्र भी नहीं मिलता है, जिनसे ऐसा अमानवीय दावा किया जा सके!
एक संभावना यह हो सकती है कि उन्हें आस्ट्रेलिया के क्रिकेट खिलाड़ी एंड्रयू साइमंड्स की शक्ल-ओ-सूरत के आदमी कुछ ज्यादा ही तादाद में मिल गये हों और उसी के आधार पर उन्होंने आपने विकासवाद सिद्धांत का प्रतिपादन कर दिया हो। इस तथ्य से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि उन्होंने आस्ट्रेलिया क्रिकेट टीम की लूट-खसोट की प्रवृत्ति को आधार बना कर ही अपने सिद्धांत की नीव रख दी हो!
बहरहाल आधार कुछ भी रहा हो, लेकिन इस सिद्धांत को लेकर कई शंकाएं हमारे मन का बंद द्वार खटखटा रहीं हैं। मसलन आदमी यदि बंदर की औलाद है, तो फिर बंदर से आदमी बनने का सिलसिला जारी क्यों नहीं है? अद्भुत इस विकास पर अचानक पूर्ण विराम कैसे लग गया? शंका-सवाल ़िफजूल ही पैदा नहीं हो गए हैं! उन्हें खाली दिमाग की खलल भी कहना उचित न होगा!
सवाल पैदा होने की वजह है कि कम से कम कलियुग में तो हमने किसी बंदर को आदमी बनते नहीं देखा! अलबत्ता आदमियों की हरकतें बंदराना जरूर दिखलाई दे जाती हैं।
कलियुग ही क्यों द्वापर के इतिहास में भी ऐसा कोई प्रसंग हमारे हाथ नहीं लगा, जिसके आधार पर यह कहा जाए कि कृष्ण भगवान के द्वापर में ़फलां-़फलां आदमी बंदर से विकसित होने के ताजा उदाहरण हैं। इतना ही क्यों द्वापर में ऐसे साइमंड्स की शक्ल-ओ-सूरत के आदमियों का भी तो कहीं जिक्र नहीं है।
साइमंड्सी सूरत के कुछ नायक-महानयक त्रेतायुग में अवश्य अवश्य प्राप्त हैं। भगवान राम की सेना में समूची एक ब्रिगेड ऐसे ही वीरों की थी। किंतु भगवान राम के भक्तों की प्रकृति बंदराना नहीं थी। क्रोध आने पर अथवा रावण जैसे राक्षस को मजा चखाने के लिए बंदराना हरकत कभी करनी पड़ गई हो तो उसे उनकी प्रकृति कहना उचित न होगा। दरअसल यह उनका परिस्थिति-जन्य स्वभाव था! रामभक्त भक्त तो आज भी शालीन ही पाए जाते हैं!
त्रेतायुग के इतिहास से संबद्ध किसी भी ग्रंथ में बंदर से विकसित आदमी का कहीं कोई संदर्भ प्राप्त नहीं है। अत: केवल भगवान राम की ब्रिगेड के आधार पर डार्विनी सिद्धांत के औचित्य को स्वीकारना उचित न होगा।

फिर डार्विन के मन में इस प्रकार का मानव विरोधी फितूर आया क्यों? अतत: इस बारे में हमने सोचा क्यों न किसी जहीन बुजुर्ग बंदर से ही इस बारे में बात की जाए? अत: हमने संसद भवन का रुख किया, क्योंकि वहां प्रत्येक किस्म के बंदर सहज उपलब्ध हैं!
वहां पहुंचते ही हमने सुदामा की पोटली की तरह बंदरों की जमात के बीच केले, चने और गुड़ की पोटली खोल दी। पोटली का खोलना था कि कुछ युवा व बाल बंदर उनकी और झपटे। तभी एक बुजुर्ग बंदर शायद उनकी जमात का मुखिया रहा होगा, ने किसी संगीत निर्देशक की तरह हाथ हवा में उठाए और साजिंदों की तरह बंदर शांत हो गए। हम यह देख कर हतप्रभ थे!
हमने बुजुर्ग को प्रणाम किया। बुजुर्ग ने अभिवादन स्वीकार हम से आने का कारण पूछा। हमने औपचारिकता का निर्वाह करते हुए कहा, 'यों ही दर्शन करने चला आया था!'
बुजुर्ग मुस्करा कर बोला, 'आदमी! ..और केवल दर्शनार्थ! ..कोरे दर्शन की इच्छा से तो वह बजरंगबली के मंदिर भी नहीं जाता! ..असंभव! ..नि:सकोच अपना मंतव्य व्यक्त करो, वत्स!'
बुजुर्ग का कटु सत्य सुनकर हमें अपने शुष्क चेहरे पर चंद जल की बूंदों का अहसास हुआ। इतने भर से ही लगा कि हम पानी-पानी हो रहे हैं!
हमें अपने पानी-पानी होने के अहसास पर भी आश्चर्य था, क्योंकि ऐसा होना जल-संकट के इस दौर में किसी भी लिहाज से व्यवहारिक नहीं कहा जा सकता!
हमने मुंह पर हाथ फेरा और बोले, 'मान्यवर! हमने प्रसाद आपकी सेवा में अर्पित किया था, अपने उसे ग्रहण करना उचित क्यों नहीं जाना?'
हमारा प्रश्न सुन कर बुजुर्ग गंभीर भाव से बोला, 'एक नहीं कई कारण हैं। प्रथम तो वर्तमान राजनीति में बंदरों के बीच भेली डालने का चलन बढ़ गया है।'
'..कैसे?' हमने प्रश्न किया।
'..भारतरत्न के नाम पर आडवाणी जी ने भेली डाली, वैसे! दूसरा कारण- हमारी ही संतान अब हमें बोझा समझने लगी है। चने-गुड़ दिखाकर हमें कैद कर रही है! अत: आदमियों से अब डर लगने लगा है, इसलिए सतर्कता आवश्यक है। सतर्कता हटी नहीं कि दुर्घटना घटी नहीं!' बुजुर्ग ने हमारी शंका का समाधान किया।
बुजुर्ग वास्तव में जहीन निकला और बातों-बातों में ही हमारी मूल शंका का संदर्भ भी छेड़ दिया। उसी संदर्भ की पूंछ पकड़ हमने प्रश्न किया, 'मान्यवर! तो क्या आप भी डार्विन के समान आदमी को अपनी ही औलाद मानते हैं?'
बुजुर्ग तपाक से बोला, '..इसमें न मानने की क्या बात है और डार्विन ने ही कौन नया सिद्धांत बघार दिया? ..यह तो हकीकत है!'
'मगर, अब..?' बुजुर्ग ने हमें प्रश्न पूरा नहीं करने दिया और हमारे प्रश्न का आशय समझ मध्य ही में बोला, 'हम ही ने आदमी बनने से तौबा कर ली है। हमारा प्रतिनिधि मंडल विधाता के पास गया था और अपनी व्यथा बता कर बंदर-आदमी विकास प्रक्रिया पर स्टे करा लाया!'
हमारा अगला प्रश्न था, 'ऐसा क्यों? यह तो प्रकृति के विकास में बाधा है!'
हमारा प्रश्न सुन बुजुर्ग के माथे पर बल पड़ गये, 'प्रकृति के विकास में बाधा और हम! प्रश्न करने से पूर्व अपने कर्मो की समीक्षा नहीं की शायद! करते, तो आरोप हम पर न लगाते, बरखुरदार!'
माहौल में आई गर्मी कम करने के लिहाज से मक्खनी अंदाज में हमने प्रश्न किया, '..किंतु आपकी व्यथा क्या थी?'
'हमारी व्यथा का कारण भी तुम आदमी-जाति ही थी!' बुजुर्ग ने अपने आवेग पर नियंत्रण किया और फिर अपनी व्यथा को विस्तार देते हुए बोला, ' लूट-खसोट करने में आदमी व्यस्त है और बदनाम हमें कर रहा है। गुड़ की भेली अपनों के ही बीच डाल कर तमाशा देखता है और अफवाह बंदरों के बीच भेली डालने की उड़ा दी जाती है!'
बुजुर्ग ने आसमान निहारा और फिर विचार की मुद्रा में बोला, 'आदमी की अति-बंदराना हरकत देख हम खुद ही भय खा गए और डार्विन के विकासवाद से तौबा कर ली! हम तो केवल खाली पेट ही लूट-खसोट करते हैं। हमारी औलाद पेट भरने के बाद भी लूट-खसोट जारी रखती है। अत: हमने सोच सुबह जो गलती हो गई सो हो गई, अब सांय काल तो घर लौट आना ही चाहिए!'
बुजुर्ग के चेहरे पर गंभीर भाव वृद्धि को प्राप्त होते जा रहे थे, 'लगता है, आदमी बंदर होता जा रहा है! विकास की प्रक्रिया उल्टी बहने लगी है! यही कारण है कि अब बंदर आदमी के रूप में विकसित होते नहीं दिखलाई पड़ रहे हैं!'
बात का उपसंहार करते हुए बुजुर्ग अंत में बोला, 'सुनों! दृष्टिं में थोड़ा परिवर्तन लाओ तो महसूस करोगे विकास की प्रक्रिया अभी भी चालू हैं, मगर बंदर से आदमी बनने की नहीं, अपितु आदमी से बंदर बनने की!'

Wednesday, January 30, 2008

गांधी की प्रासंगिकता


दिनांक 30 जनवरी, रात्रि के ठीक 12 बजे,
मुन्ना लाल ने जा जगाया बापू को।
बापू! ओ-बापू, नेक करवट तो बदल, बापू! मुन्नालाल ने टेर दी।
बापू ने आंखों पर से पलकों का परदा उठाया। खकारा और जीर्ण-शीर्ण धोती का पल्लू संभाला।
फिर बोला- पुत्र! इस वक्त?
मुन्नालाल फुसफुसाया- आज तुम्हारा श्राद्ध है, बापू।
इसमें नया क्या है? हर रोज ही तो मनाया जाता है! कुत्ते हलवा-पूरी खा रहे हैं। मेरे श्राद्ध के नाम पर ही तो। ..बेमतलब की बात! जगा तो ऐसे दिया, मानो आधी रात को फिर कोई 'बुद्ध' मुस्करा दिया हो! बापू ने झुंझलाते हुए कहा।
नहीं बापू! ऐसा नहीं है। बापू के तेवर भांप मुन्नालाल ने सुर नीचा किया और फिर बोला-मैंने सोचा था सुबह होते-होते तो तेरे भक्त आ घेरेंगे तुझे, इसलिए यही वक्त उचित लगा मन-तन की दो बातें करने के लिए।
बापू ने कहा, हूं! तो आ बैठ।
बापू के चरणों में बैठ मुन्नालाल बोला, 'क्यों बापू! क्या लोकतंत्र की पुनर्समीक्षा..?'
मुन्नालाल अपनी बात पूरी कर पाता तभी खड़ा हो स्साले! की आवाज के साथ रायफल की बट उसकी कमर पर पड़ी। मुन्नालाल बिलबिला उठा। तब तक बापू भी अपनी धोती संभाल सावधान की मुद्रा में आ चुका था।
मुन्नालाल की चीख और संविधान में प्रदत्त मौलिक अधिकार वाले अनुच्छेद में निहित भाषा सुन बापू फौरन भांप गया, 'लोकतंत्र का कोई प्रहरी आ धमका है।'
मुन्नालाल का पक्ष लेते हुए बापू बोला-महाशय! यह मेरा अनुचर है। मुझ से दो बातें करने आया था, श्रद्धांजलि के रूप में सरकारी संपत्ति नष्ट करना का इरादा नहीं है, इसका। मुझे भी कोई खतरा नहीं है इससे, आप निश्चिंत रहे।
मूछों पर हाथ फेर सिपाही बोला- अच्छा एक नहीं दो-दो, तू कौन है बे!
मैं-मैं ऽऽऽऽ! मुझे नहीं पहचाना? बापू ने रिरयाते हुए कहा।
सिपाही बोला, 'हां! तू त्तो ऐसे ही गांधी का सगा भतिज्जा से? अरे, चूक है गई तुझे ना पिछान्ना। चलो सोहरों, दोन्नों दरोग्गा जी के पास चलो, भूल सुधार वां ही हो जाग्गी।'
बापू ने विनय भाव से फिर कहा, जनाब मेरी बात मानो, यकीन करो मैं ही तो गांधी हूं, महात्मा गांधी!
सिपाही बोला- हां, स्साला! इस देश का तो हर तीसरा आदमी गांधी है या फिर गांधी का चेल्ला। हवालात में एक रात काटेगा, बस गांधी बनने का सारा भूत उतर जागा।
सिपाही ने दोनो की कलाई थामी और जा पहुंचा थाने।
कुर्सी पर पद्मासन लगाए दरोगा निर्लिप्त भाव से गांधी छाप नोटों पर उंगलियां चलाने में मगन था। सिपाही ने दरोगा के हुजूर में सलाम ठोका। समाधिस्थ दरोगा का ध्यान भंग हुआ।
मौलिक अधिकार की भाषा का सटीक इस्तेमाल करता हुआ दरोगा सिपाही पर चिल्लाया- अबे ओ भूतनी के, किन कंगालों को पकड़ लाया?
मंजन के विज्ञापन की तरह दांत निपोरता सिपाही बोला, साहब ये दोनो गांधी समाधि से पकड़े हैं। बूढ़ा अपने आप को गांधी बताता है!
दरोगा ने गांधी छाप टकसाल जेब में ठूंसी और गधे की तरह आसमान की तरफ मुंह फाड़ते हुए बोला, सालो पर रख दे देसी कट्टा, ठूंस दे हवालात में। सुबह खबर लेंगे।
बापू ने अंतिम प्रयास किया- जनाब जरूर कोई गलत फहमी हुई है। मैं गांधी ही हूं, जनाब, मोहन दास वल्द करम चंद। जनाब, वही गांधी जिसकी हत्या गोडसे ने की थी। चाहे तो दीवार पर टंगे फोटो से मेरी शक्ल का मिलान कर लो।
दरोगा बोला, ठीक है! मान लेता हूं, तू ही गांधी है। मगर किस ने सलाह दी थी दीवार से उतर कर जमीन पर आने की। दीवार से उतरने की हिमाकत की है तो सजा भी भुगत और कुछ नहीं तो अपना वायदा ही पूरा कर।
बापू बोला- कैसा वायदा, जनाब?
भूल गया! दरोगा आगे बोला- दीवार पर टंगा फोटो यदि तेरा ही है तो फोटो में पंजा भी तेरा ही होगा?
बापू बोला हां, जनाब!
दरोगा ने हाथ फैलाते हुए कहा- ठीक है तो फिर ला! हाथ पर अपने फोटो वाला नोट रख। तेरा वायदा भी पूरा हो जाएगा, नोट जेब में रहेगा तो तेरी शक्ल भी याद रहेगी।
बापू बोला- मगर जनाब! मैने तो जीते जी भी कभी नोटों के हाथ नहीं लगाए, अब तो बात ही अलग है।
दार्शनिक अंदाज में दरोगा बोला- यही तो तेरी भूल थी। अपने भक्तों की तरह यदि तू भी आजादी को कैश करता तो कोई भी गोडसे तेरी हत्या न करता! मरने के बाद तेरी आत्मा नीलाम न होती और न ही इस तरह रात हवालात में काटनी पड़ती। पकड़ा जाता भी यदि कभी तो नोट दे कर छूट जाता। अपने भक्तों की तरह एक के बाद एक घोटाले करने पर भी ईमानदार कहलाता। नोट नहीं तो कोई बात नहीं हवालात में रह, सुरक्षित रहेगा। यहां कोई भी गोडसे तुझे घायल तक नहीं कर पाएगा।
दरोगा ने इशारा किया। सिपाही ने हुकुम बजाया और दोनो को हवालात में डाल दिया। गांधी और गांधी के अनुचर ने पूरी रात हरि कीर्तन कर गुजारी।
भोर हो चुकी थी। गांधी की आत्मा हवालात में कैद थी और आत्मविहीन समाधि पर देश के कर्णधार श्रद्धासुमन अर्पित कर रहे थे।
थाने में बैठा दरोगा गांधी की प्रासंगिकता पर मंथन कर रहा था। 'एक भी नोट नहीं कमबख्त की जेब में। जमानत के लिए भी कोई नहीं आया। कितना अप्रासंगिक हो गया है, बेचारा।'
दूसरी तरफ नेता भाषण झाड़ रहा था- बापू आज भी प्रासंगिक है। उसका सिक्का आज भी लुढ़क रहा है। लाठी में आज भी दम है उसकी। बकरी भी जवान है। दूध भी उसका सूखा नहीं। क्योंकि बापू आज भी प्रासंगिक है!
भाषण समाप्त हुआ नेता घर पहुंचा। घर पर दरोगा मिला। पालतू कुत्ते की तरह दुम हिलाते हुए दरोगा बोला, सरकार गलती हो गई। आज नौकरी बचा लो माई-बाप।
नेता बोला अबे, रिरयाता ही रहेगा या कुछ बकेगा भी, चोट्टी के।
सरकार वचन दो नौकरी नहीं जाने दोगे! दरोगा ने कहा।
नेता बोला- ठीक है, ठीक है बक तो सही।
जनाब गलती हो गई, वो है ना कमबख्त सिपाही राम सिंह, बापू और उसके चेले को पकड़ लाया। मेरी आंख पर भी पट्टी बंधी थी।
वक्त खराब था सरकार, बापू को हवालात में डाल दिया। सरकार गलती हो गई।
दरोगा की बात सुन नेताजी अवाक रह गए। कड़कती ठंड में भी गंजी चांद पसीना-पसीना हो गई। पसीना पोंछा, फिर कुछ सोचा और उछल पड़ा, अंधे के हाथ बटेर लग गई हो जैसे।
फटे होंठ कान तक खींच कर बोला- अरे दरोगा कमाल कर दिया, तूने। तेरा तो मुंह चूमने को मन करता है।
पतझड़ की सी लता की तरह दरोगा हवा में झोंके खाने लगा।
नेताजी ने दरोगा को तसल्ली दी। घबरा मत तेरी नौकरी नहीं तुझे तो पद्मश्री दिलाऊंगा हां, पद्मश्री। मगर कुछ ऐसा करना, रिहा न हो पाए बापू।
बात दरोगा के सिर से ऐसे गुजर गई जैसे भारत के नागरिक के सिर पर से देसी नेता का अंग्रेजी भाषण।
नेताजी ने दरोगा को फिर तसल्ली दी ठीक कह रहा हूं मैं। रिहा मत करना बापू को। बहुत सम्मान है, उसका हमारे मन में। देख, किसी तरह की तकलीफ न हो उसको। मगर रिहा मत करना। रिहा हो गया तो सत्ता खतरे में पड़ जाएगी। बकरी का दूध सूख जाएगा, नीलामी बंद हो जाएगी।
बापू कैद है! ..कैद ही रहने दे! ..क्योंकि बापू आज भी प्रासंगिक है!
बापू तब से कैद ही है! नेता स्वराज का सुख भोग रहा है और दरोगा पद्मश्री का!

Monday, January 28, 2008

राष्ट्रभाषा हिन्दी का अपमान

रात स्टार प्लस टीवी चैनल पर एक अवार्ड फंक्शन के दौरान हिन्दी भाषा की खुल कर खिल्ली उड़ाई जा रही थी और हिन्दी फिल्म जगत की जानीमानी हस्तियों के साथ कांग्रेस सांसद राजीव शुक्ल, भाजपा सांसद शत्रुघ्न सिन्हा व महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री विलास राव देशमुख हिन्दी के अपमान पर मुस्करा रहे थे।
स्टार प्लस पर 'नोकिया 14 एन्युअल स्टार स्क्रीन अवार्ड' वितरण समारोह की झलकियां दिखलाई जा रही थी। मंच संचालन एक महिला के साथ साजिद खान कर रहे थे। समारोह के प्रारंभ में साजिद खान ने स्वयं को परिमल त्रिपाठी के रूप में प्रस्तुत किया और मंच-संचालन राष्ट्रभाषा हिन्दी में करने की घोषणा की। घोषणा के साथ ही समारोह में उपस्थित लोगों के चेहरों पर मुस्कान दौड़ने लगी। इसी के साथ शुरू हो गया हिन्दी के उपहास का क्रम। साजिद खान अंग्रेजी का हिन्दी में भ्रष्ट अनुवाद कर करके लोगों को हंसाने लगे। इस भ्रष्ट अनुवाद के तहत गीतकार के स्थान पर पद-लेखक, डायलॉग के लिए वार्तालाप और डिस्ट्रिब्यूशन का अनुवाद विभाजन के रूप में कर मनोरंजन किया जाता रहा। यह क्रम काफी देर तक चलता रहा।
खेदपूर्ण और शर्मनाक बात यह है कि उस समारोह में जिनके बीच हिन्दी का अपमान किया जा रहा था, वे सभी हिन्दी के बल पर ही स्टार बने हैं और हिन्दी ही की कमाई से अरबपति बने हुए हैं। इससे भी ज्यादा शर्मनाक बात यह है कि कांग्रेस सांसद राजीव शुक्ला और भाजपा सांसद शत्रुघ्न सिन्हा जिनकी मातृभाषा शायद हिन्दी ही होगी! वे भी साजिद की चुटकियों पर हंसते रहे। जबकि यह उन दोनों के लिए यह निहायत ही अपमानजनक वाकया होना चाहिए था। श्री सिन्हा तो उस भाजपा के नेता है, जो हिन्दी, हिन्दु, हिन्दुस्तान पर गर्व करने का दावा करती है।
यह राजभाषा हिन्दी अथवा हिन्दी भाषा-भाषी इस राष्ट्र के करोड़ों लोगों का ही अपमान नहीं है, अपितु समूचे राष्ट्र का अपमान है। सरकार से मेरा आग्रह है कि जिस प्रकार राष्ट्रगान, राष्ट्रध्वज के अपमान के लिए दण्डित करने का प्रावधान है, उसी प्रकार राजभाषा हिन्दी का अपमान करने वालों के खिलाफ भी कानून बनाया जाना चाहिए। वोट बैंक लालच में यदि सरकार ऐसा करने में असमर्थ है, तो फिर हिन्दी से राजभाषा का कथित सम्मान भी वापस ले ले। हिन्दी अपने बल पर अपना सम्मान सुरक्षित कर लेगी।

Saturday, January 26, 2008

गणतंत्र का नारको

'सुबह राजपथ जाऊंगा और गणतंत्र की परेड देखकर देशभक्ति का परिचय दूंगा', ऐसा विचार कर मुन्नालाल लिहाफ ओढ़कर लेट गया। धीरे-धीरे नींद ने उसे आगोश में ले लिया। वह नारको टेस्ट की स्थिति में पहुंच गया। उसका अवचेतन जागृत होने लगा और इसके साथ नारको एनालिसिस भी शुरू हो गया।
वह राजपथ पर खड़ा है। विश्व के सबसे बड़े गणतंत्र की झांकियां एक-एक कर उसके सामने से गुजर रही हैं। वह भावविभोर है। बबूल के पेड़ से रिसते चिपचिपे गोंद की माफिक उसके शरीर के एक-एक रोएं से राष्ट्रवाद फूट-फूटकर बाहर आ रहा है।
परेड का आंखों-देखा हाल बयान करने वाले उद्घोषक की आवाज उसके कानों में पड़ी, 'इस समय सलामी मंच के सामने है मनोहर झांकी 'गणतंत्र की सुरक्षा'। राष्ट्रभक्ति का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत करती, इस झांकी में देश के कर्णधारों को गणतंत्र की सुरक्षा में जी-जान से जुटे देखा जा सकता है।'ं
झांकी के आगे-आगे 'हम लाए हैं तूफान से किश्ती निकाल कर, इस देश को रखना मेरे बच्चों संभाल कर' राष्ट्रीय धुन के साथ राजपथ पर एक बैंड प्रकट होता है और उसके पीछे -पीछे रेंगती झांकी। मुन्नालाल के सामने भारत महान का विशाल नक्शा है। उसमें देश की संपन्नता दर्शाई गई है और सुरक्षा के लिए श्वेत वस्त्रधारी चील, कौए और कुछ गिद्ध उसके चारों ओर मंडरा रहे हैं। सुरक्षा झांकी सलामी मंच के सामने से गुजरती हुई आगे बढ़ जाती है।
मुन्नालाल के कानों में 'सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा' की धुन गूंजती है और इसी के साथ सलामी मंच के सामने लोकतांत्रिक परंपरा की झांकी का आगमन होता है। झांकी का नाम भी 'लोकतांत्रिक परंपरा' ही है। झांकी में मरियल-से दो बैल एक जीर्ण-शीर्ण छकड़ा खींच रहे हैं। उस पर मलिन-सा मानव तन खड़ा है, जिसके पेट के अंदर स्प्रिंग जैसा गुच्छा-सा दिखाई पड़ रहा है, शायद उसकी आंतें हैं।
इसके अलावा, उसके पेट में और कुछ भी नहीं है। उसके हाथ में झुनझुना-सा एक खिलौना है, जिससे वह विभिन्न चित्र अंकित कागजों पर बार-बार ठप्पा लगा रहा है। उसी छकड़े पर दो नेता भी हैं। दोनों नेता उस व्यक्ति को अपनी-अपनी ओर खींच रहे हैं। इस खींचतान में व्यक्ति न रो पा रहा है और न ही हंस पा रहा है।
गुमसुम-सा खड़ा वह व्यक्ति कभी हाथ के झुनझुने की ओर देख लेता है तो कभी-कभी निरीह भाव से नेताओं की ओर। इसी छकड़े पर टंगे एक बैनर पर लिखा है, 'पहले हम पर-अधीन थे, अब स्व-अधीन हैं। हम पहले भी अधीन थे, अब भी अधीन हैं।'
उद्घोषक घोषणा करता है, 'अब आप जिगर थाम के बैठिए'। मुन्नालाल जिगर पर हाथ रखता है, किंतु निराश होकर वह तुरंत जिगर के स्थान से हाथ हटा लेता है। उसे याद आता है, पत्नी के इलाज के एवज में जिगर तो डॉक्टर को दे दिया था।
'जय जवान-जय किसान' की धुन निकालता बैंड सलामी मंच के सामने से गुजरता है। उसके पीछे-पीछे विकास पथ पर अग्रसर देश की तस्वीर प्रस्तुत करती झांकी मंच के सामने आती है। झांकी में उजडे़ खेत हैं। खेतों में 'सेज' बिछी है। उन पर विराजमान संपन्न लोग खा-पी रहे हैं, जश्न मना रहे हैं।
उसके पीछे विशाल ठूंठ खड़ा है। उसका खंडहर बता रहा है कि कभी यह भी हराभरा विशाल वृक्ष था। उस पर दो मानव शरीर लटके हैं, जिनके गले में रस्सी के फंदे पड़े हैं। जुबान अपनी हद का अतिक्रमण कर मुंह से बाहर लटक रही है, हाथ की मुट्ठियां भींची हैं। फटी धोती के टुकड़ों से उनके शरीर के गोपनीय भाग ढके हैं, शेष शरीर वस्त्र विहीन हैं। पास ही में एक हल उलटा पड़ा है।
'जय जवान-जय किसान' की धुन के साथ हरित क्रांति की प्रतीक यह झांकी भी परंपरा का निर्वाह करते हुए मंच के सामने से गुजर गई। प्रतीक गान 'यत्र नार्यस्तु पूज्यंते, रमंते तत्र देवता' की धुन के साथ मंच के समक्ष नई झांकी का आगमन हुआ। सुसज्जित एक वाहन पर सिर झुकाए एक नारी विलाप कर रही है। उसके दोनों हाथ वक्षस्थल को ढकने का असफल प्रयास कर रहे हैं। दो व्यक्ति शरीर पर लिपटा उसका चीर खींच रहे हैं। पास ही अ‌र्द्धवस्त्रा दो सुंदरियां उसकी ओर देखकर मुस्करा रही हैं। पा‌र्श्व में टंगे बैनर पर लिखा है, 'नारी सम्मान'।
उद्घोषक की आवाज में सहसा ही उत्साह का संचार होता है, 'बच्चे राष्ट्र की धरोहर हैं'। इस उद्घोषणा के साथ ही वातावरण में 'बच्चे देश का भविष्य हैं' की धुन गूंजने लगती है और धुन के साथ ही वाहन पर बने मंच पर भविष्य का निर्जीव तन पड़ा दिखाई देता है। वीभत्स से दिखने वाले एक व्यक्ति के हाथ में छुरा है। छुरे का इस्तेमाल वह 'भारत के भविष्य' का भविष्य संवारने में कर रहा है। ऐसे ही कुछ और तन भी इधर-उधर बिखरे पड़े हैं।
सबसे अंत में 'मेरी दिल्ली मेरी शान' झांकी झलक मुन्नालाल के जहन में अवतरित होती है। दिल्ली पुलिस का बैण्ड 'दिल्ली पुलिस सदैव आपके साथ' की मातमी धुन के साथ झांकी की अगवानी कर रहा है। झांकी पर एक बैनर टंगा है। जिस पर लिखा है, 'जनसंख्या नियंत्रण में अव्वल प्रदेश, दिल्ली प्रदेश' एक बड़े से खुल ट्रक पर सजी-संवरी एक ब्लू-लाइन बस शोभायमान है। उसके टायरों के तले रिटायर शरीर पड़े हैं।
धुन धीरे-धीरे चीत्कार में बदलने लगती है। उसी चीत्कार के मध्य से मुन्नालाल के कान में एक मर्मस्पर्शी आवाज गूंजती है, 'चल खुसरो घर आपने सांझ भई चंहु ओर'। एक झटके के साथ मुन्नालाल चारपाई से खड़ा हो गया। आंखें मली, सूरज का चेहरा मलिन था, सुबह उदास थी।


Tuesday, January 22, 2008

मेरे घर में संसदीय प्रणाली!

मेरे परिवार के लोकतांत्रिक ढांचे पर जब से संसदीय प्रणाली काबिज हुई है। मेरा घर, घर नहीं विधानसभा अखाड़ा बन गया है।
माइक नहीं है, मगर चकला-बेलन का उन्मुक्त प्रयोग होता है। थपथपाने के लिए बैंच नहीं, मगर थाली-परांत का बेझिझक इस्तेमाल किया जा रहा है।
आपातकालीन किसी भी स्थिति से निपटने के लिए बहू चप्पल-सैंडल पैरों में नहीं हमेशा हाथ में रखती है। बेटा बूट के तस्मे कसना हद दरजे की बेवकूफी समझता है। पौत्र बात-बात पर गर्दभ स्वर में हूट करने के वोकल व्यायाम में जुटा है।
पत्नी जब-जब भी सम्मानित सदस्यों के घेरे में घिर जाने के भय से आशंकित होती है, तब-तब सदस्यों को सदन से निष्कासित करने की धमकी देने लगती है।
सम्मानित सदस्यों की बहुमूल्य राय में मैं 'आउट डेटिड' हो गया हूं। दर्शक दीर्घा (घर के दरवाजे पर बनी बैठक) मेरे लिए आरक्षित कर दी गई है। उसके अलावा मैं कहीं कदम नहीं रख सकता क्योंकि ऐसा करने पर मेरे खिलाफ 'प्रिव्लेज' का मामला बनना तय है।
पतली गली से बर्हिगमन। संसदीय भाषा का अखंड पाठ। सदन कूप के अंदर जौहर दिखलाना। मां को आदरणीय कह-कह कर उल्टे लोटे पानी पिलाना। मेरे परिवार की परम्परा सी बन गई है। कुल मिलाकर मेरा परिवार ऐसे सभी मानदंड आत्मसात कर घर को आदर्श सदन बनाने पर तुला है, जिन्हें अपना कर सम्मानित कोई भी सदस्य 'बैस्ट पार्लियामंटेरियन' का खिताब हासिल करने की लालसा रखता है।
बात एक रात की है। पौत्र ने पानी पीने वाली लुटिया बजाई। भूकंप के झटको से लड़खड़ाती कच्ची दीवार की मानिंद जर-जर हमारा शरीर अज्ञात किसी आशंका से कांपने लगा। पता नहीं आज किस की लुटिया टांगने का मुहूर्त आ गया है।
लुटिया की कर्कश आवाज कानों में पड़ते ही घर में अचानक चहलकदमी शुरू हो गई। सदन का कोरम पूरा करने की मंशा से परिवार के सदस्य एक दूसरे को हॉल की तरफ खींचे ला रहे थे।
हॉल मेरे घर का वह सदन है, जहां बैठ कर सम्मानित सदस्य घर-परिवार की चिंता में मगरमछी आंसू बहाते हैं। अधिकार और मौलिक अधिकार के नाम पर कुत्ते-बिल्लियों की तरह लड़ते हैं।
कोरम पूरा करने की गंभीरता भांप हमने अंदाजा मारा हो-न-हो मसला जरूर अविश्वास प्रस्ताव से जुड़ा होगा। वैसे अविश्वास मेरे परिवार का स्थायी धर्म है। एक दूजे पर विश्वास करना हमारे यहां अधर्म है। फिर भी विश्वास और अविश्वास पर यदाकदा सदन की बैठक बुला ही ली जाती है।
मसला कुछ भी न था। मसला, फिर भी था। मसला बस शक्ल दिखाने से जुड़ा था। इसलिए बैठक का एजेंडा मामूली था।
'जन गण मन' के उपरांत सदन की बैठक शुरू हुई। लघु पुत्र खड़ा हुआ और बिन प्रसंग ही चीखने लगा। अध्यक्ष की कुर्सी पर विराजमान उसकी अम्मा ने व्यवस्था देते हुए बैठने का इशारा किया।
बेटे ने जिद्द पकड़ी।
अध्यक्ष ने पैंतरा बदला- 'अच्छा चल पहले तू ही बोल ले। प्रश्नकाल बाद में शुरू कर लेंगे।' अध्यक्ष ने व्यवस्था परिवर्तन कर नई व्यवस्था फेंकी।
दीर्घ पुत्र ने नियम-उपनियमों की पुस्तक हवा में लहराते हुए 'प्वाइंट आफ आर्डर' उछाला।
सत्तापक्ष का पक्ष लेते हुए अध्यक्ष
गुर्राई-'सदन सर्वोच्च है। कोई भी नियम उससे ऊपर नहीं है।'
दीर्घ बैठ गया, यह सोच कर कि अध्यक्ष की इस व्यवस्था से वह स्वत: ही सभी कायदे-कानून से ऊपर हो गया।
अपने पति का अपमान समझ बहू ने हवा में बेलन घुमाया। पति ने 'चीफ व्हिप' के लहजे में बैठने का इशारा किया। बहू बड़बड़ाती बैठ गई।
लघु ने बोलना शुरू किया-'हमारे जन्म दिन की वीडियो फिल्म नहीं बनाई गई। बड़े भइया का यह रवैया पक्षपात पूर्ण है। सदन को इसकी निंदा करनी चाहिए।'
बिना बारी के ही बहू ने प्रतिवाद किया-'हमारी शादी की फिल्म बनवाने के नाम पर तुम्हारे बाप ने तोंबा सा मुंह बना लिया था। तब तो तुमने भी मुंह पर टेप चिपका ली थी। अपने साथ गुजरी तो कैसे बकरे की तरह मिम्यां रहे हो।'
अध्यक्ष ने व्यवस्था दी-'बाप सदन में नहीं है, इसलिए उसका नाम लेना सदन की मर्यादा के खिलाफ है। इसे कार्यवाही से निकाल दिया जाए।'
साड़ी का पल्लू कमर में खोंसती बहु बोली, 'सदन में न सही दर्शक दीर्घा में तो बैठा-बैठा खकार रहा है। एक सदस्य ने सम्मानित दूसरे सदस्य पर आरोप लगाया है, इसलिये मामला सदस्य के विशेषाधिकार हनन का बनता है, ससुर जी को सदन में तलब किया जाए।'
लघु के दिल में बाप प्रेम जागृत हुआ। उसने जूता भाभी की तरफ उछाला और वक्तव्य हवा में धकेला, 'बाप को तोंबा कहती है।'
अध्यक्ष ने सदन की गरिमा का हवाला दिया।
मगर अध्यक्ष की यह व्यवस्था भी शोर-गुल में डूब कर रह गई। बाप का पक्ष लेते हुए लघु फिर चिल्लाया, 'सदन चाहे जाए भाड़ में, मगर बाप को तोंबा नहीं कहने दूंगा।'
जवाब में बहू ने लघु के सिर पर बेलन दे मारा।
अम्मा ने अपना सिर बचाते हुए सदन की कार्यवाही पंद्रह मिनट के स्थगित कर दी।
यानी के सिर फुटव्वल के लिए पंद्रह मिनट की खुली छूट दे दी। सदन की बैठक फिर शुरू हुई।
पौत्र ने सम्मानित दोनों सदस्यों के खिलाफ विशेषाधिकार हनन का प्रस्ताव पेश किया।
अम्मा ने मामला रफा-दफा करने की गर्ज से प्रस्ताव विशेषाधिकार समिति के सुपुर्द कर अपना दामन विवाद से बचाया। निरीह जनता की तरह दर्शक दीर्घा में बैठे-बैठे हम खून के घूंट पीते रहे और कुछ इस तरह सोचते रहे-''वाह रे, सदन! जिन नियमों के कारण तू सर्वोच्च कह लाया, उन्हीं का हंता कहलाया।
नियम बनाना तो तेरा अधिकार था। नियम तोड़ने का अधिकार तुझे किसने दे दिया। सदन की गरिमा का कभी कुछ तो ख्याल रखा होता। अपने हित त्याग कभी तो समूचे परिवार के बारे में भी सोचा होता।''

Sunday, January 20, 2008

महंगाई का अर्थशास्‍त्र- दो

उम्मीदवार ने दरवाजा खटखटाया,
मतदाता ने दरवाजा खोला।
फिर अरहर की दाल से पीले दांत
निपोर कर बोला।
अरे! यह क्या?
तुम तो प्याज की तरह बाजार से गायब थे।
नई फसल की तरह इस आवक के पीछे राज क्या है?
कुछ तो बतलाओ वत्स, बात क्या है?
उम्मीदवार ने पहाड़ी आलू सा मुंह खोला।
फिर यूं बोला-
तेरे द्वार पर आया हूं,
बस वही एक अदद वोट मंगने आया हूं।
मतदाता भाव बढ़ाते हुए बोला-
वोट देना मजबूरी है।
इसलिए वोट तो जरूर मिलेगा।
मगर आलू-प्याज का हिसाब देना पड़ेगा।
अभी तक इमली के पत्ते पर दंड लगाई है।
मतदाता को खूब राह दिखाई है।
बच्चू! अब मतदाता की बारी है।
अब हम तुम्हें तेल दिखाएंगे,
तेल की धार दिखाएंगे।
दाल आटे का भाव बताएंगे।
महंगाई की मार क्या होती है,
इसका अहसास कराएंगे।
उम्मीदवार ने आदतन पाला बदला।
बातों-बातों में बातों का रस घोला।
फिर कुछ इस तरह बोला।
माई-बाप, मेरे आका, मेरे मालिक।
महंगाई तो प्रकृति का प्रकोप है,
उस पर नहीं किसी का जोर है।
चाहता तो मैं भी हूँ,
हर चीज टके सेर बिक जाए।
ईमान की तरह हर चीज सस्ती हो जाए।
मगर फिर 'अंधेर नगरी चौपट राजा'
की कहावत तुम्हीं दोहरा ओगे।
फिर मुझे ही मूर्ख ठहराओगे।
प्याज के दाम बढ़ा कर हमने ज्यादती नहीं की है।
बस गरीब के 'खाजे' को अहमियत दी है।
तुम्ही तो कहते थे,
किसी भी राज ने गरीब को सम्मान नहीं दिया है।
हमने प्याज के भाव बढ़ा कर,
उसे मेवों का सा सम्मान दिया है।
गरीब पर कम से कम एक तो उपकार किया है।
इस पर भी आंख दिखाते हो,
वोट न देने का डर जताते हो।
वोट न दोगे, वोट फिर भी तेरी ही पाऊंगा
सुन! असली न सही,
बोगस वोट से जीत कर दिख लाऊंगा।
ऊपर वाले की दुआ रही,
तो तेरे ही नाम के वोट से
संसद पहुंच जाऊंगा !
संपर्क – 9868113044

Saturday, January 19, 2008

महंगाई का अर्थशास्‍त्र

मस्टराइन ने मास्टर के हाथ में रोटी पकड़ाई।
मास्टर ने त्यौरी चढ़ाई।
कमबख्त! हाथ में सूखी रोटी पकड़ा दी।
शर्म नहीं आई।
कम से कम दाल का पानी ही बना लाती।
मास्टर के तेवर देख मस्टराइन मुस्‍कराई,
अरे, बैठे-ठाले नखरे दिखाते हो।
जमीन पर बैठे-बैठे
आसमान की उड़ान भरते हो।
अरे, ईमान से भी ज्यादा महंगे हैं,
दाल के भाव।
भाव अपने 'लेवल' में लाओ।
मास्टर फिर झल्लाया।
दाल नहीं थी, तो आलू ही भून लाती।
कम से कम रोटी तो निगली जाती।
मस्टराइन को मास्टर पर तरस आया,
गुस्से का भाव बे-भाव पचाया।
फिर मास्‍टर को इस तरह समझाया।
अरे, आजकल आलू के नखरे भी,
तेरे नखरों से कम नहीं हैं।
दिवाली पर तो बनाया ही, था आलू का चौखा।
होली पर फिर मिल जाए, यह भी कुछ कम नहीं है।
मास्टर की अकल में बात धंसी नहीं।
वह फिर बड़बड़ाया।
चल छोड़ दाल-आलू की भाजी,
कुछ नहीं था, तो नमक के साथ प्याज ही रख लाती।
प्याज का नाम सुन मस्टराइन भर्राई,
आंख में कड़वे तेल से आंसू लिए चिल्लाई।
दिमाग फिर गया है तेरा,
दाल-आटे के भाव का नहीं तुझे बेरा।
सुराज में रोटी मिल रही है, खैर मना।
आलू-प्याज को अपना व्यसन न बना।
संपर्क : 9868113044